‘मैं शंकर बिगहा बोल रहा हूं’

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मैं शंकर बिगहा, आपसे कुछ कहना चाहता हूं,
यह खत किसे संबोधित करूं, समझ में नहीं आ रहा. मेरे मन पर कुछ नृशंस हत्याओं का बोझ है, मेरी देह बेकसूर लोगों के खून से सनी हुई है. क्या यह खत मैं उन जिला न्यायाधीश महोदय को लिखूं जिन्होंने 13 जनवरी 2015 को फैसला सुनाया कि 25 जनवरी 1999 को शंकर बिगहा के पुरबारी टोला में जो हत्याएं हुई थीं, उसके लिए किसी को जिम्मेवार नहीं ठहरा सकते, या यह पत्र उस जिला प्रशासन को लिखूं जो घटना के चश्मदीदों में इतना विश्वास भी नहीं भर सका कि वे कोर्ट में जाकर आंखो देखी बयान कर सकें. जिन्होंने अपनी आंखों के सामने अपनी बेटी, बीवी, भाई और बाप को मरते हुए देखा था वे यह सच अपने सीने में दबाए रह गए. उन्होंने देखा था कि कत्लेआम करनेवाले एक किलोमीटर दूर स्थित धोबीबिगहा गांव से आए थे, वे हत्यारों को पहचानते भी थे, लेकिन अदालत में इस सच को कहने का साहस नहीं जुटा सके. किसे संबोधित करूं यह खत, समझ नहीं आ रहा. क्या सरकार के नाम संबोधित कर दूं, जिसमें अभी भी वही लोग शामिल हैं जिनकी पूरी राजनीति इसी गांव की रहवासी जातियों के इर्द गिर्द घूमती है. वे अपने सत्ता में आगमन को सामाजिक न्याय कहते हैं, और मेरे रहवासियों को न्याय दिलाने के सवाल पर चुप हो जाते हैं. तब इनका नारा था राबड़ी-लालू की सरकार को बर्खास्तकर राष्ट्रपति शासन लगना चाहिए, क्योंकि उनसे राज्य संभल नहीं रहा. क्या उन्हीं राबड़ी देवी और लालू यादव के नाम से पत्र लिखूं जो घटना के बाद शंकर बिगहा आये थे और मुआवजे की घोषणा करने में लगे थे. तब मेरे गांव की महिलाओं ने कहा था कि राबड़ी जी हमें आपका मुआवजा नहीं चाहिए, हमें हथियार दे दीजिए, हमलोग खुद न्याय कर लेंगे! मेरे गांव की वे महिलाएं शायद सही थीं, उन्हें अंदेशा था कि अदालती न्याय उन्हें कभी नहीं मिलेगा. जहानाबाद जिला अदालत के फैसले ने उनकी आशंका को सही साबित किया है.

Shankar-Bigahaआज 15 साल बाद नतीजा यही निकला कि मेरे गांव में 25 जनवरी 1999 की रात जो 23 इंसान मारे गए थे, जिसमें पांच महिलाएं, सात बच्चे और एक दस माह का बच्चा भी शामिल था, उन्हें मारनेवाला कोई नहीं था. एक बार को सोचता हूं कि मौजूदा मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के नाम ही यह पत्र लिख भेंजूं. वे तो हर दिन ही दलितों-महादलितों को न्याय दिलाने, अधिकार दिलाने की बात कर रहे हैं. लेकिन उन्हें भी संबोधित करने का क्या फायदा! वे अपने इलाके गया जिले के पुरा गांव के दलितों का साथ तो दे नहीं पाते, जिन्हें गांव के दबंगों की वजह से पिछले माह गांव छोड़कर भाग जाना पड़ा था, वे मेरी पीड़ा कितनी महसूस करेंगे, जुबानी बयान भी तो खर्च नहीं किया उन्होंने मेरे ऊपर अभी तक.

शायद सबसे मुफीद होगा कि मैं अपने लोगों, बिहार की आम जनता के नाम ही डाक भेजूं. उन तमाम लोगों को जो गांव की गलियों, कस्बों के नुक्कड़ों से लेकर राजधानी पटना के अड्डे और राजधानी दिल्ली की सड़कों तक फैले हुए हैं. बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे, नगरी और मियांपुर नरसंहार में भी इसी तरह के फैसले आए पर इन लोगों में कोई हलचल पैदा नहीं हुई, वे तब भी चुप रहे थे, वे शंकर बिगहा के फैसले पर भी चुप रहे. बस आहें भरते हुए, चाय की चुस्कियां लेते हुए.

