खेल का निकला तेल

लेकिन क्या बात सिर्फ क्रिकेट खिलाड़ियों की कुशलता और अकुशलता तक जाकर खत्म हो जाती है? भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) और प्रसंशकों का इसमें कोई योगदान नहीं? कहते हैं कि किसी भी समाज की पहचान उसकी राजनीति में परिलक्षित होती है. उसी तरह भारत के क्रिकेट प्रशंसक की रुचि भारतीय क्रिकेट में परिलक्षित होती है. सवाल यह है कि क्या आज भारतीय क्रिकेट टीम का कोई आम प्रशंसक टेस्ट क्रिकेट को गंभीरता से लेता है. यदि हां तो फिर यह ‘हां’ टेस्ट क्रिकेट में भारतीय टीम को सफलता के लिए प्रेरित क्यों नहीं कर पा रहा?

शायद इसका जवाब उस विशाल बाजार के पास है जो क्रिकेट को क्रिकेट से ज्यादा जैकपॉट समझ रहा है और इसे जैकपॉट जैसा दिखाने में बीसीसीआई की अहम भूमिका है.एक तर्क यह दिया जाता है कि बोर्ड को सर्वाधिक राजस्व आईपीएल जैसे निजी उपक्रम से प्राप्त होता है. अगर देश में लोक सभा चुनाव हो रहे हों तो आईपीएल को मध्य पूर्व एशिया के क्रिकेट मैदानों जैसे शारजाह और आबू धाबी में कराने पर कोई आपत्ति नहीं होती. ज्ञात हो कि आईपीएल से पहले मध्य पूर्व एशिया में तकरीबन 13 सालों से भारतीय क्रिकेट टीम पाकिस्तान के साथ एक दिवसीय मैचों की एक सीरीज को छोड़ अन्य कोई भी मैच नहीं खेली है क्योंकि इन देशों को सट्टेबाजो का गढ़ बताया जाता रहा. लेकिन आज वैश्वीकरण और स्पोर्ट्स प्रोफेशनलिज्म के नाम पर शारजाह और आबू धाबी जेसे स्थानों पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती. इन जुमलों के पीछे जाकर कोई यह बात नहीं करना चाहता कि क्यों हर साल आईपीएल में भ्रष्टाचार का कोई न कोई मामला सुर्खियां बनता है या फिर क्यों देश की सर्वोच्च अदालत बोर्ड अध्यक्ष को आईपीएल की गतिविधियों से दूर रखने के लिए उन्हें अध्यक्ष पद से हटा देती है.

दुनिया के अधिकांश खेल आज बाजार की दिशाओं के अनुसार वक्त बेवक्त नियंत्रित और अनियंत्रित होते रहते हैं ऐसे में हर खेल को देखने वाली सर्वोच्च संस्था की यह जिम्मेदारी होती है कि वह किस हद तक खेल को खेल बने रहने दे और किस हद तक इसमें बाजार का योगदान हो. भारतीय क्रिकेट बोर्ड के संदर्भ में उक्त कथन संतुलन की अवस्था में नहीं दिखता. जब 90 के दशक में कोलकाता के ईडेन गार्डन्स में टेस्ट मैच होते थे तो एक लाख की क्षमता वाला यह मैदान खचाखच भरा होता था. लेकिन अब यही मैदान अपनी क्षमता के महज दस फीसदी दर्शकों का गवाह बन रहा है. भारत के अन्य टेस्ट मैदानों का भी यही हाल है. बताते हैं 80 और 90 के दशक में भारत के अधिकांश मैदानों में साधारण दर्जे के टायलेट भी नहीं थे लेकिन मैदान खचाखच भरे रहते थे. आज पूंजी की बयार में टॉयलेट तो विश्व स्तरीय हैं लेकिन टेस्ट मैचों के दौरान उनका प्रयोग करने के लिए लोग ही नहीं आते. दर्शकों की यह कम भीड़ भी टेस्ट स्तरीय खिलाड़ियों को हतोत्साहित करती है. कई यह भी मानते हैं कि पिछले दो दशक में आए सामाजिक बदलावों के चलते आज क्रिकेट प्रशंसकों के एक बड़े वर्ग के पास टेस्ट क्रिकेट के लिए समय ही नहीं है. उसे आईपीएल जैसे आयोजन ज्यादा आकर्षित करते हैं जिनका समय तब होता है जब ऑफिस का समय नहीं होता और जो फटाफट निबट जाते हैं. एक आम व्यक्ति जो क्रिकेट मनोरंजन के लिए देखता है वह टी-20 के जरिए ग्लोबलाइज्ड हो रहे क्रिकेट का आदी हो चुका है जिसे लाइव ड्रामा और एक्शन के साथ रिजल्ट चाहिए. उसे पांच दिन तक चलने वाला टेस्ट मैच देखना भारी लगता है.

