‘डेमोक्रेसी में जनता तय करेगी विरासत, हम और आप नहीं’

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आप इतने भटकाव-बिखराव के साथ आंदोलन चलाते हैं. कभी कोई आंदोलन चलाते हैं और फिर उसे बीच में रोककर दूसरे में लग जाते हैं?

लड़ना पड़ेगा. हम तो सबसे पहले नेताओं से ही लड़ रहे हैं. हमने तय किया है कि इनसे लड़े बिना कुछ नहीं कर सकते.

राजनीतिज्ञों से या राजनीतिक प्रवृत्तियों सेे?

राजनीतिज्ञों से. सबकी प्रवृत्ति एक जैसी है. एनटी रामाराव, एमजी रामचंद्रन, नेहरू से लेकर मायावती को भी देख लिया गया. एक महीना में अरविंद केजरीवाल और नरेंद्र मोदी तक को देख लिया गया. इन दो जादूगरों को अब भी देख ही रहे हैं. सबकी प्रवृत्ति एक जैसी है.

राजनीतिज्ञों से लड़िएगा और सिस्टम यही रहेगा तो बदलाव क्या होगा?

पॉलिटिकल सिस्टम को बनाता कौन है? पॉलिटिशियन न! दलाल को पैदा कौन किया? पदाधिकारी को रावण कौन बनाया? इस सारे सिस्टम की कमान किसके हाथ में है? सब पॉलिटिशियन के हाथों में है. हिंदू-मुसलमान करानेवाला कौन है? जाति का जहर फैलानेवाला कौन? गरीब अमीर के मसले को डाइलूट कर देनेवाला कौन? राजनीतिज्ञों से लड़ने के साथ ही हम वैचारिक बदलाव की लड़ाई लड़ना चाहते हैं. हां लेकिन पूरा रास्ता अहिंसात्मक रखेंगे. हिंसा के रास्ते से तो कुछ नहीं बदलेगा. नक्सलियों का देख लिया कि उन्होंने क्या किया.

लेकिन बड़े बदलाव तो राजनीति करती है. आप तो सामाजिक आंदोलन जैसी कोई बात कर रहे हैं?

यह राजनीति है किसके लिए. तंत्र लोक के लिए न. लेकिन अब तो तंत्र ही मालिक बन गया है. एक मुख्यमंत्री को इतनी ताकत होती है जितनी भगवान को नहीं होती. लेकिन क्या कारण है कि अब तक किस सीएम ने बदलाव की कोशिश नहीं की बिहार में. अब देखिए देश में भी. प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ कर रहा है. यह तो विचित्र बात है. मन की बात तो गरीब और विवश आदमी करता है न. पीएम किसानों से मन की बात कर रहे हैं लेकिन 60 हजार करोड़ रुपये अदानी-अंबानी को सब्सिडी देने के लिए तो मन की बात नहीं कर रहे हैं.

कुछ दिनों पहले तो आप मोदी की तारीफ कर रहे थे तब आपकी आलोचना हुई थी?

भइया मैं किसी की तारीफ नहीं कर रहा था. मुझसे ज्यादा मेरी प्रोसिडिंग उठाकर देख लीजिए. हां, लेकिन वह सशक्त आदमी तो हैं, इससे कैैसे इंकार कर सकते हैं. व्यवहार में, देखने-दिखाने में. अपने कामों को परोसने में. उसने अपनी मार्केटिंग तो की. डायनेमिक तो है वह. इसकी कोशिश तो कर रहा है. मैंने यह बात कही थी. लेकिन मैं दूसरी बात कहना चाहता हूं. अब आज के समय में सभी नेताओं की कोशिश से इंसान का ही अस्तित्व खत्म करने की तैयारी है. आजादी के 67 सालों बाद फूड बिल आ रहा है, खाना देने के लिए, पानी पीने को नहीं है. जिस देश में स्वास्थ्य जरूरी नहीं है. लोहिया ने कहा था, ‘राजा हो या भंगी की संतान-सबकी शिक्षा एक समान.’ सब तो धरा का धरा रह गया.

‘लालूजी के बेटे ने राजद का ककहरा नहीं जाना है. राहुल 15 सालों से संघर्ष कर रहे हैं. अखिलेश ने सात साल संघर्ष किया, मायावती की लाठियां खाई. उन्हें सीखने दें लालूजी’

लोहिया की बातों को लोहियावादियों ने भी ताक पर रखा?

