झलक सरहद पार की

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में सिविल लाइंस की एक दुकान के बाहर मशहूर पाकिस्तानी अदाकारा सनम सईद का एक आदमकद पोस्टर लगा है. सड़क पर रिक्शों में जातीं स्कूल-कॉलेज की लड़कियां उन्हें पहचानती हैं और अगली बार उस दुकान पर आने की बात भी कहती हैं. अमूमन बॉलीवुडिया कलाकारों के फोटोशॉप किए हुए पोस्टरों से पटी रहने वाली दुकानों में आया ये एक नया बदलाव है और हो भी क्यों न, बॉलीवुड कलाकारों की लोकप्रियता को भुनाने वाला बाजार अब पाकिस्तानी कलाकारों की लोकप्रियता को भी भुना रहा है. चाहे बात फवाद खान या इमरान अब्बास की हो या माहिरा खान और सनम बलोच की, सरहद पार के ये सितारे अब हिंदुस्तान के छोटे-छोटे शहरों में भी अपनी चमक बिखेर रहे हैं.

जून 2014 में ‘जोड़े दिलों को’ टैगलाइन के साथ शुरू हुए जी समूह के ‘जिंदगी’ चैनल ने पाकिस्तानी धारावाहिकों को भारत में प्रसारित करते हुए जल्द ही भारतीय दर्शकों में अपनी पैठ बनाई और पाकिस्तानी कलाकार घर-घर में पहुंच गए. इतनी कम अवधि में ही मिली इतनी प्रसिद्धि का कारण साफ था, सास-बहू के कभी न खत्म होने वाले भारतीय धारावाहिकों के कारण एक बड़ा वर्ग टीवी और एंटरटेनमेंट चैनलों से कट चुका था, उनके लिए कसी स्क्रिप्ट, कम एपिसोड और सामाजिक मुद्दों पर बने ये पाकिस्तानी सीरियल एक नया विकल्प बने. पिछली सर्दियों में जब जम्मू-कश्मीर में भाजपा और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी में गठजोड़ की कोशिशें हो रही थीं तब वर्तमान मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ‘जिंदगी’ के धारावाहिक देख कर अपना तनाव कम किया करते थे. पार्टी के सूत्रों की मानें तो मुफ्ती साहब खाली समय में जिंदगी चैनल पर अपने पसंदीदा सीरियल देखते हैं. मुफ़्ती साहब अकेले व्यक्ति नहीं हैं जो चैनलों की भीड़ में ‘जिंदगी’ के धारावाहिकों को पसंद करने लगे.

दिल्ली के पॉश इलाके ग्रेटर कैलाश-2 में रहने वाली एक गृहिणी बताती हैं, ‘मैं काफी टेकसेवी हूं, इंटरनेट ही मनोरंजन का साधन है और अपडेट रहने का भी. कभी टीवी नहीं देखती, कभी हुआ तो समाचारों के लिए देखा पर चैनलों पर रोज होती बहसों के दौर में वहां समाचार देख पाना भी मुश्किल है. पिछले साल किसी दोस्त के कहने पर जिंदगी चैनल पर ‘जिंदगी गुलजार है’ नाम का शो देखा और आप यकीन नहीं मानेंगे मैं तब से इसे यूट्यूब से डाउनलोड करके कई बार देख चुकी हूं. उसके बाद मैंने इस चैनल को देखना शुरू किया और लगा कि ये बातें आज तक हमारे सीरियल निर्माता क्यों नहीं समझ पाए कि समाज से जुड़ने के लिए समाज की असली तस्वीर समझना कितना जरूरी है.’

