बेमेल ब्याह और तलाक के हजार बहाने

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चिर परिचित लहजे में मोदी ने संसद भवन में बयान दिया, ‘हम वो लोग हैं जिन्होंने इन आदर्शों के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान दिया है, इसलिए कृपया हमें देशभक्ति न सिखाएं. सरकार ऐसी किसी भी हरकत को स्वीकार नहीं करती है. देश की अखंडता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा. जम्मू कश्मीर सरकार से इस बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया है.’

जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने के लिए दोनों दल महीनेभर से अधिक समय तक माथापच्ची करते रहे, जहां विचारधारा संबंधी खाइयों की अनदेखीकर, वैचारिक खतरों का जोखिम उठाते हुए दोनों साथ आए थे, वहां ऐसे कौन से कारण हैं कि सरकार गठन के महीने-भर के भीतर ही संबंधों में सीलन आ गई. क्यों महीने-भर में ही इस गठबंधन में गांठ पड़ गई? क्या इस सरकार का गठन ही अप्राकृतिक था? क्या इसके मूल में ही टकराव था, जो अब सामने आ रहा है?

इन सवालों के जवाब ढूंढ़ने के लिए हमें पिछले विधानसभा चुनावों और थोड़ा जम्मू कश्मीर के इतिहास में झांकना होगा. चुनाव परिणाम में जनता ने किसी भी पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं दिया था. पीडीपी 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, वहीं भाजपा प्रदेश में इतिहास रचते हुए पहली बार 25 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही. ऐसा पहली बार हुआ कि भाजपा को जम्मू कश्मीर में इतनी अधिक सीटों पर जीत मिली थी.

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2014 लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक बहुमत हासिल करने के बाद से ही भाजपा की नजर जम्मू कश्मीर पर टिकी थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने जम्मू कश्मीर की छह यात्राएं की. पार्टी इस बार के विधानसभा चुनाव में बेहद आक्रामक तरीके से शामिल हुई. भाजपा नेता सरेआम कहते सुने जा सकते थे कि अबकी बार कश्मीर में पार्टी एक हिंदू को मुख्यमंत्री बनाएगी. इस चुनावी संघर्ष में प्रधानमंत्री मोदी ने भी प्रचार करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी. चुनाव परिणाम ऐसे नहीं आए कि भाजपा अकेले अपने दम पर सरकार बना सके. इन नतीजों ने प्रदेश की राजनीतिक स्थिति को और जटिल बना दिया. किसी भी दल को बहुमत न मिलने के कारण सरकार गठन के लिए गठबंधन ही एकमात्र रास्ता बचा था. पार्टियों की आपस में बातचीत होती रही लेकिन अगले एक महीने-तक कोई रास्ता नहीं निकला. महीनेभर बाद कई दौर की चिंतन बैठकों के बाद भाजपा-पीडीपी ने मिलकर सरकार बनाने का फैसला किया.

उल्लेखनीय है कि दोनों पार्टियां दो विपरीत वैचारिक छोरों पर खड़ी हैं. जम्मू और कश्मीर के बीच यह खाई जनादेश में भी साफ झलकती है. जहां जम्मू क्षेत्र की कुल 37 सीटों में से 25 सीटें भाजपा की झोली में आई हैं वहीं पीडीपी को मिली कुल 28 सीटों में से 25 सीटें उसे कश्मीर घाटी से मिलीं. जाहिर है जम्मू के हिंदू बहुल इलाके में भाजपा है तो घाटी का मुस्लिम बहुल इलाका पीडीपी का गढ़ है. जम्मू कश्मीर की राजनीति का ध्रुवीकरण बताता है कि दोनों हिस्से एक-दूसरे से एकदम अलहदा हैं.

चूंकि कांग्रेस और नेशनल काॅन्फ्रेंस को जनता ने नकार दिया था इसलिए सरकार बनाने का नैतिक बल पीडीपी और भाजपा के पास ही था. तमाम वैचारिक खाइयों के बावजूद पीडीपी के सामने भाजपा के साथ गठबंधन का विकल्प बचा था. भाजपा के पास तो सिवाए पीडीपी के कोई विकल्प ही नहीं था. इस राजनीतिक सच्चाई को समझते हुए इन पाटियों ने गठबंधन पर आगे बढ़ने का फैसला किया. एक-दूसरे के साथ अनगिनत बैठकों में चर्चा करके, कुछ तुम बदलों कुछ हम की राह अपनाते हुए, विवादास्पद विषयों को छोड़ते हुए साथ आने के नतीजे पर पहुंचे. कुछ लोग मजाक में इस बेमेल गठजोड़ को लव जिहाद का नाम देकर चुटकी लेते हुए भी दिखे.

