व्यापमं की राह पर…

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मोनी अपने आंसू पोछते हुए बताती हैं, ‘हमें यह भी पता नहीं था कि वे आसाराम के सत्संग में जाते हैं. हमने उनसे जब इस बारे में पूछा था तब उन्होंने टाल दिया था. उन्हें इस मसले में साजिश के बतौर गवाह बनाया गया है. जब आसाराम के साथ उनके संबंध नहीं थे तब उन्हें गवाह क्यों बनाया गया? इससे इतर जब सरकार को यह पता चला कि वे इस मामले में मुख्य गवाह हैं तब फिर उन्हें सुरक्षा क्यों नहीं दी गई?’ करमवीर को मोनी की यह बात अच्छी नहीं लगी.

करमवीर ने बताया, ‘मेरी उनके साथ पूरी सहानुभूति है लेकिन वे पूरी तरह डरी हुई हैं. कृपाल, आसाराम के संगठन की स्थानीय युवा इकाई के अध्यक्ष भी रहे थे. हकीकत तो यह है कि कृपाल के परिवार के लोग आसाराम का साहित्य वितरित करते थे. कृपाल और उसके परिवार के लोगों को अदालत में बयान नहीं देने के लिए धमकाया जा रहा था. परिवारवालों ने कृपाल पर बयान न देने का दबाव भी बनाने की कोशिश की थी.’

करमवीर इस घटना से पहले आसाराम के भक्त थे. उन्होंने आसाराम द्वारा 15 अगस्त 2013 को जोधपुर में अपनी बेटी के यौन उत्पीड़न के खिलाफ 19 अगस्त 2013 को दिल्ली के कमला नगर थाने में शिकायत दर्ज कराई थी. आसाराम का सत्संग दिल्ली में चल रहा था, इसलिए उन्होंने वहां शिकायत दर्ज कराई थी. करमवीर ने पहली बार 2001 में रायबरेली में हुए आसाराम के सत्संग में भाग लिया था. शाहजहांपुर से रायबरेली सिर्फ 75 किमी की दूरी पर है. इसके बाद वह आसाराम के सत्संग में नियमित रूप से आने-जाने लगेे. कुछ समय बाद उन्होंने अपनी बच्ची को आसाराम के मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित गुरुकुल में भेज दिया. मामले का पता तब चला जब उनकी 17 वर्षीय बेटी स्कूल में अचानक बीमार हो गई.

आसाराम को कभी ईश्वर की तरह माननेवाले करमवीर उन्हें धुआंधार तरीके से गाली देते हुए बताते हैं, ‘मुझे गुरुकुल से एक दिन फोन आया कि आपकी बेटी बीमार पड़ गई है. मैं जब वहां पहुंचा तो मुझसे कहा गया कि अपनी बेटी को लेकर जोधपुर स्थित आसाराम के आश्रम चले जाओ. मैं उसे लेकर वहां गया और फिर वापस घर आ गया. बाद में मेरी बेटी का फोन आया और उसने अपने कटु अनुभव मुझसे बताए. यही वजह है कि मैंने आसाराम के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई.’ दूसरी ओर कृपाल को जब इस घटना के बारे में पता लगा तो उन्होंने भी आसाराम के आश्रम जाना छोड़ दिया और इस मामले में गवाह बन गए. मामला दर्ज कराने के बाद से ही कृपाल और करमवीर को लगातार जान से मारने की धमकियां मिलती रहीं. करमवीर ने अपनी सुरक्षा के लिए प्रशासन को आवेदन भी दिया था लेकिन कृपाल ने कभी इस बारे में आवेदन तक नहीं दिया. करमवीर कहते हैं, ‘वह बहादुर थे और बहादुर आदमी की तरह उन्होंनेे इस बात को हलके में लिया. मैंने उनसे कई बार सुरक्षा लेने को कहा लेकिन हर बार उन्होंनेे मना कर दिया. मैंने पुलिस से जान से मारने की धमकियां मिलने की शिकायत कई बार की थी.’ पुलिस ने कृपाल सिंह की मौत के बाद करमवीर की सुरक्षा बढ़ा दी है.

इस मामले में धमकियां और हमले केवल गवाहों तक ही सीमित नहीं हैं. यहां के एक पत्रकार जो राष्ट्रीय हिंदी दैनिक के लिए काम करते हैं, जो इस मामले पर लिखते रहे, उन पर छुरे और ब्लेड से जानलेवा हमला हो चुका है. पत्रकार नरेंद्र यादव का कहना है, ‘मुझे जान से मारने की धमकियां दी गईं और जब मैंने तब भी इस मुद्दे पर लिखना जारी रखा तब मुझे पांच लाख रुपये की पेशकश भी की गई. इसके बावजूद मैंने इस मुद्दे पर लिखना जारी रखा तब मुझ पर दो लोगों ने छुरी और ब्लेड से जानलेवा हमला किया. संयोग से  मैं बच गया और अब मैं आसाराम के मसले पर विशेषज्ञ की तरह हूं. सच तो यह है कि मैं इस मसले पर पुलिस से ज्यादा जानकारी रखता हूं.’ नरेंद्र का दावा है कि उन्होंने आसाराम से जुड़े इस मसले पर अब तक 287 रिपोर्ट लिखी हैं. नरेंद्र अपने ऊपर हुए हमले के बाद खुद की लाइसेंस वाली बंदूक साथ में लेकर सड़क पर निकलते हैं. उन्हें पुलिस की सुरक्षा भी मिली हुई है. उन्होंने इस मामले की तहकीकात  सीबीआई से कराए जाने की मांग की है. जोधपुर कोर्ट से बाहर मीडिया के सवालों के जवाब देते हुए आसाराम ने कहा था, ‘दुनिया में सारे हमले मैं ही करवाता हूं. राष्ट्रपति से कहो जांच करवाने के लिए.’

आसाराम मामले में 50 से ज्यादा गवाह हैं और इनमें से तीन की मौत हो चुकी है जबकि अब तक नौ गवाहों पर हमले हो चुके हैं. सरकार को इस मामले के गवाहों की सुरक्षा के लिए अनिवार्य तौर पर कुछ कार्रवाई करनी चाहिए अन्यथा यह कहीं दूसरा व्यापमं न साबित हो जाए.

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