मशहूर पाकिस्तानी अदीब उमैरा अहमद के इसी नाम के नॉवेल पर बना ‘जिंदगी गुलजार है’ आते ही हिट हुआ. इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से ही लग जाता है कि शबाना आजमी और दिव्या दत्ता जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों ने आगे आकर इसकी तारीफ की. कलाकारों की सादगी और लाजवाब अदाकारी तो इसकी लोकप्रियता की वजह बने ही, सरहद पार को सिर्फ गोली-बारूद की दुनिया समझने वालो को भी लगा कि वहां भी हम जैसे इंसान ही रहते हैं, उनकी परेशानियां, दर्द- ख़ुशी सब हमारे जैसे ही तो हैं. लोगों के पूर्वाग्रह टूटे हैं. 68 वर्षीय प्रतिभा बताती हैं, ‘बचपन से जब बंटवारे की बात सुनते थे तो लगता था कि कोई नई ही दुनिया बनी होगी वहां, पर इन धारावाहिकों को देखकर लगा कि ये तो अपने ही घर-आंगन की बातें हैं. वैसे भी हम दोनों देशों की संस्कृति, सामाजिक मूल्य, परिवेश सब एक ही जैसे तो हैं. आप एक सीमारेखा खींच के लोगों को ही बांट सकते हैं, संस्कृति को तो नहीं.’

Sultana Siddiqui
सुल्ताना सिद्दीकी

ऐसा ही कुछ अदाकारा सनम सईद भी मानती हैं, वे भारत में अपने धारावाहिकों को मिली अपार सफलता से उत्साहित हैं. मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘मुझे ये बात समझ नहीं आती कि हमें (हिंदुस्तान और पाकिस्तान) को अलग क्यों समझा जाता है? हम एक ही तो हैं. आप हम में ढेरों समानताएं देख सकते हैं चाहे बात खाने की हो, पहनावे की, भाषा, परिवार या संस्कृति की. मुझे तो कभी नहीं लगता कि हम अलग हैं और मुझे बहुत खुशी है कि पाकिस्तानी धारावाहिकों को हिंदुस्तान में इतना सराहा गया, उन्होंने वहां (हिंदुस्तान) की जनता को भी बिलकुल उसी तरह छुआ जिस तरह यहां की अवाम को.’

पाकिस्तान में खासा लोकप्रिय एंटरटेनमेंट चैनल ‘हम टीवी’ अपने धारावाहिकों की विषय वस्तु (कंटेंट) लिए जाना जाता है. चैनल की संस्थापक और अध्यक्ष सुल्ताना सिद्दीकी लगभग 4 दशकों से टेलीविजन इंडस्ट्री से जुड़ी हुई हैं और एशिया में अपना टीवी चैनल शुरू करने वाली पहली महिला हैं. वे एक सफल निर्माता तो हैं ही, साथ ही एक सफल निर्देशक भी हैं. ‘जिंदगी’ पर प्रसारित बहुचर्चित शो ‘जिंदगी गुलजार है’ उन्हीं ने बनाया है. ‘जिंदगी’ पर दिखाए जाने वाले अधिकतर सीरियल उन्हीं के ‘हम टीवी’ से लिए गए हैं. एक इंटरव्यू में वे बताती हैं, ‘बरसों से भारत से तो फिल्में, धारावाहिक आदि पाकिस्तान पहुंचते थे पर हमारे यहां के कार्यक्रमों को भारत ले जाने की बात पर कोई न कोई बहाना ही सुनने को मिलता था.’

जब जी टीवी की टीम ने उनसे संपर्क किया तो वे फौरन तैयार हो गईं. वो चाहती थीं कि मीडिया में पेश की गई पाकिस्तान की नकारात्मक छवि से इतर लोग असली पाकिस्तान को जानें. ‘जिंदगी गुलजार है’ की सफलता पर कई हिंदुस्तानी कलाकारों ने ट्वीट किए तो वहीं अभिनेत्री शबाना आजमी ने तो सुल्ताना को फोन कर के बधाई दी और उनके साथ काम करने की इच्छा भी जाहिर की.

