‘आपको सरकारी ठेका दिलवा देंगे, धरना खत्म कर दीजिए’

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कौन

सुभाष कुमार मित्तल

कब

8 जुलाई 2015 से

कहां

उपायुक्त कार्यालय, जमशेदपुर, झारखंड

क्यों

जमशेदपुर प्रखंड के उत्तरी पूर्वी बागबेड़ा पंचायत क्षेत्र में मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़क निर्माण कराया गया था. सूचनाधिकार कार्यकर्ता सुभाष कुमार मित्तल ने सूचना के अधिकार के तहत इस संबंध में संबंधित विभाग से जानकारी मांगी. प्राप्त जानकारी से उन्हें निर्मित सड़कों की मोटाई पर संशय हुआ. वह कहते हैं, ‘सड़कों की मोटाई छह इंच होनी चाहिए थी, लेकिन सड़क बनाने वाले ठेकेदार और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से पैसा बचाने के लिए महज ढाई से तीन इंच मोटाई की सड़कें बनाई गईं. 8 से 10 साल चलने वाली सड़कें कुछ ही महीनों में उखड़ने लगीं. वहीं कागजों पर सड़क निर्माण पूरा हुआ दिखा दिया गया. ठेकेदारों को पूरी रकम दे दी गई, लेकिन वास्तव में सड़कें ही अधूरी बनी छोड़ दी गईं. इस पर मैंने जांच की मांग की.’ उनके अनुसार जांच हुई पर लीपापोती कर भ्रष्टाचारियों को बचाया गया, जिसके विरोध में उन्होंने पिछले साल अप्रैल माह में उपायुक्त कार्यालय के सामने धरना दिया. प्रशासन से मौखिक आश्वासन मिला कि महीने भर के अंदर कार्रवाई की जाएगी पर नतीजा शून्य रहा. पूछे जाने पर उन्हें बार-बार आश्वासन दिया जाता रहा. सुभाष मित्तल कहते हैं, ‘जून के आखिरी सप्ताह में मैं फिर धरने पर बैठा. प्रशासन ने दस दिन में कार्रवाई का आश्वासन देकर मुझसे धरना समाप्त कराया. लेकिन प्रशासन की मंशा कुछ और ही थी. मेरे खिलाफ षड्यंत्र रच मुझे जांच अधिकारी द्वारा जांच स्थल पर बुलाया गया. वहां सड़क बनाने वाले ठेकेदार ने मुझ पर जानलेवा हमला किया. थाने में मेरी शिकायत दर्ज नहीं की गई. तो मैं 8 जुलाई से सड़क घोटाले की निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गया.’

सात महीने से धरने पर बैठे सुभाष मित्तल अपनी मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी धरना दे चुके हैं. वह जिला प्रशासन से लेकर राज्य के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक से मामले में जांच की गुहार लगा चुके हैं. प्रधानमंत्री कार्यालय ने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर कार्यवाई के आदेश भी दिए हैं. मित्तल कहते हैं, ‘प्रधानमंत्री कार्यालय का आदेश आए तीन माह हो चुके लेकिन प्रशासन दोषियों को बचाने पर अड़ा है. पहले मुझे धमकाया गया लेकिन बात नहीं बनी तो मेरे ऊपर सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने, रंगदारी मांगने, छेड़खानी और अनुसूचित जाति/जनजाति कानून के तहत पुलिस में मामले दर्ज करा दिए गए. पुलिस पर मुझे गिरफ्तार करने का दबाव बनाया गया. परंतु थाना प्रभारी द्वारा मेरा पक्ष लिया गया. जिस कारण उनका तबादला कर दिया गया. इन मामलों को वापस लेने के एवज में मुझे धरना समाप्त करने को कहा गया. प्रशासन के एक बड़े अधिकारी ने यहां तक कहा कि आपको कोई सरकारी ठेका दिलवा देंगे. बस धरना खत्म कर दीजिए.’

मित्तल के अनुसार राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में जितनी भी सड़कें बनाई गई हैं उनमें से चालीस प्रतिशत सड़कें भी तय मानकों पर खरी नहीं उतरतीं. ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क निर्माण में बहुत बड़ा घोटाला हुआ है, इसलिए मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है.

 प्रधानमंत्री कार्यालय के आदेश के बाद पिछले ही दिनों एक बार फिर से पांच सदस्यीय प्रशासनिक टीम ने सड़कों की जांच की है लेकिन मित्तल का कहना है, ‘जांच के नाम पर खानापूर्ति हुई है. उसी टीम से जांच कराई गई है जिसने पहले क्लीन चिट दी थी. अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो संसद के सामने धरना देंगे.’