जवाहरलाल नेहरू: 125 सवालों के घेरे में

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गुलाम भारत के अंतिम वाइसरॉय अौर स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने अपने प्रिय मित्र, ब्रितानी साम्राज्यवाद के कट्टर विरोधी अौर अपनी पत्नी एडविना के गहरे अनुरागी जवाहरलाल नेहरू के बारे में, उनकी मृत्यु के बाद जो लिखा, जवाहरलाल का उससे बेहतर मूल्यांकन शायद ही किसी ने किया होगा, ‘अगर जवाहरलाल की मृत्यु 1947 में हो जाती तो वे इतिहास के महानतम नायकों की कतार में रखे जाते, अब वे दुनिया के महान राजनेताअों की श्रेणी में रखे जाएंगे!’

ऐसा ही कुछ कभी उनके भाई समान रहे, कभी के उनके अनन्य प्रशंसक अौर कभी के उनके अनन्यतम राजनीतिक विरोधी लोकनायक जयप्रकाश ने भी कहा था, ‘हमें एक साथ दो जवाहरलाल को देखना, समझना व सीखना होगा – 1947 से पहलेवाले अौर 1947 के बादवाले!’ अाजाद भारत में अमेरिका के राजदूत बनकर अाए चेस्टर बाउल्स ने 15 अगस्त, 1947 के बाद लिखा, ‘अब दुनिया गांधी को इतिहास का नायक (हीरो अॉफ द पास्ट) अौर जवाहरलाल को भविष्य की अाशा (होप अॉफ द फ्यूचर) की नजर से देखेगी.  ऐसे कितने ही, कम से कम 125, उद्गारों से हम उन जवाहरलाल को याद कर सकते हैं जिनकी 125वीं जयंती का यह वर्ष है अौर जिसे लेकर सब तरफ यह बहस चल पड़ी है कि जवाहरलाल ने ऐसा क्या किया कि वे 125 साल जी सके. उन पर अारोपों के भी कम से कम 125 तीर तो चलाए ही जा सकते हैं. अगर उपलब्धियों अौर विफलताअों के 125 तीर दोनों अोर से चलाए जा रहे हैं, तो इस जवाहरलाल में कुछ खास तो जरूर था. कोई 50 वर्ष पहले ही मर चुका यह अादमी अगर अाज भी इस कदर जिंदा है, तो यह मानना ही होगा कि यह कोई साधारण अादमी नहीं था. अाज हम उस दौर में जवाहरलाल को याद कर रहे हैं जिस दौर में लोग-बाग जनता के पैसों से टूटी हुई सड़क या पुलिया भी ठीक करवाते हैं, तो उस पर यह बोर्ड लगवाना नहीं भूलते कि यह हमारी सांसद निधि से बनाया गया है, जहां लोग नकली लालकिला बनवाकर, उस पर चढ़कर खुद को प्रधानमंत्री घोषित कर देते हैं अौर फिर अपनी ही पार्टी का गला दबोचकर उससे चूं करवा लेते हैं! इस मोड़ से देखता हूं, तो जवाहरलाल दो अंगुल अौर बड़े नजर अाते हैं. उनके नाम की तख्ती इतिहास ने ही टांग रखी है.

जवाहरलाल संत, साधक, क्रांतिकारी या प्रशासक में से कुछ भी नहीं थे, लेकिन इतिहास ने उन पर ये सारी भूमिकाएं थोप दीं और दूसरों की अपेक्षा उन्होंने बेहद सफलता से इनका निर्वाह किया

जवाहरलाल की सबसे बड़ी खुशकिस्मती यह हुई कि वे उस युग में पैदा हुए जो एकाधिक अर्थों में गांधी-युग था, अौर यही उनका दुर्भाग्य भी बना. गांधी ने उनके भीतर छुपे उन गुणों को पहचाना, जिनके बारे में खुद जवाहरलाल को ही पता नहीं था. उन्हें तराशा-चमकाया अौर फिर वक्त की भट्ठी में झोंक दिया. फिर गांधी ने उनकी ऐसी कसौटी करनी शुरू कर दी कि जवाहरलाल का दम फूल गया. गांधी ने अपने समेत सबके साथ ऐसा ही किया, अौर इसलिए अाश्चर्य नहीं कि उस दौर के सारे गुलिवर अाज की कसौटी पर लिलिपुटियन नजर अाते हैं. जवाहरलाल को गांधी न मिले होते तो वे किसी भी सूरत में हिंद के जवाहरलाल तो न बने होते, शायद प्रधानमंत्री भी नहीं. लेकिन हम ऐसा कहें, तो उसी सांस में यह भी कहना होगा कि गांधी नहीं होते तो जिन्ना भी अौर सरदार भी अौर राजेन्द्र बाबू, मौलाना अौर राजाजी अौर जयप्रकाश नारायण अौर विनोबा भावे भी वो नहीं होते जो वे बने अौर अाज जहां वे हैं. यह तो उस गांधी का विभूतिमत्व ही था कि उसने कविगुरु रवींद्र अौर बाबा साहेब अंबेडकर अौर ठक्करबापा जैसों को एक ही दरी पर ला बिठाया अौर सबने इसमें धन्यता का अनुभव किया. इसलिए अाज हम गांधी को किनारे रखकर, केवल जवाहरलाल की बात करेंगे.

