लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार

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फोटोः सोनू किशन
फोटोः सोनू किशन

बात दो महीने पहले की है. बिहार में 10 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव के प्रचार का समय था. पटना से सटे हाजीपुर में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की एक सभा थी. वर्षों बाद दोनों नेताओं का एक साथ इस तरह राजनीतिक मंच साझा करने का अवसर था. कौतूहल और उत्सकुता का उफान स्वाभाविक था. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ओबी वैन अहले सुबह से ही पोजिशन लेकर वहां खड़े हो चुके थे. बड़े-बड़े पोस्टरों के जरिये कुछ सप्ताह पहले से ही माहौल को गरमाने की पूरी कोशिश हुई थी लेकिन जिस दिन लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की सभा हुई, भीड़ जुट ही नहीं सकी. मुश्किल से भीड़ उतनी ही हो सकी, जितनी एक आम विधायकी का उम्मीदवार बिना किसी बड़े नामचीन नेता के खुद के दम पर जुटा लेता है. लालू नीतीश की सभा में भीड़ का नहीं जुटना तो एक अलग बात रही, सबसे विचित्र तो नीतीश कुमार के चेहरे पर उभरा भाव था. नीतीश कुमार मंच पर लगातार किसी शरमाते, झेंपते हुए बालक की तरह इधर से उधर देखते रहे और पसीने-पसीने होते रहे. लालू प्रसाद अपनी लय  में थे और नीतीश के हाथों को पकड़कर दनादन तसवीरें उतरवा रहे थे. नीतीश कुमार सिर्फ उसी दिन पसीने-पसीने नहीं हुए, जनसभा के बाद जिस दिन विधानसभा उपचुनाव का परिणाम आया और दस में से छह सीटों पर लालू-नीतीश-कांग्रेस गठबंधन को जीत हासिल हुई उस दिन भी खुशी व्यक्त करने के लिए नीतीश कुमार ने संवाददाता सम्मेलन तो जरूर बुलाया लेकिन उन्होंने सबसे ज्यादा समय इसी बात को बताने में लगा दिया कि लालू प्रसाद-राबड़ी देवी के राज को उन्होंने कभी भी जंगलराज नहीं कहा बल्कि भाजपावाले इस शब्द का इस्तेमाल करते थे.

लालू प्रसाद के साथ ही बिहार में सत्ता की राजनीति की शुरुआत करनेवाले नीतीश कुमार लगभग दो दशक बाद फिर से लालू प्रसाद के साथ आए हैं लेकिन साथ आने के बाद भी वे कभी उतने सहज नहीं दिखे हैं जैसी सहजता उनकी स्वाभाविक पहचान हुआ करती थी. नीतीश कुमार का असहज होना स्वाभाविक भी है. लालू प्रसाद के संग सत्ता की सियासत की शुरुआत करने वाले नीतीश कुमार वर्षों मेहनत करने और लालू प्रसाद को बिहार से उखाड़ फेंकने के लिए ही लाल पार्टी से लेकर भगवा पार्टी यानि भाजपा के साथ जाते रहे. आखिरकार 2005 में उन्हें लालू प्रसाद और उनकी पार्टी को बिहार से हटाने में सफलता भी मिली. उसके बाद 2010 के विधानसभा चुनाव में भी लालू प्रसाद के भूत को जिंदा रखकर और फिर से राजद के सत्ता में आने के बाद के खतरों का अहसास कराकर नीतीश कुमार दुबारा सत्ता पाने में कामयाब रहे. लेकिन राजनीतिक हालात के बदलाव और बिहार की राजनीति में अपने अस्तित्व को बचाये रखने की चुनौती ने ही उन्हें फिर से लालू प्रसाद के साथ ला दिया है. इस राजनीतिक गठजोड़ के बन जाने के बावजूद भी स्थिति अब तक असहज-सी बनी हुई है. मीडिया में लालू प्रसाद को बड़े भाई और नीतीश कुमार को छोटे भाई का उपनाम हमेशा से दिया जाता रहा है. यह भी कहा जाता रहा है कि एक जमाने में नीतीश कुमार ही लालू प्रसाद के चाणक्य हुआ करते थे. लेकिन ये दोनों ही नेता इन उपनामों और विशेषणों को लगातार खारिज करते रहे हैं. नीतीश कुमार के नजदीकी लोग कहते हैं कि जबर्दस्ती मीडिया लालू प्रसाद को बड़ा भाई कहती है और नीतीश को छोटा भाई. दूसरी तरफ लालू प्रसाद खुद मौके-बेमौके कहते रहे हैं कि नीतीश को हमने राजनीति सिखाई है, वे कभी हमारे चाणक्य नहीं रहे.

