जारी रहेगी प्रफुल्ल बिदवई की लड़ाई

पिछले साल जब मोदी सरकार ने आते ही वह आईबी रिपोर्ट जारी की जिसके अनुसार कुछ ‘देशद्रोही’ लोग व संस्थाएं ‘विकास’ से जुड़ी परियोजनाएं रोककर भारत की वृद्धि दर दो प्रतिशत कम कर रहे हैं, तो उसमें प्रफुल्ल और उनके बनाए परमाणु बम व अणु ऊर्जा विरोधी मंच ‘सीएनडीपी’ का नाम शुरुआती पन्नों पर था. तब मोदी का शबाब चरम पर था लेकिन प्रफुल्ल बिदवई ने कॉनस्टीट्यूशन क्लब में प्रेसवार्ता कर निडरता से इस दुष्प्रचार का मुंहतोड़ दिया और सरकार को आरोपों को साबित करने की खुली चुनौती दी. विकास की जनविरोधी परिभाषा को अंतिम सत्य मानकर उसे पुलिस मैन्युअल में बदल देने और सभी असहमतों को ठिकाने लगाने वालों को दी गयी प्रफुल्ल बिदवई की वह चुनौती हमें आगे बढ़ानी है.

परमाणु डील के मुद्दे पर विपक्ष में रहते समय विरोध करने वाली भाजपा के मौजूदा प्रधानमंत्री हर विदेशी दौरे में परमाणु समझौतों और मुआवजे की शर्तों में विदेशी कंपनियों के ढील देने को ट्रॉफी तरफ चमकाते हैं. इन करारों की आखिरी मार उन किसानों-मछुआरों पर पड़नी है जिनके यहां फुकुशिमा के बाद पूरी दुनिया में नकारे गए ये परमाणु प्लांट लगाए जा रहे हैं. प्रफुल्ल ने मोदी सरकार के एक साल पूरे होने पर शायद जो आखिरी लेख लिखा, वह आने वाले कई सालों तक हमें दिशा दिखाएगा क्योंकि साल-निजाम बदलते रहते हैं लेकिन आम जनता और प्रफुल्ल बिदवई सरीखे उसके भरोसेमंद दोस्तों की लड़ाई जारी रहती है.

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