महात्मा गांधी ने जिस देश की कमान जवाहरलाल को सौंपी थी, वह देश अभी-अभी खून की नदियां पारकर, अाजादी के किनारे लगा था अौर इस जद्दोजहद में इसका एक हिस्सा वक्त के समंदर में टूटकर किसी दूसरे किनारे जा लगा था- पाकिस्तान ! वह अलग ही नहीं हुअा था, इस हिंदुस्तान में से दूसरा भी जो हड़पा जा सके, उसे हड़पने की कोशिश में लगा था.  इधर जो हिंदुस्तान जवाहरलाल के हाथ अाया था, उसके मुंह में भी खून लग चुका था. वह तन से भले ही एक दीखता था, मन से एक नहीं था अौर एक-दूसरे के प्रति गहरी हिकारत से भरा था. गरीबी अौर अशिक्षा अौर कुशिक्षा अौर जहालत अौर अालस्य ऐसा था जो अाप ही प्रतिमान बन गया था. धार्मिकता का कहीं पता नहीं था, धर्मांधता का बोलबाला था. भौतिक विकास की गहरी भूख थी, लेकिन भौतिक विकास का कोई ढांचा नहीं था. बाहरी अौर भीतरी खतरों से घिरे इस मुल्क के हर कोने से एक ही अावाज उठती थी कि उसे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए फौज-पुलिस चाहिए अौर देश के पास राजधानी दिल्ली को बचाने के लिए भी बहुत अपर्याप्त अौर अकुशल फौज-पुलिस थी. अौर ऐसे में जो देश का सबसे बड़ा अौर वर्षों का जांचा-परखा रहनुमा था, हमने उसकी हत्या कर डाली थी. देश ऐसी ही हालत में था तब, जैसे वक्त के समंदर में बिना पतवार की नाव. जवाहरलाल ने ऐसा देश संभालने की नहीं सोची थी. लेकिन जैसा भी िमला, उसे संभालने अौर बचाने की कोशिश में वे पहले क्षण से अंतिम क्षण तक जुटे रहे.

जवाहरलाल संत, साधक, विचारक, क्रांतिकारी या दुर्धर्ष प्रशासक में से कुछ भी नहीं थे लेकिन इतिहास ने उन पर ये सारी भूमिकाएं थोप दीं अौर वे उस दौर के दूसरे नायकों की अपेक्षा इनके निर्वाह में न केवल बहादुरी से लगे रहे, बल्कि एक प्रतिमान भी बना गये. वे इतिहास की गहरी समझ रखनेवाले, उत्साह व ऊर्जा से भरपूर मोहक व्यक्तित्व के धनी थे. कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने उन्हें वैसे ही ‘ऋतुराज’ या गांधी ने ‘हिंद का जवाहर’ नहीं कहा था. वे सच में ऐसे ही थे. अपने इस व्यक्तित्व के कारण, अाजादी की लड़ाई के अग्रणी सिपाही की राष्ट्रीय पहचान अौर इतिहास की बारीकियों को पहचानने के कारण वे इस डगमागते देश में अाशा का संचार कर सके, इसका भौगोलिक ढांचा बनाने व मजबूत करने का काम कर सके अौर दुनिया के सामने इसके भूत, वर्तमान व भविष्य का मोहक व चुनौतीपूर्ण नक्शा रख सके. उन्होंने देश को मजबूत व स्थिर करने के दो सबसे महत्वपूर्ण तत्व को पहचाना – संसदीय लोकतंत्र की नींव मजबूत की जाए अौर देश को अार्थिक निर्भर बनाया जाए. सवाल था कि कैसे हो यह काम? इन दोनों के बारे में एक काल्पनिक तस्वीर थी, महात्मा गांधी की दी हुई, जिसे उनकी बुद्धि स्वीकारती नहीं थी. गांधी से अलग समाज का कोई नया ढांचा बना सकने की बौद्धिक क्षमता उनमें नहीं थी. उनके सामने अपेक्षाकृत अासान व बुद्धिगम्य रास्ता था कि वे रूस का साम्यवादी या अमरीका का पूंजीवादी ढांचा अपनाएं. लेकिन गांधी से मिली दृष्टि उन्हें इसकी कमियों-कमजोरियों के प्रति सावधान करती थी. उन्होंने एक तीसरा रास्ता खोजा- हम इन दोनों मॉडलों के अच्छे-अच्छे तत्वों को लेकर अपने भारत का स्वरूप गढ़ें. क्या इसमें कोई गलती थी?

