मुलायम सिंह यादव और अमर सिंह

0
373
mulayam_singh
फोटोः शैलेन्द्र पाण्डेय

राजनीति की दुनिया में अगर कोई एक लाइन सबसे ज्यादा बार दुहराई गई है तो वह है, यहां कोई किसी का न तो स्थायी दोस्त होता और न ही दुश्मन होता है. इस पंक्ति को राजनेता, पत्रकार और विश्लेषक सब बार-बार दोहराते हैं. फिर भी यहां समय-समय पर जोड़ियां बनती-बिगड़ती रहती हैं. दोस्त बनते हैं, साथ-साथ जीने-मरने की कसमें खाई जातीं हैं.

इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी एक राजनीतिक जोड़ी बनी. बात 1995 की है. विदेशी कारों से सफर करने वाले, पांच सितारा होटलों में होने वाली फिल्मी पार्टियों में शामिल होने का शौक रखने वाले अमर सिंह मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह और अमर सिंह की नई जोड़ी अस्तित्व में आई. जब यह जोड़ी बन रही थी तभी कुछ लोग इसे बेमेल बता रहे थे. कारण अमर सिंह का व्यक्तित्व जो समाजवाद और समाजवादी मूल्यों से बिल्कुल अलग था. अमर सिंह धन-दौलत और अपने संपर्कों के लिए जाने जाते थे तो मुलायम सिंह अपनी जमीनी राजनीति की वजह से पहचाने जाते थे. लेकिन फिर भी यह राजनीतिक जोड़ी 14 साल तक टिकी रही और दिन प्रतिदिन मजबूत होती गई. अमर सिंह खुद को मुलायम का छोटा भाई और सेवक बताते थे. कई साक्षात्कारों में उन्होंने खुद को हनुमान और मुलायम को राम बताया. पार्टी में आने के बाद अमर सिंह ने जमीन से जुड़ी इस पार्टी की चौखट पर कई सितारे टांक दिए. जया प्रदा, संजय दत्त,  जया बच्चन और मनोज तिवारी जैसे कई फिल्मी सितारे समाजवादी पार्टी में दिखने लगे. अमिताभ बच्चन से लेकर अनिल अंबानी तक की आवक-जावक लखनऊ होने लगी. समाजवाद की बात करने वाली पार्टी और उसके मुखिया, अमर सिंह का साथ पाकर ‘पांच सितारा’ चकाचौंध से सराबोर होने लगे.

लेकिन इस चमक-दमक की वजह से पार्टी के कई खांटी समाजवादी नेता हाशिये पर चले गए. कुछेक नेता खुदबखुद किनारे हो गए तो कई को अमर सिंह ने किनारे लगा दिया.

पार्टी के कार्यकर्ताओं में असंतोष फैलने लगा और पार्टी के वरिष्ठ नेता, अपने ‘नेता जी’ से नाराज रहने लगे. जमीनी राजनीति के माहिर मुलायम सिंह यादव पर अमर प्रेम इस कदर हावी हुआ कि वे न तो कोई असंतोष देख पा रहे थे और न ही किसी की नाराजगी महसूस कर पा रहे थे. इस समय के हालात के बारे में लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक गोविंद पंत राजू ने अपने एक लेख में लिखा है, ‘मुलायम के केंद्रीय रक्षा मंत्री रहते हुए जब 1997 में लखनऊ में समाजवादी पार्टी कार्यकारिणी की बैठक एक पांच सितारा होटल में आयोजित की गई तो आलोचना करने वालों में मुलायम के राजनीतिक विरोधियों के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के आम नेता और कार्यकर्ता भी थे. मुलायम सिंह के खांटी समाजवाद का यह एक विरोधाभासी चेहरा था. इस शुरुआत के बाद सपा में पांच सितारा संस्कृति का सिलसिला शुरू हो गया. पार्टी समाजवादी सिद्धांतों और जमीनी राजनीति को एक-एक कर ताक पर रखते हुए

 

‘कॉरपोरेट कल्चर’ के शिकंजे में फंसती चली गई. नेतृत्व में एक ऐसा मध्यक्रम उभरने लगा जिसे न समाजवादी दर्शन की परवाह थी और न समाजवादी आचरण की चिंता.’

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here