न्याय की रक्षक को न्याय की तलाश

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अपूर्वा की शिकायत के आधार पर उनके विभाग ने आंतरिक जांच शुरू कर दी. लेकिन अपूर्वा को इस विभागीय जांच पर भरोसा नहीं था. उनका दबाव था कि मामले की जांच यौन उत्पीड़न के नए कानूनों के तहत एक कमेटी करे. मामला बड़ा होता जा रहा था. पुलिस विभाग पर दबाव बढ़ गया था लिहाजा आनन-फानन में तीन मई को विशाखा गाइडलाइंस के तहत एक और जांच कमेटी का गठन कर दिया गया. बाद में इस कमेटी को यौन उत्पीड़न के नए कानून के तहत पूर्ण कालिक कमेटी का दर्जा दे दिया गया. यह कमेटी विभागीय जांच के समानांतर अपनी जांच आगे बढ़ाने लगी. यहां से इस मामले में पेंच फंसते दिखते हैं. अपूर्वा कहती हैं, ‘मुझे विभागीय कार्रवाई पर कभी भी भरोसा नहीं था. यह लोग मामले में लीपापोती करने की कोशिश कर रहे थे. इसीलिए मैं शुरू से ही यौन उत्पीड़न अधिनियम के तहत मामला दर्ज करवाना चाहती थी.’

जांच के दौरान हुए घटनाक्रम से अपूर्वा का यह आरोप समझा जा सकता है. विभागीय जांच कर रही कमेटी को अपनी रिपोर्ट 45 दिनों के भीतर देनी थी. पर यह जांच अभी तक पूरी नहीं हो सकी है. विभागीय जांच के एक नियम के मुताबिक अगर नियत समय के भीतर जांच की रिपोर्ट नहीं आती है तो आरोपी व्यक्ति का निलंबन वापस लेकर उसे बहाल कर दिया जाना चाहिए. इस कानूनी पेंच की मदद से आरोपी डीपी श्रीवास्तव का निलंबन वापस ले लिया गया है. बहाल करते हुए उन्हें डीजी ऑफिस लखनऊ से अटैच कर दिया गया है.

समय सीमा के भीतर रिपोर्ट आ जाने के महीने भर बाद भी पुलिस महानिदेशक कार्यालय ने अभी तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं की है

इस मामले में पुलिस विभाग की हीलाहवाली का एक दूसरा पक्ष भी है. जो पुलिस विभाग 45 दिन में रिपोर्ट न दे पाने की तकनीकी सीमाओं का फायदा उठा कर आरोपी अधिकारी को तत्काल बहाल कर देता है उसी विभाग का विशाखा कमेटी की रिपोर्ट के प्रति जो रवैया है वह सवाल खड़े करता है. तहलका को मिली जानकारी के मुताबिक रिपोर्ट में आरोपी डीआईजी श्रीवास्तव के खिलाफ संस्तुतियां की गई हैं जिसमें विभागीय कार्रवाई के साथ ही उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न कानून 2013 के तहत एफआईआर दर्ज करने की बात कही गई है. गौरतलब है कि इस कमेटी को अपनी रिपोर्ट 90 दिनों के भीतर दे देनी थी. कमेटी ने इससे पहले ही पांच अगस्त को अपनी रिपोर्ट पुलिस महानिदेशक को सौंप दी. लेकिन जो पुलिस विभाग 45 दिन के नियम का हवाला देकर आरोपी को बहाल करने में कोई वक्त नहीं लगाता वह समय से पहले कमेटी की रिपोर्ट आ जाने पर भी उसकी संस्तुतियों पर कार्रवाई करने की बजाय चुप है. इस जांच कमेटी की एक सदस्य शालिनी माथुर कहती हैं, ‘मैं जांच के निष्कर्षों के बारे में तो कुछ नहीं कहूंगी. इतना जरूर कहूंगी कि लगभग महीना होने को आ रहा है, लेकिन पुलिस महानिदेशक कार्यालय ने अभी तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं की है.’ तहलका ने यह जानने की कई कोशिशें कीं कि कमेटी द्वारा दी गई जांच रिपोर्ट पर पुलिस विभाग क्या कार्रवाई कर रहा है. उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक आनंद लाल बनर्जी से फोन और ईमेल से संपर्क करने के प्रयास किए गए. लेकिन खबर लिखे जाने तक उनका कोई जवाब नहीं आया था.