जिस संविधान सभा में देश की सारी अाला प्रतिभाएं लंबे समय तक दिमाग जोड़ कर बैठीं – राजेंद्र प्रसाद से लेकर डॉक्टर अंबेडकर तक – वह भी वही संविधान बना सकी न जिसमें दुनिया के प्रचलित संविधानों से ले-लेकर प्रावधान जोड़े गये थे. हम कह सकते हैं कि एक अच्छी-सुंदर टेपेस्ट्री है हमारा संविधान. उसमें हिंदुस्तान की अपने जीनियस की, लंबी अार्थिक, सामाजिक, राजनीतिक परंपरा व अनुभव की कोई झलक मिलती नहीं है, क्योंकि वह काम बहुत मौलिकता व दृढ़ता की मांग करता है. हम अपनी फिल्मों का संदर्भ लें तो बात समझना अासान होगा. अधिकांश भारतीय फिल्में कैसे बनती हैं? किसी विदेशी फिल्म की हम नकल मारते हैं अौर अपनी-अपनी समझ से उसका भारतीयकरण कर लेते हैं. हमारा संविधान भी अौर हमारा सारा राजनीतिक दर्शन भी ऐसी ही मानसिकता से बना है.

उन्होंने देश को मजबूत व स्थिर करने के दो सबसे महत्वपूर्ण तत्व को  पहचाना – संसदीय लोकतंत्र की नींव मजबूत की जाए अौर देश को आर्थिक निर्भर बनाया जाए

संविधान बन गया, तब किसी ने ध्यान खींचा कि इसमें कहीं भी भारतीय सामाजिक परंपरा, ग्रामीण संस्कृति अौर ग्रामस्वराज्य की गांधी की परिकल्पना का तो जिक्र भी नहीं अाया. हवा में यह सनसनी तो थी ही कि बूढ़े गांधी को संविधान निर्माण की यह पूरी कसरत ही व्यर्थ की लग रही है, वे इस पर कोई टिप्पणी भी नहीं कर रहे हैं. ऐसे में अगर वे देखेंगे कि इस संविधान से बनने व चलनेवाला राज्य उन मूल्यों के बारे में अपनी कोई प्रतिबद्धता जाहिर ही नहीं करता है जिसका वादा अाजादी की लड़ाई के दौरान गांधी के साथ सबने देश से किया था, तो क्या होगा? सभी जानते थे कि इस संविधान की नैतिक बुनियाद ही धसक जाएगी अौर यह खोटा सिक्का भर रह जाएगा. यदि इस पागल बूढ़े ने इसके बारे में कोई नकारात्मक टिप्पणी कर दी, तो राजेंद्र प्रसाद की नींद हराम हुई. डॉक्टर अंबेडकर गांधी के रवैये को लेकर ज्यादा संवेदनशील नहीं थे, लेकिन एक रास्ता निकाला गया अौर गांधी की वह सारी खब्त थोक के भाव से संविधान के एक नये बेशकीमती अध्याय में डाल दी गई अौर उसे राज्य के नीति-निर्देशक तत्व का नाम दिया गया. खाना-पूर्ति का यह अध्याय ही कहीं गले की फांस न बन जाए, इसका खतरा भांप कर, इसके अंत में यह पंक्ति भी जोड़ दी गई कि राज्य इनकी पूर्ति की दिशा में तो काम करेगा, लेकिन इसके अाधार पर उसे किसी अदालत में अपराधी बनाकर खड़ा नहीं किया जा सकता है. यह पूरा प्रसंग यह समझने में सहायक होगा कि सिर्फ जवाहरलाल नेहरू ही नहीं, देश का तब का पूरा नेतृत्व यह बुनियादी बात समझ नहीं सका था कि कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर सड़कें-इमारतें तो शायद बन भी जाएं, मुल्क नहीं बनते हैं. इसलिए नेहरू के नेतृत्व में भारतीय समाज के विकास की कहानी बहुत अाधी-अधूरी अौर जयप्रकाश नारायण के शब्दों में बेहद नकली बनी. लेकिन कौन था कि जिसके पास तब कोई दूसरा प्रतिमान था?

डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सैकड़ों कमरोंवाले उसी वाइसरॉय भवन में अाराम से अवस्थित हो रहे थे, जिसे गांधी तुरंत ही सार्वजनिक अस्पताल में बदल देना चाहते थे. सरदार पटेल अंग्रेजों की बनाई अौर छोड़ी उसी नौकरशाही से वही सब काम करवाने में जी-जान से जुटे थे जिसे गांधी ने देश के लिए अनुपयोगी व घातक साबित कर दिया था. मौलाना अाजाद शिक्षामंत्री की अारामदेह कुर्सी पर अात्ममुग्ध बैठे थे. डॉक्टर अंबेडकर सत्ता में भी भागीदारी चाहते थे अौर विपक्ष में भी अपनी जगह  सुरक्षित रखने की कसरत कर रहे थे. जयप्रकाश नारायण का समाजवादी खेमा देश की नहीं, अपनी जड़ें मजबूत करने में लगा था क्योंकि उनका समाजवाद सत्ता में अाने के बाद ही शुरू होता था. तब के सारे संघ परिवारी राष्ट्र-निर्माण की किसी भी चुनौती से नहीं जूझ रहे थे, बल्कि हिंदुत्व की जड़ें सींचने में लगे थे. उनके लिए हिंदू राष्ट्र का निर्माण ही राष्ट्रनिर्माण था. देश का सारा व्यापार जगत जेआरडी टाटा के नेतृत्व में कह रहा था कि देश की सारी अार्थिक गतिविधियों का सूत्र-संचालन राज्य के हाथों में ही होना चाहिए. तब के सबसे बड़े अर्थशास्त्रियों में एक (तब के मनमोहन सिंह) पीसी महालनोबीस हमारे पहले योजनाकार थे अौर सार्वजनिक क्षेत्र में उपक्रम खड़ा करने की शुरुअात उनकी पहल से ही हुई थी. राजेंद्र प्रसाद अौर सरदार पटेल ने उस अार्थिक ढांचे की जोरदार पैरवी की, जिसे हम मिश्रित अर्थतंत्र का नाम देते हैं अौर जिसका श्रेय जवाहरलाल को देते हैं. तो इन सारे प्रयासों का अच्छा-बुरा ठीकरा केवल जवाहरलाल के सर कैसे फोड़ा जा सकता है? अगर इस अर्थ में यह बात कही जा रही हो कि सबसे बड़ा सर उनका ही था, तो सबसे अधिक जिम्मेवारी भी उनकी ही है, तो इससे इंकार नहीं किया जा सकता है. लेकिन तब हमारा स्वर अभियोग का नहीं, अफसोस का होना चाहिए.

जवाहरलाल को देखने की एक खिड़की अौर भी है. हम भारत की अाजादी के साथ या उसके अासपास अाजाद हुए दुनिया के प्रमुख देशों की अाजादी, लोकतंत्र अौर उनके सामाजिक-अार्थिक विकास का जायजा लें. पाकिस्तान का हाल क्या रहा अौर अाज क्या है, यह लिखने की जरूरत नहीं है. तब के पाकिस्तान की जेल में बैठे फैज अहमद फैज ने लिखा था, ‘निसार मैं तेरी गलियों पे ऐ वतन कि जहां / चली है रस्म की कोई न सर उठाकर चले’ अौर अाज के पाकिस्तान में घुटते अजहर रफीक लिख रहे हैं, ‘मुझको अब यह मुल्क, ये अपना घर नहीं अच्छा लगता / दहशतगर्दों का यह खौफ नगर नहीं अच्छा लगता / शहर में एक तन्जीम क्लाशननिकोव लिए फिरती है / लोगों के कंधों पर इसको सर नहीं अच्छा लगता / मैं अाजाद वतन का शहरी, कैदी अपने घर में / अब इस अरज-ए-पाक पे, सैर-अो-सफर नहीं अच्छा लगता.’ पाकिस्तान उस प्रेत से लड़ने को अभिशप्त है, जिसकी ताकत से इसका जन्म हुअा है. हर वक्त के िजन्नाअों को यह समझना ही होगा कि मुल्कों की जड़ में अाप कैसे सपनों की खाद भरते हैं, इसका निर्णायक महत्व होता है. घृणा, द्वेष, चालों-कुचालों की ताकत से सत्ता की अपनी भूख को तृप्त करने की कोशिश में बने मुल्क पाकिस्तान जैसे अंधेरे, रक्तरंजित वर्तमान अौर भविष्यहीन भविष्य से घिरे रह जाते हैं. गुलामी के हमारे दौर में ही गांधी ने अाजाद भारत के सपनों की ऐसी खाद हमारे मनों में भरी कि उसकी कसौटी पर, बाद में उगी सारी फसलें हमें कमतर नजर अाती हैं- जवाहरलाल की उपलब्धियां भी बौनी नजर अाती हैं. लेकिन गांधी के तराजू पर जवाहलाल को तौलना न्याय नहीं है क्योंकि यह अादमी इस तराजू से हरदम इंकार ही करता अाया था.  हम सोचें तो यह कि गांधी अगर हुए ही नहीं होते अौर हमारे पास विकास का एक ही मानक होता, जो पश्चिम से लिया हुअा है, तब जवाहरलाल की उपलब्धियां कैसी नजर अाती हैं?

