सौ सुनार की, एक सरकार की !

Sarafa 9web

 

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मोटी बात ये है कि टैक्स तो देना ही पड़ेगा. हर कोई चाहता है कि टैक्स न देना पड़े. सरकार को टैक्स चाहिए होता है और उसे वह कहीं न कहीं तो लगाना ही पड़ेगा. सराफा पर जो टैक्स लगाया है वह मूल रूप से सही है और इसका मैं स्वागत करता हूं. जहां तक मेरी समझ है इन्होंने छह करोड़ रुपये सालाना कारोबार करने वाले व्यापारियों को इससे मुक्त रखा है, मैं जिसे समझता हूं ठीक ही है और विरोध तो होता ही रहता है. देखिए सराफा में नंबर दो का धंधा बहुत ज्यादा होता है तो शायद यह कदम इस पर रोक लगाने के लिए उठाया गया होगा. जीविका का सवाल है तो विरोध-प्रदर्शन चल रहा है. विरोध करने से कोई चीज सही और गलत नहीं होती.’

भरत झुनझुनवाला, अर्थशास्त्री

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गोरखपुर के कारोबारी श्याम बरनवाल कहते हैं, ‘हमें टैक्स देने से इनकार नहीं है. हमारा विरोध उत्पाद शुल्क लगाने से है. सरकार इसके बजाय वैट या कस्टम ड्यूटी बढ़ा दे हमें कोई दिक्कत नहीं.’ बहरहाल, पिछले एक महीने से जारी हड़ताल से छोटे कारोबारियों की कमर टूट गई है क्योंकि सराफा कारोबार ठप होने से सबसे ज्यादा मार उन पर ही पड़ी है. अलग-अलग शहरों के बड़े व्यापारियों द्वारा अपने स्तर पर फंड बनाकर या चंदा जमा करके उनकी मदद की कोशिश की जा रही है. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में सराफा मंडल अध्यक्ष शरद चंद्र अग्रहरि ‘बबलू’ बताते हैं, ‘हमारे आंदोलन को एक महीना हो गया है, लेकिन सरकार की ओर से कोई माकूल जवाब नहीं आया है. भाई साहब! हमारे शहर के कारोबारियों की स्थिति गड़बड़ हो चुकी है. छोटे कारीगर भुखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं. हम बड़े कारोबारियों से चंदा इकट्ठा करके छोटे कारोबारियों के लिए राशन-पानी की व्यवस्था कर रहे हैं. मोदी हम व्यापारियों के वोट से जीतने वाले व्यक्ति हैं. अब वे हम लोगों को ही कुछ नहीं समझ रहे हैं. इसका खामियाजा इन्हें भुगतना पड़ेगा. अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इनकी बोहनी तक नहीं होगी. ये सब इस व्यवसाय से जुड़े 10 फीसदी मल्टीनेशनल कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है. ये रिलायंस, टाटा जैसी कंपनियों का कुचक्र है जिसमें छोटे कारोबारियों को फंसाया जा रहा है. सरकार चाह रही है कि यही लोग व्यापार करें. हम लोग कोई ऐसा काम नहीं कर रहे हैं जो लोकतंत्र के खिलाफ हो. अगर सरकार नहीं मानती है तो विरोध-प्रदर्शन और तेज किया जाएगा.’