जन-धन योजना: आंकड़ों के आगे क्या?

अगस्त में जल्दबाजी में योजना तो घोषित कर दी गई, लेकिन बाकी चीजों को बाद में तय करने के लिए छोड़ दिया गया

सरकार को यह तय करने में कई महीने लग गए कि सभी लोगों को इस जीवन बीमा का हकदार नहीं बनाया जा सकता

जीवन बीमा देने की जिम्मेदारी एलआईसी को सौंपी गई है. लेकिन चार महीने बाद भी इससे अधिक जानकारी बैंकों के पास नहीं है

बैंकों को दुर्घटना बीमा के बारे में कोई जानकारी नहीं है, लिहाजा बीमा का दावा आने पर वे उचित जवाब तक नहीं दे पा रहे हैं

जिस कंपनी (एचडीएफसी एर्गो) को दुर्घटना बीमा की जिम्मेदारी देने की बात कही गई है, वह इस बारे में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है

योजना के तहत बड़ी संख्या में खाते खुलने की वजह से देश में बैंक खातों और एटीएम का अनुपात गड़बड़ाता दिख रहा है

देश के ग्रामीण इलाकों में बैंक एटीएम की संख्या बहुत कम है, इस वजह से भी बैंक शाखाओं पर दबाव बढ़ेगा

बैंकों को अपने यहां अतिरिक्त कर्मचारी लगाने पड़ेंगे, जिसकी वजह से बैंकों की परिचालन लागत बढ़ेगी

इतनी बड़ी संख्या में खातों पर ओवरड्राफ्ट देने से बैंकों पर पड़नेवाले बोझ के बारे में सहज ही कल्पना की जा सकती है

अगर नए खातों में कामकाज नहीं हुआ और वे ठप पड़ गए, तो इनकी लागत के बोझ से उबरना भी बैंकों के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा
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बैंकों के लिए चुनौतियां यहीं खत्म नहीं होतीं. इन खातों पर बैंकों को ओवरड्राफ्ट की सुविधा भी देनी है. हर परिवार में केवल एक व्यक्ति को 5,000 रुपये की ओवरड्राफ्ट सुविधा मिलेगी. प्राथमिकता इस बात को दी जाएगी कि यह उस परिवार की महिला को मिले. लेकिन अब तक 11 करोड़ खाते खुल चुके हैं और खातों का खुलना लगातार जारी है. ऐसे में ओवरड्राफ्ट के रूप में बैंकों पर पड़नेवाले बोझ के बारे में सहज ही कल्पना की जा सकती है.

बैंकिंग विशेषज्ञ यूएस भार्गव बताते हैं, ‘अगर रुपपे कार्ड लोकप्रिय हो गए और लोगों ने एटीएम में जाकर पैसे निकालना सीख लिया और बैंक शाखा में जाकर लेन-देन नहीं किया, तब तो बैंकों का काम मौजूदा कर्मचारियों से चल जाएगा, लेकिन अगर ये खाताधारक छोटे लेन-देन के लिए शाखाओं में आने लगे, तब बैंकों की सामान्य सेवाओं पर भी विपरीत असर पड़ने लगेगा.’ देश के ग्रामीण इलाकों में बैंक एटीएम की संख्या बहुत कम है, इस वजह से भी बैंक शाखाओं पर दबाव बढ़ेगा. ऐसे में बैंकों को अपने यहां अतिरिक्त कर्मचारी लगाने पड़ेंगे, जिसकी वजह से बैंकों की परिचालन लागत बढ़ेगी. अभी तो इनमें से 30 फीसदी खातों में ही कुछ कामकाज हो रहा है. बैंकों को असली चुनौती का सामना तो तब करना पड़ेगा, जब इन सारे खातों में कामकाज होने लगेगा. इसका एक दूसरा पहलू भी है. अगर नए खातों में कामकाज नहीं हुआ और वे ठप पड़ गए, तो इनकी लागत के बोझ से उबरना भी बैंकों के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा.

बिजनेस कॉरेस्पांडेंट का सवाल
वित्तमंत्री जेटली ने जन-धन योजना की सफलता में बिजनेस कॉरेस्पांडेंट्स की भूमिका को काफी अहम माना है. आरबीआई के सुझाव के अनुरूप बैंकों ने ग्रामीण क्षेत्रों में बिजनेस कॉरेस्पांडेंट नियुक्त भी किए हैं, लेकिन यह व्यवस्था अभी तक सुचारु रूप से आगे नहीं बढ़ पाई है. आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर केसी चक्रवर्ती द्वारा वित्तीय समावेशन पर मार्च 2013 में जो रिपोर्ट पेश की गई थी, उसमें साफ कहा गया था कि बिजनेस कॉरेस्पांडेंट्स में पेशेवर रवैये का अभाव है. रिपोर्ट ने यह भी माना था कि बिजनेस कॉरेस्पांडेंट्स को इस काम से काफी कम आमदनी हो रही है, जिसकी वजह से ये लोग काम छोड़ रहे हैं. इन स्थितियों में योजना की सफलता पर सवालिया निशान लगना लाजमी है.