वैसे शुरुआत से ही इस पूरे मामले में विभाग का रवैय्या सवालिया रहा है. तीन मई को जांच कमेटी का गठन होने के बाद जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी. इसी के तहत 31 मई को आरोपी अधिकारी के खिलाफ मेरठ के महिला थाने में एक एफआईआर भी दर्ज करवाई गई. इसमें तमाम धाराओं के साथ ही धारा 364 भी लगाई गई थी. यह गैर जमानती धारा है जिसमें आरोपी की गिरफ्तारी संभव थी. 13 जून को पुलिस ने चुपके से यह धारा एफआईआर से हटा दी. इससे अपूर्वा के आरोपों को बल मिलता है कि पुलिस विभाग मामले में लीपापोती कर रहा था. लेकिन आरोपी डीआईजी श्रीवास्तव का इस पूरे प्रकरण पर अपना अलग मत है. वे कहते हैं, ‘पुलिस ने प्रथम दृष्टया अपनी जांच में ऐसा कुछ पाया ही नहीं तो धारा लगाने का सवाल ही पैदा नहीं होता.’

अपूर्वा राय का पूरा मामला असल में उत्तर प्रदेश समेत देश के सारे पुलिस विभाग में महिलाओं के प्रति फैली एक किस्म की उदासीनता की कहानी है. अपूर्वा कहती हैं, ‘सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद आज तक प्रदेश के पुलिस विभाग में विशाखा गाइडलाइंस की तर्ज पर कोई कमेटी नहीं है जहां महिलाएं अपने साथ हुए किसी तरह के दुर्व्यवहार की शिकायत कर सकें. मेरे साथ भी यही हुआ. अगर मीडिया और सोशल मीडिया में लोगों ने सहयोग नहीं किया होता तो शायद इस मामले में भी जांच कमेटी का गठन नहीं किया जाता.’ इस मामले की जांच कमेटी की सदस्य शालिनी माथुर कहती हंै, ‘महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न से जुड़े कानूनों को लेकर किसी को ज्यादा कुछ पता नहीं है. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से जुड़ा कानून है लेकिन उसके बारे में महिलाकर्मियों को ज्यादा कुछ पता नहीं है. इस एक्ट का एक प्रमुख हिस्सा है कि इस कानून का प्रचार-प्रसार संबंधित विभाग द्वारा किया जाए और लोगों को इसके बारे में जागरुक किया जाए, लेकिन इस किस्म की कोई प्रयास विभागीय स्तर पर नहीं होता है. यह चिंता का विषय है.’

जानकारी या कहें कि विकल्पों के अभाव में अक्सर इस तरह के मामले लीपापोती करके बंद कर दिए जाते हैं. अपूर्वा इस मामले में भाग्यशाली रहीं कि उन्हें कानूनों की भी जानकारी थी और उन्होंने इस मामले मंे अपनी पहचान न छिपाने का फैसला किया. इससे उन्हें अपनी लड़ाई को सोशल मीडिया जैसे प्लेटफॉर्म पर ले जाने में आसानी हुई. इसके बावजूद उनकी लड़ाई अभी अधर में है. फिलहाल मामले में पुलिस विभाग का रवैया लचर है, लेकिन अपूर्वा का हौसला कायम है. वे कहती हैं, ‘मैं अपनी लड़ाई को अंतिम मुकाम तक पहुंचाऊंगी. आगे की लड़ाई में मैं सूचना कानून के अधिकार का सहारा लूंगी.’

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