सुल्ताना कहती हैं, ‘उन्हें समाज में बदलाव बेहद पसंद हैं और ये उनके धारावाहिकों के कंटेंट से जाहिर होता है. कहानी एक बिंदु से शुरू होती है और एक चक्र पूरा कर के खत्म हो जाती है. ये चक्र कभी 25 एपिसोड का होता है तो कभी 30-32 पर हिंदुस्तानी धारावाहिकों की तरह बेसिर-पैर की कहानियां और ट्वीस्ट जोड़े बिना ये अपनी बात कह कर एक निश्चित पड़ाव पर खत्म हो जाता है. दर्शक किसी भी सृजनात्मक कार्य से तभी जुड़ता है जब उसे अपने जीवन से जोड़ के देख पाए, तो ऐसे में कितने दर्शक होंगे जो रोज होती प्लास्टिक सर्जरी, हर साल होते विवाह और मर के जिन्दा हो जाने से खुद को जोड़ पाते होंगे! मैं तो सोच ही नहीं सकती कि किस तरह ‘जिंदगी गुलजार.. को 26 एपिसोड्स से आगे ले जाती.’

‘जिंदगी’ पर प्रसारित ये धारावाहिक सामाजिक बदलाव के लिए कोई उपदेश नहीं देते पर दिखाते हैं कि कैसे तरह-तरह की परिस्थितियों में इंसान जूझते हुए अपना रास्ता बना ही लेता है. ये धारावाहिक न केवल एक प्रगतिवादी दृष्टिकोण लिए हुए हैं बल्कि लैंगिक भेदभाव, स्त्री शिक्षा जैसे बड़े मुद्दों को भी बहुत ही सहज रूप में दिखाते हैं. ‘जिंदगी गुलजार है’, ‘औन-जारा’, ‘मात’, ‘दिल-ए- मुज्तर’, ‘बड़ी आपा’, ‘खेल किस्मत का’ जैसे धारावाहिकों में दिखाए गए स्त्री चरित्र पाकिस्तान की महिलाओं की प्रचलित छवि के बिलकुल उलट हैं. ये औरतें न केवल अपने हकों के लिए लड़ रही हैं बल्कि बिना किसी झिझक के अपने बच्चों को अकेले पालने का माद्दा भी रखती हैं.

बहरहाल इनके मशहूर होने के पीछे बहुत सी छोटी-छोटी बातें भी जुड़ी हैं, जिनमें इनकी भाषा सबसे प्रमुख है. हिंदुस्तानी दर्शकों का इनसे जुड़ाव रहे इसलिए इनके टाइटल तो बदल दिए जाते हैं पर भाषा के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होती. हिंदुस्तान में जो खिचड़ी भाषा चलन में है, उससे किसी के प्रभावित होने की सम्भावना शून्य ही है. ऐसे में हिंदी-उर्दू की चाशनी में पगे इन सीरियलों की भाषा युवाओं को भी खासा आकर्षित कर रही है.

Waqt Ne Kiya Kya Hansi Sitam

उत्तर प्रदेश के मुस्लिम आबादी बहुल जिले बरेली की निदा कहती हैं, ‘वैसे हम मुस्लिम आबादी में रहते हैं पर यहां भी उर्दू जबान उतनी प्रचलन में नहीं है. इन धारावाहिकों को देख के कुछ बहुत ही अच्छे शब्द सीखने को मिलते हैं, हिंदुस्तानी सीरियलों को देख कर नई भाषा सीख पाना मुमकिन नहीं है.’ ऐसा ही कुछ उनकी दोस्त दिव्या का भी मानना है, ‘मैं ये सीरियल इनकी उर्दू जबान के लिए देखती हूं. तरबियत, तवक्को, फरमाबरदार, मुतासिर कुछ ऐसे शब्द हैं जो मैंने ये चैनल देख कर जाने हैं और अब मैं इन्हें अपनी आम बोलचाल में भी प्रयोग करती हूं. आखिर उर्दू भी हमारे देश की ही भाषा है और इसे भी बचाए रखने की जरूरत है.’

ये बात बहुत हद तक सही है. धारावाहिकों का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं होता. समाज के किसी भाग को प्रभावित करने में टीवी का बहुत बड़ा हाथ है और ये सबसे प्रभावी भी है. ऐसे में अगर कोई चैनल या कार्यक्रम किसी तरह का बदलाव लाने की कोशिश करना चाहें तो वो उसमें सफल हो सकते हैं. सुल्ताना सिद्दीकी बताती हैं, ‘मेरे पास कई बार महिलाएं आती हैं जो बताती हैं कि किस तरह मेरे धारावाहिकों में औरतों के संघर्ष को देख कर उन्हें हौसला मिला और वो सब मुश्किलात से लड़ते हुए आगे बढ़ीं.’