आरबीआई कोे बदलनी पड़ी समय सीमा
जन धन योजना के शुरू हो जाने की वजह से अब देश में वित्तीय समावेशन की दो समांतर योजनाएं चल रही हैं. भारतीय रिजर्व बैंक की पहले से चल रही वित्तीय समावेशन योजना में उन गांवों को दायरे में लाने का लक्ष्य बनाया गया है जिनकी आबादी 2000 से अधिक है. देश के 5.92 लाख गांवों में से 74,000 गांवों को अब तक वित्तीय समावेशन के दायरे में लाया जा चुका है.

इतनी भारी संख्या में खुल रहे खातों पर ओवरड्राफ्ट देने में बैंकों पर पड़नेवाले बोझ के बारे में सहज ही कल्पना की जा सकती है

लेकिन इस योजना के तहत ध्यान गांवों पर था, न कि परिवारों पर. इसके अलावा यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों को वित्तीय सेवाओं के दायरे में लाने के लिए काम करती थी. जन धन योजना परिवारों को बैंक खाते उपलब्ध कराने पर ध्यान देती है और इसका ध्यान ग्रामीण क्षेत्रों के साथ ही साथ शहरी क्षेत्रों पर भी है.
आरबीआई की पहले से चल रही योजना का पहला चरण 2009-10 में शुरू हुआ था. इसका दूसरा चरण 2013 से शुरू होकर मार्च 2016 तक चलना था. दूसरी ओर जन धन योजना का पहला चरण 14 अगस्त 2015 तक चलना है. ऐसे में इस योजना की वजह से आरबीआई को वित्तीय समावेशन की अपनी पहली योजना की तिथियां बदलनी पड़ गई हैं. दो जनवरी 2015 को जारी सर्कुलर में आरबीआई ने मार्च 2016 तक की समय सीमा को कम करके 14 अगस्त 2015 कर दिया है, ताकि इसे जन धन योजना के तालमेल में लाया जा सके.

और भी सवाल हैं
खातों की तेजी से बढ़ती संख्या के बीच कई और सवाल उठ खड़े हुए हैं. आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने सितंबर में एक बैंकिंग कांफ्रेंस में बोलते हुए कहा था, ‘जब हम कोई योजना शुरू करते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह पटरी से न उतरे. इसका लक्ष्य लोगों को शामिल करना है, सिर्फ तेजी और संख्या इसका लक्ष्य नहीं है.’ साथ ही राजन ने यह चिंता भी जताई थी कि यदि एक ही व्यक्ति कई-कई खाते खोले, नए खातों में कोई लेन-देन न हो और बैंकिंग व्यवस्था में पहली बार शामिल हो रहे व्यक्ति को खराब अनुभव का सामना करना पड़े, तो यह योजना निरर्थक साबित हो सकती है. भार्गव बताते हैं, ‘ऐसी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि इस योजना का फायदा लेने के लिए लोगों ने कई-कई खाते खुलवा लिए हैं, ताकि उन्हें कई बार ओवरड्राफ्ट और बीमा की सुविधा मिल जाए.’ इसके अलावा यह भी संभव है कि लोगों ने अलग-अलग दस्तावेजों का इस्तेमाल कर कई खाते खुलवाए हों. ऐसे में स्मर्फिंग (बड़ी राशि को कई हिस्सों में बांटकर कई खातों के जरिए भेजना) और मनी लांड्रिंग की समस्या भी बढ़ सकती है.

आरबीआई के डिप्टी गवर्नर एसएस मुंद्रा ने भी डुप्लिकेट खाते खुलने की बात स्वीकार की है. पिछले दिनों उन्होंने कहा, ‘मैं डुप्लिकेट खातों की सही संख्या तो नहीं बता सकता, लेकिन कुछ सर्वेक्षणों के मुताबिक इनकी संख्या 30 फीसदी तक हो सकती है.’ दिक्कत यह है कि वक्त के साथ जैसे-जैसे कुल खातों की संख्या बढ़ेगी, इस तरह की गड़बड़ी को दूर करना काफी मुश्किल होता जाएगा.