साफ है कि यह टेस्ट क्रिकेट के लिए संकट काल है. कुछ हद तक अंतरष्ट्रीय क्रिकेट परिषद  (आईसीसी) भी इसके लिए जिम्मेवार है. क्रिकेट की सर्वोच्च संस्था होने के बाद भी यह बीसीसीआई की महत्वकांक्षाओं पर लगाम नहीं लगा सकी. हालांकि दूसरी तरफ से देखा जाए तो क्रिकेट की इस सर्वोच्च संस्था की लगाम आज पूरी तरह से बीसीसीआई के हाथ में ही है. आज आईसीसी के मामलों में उसके पास सबसे ज्यादा वीटो पावर है. इस वीटो पावर के पीछे सबसे बड़ा कारण भारत से आने वाली स्पांसरशिप और राजस्व है. बीसीआई नहीं तो आईसीसी का क्या होगा, यह सवाल बीसीसीआई अधिकारियों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से आईसीसी के सामने खड़ा किया जाता रहा है. जिन एन श्रीनिवासन पर बतौर बोर्ड के अध्यक्ष और चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक के रूप में हितों के टकराव का आरोप लगा आज वे ही आईसीसी के चेयरमैन हैं और भारत की सर्वोच्च अदालत आईसीसी के मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती. फलस्वरूप, ग्लैमर, चकाचौंध, चीयर गर्ल्स और दर्शकों का रुझान सब कुछ बीसीसीआई के हिसाब से चल रहा है. यह आर्थिक शक्ति भारत के उस मध्यवर्ग को बहुत लुभाती है जो भारत को विश्व पटल पर एक महाशक्ति के रूप में देखना चाहता है. यह भी एक वजह है कि टेस्ट क्रिकेट पुराने जमाने की किसी बात की तरह देखा जा रहा है तो ट्वेंटी ट्वेंटी  क्रिकेट के भविष्य के रूप में.

जिन श्रीनिवासन पर बोर्ड के अध्यक्ष और चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक के रूप में हितों के टकराव का आरोप लगा आज वे ही आईसीसी के चेयरमैन हैं

ऐसे में सवाल उठता है कि फिर सारा दोष खिलाड़ियों पर डालना कितना वाजिब है. जानकारों का एक वर्ग है जो मानता है कि कुछ तो खेल खिलाड़ी को बदलता है और कुछ खिलाड़ी भी खेल को बदलते हैं. इस लिहाज से टेस्ट क्रिकेट में भारतीय टीम की दुर्गति में उसके खिलाड़ियों का अहम योगदान तो है ही. कप्तान धोनी को ही लीजिए. पूर्व ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर और दिग्गज इयान चैपल तो अभी से कह चुके हैं कि यदि धोनी टेस्ट मैचों में ऐसे ही कप्तानी करते रहे तो भारतीय टीम को साल के अंत में आस्ट्रेलिया में फिर से 4-0 से शिकस्त झेलनी पड़ेगी. गौर से देखा जाए तो पता चलता है कि भले ही बतौर कप्तान धोनी की रणनीतियां क्रिकेट के छोटे प्रारूप में उन्हें बहुत सी सफलताएं दिला चुकी हैं, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में उनकी यही रणनीतियां टीम को हार की और लेकर जाती हैं. कहते हैं कि टेस्ट क्रिकेट में आक्रामकता ही सुरक्षा का सबसे बेहतरीन तरीका है. लेकिन धोनी किसी छोटी सी साझेदारी के बनने से पहले ही ऐसी फील्डिंग लगा लेते हैं मानो किसी एक दिवसीय मैच के अंतिम ओवरों के लिए फील्डिंग सजा रहे हों. टेस्ट मैच के पहले दिन ही 20 वें ओवर तक लॉन्ग आन या फिर डीप मिड विकेट पर फील्डिंग लगाना गेंदबाज के उत्साह को तो कमजोर करता ही है, विपक्षी बल्लेबाज को रन बनाने का मौका भी देता है. यही वजह है कि आज क्रिकेट जगत में धोनी को एक सुरक्षात्मक कप्तान के रूप में जाना जाने लगा है.

साथ ही धोनी की बल्लेबाजी तकनीक टेस्ट क्रिकेट के लिए कितनी माकूल है, इस पर भी कई सवाल उठ रहे हैं. अगर बतौर बल्लेबाज उनके रिकार्डों पर नजर डालें तो महसूस होता है कि भारत में विकेटकीपर बल्लबाजों की एक ऐसी खेप जरूर रही है जो शायद टेस्ट में धोनी से बेहतर बल्लेबाजी कर सकते थे. कई साल तक तमिलनाडु के दिनेश कार्तिक घरेलू क्रिकेट में रनों का अंबार लगाते रहे . लेकिन एक दिवसीय क्रिकेट में धोनी की सफलता भारत के चयनकर्ताओं से लेकर जनमानस क को इस कदर प्रभावित करती रही की किसी ने धोनी से आगे देखने की कोशिश ही नहीं की.