जवाहरलाल को जैसा रक्तरंजित देश मिला था उसमें इसका टूट जाना, लोकतंत्र का चोला उतार फेंकना, दरबारियों का जमावड़ा लगना, कुछ भी अस्वाभाविक नहीं होता

तटस्थ राष्ट्रों की परिकल्पना में जवाहरलाल के साथ अा जुड़े चार सबसे कद्दावर नेताअों को देखिए – मिस्र के गमाल अब्दुल नासिर, घाना के क्वामे एंक्रूमा, इंडोनेशिया के सुकर्णो अौर यूगोस्लाविया के मार्शल जोसेफ ब्रोज टीटो. 1952 में राजशाही को खत्मकर मिस्र अागे अाया अौर 1956-1970 तक नासिर उसके राष्ट्रपति रहे. एकाधिकारशाही अौर मतांतर को फौजी बूटों से कुचलना, मनमानी फौजी कार्रवाइयों से अपनी ताकत का प्रदर्शन करना – नासिर ने अपने देश को इस रास्ते पर जो तब डाला, वह अाज तक मिस्र को जकड़े हुए है. कभी ‘अफ्रीका के लेनिन’ कहे जानेवाले एंक्रूमा ने 1951-1966 के दौर में अपनी निजी सत्ता बनाए रखने के लिए हर उस हथकंडे का इस्तेमाल किया जिसने राजनीतिक-अार्थिक भ्रष्टाचार का अभूतपूर्व मायाजाल रचा. अफ्रीकी दुनिया की एका के सपने का कब अंत हुअा यह तो नहीं पता चला, लेकिन घाना की बीमारी सारे अफ्रीकी देशों को ग्रस ले गई, यह तो हम देख ही सकते हैं. 1949 में सुकर्णो ने इंडोनेशिया को अपने हाथ में लिया अौर फिर वहां कभी भी राजनीतिक स्थिरता नहीं अाई- राजनीतिक व फौजी तख्तापलट, भ्रष्टाचार, परिवारवाद अौर सामाजिक अशांति की बैसाखी पर ही चलता रहा है इंडोनेशिया. टीटो 1953-1980 तक यूगोस्लाविया के राष्ट्रनेता रहे. वहां की अार्थिक संपन्नता का श्रेय उन्हें दिया जाता है, लेकिन सत्ता के इस्तेमाल के बारे में मतांतर के कारण अपने अनन्यतम सहयोगी मिलोवान जिलास को जेल में ठूंसने से जो बात शुरू हुई, वह टीटो से असहमत हर व्यक्ति की नियति ही बन गई. अपने राजनीतिक विरोधियों की कमर तोड़ते-तोड़ते टीटो ने वह माहौल रचा कि अंतत: यूगोस्लाविया ही  टूट गया. जवाहरलाल को जैसा रक्तरंजित देश मिला था, उसमें इसका टूट जाना, सांप्रदायिक दंगों की अाग में झुलसते रहना, लोकतंत्र का चोला उतार फेंकना, दरबारियों का जमावड़ा अौर राजनीतिक-अार्थिक भ्रष्टाचार का घटाटोप कुछ भी अस्वाभाविक नहीं होता. लेकिन कदम-दर-कदम यह देश अागे ही बढ़ा, मजबूत हुअा, संसदीय लोकतांत्रिक संस्थाअों व परंपराअों के प्रति हमारी मजबूत प्रतिबद्धता बनी, अार्थिक विकास व अात्मनिर्भरता के बारे में देश सचेत हुअा, तो इन सबका श्रेय हम किसे दें? गांधी द्वारा फैलाई गई चेतना का, उस दौर में बने-उभरे दूसरे प्रखर राजनीतिक नेताअों का, विनोबा-जयप्रकाश जैसे सामाजिक क्रांतिकारियों की सतत जद्दोजहद का योगदान तो है ही, लेकिन जवाहरलाल को हम इस श्रेय से वंचित कर सकेंगे क्या? माअो के चीन, सिंगमन री के दक्षिण कोरिया, जिन्ना के पाकिस्तान, भंडारनायके के श्रीलंका, जनरल अांग सन के बर्मा अौर गुरियन के इजराइल से हम अपना हिंदुस्तान या अपना जवाहरलाल बदलना चाहेंगे क्या? कम से कम मैं तो नहीं, हर्गिज नहीं! इन सबने पहली चुनौती में ही लोकतंत्र को गंदे कपड़े की भांति उतार फेंका था. जवाहरलाल ने हर गंदगी को पार करते-झेलते हुए भी लोकतंत्र को एक मूल्य की तरह पकड़कर रखा.