सभी विचाराधाराओं को उन्हें माननेवालों ने रख दिया. वैसा ही हुआ है, छोड़िए न पुरानी बात. हाल में तो अन्ना आंदोलन का जोर रहा था. आंदोलन के बाद नौ प्रतिशत भ्रष्टाचार बढ़ गया. आंदोलन में गरीब तो जुटे नहीं, बेईमान जुट गए. वकील, डॉक्टर, मास्टर, नेता, नौजवान सब बोले कि ‘मैं भी अन्ना.’ जेठमलानी वकील हैं. दो करोड़ रुपये लेकर कहने लगे कि आसाराम पर केस करनेवाली महिला को हिस्टिरिया है. छी-छी… जेठमलानी. गरीब का घर जब तक बिक न जाए, तब तक वकील लोग केस चलाते हैं. वह भी कहने लगा कि हम भी अन्ना. 44 प्रतिशत गरीबी सिर्फ डॉक्टरों की वजह से है. अमन और इंसानियत ही सबसे बड़े डॉक्टर हैं. डॉक्टर भी कहने लगा था कि वह भी अन्ना. रात में दो बजे तक व्हाटस ऐप और फेसबुक से फुर्सत न लेनेवाला नौजवान भी कहने लगा था कि मैं भी अन्ना.

आपने डॉक्टरों के बारे में आंकड़े बताए. उनके कुकर्मों के खिलाफ लड़ाई शुरू की लेकिन एक मुकाम तक पहुंचने के बाद उसमें ढील दे दी?

कहां छोड़ दिया. हम लगातार जनसंवाद के माध्यम से यह मामला उठा रहे हैं. कहां छोड़ दिया. छोड़ने का सवाल ही नहीं. सदन में रोज मामला उठा रहा हूं. डेमोक्रेटिक फ्रंट पर ही उठाऊंगा न! मैं बता रहा हूं लोगांे को कि डॉक्टर पैसे के लालच में 62 प्रतिशत मामलों में घुटने बदल देते हैं. 53 प्रतिशत मरीजों को डॉक्टरों ने फर्जी तरीके से कैंसर रोगी बनाया. 67 प्रतिशत लोगों की किडनी पैसे के लिए बदली गई. ये सब मैं अपने मन से नहीं कह रहा. भारत के संदर्भ में जापान और अमेरिका का सर्वे है. 78 प्रतिशत को सुई नहीं दी जानी चाहिए लेकिन फिर भी दी जाती है. 85 प्रतिशत बगैर सर्जरी के डिलिवरी नहीं हो रही. यह भी एक खेल है. एक की जगह नौ दवाई लिखते हैं. आईसीयू में जबरदस्ती ले जाते हैं. ये सब तो हर सभा में बताता हूं. लोगों को भी जागरूक होना होगा.

ठीक है आप इन बातों को जनसंवाद में उठा रहे हैं. आपका जो ये जनसंवाद है, उसका मूल मकसद क्या है?

आम जनों को जानना. उनसे पूछना. उनको बताना कि 67 सालों बाद पॉलिटिशयन कहां हैं और आप कहां हैं. और ये देश कहां है. आपका राज्य कहां है?

आपके इस जनसंवाद में लालूजी की तस्वीर रहती है?

मैं दल में हूं इसलिए है.

लेकिन राजद की तस्वीरों में तो राबड़ीजी की तस्वीर भी रहती है. आपके संवाद में तो लालूजी ही दिखते हैं सिर्फ!

नहीं, राबड़ी देवीजी की तस्वीर नहीं है.

क्यों?

राबड़ी देवीजी मेरे लिए मां की तरह हैं लेकिन तस्वीर नहीं लगाता. अब तो मंच पर लालूजी की तस्वीर भी नहीं दिखेगी, क्योंकि उनको चापलूसों ने कहना शुरू कर दिया है कि आपकी तस्वीर लगाकर पप्पू यादव घूम रहा है. लीजिए मंच से हटा दे रहे हैं.

आप चाहते क्या हैं?

ये बताना कि आपके नेता करना चाहते तो कुछ भी कर सकते थे, आपके लिए. एक सीएम चाहेगा तो क्या नहीं बदल जाएगा. हमको तीन महीना का समय दंे. हम एफिडेविट बनाकर देंगे कि अगर कुछ नहीं कर सके तो राजनीति नहीं करेंगे. अगर तीन महीने बाद दलाल और बिचौलिया सोच भी लें धरती पर आना तो जो नहीं सो. मैं राजनीति ही नहीं करूंगा. एक चपरासी और पंचायत सचिव पैसा  लेने की सोच भी ले तो राजनीति नहीं करूंगा. अधिकारी अगर आम आदमी को मालिक की तरह आदर न दे तो मैं छोड़ दूंगा. आम आदमी के टैक्स से ही हमको तनख्वाह मिलती है. अगर आम आदमी को ही सम्मान नहीं मिलेगा तो काहे की राजनीति. हम बेईमान हैं और हम ही बेईमानी करेंगे तो कैसे होगा.

