‘मधेसियों पर संकट आता है तो वे एक बार भारत को और दूसरी बार भगवान को याद करते हैं’

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आंदोलन शांतिपूर्ण ही था. सरकार ने दमन की शुरुआत की, तो थारूओं के इलाके में उसकी प्रतिक्रिया हुई. उसके पहले भारदा में हमारे साथी राजेंद्र राउत को मार दिया गया था. बाद में गृहमंत्री ने कहा कि आंदोलनकारियों ने पहले गोली चलाई इसलिए ऐसा हुआ. इससे बड़ा झूठ क्या बोला जा सकता है. सरकार ऐसे झूठ बोलेगी तो जनता तो प्रतिरोध करेगी ही.

साभार : Conciliation Resources
साभार : Conciliation Resources

एमाले, नेपाली कांग्रेस और माओवादी, ये तीनों नेपाल सरकार में शामिल प्रमुख दल हैं. तीनों के बीच मतभिन्नता भी है. तीनों में से कौन-सी पार्टी मधेसियों के प्रति नरम रुख अपनाए हुए है?

कोई नहीं. यही तीनों तो मधेसियों के सबसे बड़े शत्रु हैं. इन तीनों पार्टियों की आपसी मतभिन्नता अलग बात ह,ै लेकिन मधेसियों के खिलाफ तीनों एक हो जाते हैं.

राष्ट्रपति तो मधेसी हैं, उनका रुख?

मधेसियों का समर्थन कोई नहीं कर रहा है.

नेपाल को धर्मनिरपेक्ष देश बनाने की बात चल रही है और कुछ लोग इसे हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं. क्या इसे लेकर भी अंदर ही अंदर विवाद है?

इसे लेकर द्वंद्व है और यह बना ही रहेगा.

नेपाल के अल्पसंख्यक विशेषकर मुसलमान, किस ओर हैं. क्या वे मधेसियों के पक्ष में हैं?

अल्पसंख्यक पूरी तरह से मधेसी हैं और मधेश के सवाल पर वे सिर्फ मधेसी हैं और कुछ नहीं. वे पूरी तरह से हमारे साथ हैं.

नरेंद्र मोदी तो दो बार नेपाल गए. कई सालों बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री वहां गया है और बहुत सालों बाद ही सीधे नेपाल के मामले को भी देख रहा है. इसका कुछ तो सकारात्मक असर होगा?

भारतीय प्रधानमंत्री आए तो जरूर लेकिन आपने देखा ही होगा कि नेपाल में इसका क्या असर हुआ और भारत के प्रति नेपाल में क्या माहौल है. भूकंप आने के बाद भारत ने सबसे पहले सहयोग किया, लेकिन उसका क्या असर हुआ. भारत की राहत सामग्री ही वापस कर दी गई, पत्रकारों को भगाया गया. इससे क्या फर्क पड़ता है कि कोई भारतीय प्रधानमंत्री 17 साल बाद गया है या 17 दिनों बाद. नेपाल मंे भारत का विरोध ही राष्ट्रवादिता की मूल पहचान बन गया है. देशभक्ति का एकमात्र नारा है और राष्ट्रीयता का आधार भारत और भारतीयों का विरोध ही है. भूकंप के समय चीन से राहत सामग्री दो दिनों के बाद आई. चीन को कहां कुछ लौटाया गया. नेपाल में मधेसियों के लिए ‘भारतीय विस्तारवाद मुर्दाबाद’ का नारा बोला जाता है. चीन ने तिब्बत को कब्जे में कर रखा है, लेकिन उसे कभी चीनी विस्तारवाद नहीं कहा गया. आपको और कुछ जानना हो तो आप याद कीजिए कि जब राजतंत्र का अंत हुआ तब गणतंत्र की रूपरेखा भारत में बनी, लेकिन जब  प्रचंड नेपाल के प्रधानमंत्री बने तो पहले चीन गए. भारत और भारत सरकार के प्रति उनका क्या रवैया था, आप समझ ही सकते हैं.

भारत के अलावा वहां चीन की धमक और खनक सब जानते हैं. साथ ही यूरोपियन यूनियन और अमेरिका भी महत्वपूर्ण भूमिका में हैं. उनके प्रति नेपाल में क्या रवैया है?

सब हैं वहां लेकिन यह सच है कि नेपाल के हर परिवर्तन में भारत की ही भूमिका सबसे अहम रही है. राणा शासन के अंत के बाद जब व्यवस्था बनाने की बात हुई तो भारत की भूमिका रही. पंचायती व्यवस्था की बात आई तो भारत के एमजे अकबर जैसे पत्रकार, हरकिशन सिंह सुरजीत, चंद्रशेखर जैसे नेताओं की भूमिका रही. राजतंत्र के खात्मे के बाद गणतंत्र की बात आई तो दो बिंदुओं वाला समझौता कहीं और नहीं बल्कि दिल्ली में ही हुआ. भारत हमेशा अहम भूमिका निभाता रहा है लेकिन भारतीयों के साथ वहां क्या हो रहा है. पशुपति नाथ मंदिर के पुजारी को निकाला गया. भारतीय राजदूत पर जूता फेंका गया. भूकंप के बाद भारतीय सहायता सामग्री लौटाने के बाद भारतीय पत्रकारों को भगाया गया. कोई बताए तो सही कि नेपाल में भारतीय पत्रकारों की गलती आखिर क्या थी? भारत को हटा दें तो नेपाल में कोई बदलाव नहीं हुआ.