हम यह न भूलें कि जवाहरलाल सत्ता की ताकत से समाज का कल्याण करने के प्रचलित दर्शन में विश्वास करनेवाले व्यक्ति हैं. वे सत्ता के बारे में वैसी तटस्थता कभी नहीं रखते हैं कि कोई छीन ले जाए तो ले जाए. वे संगठन व सरकार दोनों पर अपनी पूरी पकड़ रखना चाहते हैं अौर इसलिए संसदीय राजनीति की मान्य मर्यादाअों को भंग किए बिना अपने लोग चुनते भी हैं अौर उन्हें खास जगहों पर बिठाते भी हैं. उन पर तरह-तरह के अारोप लगानेवाले अधिकांश लोग वे ही हैं, जो उनकी तरह ही सत्ता से समाज का कल्याण करने के दर्शन में विश्वास करते हैं. वे सब सत्ता पाने की जितनी जुगत करते हैं, जवाहरलाल सत्ता बनाए रखने की वैसी ही जुगत करते मिलते हैं, तो हम किस अाधार पर शिकायत करें? जवाहरलाल पर खानदानी राजनीति का अारोप इसलिए कि उन्होंने अपनी बेटी इंदिरा को राजनीति में स्थापित किया. यह सच है, लेकिन इसका एक पहलू यह भी है कि इंदिरा गांधी में राजनीतिक प्रतिभा अौर नेतृत्व का कीड़ा जन्मजात ही था. एक जागरूक किशोरी की तरह उन्होंने अाजादी के अांदोलन में भी हिस्सा लिया था. उन्होंने अपने पिता की राजनीति को निकट से देखा भर ही नहीं था, बल्कि उसे संभाला भी था. अपने वैवाहिक जीवन को बहुत तवज्जो न देकर भी वे इस क्षेत्र की थाह लेती रही थीं. अपनी ऐसी बेटी की प्रतिभा को पहचानकर, पिता ने उन्हें इस समुद्र में उतरने की इजाजत दी. यह अपने बेटे या बेटी को या भाई या भतीजे को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने की खानदानी सियासत जैसी बात नहीं है. राजनीति को या सत्ता को अपना खानदानी पेशा बनाने वाले ये लोग भले अपनी कमजोरी या बेईमानी को छिपाने के लिए जवाहरलाल की अोट लें, लेकिन इससे उनकी नंगई छिपती नहीं है. अौर फिर यह तथ्य तो सामने है ही कि जवाहरलाल के बाद इंदिरा गांधी नहीं, लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने. अचानक हुई उनकी मौत ने फिर से वह पद खोल दिया अौर सिंडिकेट ने अपना पूरा हिसाब लगाकर, इस गूंगी गुड़िया को कुर्सी पर बिठाया. यह उनकी रणनीति थी. इसमें जवाहरलाल की कोई भूमिका नहीं थी.

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हमें यह भी सोचना चाहिए कि यदि शास्त्री जी की असमय मृत्यु नहीं हुई होती और वे अगले 5-7 सालों तक प्रधानमंत्री रह जाते, तो इंदिरा गांधी कहां होतीं? फिर खानदानी राजनीति का अारोप किसके सर जाता? क्या उनके जो संघ परिवार की अनुमति या अादेश के िबना एक चपरासी भी नियुक्त नहीं करते हैं? अौर क्या प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी ने यह साबित नहीं कर दिया, ये सभी राजनीति का जैसा खेल खेलने में लगे थे, अौर अाज भी लगे हैं, उस खेल की सबसे चतुर, सबसे क्रूर खिलाड़ी वे ही हैं! इंदिरा गांधी जवाहरलाल के बल पर नहीं, अपने अौर सिर्फ अपने बल पर प्रधानमंत्री बनीं अौर लंबी पारी खेलकर सिधारीं. हम उनका सकारामक या नकारात्मक जैसा भी विश्लेषण करें, इतनी ईमानदारी तो बरतें ही कि वह इंदिरा गांधी की अाड़ में जवाहरलाल पर हमला बनकर न रह जाए.