‘जेठमलानी दो करोड़ रुपये लेकर कहने लगे कि आसाराम पर केस करनेवाली महिला को हिस्टिरिया है. छी-छी जेठमलानी. गरीब का घर बिक न जाए, तब तक वकील केस चलाते हैं’

बड़ा द्वंद्व है. दुविधा है. आप लालूजी की तस्वीर भी रखते हैं और उनके खिलाफ ही मोर्चा खोल रहे हैं?

लालूजी मेरे लिए आदरणीय हैं. कल को उनके साथ नहीं भी रहेंगे तो भी रहेंगे. विचारों के कारण. संस्कारों के कारण.

राजद के लोगों का साथ मिल रहा है?

नहीं, कहीं नहीं. कुछ लोग आते हैं, जो मेरे विचारों से सहमत हैं. जिनमें संघर्ष करने की क्षमता नहीं वे साथ नहीं आते. जो सरकार बनने की उम्मीद में आस लगाए हुए हैं, वे नहीं आते.

विरासत पर बात उठाई है. बेटा तो बेटी क्यों नहीं?

मैंने कहा कि बेटा-बेटी में फर्क नहीं. तीन लोग उनके घर में हंै तो फिर बेटी क्यों नहीं. अब लालूजी ने कहा कि कार्यकर्ताओं को टिकट नहीं. बड़ा गजब का बयान है उनका. हम तो जानना चाहते हैं कि क्या लालूजी परिवारवालों को टिकट देंगे, दलालों को टिकट देंगे तो कार्यकर्ताओं को क्यों नहीं. दलालों-चाटुकारों का टिकट क्यों नहीं काटते. परिवार के लिए क्यों नहीं काटते. अभी तो महाविलय हुआ है अभी से ही यह रंग.

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लंबे समय बाद आपने बात उठाई, परिवार का प्रयोग तो वे पहले से करते रहे हैं?

भइया मेरे, वे क्या प्रयोग करते रहे हैं, उससे मतलब नहीं. आप देखिए कि रामलखन सिंह यादव की विरासत इन्हें मिल गई. चौधरी चरण सिंह की विरासत मुलायम सिंह को मिल गई. डेमोक्रेसी में जनता न विरासत तय करेगी. हम और आप तय नहीं कर सकते. जनता तय कर ले कि लालूजी के बेटे को आगे बढ़ाना है तो कौन रोक लेगा.

आप रहेंगे न साथ में?

मेरी शुभकामना है. लेकिन बात तो यह है न कि अभी लालूजी के बेटे ने राजद का ककहरा नहीं जाना है. राहुल गांधी 15 सालों से संघर्ष कर रहे हैं. अखिलेश ने सात साल संघर्ष किया. मायावती की लाठियां खाई. उन्हें सीखने दें लालूजी. विरासत के बारे में पप्पू यादव कैसे बोलेगा कि उनका बेटा जनता की रहनुमाई करनेवाला विरासत संभालेगा. दुनिया में किसी के मुंह से सुना क्या. क्या नेहरूजी ने कहा. यह लालूजी पहले आदमी हैं जो इस तरह विरासत पर बोले. ये तो विचित्र बात है.

लालूजी ने पप्पू यादव की ओर इशारा करके तो नहीं कही विरासतवाली बात?

पता नहीं उन्हें किसने सलाह दी. मैं तो सबसे ज्यादा उनका आदर करता रहा हूं.

लेकिन उनको लगता है कि पप्पू यादव तो बहकता रहता है. कभी निर्दलीय, कभी सपा से तो कभी किसी दल से. आप अलग-अलग रास्ता अपनाते रहते हैं और अब कोसी छोड़ बिहार घूम रहे हैं तो चुनौती दिखी होगी?

इंिडयन डेमोक्रेटिक फेडरल पार्टी बनाई. सपा का अध्यक्ष रहा. जनता दल में संसदीय बोर्ड में मेंबर बना. मैं तो बचपन से ये सब करता रहा हूं. 1987 से मैं ऐसा करता रहा हूं.

क्यों. आपने इतने ठांव क्यों बदले. इतने बेचैन क्यों?

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