क्या भारत सरकार मधेसियों के पक्ष में किसी तरह का सार्थक हस्तक्षेप कर रही है?

दुख तो इसी बात का है कि भारत कभी मधेसियों की पीड़ा समझता ही नहीं जबकि मधेसी भारतीय होने की सजा ही भुगत रहे हैं. तराईवासी मधेसियों को जब-जब संकट आता है, वे एक बार भारत को याद करते हैं और दूसरी बार भगवान को, लेकिन भारत कभी इनकी पीड़ा नहीं समझता. नेपाल में मधेसी दोयम दर्जे के नागरिक बन गए हैं और भारत में उससे भी घटिया दर्जे के. वहीं भारत में कुछ होता है तो उसका मधेसियों पर क्या असर पड़ता है, इसे एक उदाहरण से समझाता हूं. एक बार भारतीय फिल्म कलाकार ऋतिक रोशन ने कह दिया था कि उन्हें नेपाली पसंद नहीं. उसके बाद काठमांडू में तीन दिनों तक अत्याचार हुआ. तराई में गोलियां चलीं और मधेसियों को मारा गया.

मधेसियों को भारत से क्या अपेक्षाएं हैं?

बस भारत हमें अौर हमारी पीड़ा को समझे. जो नेपाल के नागरिक हैं, वे भारतीय सेना में भर्ती हो सकते हैं लेकिन जो मधेसी हैं, उन्हें भारतीय सेना में नहीं लिया जाता. आखिर मधेसियों ने भारत का क्या बिगाड़ा है? भारत के बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों से मधेसियों का रिश्ता बेटी-रोटी का है. हमारे यहां भारत के लोगों की शादियां होती हैं. अब जो भारत में हैं, उन्हें भी भारत में अवसर मिलता है, जो नेपाली हैं, उन्हें भी अवसर मिलता है, बीच में मधेसियों को कोई नहीं पूछता. ऐसे में आप समझ सकते हैं कि आंदोलन कर रहे मधेसियों को कैसा लगता होगा.

मधेसियों के प्रति बने भारत के इस नजरिये की आप क्या वजह मानते हैं?

भारत का रवैया शुरू से ही ऐसा रहा है. भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन भारत को देखने का जो नजरिया ब्रिटिशों  का था, वह बना रहा और अब भी यह कायम है.

आपका संगठन सशस्त्र और हथियारबंद आंदोलन में भरोसा रखता है. दुनिया में सशस्त्र आंदोलन के दिन लद रहे हैं. माओवादियों से लेकर एलटीटीई का हश्र देखकर आपको क्या लगता है?

ऐसा नहीं कि हम हिंसाप्रिय हैं. हम तो बात करना चाहते हैं. नेपाल सरकार ही बताए कि मधेसी कैसे नेपाल में आए? क्या बंगाल, अवध और बिहारवालों ने अपनी जमीन देकर नेपाल के दायरे का विस्तार नहीं किया था और क्या यह सच नहीं है कि नेपाल के पास अनाज उगाने वाले उपजाऊ इलाके थे ही नहीं. ऐसे में बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल आदि ने अपनी जमीन देकर नेपाल को आत्मनिर्भर और जीने योग्य बनाया. हम बाद में जाकर जबर्दस्ती तो वहां बसे नहीं हैं. कम से कम हमारे इस इतिहास पर तो बात हो. हमें अपने मधेश का इतिहास बताने की इजाजत दो, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होने दिया जा रहा है.

अभी हाल ही में नेपाल सरकार के बारे में ‘मूल्यांकन’ पत्रिका के पत्रकार श्यामश्रेष्ठ ने अच्छी बात कही है. उनके अनुसार, ‘नेपाल की सरकार हिंसाप्रिय है, बिना हिंसा के बात सुनती ही नहीं.’ आपके यहां शहीद भगत सिंह कहते थे न कि बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती है. वही नेपाल में हो रहा है. अब बताइए नेपाल में सरकार सीमांकन को तैयार है. वह तैयार हो जाती तो इतनी हिंसा तो न होती.

आपको क्यों लगता है कि आप लोगों की बात एक दिन जरूर सुनी जाएगी?

भारत में जब ब्रिटिशराज था तब कहा जाता था कि ब्रिटिश सरकार का सूरज कभी नहीं डूबता. उसके पास दूसरा विश्वयुद्ध लड़ी हुई सेना थी, लेकिन भारत के लोगों ने उन्हें अपने यहां से भागने पर मजबूर कर दिया. भारत आजाद हुआ. जनता की ताकत अलग होती है. यह हमेशा नहीं जगती, लेकिन जब जगती है तो बड़ी-बड़ी क्रांतियां हो जाती हैं.

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