प्रधानमंत्री के रूप में, अाज 67 सालों के बाद भी वही रोल मॉडल हमारे राजनेताअों के सामने है, जिस पर खरा उतरने की कोशिश अटल बिहारी वाजपेयी ने भी की अौर अाज नरेंद्र मोदी भी उनकी ही नकल करते दिखाई देते हैं. गांधी तो बहुत दूर की बात है, जवाहरलाल जैसा बनना अौर उसे निभा ले जाना भी बहुत बड़ा सीना मांगता है – 56 इंच का हो कि न हो, दूसरे किसी से भी ज्यादा गहरा अौर पारदर्शी तो हो ही – अौर वैसा सीना जवाहरलाल नेहरू के पास था. हम अाज भी उसकी कमी अौर उसकी ऊष्मा महसूस करते हैं.

अादमी पूरा हुअा तो देवता हो जाएगा, है जरूरी कि उसमें कुछ कमी बाकी रहे !

(लेखक वरिष्ठ गांधीवादी चिंतक हैं)

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नियति से मुलाकात

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का यह ऐतिहासिक भाषण 14 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि को संसद भवन में दिया गया था. उनका यह भाषण ट्रिस्ट विद डेस्टिनी नाम से मशहूर है
जवाहरलाल नेहरू

कई वर्षों पहले हमने नियति से मिलने का एक वचन दिया था, अब वह समय आ गया है कि हम अपने वचन को निभाएं, पूरी तरह न सही, जहां तक संभव हो सके वहां तक ही सही. आज आधी रात के समय जब सारी दुनिया सो रही होगी, भारत जीवन और आजादी की नई सुबह के साथ उठेगा. एक ऐसा क्षण जो इतिहास में कभी-कभार आता है. जब हम पुराने को छोड़ नए की तरफ जाते हैं, जब एक युग का अंत होता है और वर्षों से शोषित एक देश की आत्मा, अपनी बात कह सकती है. यह एक संयोग है कि इस पवित्र मौके पर हम समर्पण के साथ भारत और उसकी जनता की सेवा और उससे भी बढ़कर सारी मानवता की सेवा करने की प्रतिज्ञा ले रहे हैं.

इतिहास के आरंभ के साथ ही भारत ने एक अंतहीन खोज की दिशा में कदम बढ़ा दिया था. न जाने कितनी ही सदियां इसकी महान सफलताओं और असफलताओं से भरी हुई हैं. चाहे अच्छा वक्त हो या बुरा, भारत ने कभी इस खोज से अपनी दृष्टि नहीं हटाई और कभी भी अपने उन आदर्शों से डिगा नहीं जिसने इसे शक्ति दी. आज हम दुर्भाग्य के एक युग का अंत कर रहे हैं और भारत पुनः खुद को खोज पा रहा है. आज हम जिस उपलब्धि का उत्सव मना रहे हैं, वो महज एक मौका है, नए अवसरों के खुलने का. इससे भी बड़ी विजय और उपलब्धियां हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं. क्या हममें इतनी शक्ति और बुद्धिमत्ता है कि हम इस अवसर को समझें और भविष्य की चुनौतियों को स्वीकार करें?

भविष्य में हमें विश्राम करना या चैन से नहीं बैठना है, बल्कि निरंतर प्रयास करना है, ताकि हम जो वचन बार-बार दोहराते रहे हैं और जिसे हम आज भी दोहराएंगे उसे पूरा कर सकें. भारत की सेवा का अर्थ है लाखों-करोड़ों पीड़ित लोगों की सेवा करना. इसका मतलब है गरीबी और अज्ञानता को मिटाना, बीमारियों और अवसर की असमानता को मिटाना. हमारी पीढ़ी के महानतम व्यक्ति की यही दिली इच्छा रही है कि हर एक आंख से आंसू मिट जाए. शायद ये हमारे लिए संभव न हो पर जब तक लोगों की आंखों में आंसू हैं और वे पीड़ित हैं, तब तक हमारा काम खत्म नहीं होगा.