कशफ के नाम से लोकप्रिय अदाकारा सनम सईद भी ऐसी ही बात कहती हैं, ‘मैं अपने किरदार यही देख कर चुनती हूं कि ये युवा लड़कियों के लिए रोल मॉडल बन सकें, लोगों का नजरिया बदल सकें. लोगों से मेरा अर्थ मध्यम वर्ग से है. उच्च वर्ग के पास इंटरनेट है, हॉलीवुड फिल्में हैं, किताबें हैं पर मध्यम वर्ग के पास बस टीवी है तो ऐसे में हम ऐसे ही किरदार चुनने की कोशिश करते हैं, जो उन्हें प्रेरित कर सके.’

‘जिंदगी’ के कार्यक्रमों की पसंद किसी विशेष समुदाय, लिंग या उम्र के दायरे में नहीं बंधी है. इन्हें जितना महिलाएं पसंद कर रही हैं, पुरुष दर्शकों को भी ये भा रहे हैं. इस चैनल की व्यापार प्रमुख प्रियंका दत्ता बताती हैं, ‘हमरा कंटेंट पुरुष दर्शकों को भी पसंद आ रहा है और मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के बड़े नाम सुभाष घई, कुनाल कोहली, जावेद जाफरी आदि की ओर से ‘जिंदगी’ की तारीफ में किए गए ट्वीट इसकी गवाही देते हैं. ये अच्छी बात है कि हमारे धारावाहिक किसी दायरे में नही बंधा है. सालों तक हमने सास-बहू के किस्से देखे हैं और किसी को तो ये एकरसता तोड़नी ही थी. और वैसे भी टीवी इंडस्ट्री में कंटेंट ही सब कुछ होता है और हमें गर्व है कि अब तक जिंदगी पर दिखाए गए सभी धारवाहिकों में बिना किसी उम्र और वर्ग के भेदभाव के सभी को प्रभावित किया.’

प्रियंका की कही बात बिलकुल सही है. लेख के लिए जानकारी जुटाने के दौरान उन पुरुषों के बारे में भी जाना जिनके लिए टीवी सिर्फ खबरें देखने का जरिया था, सीरियल औरतों के देखने की चीज पर जिंदगी के धरावाहिकों ने उनकी ये धारणा बदल दी. 55 वर्षीय एक सरकारी कर्मचारी बताते हैं, ‘ये धारावाहिक हमारे यहां बनने वाले सीरियलों के उलट वास्तविकता के ज्यादा करीब हैं. मैंने एक सीरियल देखा था, जिसके एक किरदार जैसे व्यक्ति को मैं असल में जानता हूं. जिस उम्र में मैं हूं वहां ये कह सकता हूं कि कहीं न कहीं ये धारावाहिक मानव स्वभाव के बारे में हमारी समझ भी विकसित कर रहे हैं.’

जहां ये प्रचलित हो कि सीरियल सिर्फ गृहिणियां देखती हैं वहां कामकाजी वर्ग का टीवी सीरियलों के प्रति ये झुकाव देखना सुखद है. बैंकर अर्पणा बताती हैं, ‘भारतीय टेलीविजन इंडस्ट्री का इतिहास देखिए तो ‘बुनियाद’, ‘ये जो है जिंदगी’, ‘फर्ज’ जैसे धारावाहिक मिलते हैं जिनसे दर्शक जुड़ाव महसूस करता था पर आज भारतीय टीवी इंडस्ट्री खासकर धारावाहिकों की हालत बहुत खराब है. एक भी ऐसा सीरियल नहीं है जिससे कोई आम दर्शक जुड़ाव महसूस कर सके. वहीं इन पाकिस्तानी सीरियलों में एक गहराई है जो दिल को छू जाती है. भारतीय सीरियल विश्वसनीयता खो चुके हैं पर पाकिस्तानी सीरियलों में अभी ये बाकी है. भारतीय टीवी निर्माताओं को इनसे कुछ सीखना चाहिए. ‘हमसफर’, ‘जिंदगी गुलजार है’, ‘औन-जारा’ कुछ ऐसे सीरियल हैं जो मैं कितनी भी बार देख सकती हूं.’