सबको मालूम होगा कि अदालत ने बीती 13 जनवरी को क्या कहा. अदालत ने कहा कि जिन आरोपितों के खिलाफ आरोप लगाये गए हैं, गवाह उनके खिलाफ गवाही देने को तैयार नहीं हैं, इसलिए सबको बरी किया जाता है. उन अभियुक्तों को पहचानने से, उन अभियुक्तों के खिलाफ गवाही देने से मेरे गांव के लोग कतरा गये, जिनके खिलाफ 26 फरवरी 2000 को और 15 अगस्त 2003 को दो-दो चार्जशीट दाखिल हुई थी. मेरे गांव का भैरो राजवंशी जैसा गवाह, जिसने आंखों के सामने पत्नी और दो बच्चों के संग परिवार के पांच लोगों को मारे जाते हुए देखा था, उसने भी गवाही देने से इंकार कर दिया. आकर पूछिए कभी भैरो से कि उसने ऐसा क्यों किया? वह कहता है कि क्या करें, प्रशासन सुरक्षा दे नहीं रहा था और दबंग नतीजा भुगतने की धमकी दे रहे थे. मेरे ही गांव के रामप्रसाद पासवान से पूछिए. वह बताएगा कि उसे भी उस रात गोली मारी गई थी, वह बेहोश हो गया था, इसलिए नहीं देख सका कि कौन लोग मार रहे हैं, कहते-कहते रामप्रसाद रोने लगेगा. वह झूठ बोलेगा, क्योंकि उसे मालूम है कि सच बोल देने से उसे भी मार दिया जाएगा. मेरे गांव में सबको मालूम है कि धोबीबिगहा में जिन 23 अभियुक्तों को बरी किया गया है, उनकी बात शासन-प्रशासन में सुनी जाती है और वे ताकतवर लोग हैं, इसलिए सब अदालत में झूठ बोल रहे हैं.

क्या-क्या कहूं, आज कुछ लोग बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं कि शंकर बिगहा में तो अन्याय हो गया. यह बड़ा अजीब लगता है. सामाजिक न्याय के नाम पर दिन-भर जुगाली करने की बजाय इन लोगों ने धरा पर आकर कभी न्याय-अन्याय की परवाह की होती तो मैं बताता कि इन 15 सालों में मेरे साथ क्या हुआ. यहीं कहा गया था नरसंहार के बाद कि मारे गये लोगों के परिजनों को नौकरी मिलेगी, लेकिन एक को सिर्फ चैकीदार की नौकरी मिली, वह भी अनुकंपा के आधार पर. कभी आते तो देखते कि आज तक गांव की सड़क कच्ची और टूटी-फूटी है. स्कूल जर्जर है लेकिन घोषणा की गई थी कि मेरे साथ न्याय होगा. मेरे गांव के बच्चे आज भी उसी गांव में पढ़ने जाते हैं, जिस गांव के लोगों ने 25 जनवरी 1999 की रात आकर रक्तपात किया था और एक क्रूर इतिहास रचा था. सिर्फ बच्चे ही पढ़ने नहीं जाते, बड़े लोग भी उनके यहां ही काम करने जाते हैं. खेती-मजदूरी का काम, क्योंकि उनके पास कोई विकल्प नहीं है. कोई मेरे साथ खड़ा नहीं हुआ. पेट पालने के लिए उनके यहां ही जाने की मजबूरी हो तो कौन गवाही देगा. मेरे लोग कायर नहीं थे, लेकिन मजबूर थे. उनके पास कोई और विकल्प नहीं था. 25 जनवरी की वह रात मेरे जेहन में अब भी ताजा है. उस रात सिर्फ लल्लन साव का घर बच गया था, अकेला पक्का घर होने के कारण हत्यारे उसके घर में घुस नहीं सके थे. इस कहने-सुनने का भी क्या फायदा. मेरे गांव की घटना तो फिर भी 15 साल पुरानी हो गई. बाथे-बथानी-नगरी-मियांपुर की घटना को भी वर्षों गुजर गए. लोग तब भी चुप ही थे. सब जगह एक सा न्याय हुआ- किसी को किसी नें नहीं मारा. पुरानी बातों को छोड़ दीजिए, एक बार रोहतास जिले के मोहनपुर गांव में चले जाइयेगा, एक बार भोजपुर जिले के डुमरिया गांव में चले जाइए. ये तो आज कल की घटना है. डुमरिया में छह महिलाओं को दारू पिलाकर उनके साथ गैंगरेप किया गया है. उन्हीं को न्याय दिला दीजिए.

मेरे नाम पर राजनीति मत कीजिए. न्याय की उम्मीद तो अब मिट चुकी है. अंत में एक सवाल जज साहब से कहना चाहता हूं. क्या हमें किसी ने नहीं मारा?