इसके अलावा सवाल यह भी है कि 11 करोड़ का यह आंकड़ा कितना विश्वसनीय है. भार्गव कहते हैं, ‘दरअसल इस योजना के साथ सबसे बड़ी गड़बड़ी यह हो गई कि बैंकों को छोटी अवधि में एक लक्ष्य पूरा करने को दे दिया गया. इससे इस बात का खतरा हो गया है कि दबाव में आकर बैंक कहीं गलत रिपोर्टिंग न करने लगे हों.’ यह जानना भी जरूरी है कि इनमें से कितने खाते बैंकिंग सुविधा की पहुंच से दूर उन ग्रामीण क्षेत्रों में खुले हैं, जहां वाकई इनकी जरूरत है. ऐसी आशंकाएं जताई जा रही हैं कि इतनी भारी संख्या में खाते खोलेजाने के बावजूद इसके असली हकदार इससे वंचित रह गए हों.

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देश में राजनीति का अनुभव यही कहता है कि राजनेता अपनी उपलब्धियां दिखाने के लिए आंकड़ों के खेल में उलझ जाते हैं. इस योजना के साथ भी ऐसी आशंकाएं जन्म लेने लगी हैं. भार्गव कहते हैं, ‘अगर सरकार ने इस योजना के साथ देख-रेख और निगरानी का काम जारी नहीं रखा और इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि योजना के तहत खोले गए खाते आगे भी चालू रहें, तो यह योजना भी औंधे मुंह गिर सकती है.’ हालांकि भार्गव यह भी कहते हैं कि जल्दीबाजी में इस योजना के बारे में किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले कम से कम छह महीने और इंतजार करना बेहतर होगा.

 


आरबीआई की अब तक की कोशिशों का हाल
डेलॉयट और सीआईआई की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में केवल 50 फीसदी लोगों के पास ही बैंक खाते हैं और 20 फीसदी से कम लोगों के पास बैंकों से कर्ज की सुविधा है. इसका सीधा मतलब यह है कि शेष जनता को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था के तहत लाने के लिए अभी काफी लंबी दूरी तय की जानी बाकी है. भारतीय रिजर्व बैंक काफी समय से वित्तीय समावेशन की दिशा में प्रयास भी कर रहा है. साल 2004 में इसने खान आयोग का गठन किया था, जिसे इस बारे में सुझाव देने के लिए कहा गया था. आयोग की सिफारिशों को आरबीआई की साल 2005-06 की मध्यावधि समीक्षा रिपोर्ट में शामिल किया गया. इसके तहत बैंकों से कहा गया कि कमजोर वर्गों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने के लिए वे नो-फ्रिल्स खाते (बेसिक एकाउंट) उपलब्ध कराएं. जनवरी 2006 में आरबीआई ने बैंकों को इस बात की अनुमति दे दी कि वे इस काम के लिए एनजीओ, स्वयं सहायता समूहों, माइक्रो फाइनेंस संस्थाओं आदि की मदद ले सकते हैं और इन्हें बिजनेस कॉरेस्पांडेंट के तौर पर नियुक्त किया जा सकता है.

लेकिन इस दिशा में प्रगति की दर काफी धीमी है. दरअसल इसकी एक बड़ी वजह इसके लिए जरूरी उपयोगी बिजनेस मॉडल का अभाव है. चक्रबर्ती रिपोर्ट के अनुसार, ‘वित्तीय समावेशन के काम को आगे बढ़ाने के लिए देश में उपयोगी बिजनेस मॉडल अभी तक विकसित नहीं हो सका है. इसके लिए रेवेन्यू जेनरेशन मॉडल का अभाव इसकी असफलता की एक बड़ी वजह है.’

इसके अलावा वित्तीय समावेशन के प्रयासों के तहत अब तक जो खाते खोले भी गए हैं, उनमें से काफी अधिक खातों में कोई कामकाज नहीं हो रहा है या फिर काफी कम लेन-देन हो रहा है. यह इस बात का प्रमाण है कि महज खाता खोल देने भर से कोई व्यक्ति वित्तीय रूप से व्यवस्था का हिस्सा नहीं बना जाता.
भार्गव के मुताबिक, इस लिहाज से वित्तीय साक्षरता और जागरुकता की भूमिका काफी अहम है. लोगों को इस बारे में शिक्षित करने की जरूरत है कि अगर वे बैंकिंग व्यवस्था में सक्रिय रूप से भागीदारी करते हैं, तो आनेवाले समय में उनको क्या-क्या लाभ होंगे. ऐसे उपाय करने होंगे कि ये लोग सूदखोरों और पोंजी स्कीमों के चंगुल में न फंसें. खास तौर पर उन लोगों के लिए वित्तीय उत्पाद तैयार करने होंगे, जो पहली बार बैंकिंग व्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं. उन्हें छोटी बचतों के लिए प्रेरित करना होगा और कामकाज के लिए छोटे कर्ज मुहैया कराने होंगे.

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