तमाम मजबूरियों और सच्चाइयों को समझते हुए दोनों दल साथ आए. महीने-भर चली उठापठक के बाद यह तय हुआ कि दोनों दल अपनी-अपनी विचारधारा को किनारे रखते हुए एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम (न्यूनतम साझा कार्यक्रम) तय करेंगे. दोनों पार्टियों ने कहा कि वो विवादित मुद्दों से दूर रहते हुए प्रदेश के विकास के लिए काम करेगी.

यह तो सरकार बनाने तक की समस्या थी. असली संकट इसके बाद शुरू होना था. शुरुआत की घटनाओं से उस संकट की एक झलक मिल भी गई है. सरकार बनाने के इस क्रम में भाजपा के लिहाज से कुछ बहुत बड़े बदलाव देखने को मिले हैं. इसे हम भाजपा की पारंपरिक और वैचारिक जमीन में ऐतिहासिक बदलाव के तौर पर भी देख सकते हैं. कश्मीर को लेकर भाजपा का बहुत ही कठोर और अतिवादी स्टैंड रहा है. आजादी के बाद से अब तक वह स्टैंड कमोबेश कायम रहा था लेकिन अब भाजपा ने उस विचार को त्याग दिया है. इसके नतीजे उसके लिए कितने सुखद या दुखद होंगे इसका जवाब अभी समय के गर्भ में है.

जनसंघ के जमाने से ही भाजपा जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देनेवाली संविधान की धारा 370 के खिलाफ रही है. पार्टी का दावा है कि उसके संस्थापक सदस्य श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाने के लिए ही बलिदान दिया था. वो कश्मीर को अलग संवैधानिक दर्जा देने के खिलाफ लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए. उन दिनों मुखर्जी का नारा था- ‘एक देश में दो निशान,  एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगें’. कश्मीर को लेकर भाजपा नेता आज भी यही लाइनें दोहराते हैं. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की लाइन ही आज तक भाजपा की लाइनें रही है.

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के बाद ‘जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वो कश्मीर हमारा है’ का नारा गढ़नेवाली भाजपा कश्मीर में उस पार्टी के साथ सत्ता में साझीदार बनी जो धारा 370 को भारत से कश्मीर को जोड़नेवाले सेतू के रूप में देखती है. उसका साफ कहना है कि अगर इसे हटाया गया तो कश्मीर भी भारत का नहीं रह पाएगा. अब उसी भाजपा ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जमाने से चली आ रही धारा 370 को खत्म करने की अपनी मांग को विराम दे दिया है.

इसे भी विडंबना ही कहेंगे कि जिस जम्मू कश्मीर से भाजपा दो विधान हटाने की बात करती थी उसी जम्मू कश्मीर में उसके नेता राज्य के संविधान के तहत ‘मैं विधि द्वारा स्थापित राज्य के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूंगा’ कहकर शपथ ले रहे थे.

धारा 370 पर पीछे हटने के साथ ही भाजपा पश्चिमी पाकिस्तान से आए विस्थापितों को जम्मू कश्मीर का स्टेट सब्जेक्ट बनाने की अपनी दशकों पुरानी मांग भी छोड़ चुकी है. सन 1947 में पाकिस्तान के पश्चिमी इलाके से जम्मू आकर बसे दो लाख से ज्यादा लोग प्रदेश में पिछले छह दशकों से बिना राजनीतिक और नागरिक अधिकारों के जी काट रहे हैं. अब तक की प्रदेश सरकारों का कहना था कि ये लोग जम्मू-कश्मीर राज्य के सबजेक्ट नहीं हैं इसीलिए इन्हें वे सारे अधिकार नहीं मिल सकते जो यहां के लोगों को मिलते हैं. इनमें सबसे बड़ा अधिकार था राजनीतिक अधिकार. अर्थात राज्य में होने वाले चुनावों में मतदान करने का अधिकार. ये लोग न तो जम्मू कश्मीर विधानसभा के चुनावों में वोट डाल सकते हैं और न ही स्थानीय चुनावों में. यहां तक कि पंचायत के चुनावों में भी इन्हें वोट डालने का अधिकार नहीं है.

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