अर्जुन के लक्ष्य पर अकबर का निशाना

सबको मालूम है कि ये सवाल धरे के धरे रह जाएंगे. सूत्र बताते हैं कि झामुमो से आने के बाद भाजपा में छा जाने वाले अर्जुन मुंडा अगर चुनाव हारने के बाद से एकदम से खामोश हैं और चुपचाप पार्टी के हर सभा-सम्मेलन में शामिल हो रहे हैं तो उनकी इस खामोशी में भी एक राजनीति है, जिसका स्वरूप आने वाले दिनों में देखा जा सकता है. क्या एक समय में बाबूलाल मरांडी को अपदस्थ कर मुख्यमंत्री बनने वाले मुंडा भी कभी मौका पाकर बाबूलाल की तरह राह अपनाने का साहस जुटा पाएंगे? क्या मुंडा तब तक एक अनुशासित ‌सिपाही की तरह रघुबर दास को उनके कार्यकाल के बीच में ही हटा दिए जाने की उम्मीद में टकटकी लगाए रखेंगे? क्या अर्जुन मुंडा वक्त की नजाकत तो समझकर अभी चुपचाप ही रहेंगे, क्योंकि केंद्र और राज्य में भाजपा की सरकार है. और एक बार भी मुंह खोलना उन्हें भारी झमेले में फंसा सकता है. ऐसे कई सवाल मुंडा को लेकर आए दिन भाजपा कार्यालय में सुनने को मिलते रहते हैं.

जिस दिन एमजे अकबर के नाम की घोषणा हो रही थी, उस दिन भी कार्यालय के बाहर भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच बतकही में एक विषय मुंडा थे. जाहिर सी बात है कि यह सवाल अर्जुन मुंडा से पूछने का मतलब नहीं था कि आपकी ओर पार्टी ने ध्यान क्यों नहीं दिया, आपके नाम पर एक बार विचार तक क्यों नहीं हुआ? मुंडा का सीधा जवाब होता कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व फैसला करता है और उनका हर फैसला सिर आंखों पर होगा. एमजे अकबर हमारी पार्टी के बड़े और योग्य नेता हैं, इसलिए यह फैसला लिया गया. यही सवाल दूसरे तरीके से एमजे अकबर के सामने रखा जाता है कि आप तो 1989 में बिहार के किशनगंज से चुनाव लड़े और जीत दर्ज की थी. दोबारा भी लड़े मगर जीत नहीं सके. लोकसभा चुनाव के पहले भाजपा में शामिल हुए और फिर अचानक झारखंड से उम्मीदवार बनने कैसे आ गए. एमजे अकबर कहते हैं, ‘मैंने पत्रकारिता के दौरान बहुत समय झारखंड में गुजारा हैं, इसलिए मेरा झारखंड से रिश्ता बहुत पुराना और गहरा है. यह मेरा सौभाग्य है कि झारखंड की सेवा करने का मौका मिला है.’

खैर! आगे क्या होगा, आगे की बात है. अकबर का राज्यसभा जाना तय है. भाजपा के पास खुद का अंकगणित है. बाबूलाल मरांडी की पार्टी को तोड़ देने के बाद यह गणित और मजबूत हो चुका है. आजसू पार्टी का साथ उसके पास है ही. हालांकि इस बहाने झामुमो ने अपनी स्थिति मजबूत जरूर कर ली है. झामुमो ने पार्टी की ओर से हाजी हुसैन का नामांकन करवाया है. हाजी हुसैन जीत भले न सके लेकिन हेमंत सोरेन ने हाजी के बहाने पूरे विपक्ष को एकजुट कर उसका सिरमौर नेता बनने की कवायद की और यह उनकी सफलता भी रही.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here