धोनी आईपीएल में खेलने वाली एक टीम चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान हैं. इस टीम का स्वामित्व इंडिया सीमेंट्स नाम की एक कंपनी के पास है जिसके मुखिया वर्तमान आईसीसी चेयरमैन एन श्रीनिवासन हैं. धोनी इंडिया सीमेंट्स के वाइस प्रेसीडेंट भी हैं. हितों के इस टकराव पर चर्चा होती रहती है और दबी जबान में यह भी कहा जाता रहता है कि भारतीय टीम में उन खिलाड़ियों को तरजीह मिलती है जिनका संबंध चेन्नई सुपरकिंग्स से हो. इंग्लेंड दौरे पर कमेंट्री करते वक्त शेन वॉर्न ने रविंदर जडेजा को टेस्ट स्तर का गेंदबाज मानने से असहमति जता दी थी. ज्ञात हो कि जडेजा चेन्नई सुपर किंग्स के लिए खेलते हैं. कई आरोप लगाते हैं कि आर अश्विन, मुरली विजय, मोहित शर्मा आदि को  भारतीय टीम में जगह मिलती है तो इसकी वजह यह भी है कि वे चेन्नई सुपर किंग्स के खिलाड़ी हैं. उधर, प्रज्ञान ओझा, अमित मिश्रा और उमेश यादव जैसे कई और नाम कुछ मैचों में मेहमान के तौर पर बुलाए जाते हैं और फिर बिना कोई मैच खेले अगले दौरे से बाहर कर दिए जाते हैं.

धोनी की मैदान के अंदर और बाहर की नीतियां भारतीय क्रिकेट आगे कहां लेकर जाती हैं इसका जवाब अगले साल आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में होने वाले विश्व कप तक मिल जायेगा. तब तक चयनकर्ता धोनी को ही कप्तान बनाए रखेंगे इसमें कोई संदेह नहीं दिखता. धोनी साल के अंत में आस्ट्रेलिया में तीन टेस्ट मैचों की सीरीज हारते हैं तो वे ऐसे कप्तान बन जाएंगे जिसका रिकॉर्ड घर से बाहर कप्तानी करने के मामले में सबसे खराब रहा है.

धोनी के समर्थक कहते हैं कि अगर धोनी नहीं तो कप्तानी का विकल्प कौन है. धोनी के विकल्प के रूप में देखे जा रहे विराट कोहली का प्रदर्शन इंग्लैंड में बहुत खराब रहा इसलिए टेस्ट कप्तानी के लिहाज से उनकी संभावनाएं भी कमजोर हुई हैं. लेकिन टेस्ट क्रिकेट में जिस प्रकार से भारत हार झेल रहा है उसे देखकर लगता है कि कप्तान कोई भी हो क्या कोई टीम इस से बुरा प्रदर्शन कर सकती है.

नयी सहस्त्राब्दी में भारतीय क्रिकेट टीम ने सौरव गांगुली की कप्तानी में जो सबसे बड़ी छवि बनाई थी वह यही थी कि अब भारतीय टीम उपमहाद्वीप के बाहर भी प्रतिस्पर्धा करती है. लेकिन धोनी की कप्तानी में यह छवि आसमान पर पहुंचने के बाद अब गर्त तक पहुंच गई है. लेकिन इसके बाद भी बीसीसीआई की ओर से वैसे कदम नहीं उठाए गए जो उठाए जाने चाहिए थे.

हार, हार होती है और बिना प्रतिस्पर्धा के हो जाए तो ज्यादा दुखदायी होती है. भले ही भारत एक दिवसीय क्रिकेट में चैम्पियन हो, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में उसकी प्रत्येक हार खेल के हर प्रारूप में किसी न किसी तरह से उसके लिए नुकसानदेह ही होगी. गायक भले ही गीत गाए या गजल, रियाज की उपेक्षा आखिरकार उसका नुकसान ही करती है. इसलिए टेस्ट क्रिकेट के लिहाज से देखें तो बीसीसीआई और खिलाड़ियों की सोच और प्राथमिकताओं में बदलाव होना जरूरी है क्योंकि सवाल खेल का है और कोई भी खिलाडी खेल से बड़ा नहीं होता.

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2 COMMENTS

  1. सम़ की मांग फटाफट करिकेट है टैसट मैच का पतन होना खिलाडियों के पास
    फटाफटmindsetहै आर टैसट मे अछीperformanceकीउमिदकैसे कर सकते है खिलाडी़इसके लिये तैयार नही है

  2. धोनी odiका खिलाडी़ बन चुका है उसे टैसट में उतारना उसके साथअनयाय करना हैटैसट के लिये ऩया कैपतान तैयार करो

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