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‘जिंदगी गुलजार है’ भारत में आए इन पाकिस्तानी धारावाहिकों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ और इसके लिए किसी टीआरपी आंकड़े की जरूरत नहीं है बस ये जानना काफी है कि मात्र 26 एपिसोड के इस धारावाहिक को पिछले साल जून में शुरू होने के बाद से चैनल पर चार बार दिखाया जा चुका है. यहां महत्वपूर्ण बात ये भी है कि भारत में धार्मिक कट्टरता के बढ़ने के बावजूद ‘जिंदगी’ चैनल के इस्लाम केंद्रित धारावाहिकों को पसंद किया जा रहा है. लोग मुस्लिम संस्कृति को जानना चाहते हैं. ऐसा नहीं है कि भारत में मुस्लिम बैकग्राउंड पर सीरियल नहीं बने हैं पर हर दूसरे सीरियल की ही तरह सगे-सौतेले के झगड़ों और सास-बहू के अति नाटकीय घटनाक्रमों ने मुस्लिम संस्कृति को न दिखाते हुए बस ऊब ही पैदा की है.

वैसे दर्शक सिर्फ कंटेंट से ही नहीं इन सीरियलों में प्रयोग किए जा रहे संगीत से भी काफी प्रभावित हैं. पेशे से वकील 45 वर्षीय पूजा कहती है, ‘हमारे यहां टीवी सीरियलों में जबरदस्ती साउंड इफेक्ट ठूंसे जाते हैं, गर्दन मुड़ने पर उसी सीन को बिजली कड़कने की आवाज के साथ तीन बार दिखाना हास्यास्पद है. पाकिस्तानी ड्रामा में बहुत हल्का बैकग्राउंड संगीत प्रयोग होता है जो स्थिति और कहानी की गंभीरता को बनाए रखता है.’ भारतीय सीरियलों में टाइटल गीत का चलन लगभग बंद ही हो चुका है और सीरियल के बीच में भी फिल्मी गानों के मुखड़े-अंतरे ही सुनने को मिलते हैं. ऐसे में दर्शकों को सीरियल में प्रयोग होने वाले गीत भी खूब लुभा रहे हैं. कुर्तुलीन बलोच की खूबसूरत आवाज में गाए धारावाहिक ‘हमसफर’ के गीत ने बलोच के फैन क्लब में भारतीयों की संख्या में खासा इजाफा किया है, तो वहीं ‘जिंदगी गुलजार है’, ‘ये गलियां ये चौबारा’, ‘दिल-ए-मुज्तर’ जैसे सीरियलों के गीत भी खासे पसंद किए गए. धारावाहिक ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’ में फवाद खान की आवाज में कही गई अहमद फ़राज़ की नज़्म ने नई पीढ़ी को इस शायर से रूबरू करवाया.

वैसे ये पहली बार नहीं है जब पाकिस्तानी धारावाहिक हिंदुस्तानी अवाम में लोकप्रिय हुए हैं. 80 के दशक में ‘तनहाइयां’, ‘अनकही’ और ‘धूप किनारे’ जैसे सीरियल भारत में आए थे पर तब टीवी और केबल का इतना चलन नहीं था जितना आज है. पाकिस्तानी सीरियलों की लोकप्रियता सिर्फ भारत में ही नहीं है बल्कि इन्हें डब करके सऊदी अरब और मलेशिया में भी प्रसारित किया जाता है. पाकिस्तानी धारावाहिकों को भारतीयों तक लाना शैलजा केजरीवाल का आइडिया था जिसे जी समूह ने असल रूप दिया. इस समय कंपनी में चीफ क्रिएटिव ऑफिसर (स्पेशल प्रोजेक्ट्स) पद संभाल रहीं शैलजा चैनल को एक साल के कम वक्त में मिली सफलता से खुश हैं और चैनल के अगले उपक्रम को संभाल रही हैं, जिसके बारे में वे अभी घोषणा नहीं करना चाहतीं.