समाजवादी पाठशाला से राजनीति सीखकर कभी जिगरी दोस्त रहने के बाद दो दशक तक जानी-दुश्मन की तरह रहे बिहार के इन दोनों कद्दावर नेताओं की जोड़ी एक बार फिर से अस्तित्व में है

एक ही समाजवादी पाठशाला से राजनीति का ककहरा सीखकर कभी जिगरी दोस्त रहने के बाद लगभग दो दशक तक राजनीति में जानी-दुश्मन की तरह रहे बिहार के इन दोनों कद्दावर नेताओं की जोड़ी एक बार फिर से अस्तित्व में है. लेकिन राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए बनी यह जोड़ी कितने दिनों तक चलेगी, यह कह सकने की स्थिति में दोनों ही दल अभी भी नहीं हैं. दोनों के संग आ जाने का एक साफ फायदा तो यह दिख रहा है, जिसे लालू प्रसाद भी मूल मंत्र की तरह दुहराते रहे हैं, कि पिछड़ों, दलितों व मुसलिमों का वोट एक साथ जुड़ जाएगा तो बिहार की सियासत में इसके सामने खड़े किसी भी गठबंधन को धूल चटाना बहुत आसान हो जाएगा. वोट के इस समीकरण को लेकर लालू प्रसाद सबसे ज्यादा आश्वस्त रहते हैं और इसी को ध्यान में रखकर उन्होंने यह भी बार-बार दुहराया है कि मंडलवादी ताकतों के एक हो जाने से कमंडलवादी ताकतों की हार तय है. सैद्धांतिक तौर पर लालू-नीतीश की जोड़ी को एक आधार देने के लिए यह फार्मूला तो सही लगता है लेकिन नीतीश कुमार और उनके लोग जानते हैं कि पिछले दो दशक में नदी का पानी भी ठहरा हुआ नहीं है. दो दशक पहले नीतीश कुमार, लालू प्रसाद का ही साथ छोड़कर आये थे और अपनी पूरी सियासी पहचान भी लालू प्रसाद के विरोध के जरिये ही बना सके हैं. दस सीटों के उपचुनाव में जोड़ी बनाकर और उसके जरिये समीकरण को उभारकर छह सीटों पर कब्जा जमाना तो अलग बात रही है लेकिन अगले साल होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव में इस जोड़ी का जलवा भी इसी तरह चलेगा और उसके नतीजे भी इतने ही सकारात्मक फल देंगे, इसे लेकर कोई आश्वस्त नहीं है. वजह भी साफ है. मंडल के इस समीकरण को मात देने के लिए भाजपा अपने साथ उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास पासवान जैसे नेता को जोड़ चुकी है. बिहार भाजपा में पिछड़े समुदाय से आने वाले नेताओं की एक लंबी सूची तैयार है. भाजपा के पास सबसे ताकतवर नेता नरेंद्र मोदी तो है हीं, जिन्हें बिहार भाजपा के नेता बार-बार अपनी सहूलियत के अनुसार बिहारी लोकमानस में स्थापित करने की कोशिश करते हैं. बिहार के भाजपाई, सवर्णों के बीच मोदी को करिश्माई नेता के तौर पर तो पिछड़ों के बीच पिछड़ा समुदाय के प्रतिनिधि के तौर पर स्थापित करने की हर संभव कोशिश करते रहते हैं. इस बीच अपने लिए एक और मुसीबत खुद नीतीश कुमार ने ही खड़ी कर ली है. महादलितों को अपने पक्ष में लामबंद करने के लिए उन्होंने जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था और मांझी खुद की आकांक्षाओं से घिरे हुए नजर आते हैं. मांझी की इस कोशिश में लालू-नीतीश की बनी-बनाई जोड़ी पर पानी फिरने की पूरी संभावना पैदा हो चुकी है.

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