इसलिए हमें परिश्रम करना होगा, और कठिन परिश्रम करना होगा, ताकि हम अपने सपनों को साकार कर सकें. ये सपने भारत के लिए हैं, पर साथ ही वे पूरे विश्व के लिए भी हैं. आज कोई खुद को बिलकुल अलग-थलग रखकर आगे नहीं बढ़ सकता, क्योंकि सभी राष्ट्र और लोग एक-दूसरे से बड़ी निकटता से जुड़े हुए हैं. शांति को अविभाज्य कहा गया है, इसी तरह से स्वतंत्रता भी अविभाज्य है, समृद्धि भी और विनाश भी. अब इस दुनिया को छोटे-छोटे हिस्सों में नहीं बांटा जा सकता है. हमें स्वतंत्र भारत का निर्माण करना है, जहां उसके सारे बच्चे रह सकें.

आज वह समय आ गया है, एक ऐसा दिन जिसे नियति ने तय किया था-और एक बार फिर वर्षों के संघर्ष के बाद, भारत जागृत और स्वतंत्र खड़ा है. कुछ हद तक अभी भी हमारा अतीत हमसे चिपका हुआ है, और हम अक्सर जो वचन देते रहे हैं, उसे निभाने से पहले बहुत कुछ करना है. फिर भी निर्णायक बिंदु बीते वक्त की बात हो चुका है, और हमारे लिए एक नया इतिहास आरंभ हो चुका है, एक ऐसा इतिहास जिसे हम गढ़ेंगे और जिसके बारे में और लोग लिखेंगे.

यह हमारे लिए सौभाग्य का क्षण है, एक नए तारे का उदय हुआ है, पूरब में स्वतंत्रता के सितारे का उदय. एक नई आशा का जन्म हुआ है, एक दूरदृष्टि अस्तित्व में आई है. काश ये तारा कभी अस्त न हो और ये आशा कभी धूमिल न हो! हम सदा इस स्वतंत्रता में आनंदित रहें. भविष्य हमें बुला रहा है. हमें किधर जाना चाहिए और हमारे क्या प्रयास होने चाहिए, जिससे हम आम आदमी, किसानों और कामगारों के लिए स्वतंत्रता और अवसर ला सकें, हम गरीबी, अज्ञानता और बीमारियों से लड़ सकें, हम एक समृद्ध, लोकतांत्रिक और प्रगतिशील देश का निर्माण कर सकें और हम ऐसी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना कर सकें, जो हर एक आदमी-औरत के लिए जीवन की संपूर्णता और न्याय सुनिश्चित कर सकें?

हमें कठिन परिश्रम करना होगा. हम में से कोई भी तब तक चैन से नहीं बैठ सकता है, जब तक हम अपने वादों को पूरी तरह निभा नहीं देते, जब तक हम भारत के सभी लोगों को उस गंतव्य तक नहीं पहुंचा देते, जहां भाग्य उन्हें पहुंचाना चाहता है. हम सभी एक महान देश के नागरिक हैं, जो तीव्र विकास की कगार पर है, और हमें उस उच्च स्तर को पाना होगा. हम सभी चाहे जिस धर्म के हों, समान रूप से भारत मां की संतान हैं, और हम सभी के बराबर अधिकार और दायित्व हैं. हम सांप्रदायिकता और संकीर्ण सोच को बढ़ावा नहीं दे सकते, क्योंकि कोई भी देश तब तक महान नहीं बन सकता जब तक उसके लोगों की सोच या उनके कर्म संकीर्ण होंं.

विश्व के देशों और लोगों को शुभकामनाएं भेजिए और उनके साथ मिलकर शांति, स्वतंत्रता और लोकतंत्र को बढ़ावा देने की प्रतिज्ञा लीजिए. और हम अपनी प्यारी मातृभूमि, प्राचीन, शाश्वत और निरंतर नवीन भारत को नमन करते हैं और एकजुट होकर नए सिरे से इसकी सेवा करने का प्रण लेते हैं.

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  1. बहुत उम्दा लिखते हैं. आज के सभी गाल बजाने वाले राजनीति-कर्मियों एवं नई पीढ़ी को यह पढना चाहिए. ऐसा लेख इतिहास की गहरी समझ और प्रमाणिक सूचना रखने वाले व्यक्ति के ही बस की बात है. एक लंबे समय बाद इतिहास पुरुषों के ऊपर इतनी अच्छी सामग्री पढ़ने को मिली. आदरणीय कुमार प्रशांत को कोटि-कोटि साधुवाद.
    एस.के.वर्मा

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