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जिन्होंने जीता भारतीयों का दिल

जिंदगी गुलजार हैः  उमैरा अहमद के उपन्यास पर बने इस धारावाहिक ने पूरे हिंदुस्तान का दिल जीता. ये निम्न मध्यम वर्गीय कशफ की दुनिया की मुश्किलों से जूझते हुए जिंदगी में कामयाब होने की कहानी है. दूसरी तरफ एक अमीर घर के लड़के जारून का किरदार है, जो जिंदगी और प्यार को एक अलग ही नजर से देखता है. प्रभावी अभिनय और सादगी ने मुख्य अभिनेताओं सनम सईद और फवाद खान को भारतीय जनता का चहेता बना दिया. केवल 26 कड़ियों के इस सीरियल को अब तक ‘जिंदगी’ चैनल पर चार बार प्रसारित किया जा चुका है.

Aunn_Zaraऔन जाराः  ‘जिंदगी’ पर प्रसारित हुए शुरुआती धारावाहिकों में से एक ‘औन जारा’ एक जिद्दी लड़की जारा (माया अली) और परिवार के लाड़-प्यार में पले इकलौते बेटे औन (उस्मान खालिद बट) की कहानी थी, जो एक-दूसरे को पसंद न करने के बावजूद शादी करते हैं. ये धारावाहिक फैजा इफ्तिखार के उपन्यास ‘हिसार-ए-मोहब्बत पर आधारित था.

हमसफरः  ‘जिंदगी’ के सबसे ज्यादा चर्चित कार्यक्रमों में से एक ‘हमसफर’ ने इसकी मुख्य अदाकारा माहिरा खान की बॉलीवुड में आने की राह बनाई. पति-पत्नी के रिश्तों के उतार-चढ़ाव पर आधारित ये सीरियल फरहत इश्तियाक के इसी नाम के उपन्यास पर बना था.

वक्त ने किया क्या हसीं सितमः   बंटवारे की पृष्ठभूमि में रची इस मासूम प्रेम कहानी ने लोगों के दिलों को छू लिया. खूबसूरत सनम बलोच ने बानो के किरदार में काफी चर्चा बटोरी. रजिया बट के उपन्यास ‘बानो’ पर बने इस सीरियल पर बंटवारे के समय भारत की गलत छवि पेश करने के आरोप भी लगे. सनम के अलावा फवाद खान, सबा कमर, मेहरीन राहिल और एहसान खान के अभिनय की भी खासी प्रशंसा बटोरी.

2ujqb0yबड़ी आपाः  यह एक अति-स्वाभिमानी जुबैदा की कहानी है, जो अपनी और अपने आसपास के सभी लोगों की जिंदगियों पर नियंत्रण रखना चाहती हैं, पर विभिन्न उतार-चढ़ावों के बाद आखिरकार अकेली ही रह जाती है. दर्शकों को इस धारावाहिक को पसंद करने का सबसे बड़ा कारण ‘बड़ी आपा’ जैसा मजबूत महिला चरित्र था, जो अमूमन भारतीय धारावाहिकों में देखने को नहीं मिलता. लोकप्रियता के चलते चैनल द्वारा इसका भी पुनः प्रसारण किया जा चुका है.

कितनी गिरहें बाकी हैंः  भारत में टेलीफिल्मों का दौर खत्म हो चुका है पर ‘जिंदगी’ के इस सीरियल ने उन्हें फिर चलन में ला दिया. समाज में औरतों से जुड़े विभिन्न मुद्दों जैसे घरेलू हिंसा, शिक्षा, करिअर आदि पर आधारित एक एपिसोड की कहानी बुनी जाती है. किरण खेर द्वारा होस्ट किए गए इस कार्यक्रम को भी भारतीय दर्शकों ने हाथोहाथ लिया.

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