मंगल की ओर

माना यह भी जा रहा है कि मंगलयान जैसे अभियानों से मिलने वाली जानकारियां भविष्य में वहां मानव बस्तियां बसाने के लिहाज से काफी अहम होंगी. 2030 तक इंसान के मंगल पर उतरने की बात हो रही है. दरअसल आज भी हमारे सौरमंडल में पृथ्वी के बाद मंगल ही है जो इंसानों के रहने के लिए अनुकूल है. इसकी सतह के नीचे पानी की मौजूदगी है. यह न तो बहुत गर्म है और न बहुत ठंडा. सोलर पैनलों के लिए यहां पर सूरज की पर्याप्त रोशनी है. इसका गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के मुकाबले 38 फीसदी है और बहुत से वैज्ञानिक मानते हैं कि मानव शरीर खुद को इसके मुताबिक ढाल सकता है. विरल ही सही, पर यहां एक वायुमंडल है जो सौर विकिरण से ढाल का काम कर सकता है. मंगल पर दिन-रात का चक्र भी पृथ्वी जैसा है. यहां एक दिन 24 घंटे 39 मिनट और 35 सेकेंड का है.

हालांकि मंगलयान सहित भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक वर्ग में आलोचना का विषय भी बना है. ऐसे भी लोग हैं जिनका मानना है कि अंतरिक्ष कार्यक्रम अमीर औद्योगिक देशों के शगल हैं जिनकी देखादेखी भारत को नहीं करनी चाहिए. वह इस पैसे का इस्तेमाल शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी उन बुनियादी सेवाओं में कर सकता है जो आम आदमी को सीधे प्रभावित करती हैं और जिनका हाल देश में बहुत बुरा है. वहीं इसके उलट बहुत से लोग यह भी मानते हैं कि इसके अपने फायदे हैं. अंतरिक्ष उत्पाद और सेवा क्षेत्र का बाजार भविष्य के लिए काफी संभावनाओं से भरा हुआ है. अमेरिका स्थित सेटेलाइट इंडस्ट्री एसोसिएशन की सितंबर 2014 में ही आई एक रिपोर्ट बताती है कि 2013 में सेटेलाइट उद्योग से करीब 195 अरब डॉलर का राजस्व पैदा हुआ. कई दूसरी रिपोर्टें हैं जो बताती हैं कि अगले कुछ साल में व्यावसायिक मकसद के लिए लांच किए जाने वाले सेटेलाइटों का कारोबार कम से कम 15 फीसदी सालाना की दर से बढ़ेगा. इस क्षेत्र में सफल खिलाड़ी गिने-चुने ही हैं. मंगलयान ने एक बार फिर संदेश दिया है कि कोई कम खर्च में अपना उपग्रह अंतरिक्ष में भेजना चाहे तो उसे नासा या यूरोपियन स्पेस एजेंसी की बजाय इसरो की तरफ देखना चाहिए.

लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि विज्ञान और तकनीक में निवेश अंतत: योग्यता और क्षमता को प्रोत्साहन देता है. इससे उन प्रतिभाओं के उभरने में मदद मिलती है जो व्यापक रूप में अर्थव्यवस्था और समाज को लाभ पहुंचाती हैं. इस लिहाज से देखें तो मंगलयान की सफलता हर नजरिये से मंगलकारी दिखती है.

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