डेंगू बना महामारी, हमारी कितनी तैयारी?

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वहीं, दूसरी तरफ भारत-यूनाइटेड किंगडम के आपसी सहयोग पर आधारित औद्योगिक अनुसंधान और विकास कार्यक्रम के तहत ऑक्सीटेक लिमिटेड नाम की ब्रिटिश कंपनी ‘सस्टेनेबल डेंगू प्रिवेंशन प्रोजेक्ट’ के तहत स्थायी रूप से डेंगू का निराकरण करने के लिए काम कर रही है. इस अध्ययन के तहत यह देखा जा रहा है कि मच्छरों में आनुवांशिक बदलाव करके किस प्रकार से डेंगू को रोका जा सकता है. कंपनी ने तकरीबन नौ करोड़ मच्छरों में आनुवांशिक बदलाव करके बाहर छोड़ा है, ताकि पर्यावरण और मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जा सके. कंपनी अब तक अपनी प्रयोगशाला में मच्छरों की लगभग 150 पीढ़ियों का अध्ययन कर चुकी है. दिलचस्प बात ये है कि इस प्रयोग में 90 प्रतिशत सफलता मिली है. इस शोध के मायने इसलिए और बढ़ जाते हैं क्योंकि मच्छरों ने आनुवांशिक उत्परिवर्तन (म्युटेशन) के चलते कीटनाशकों के हिसाब से खुद को ढाल लिया है यानी कीटनाशकों का इन पर असर धीरे-धीरे कम होता जा रहा है. बहरहाल अंतर्राष्ट्रीय टीकों के प्रति सरकार का रवैया उदासीन है. उचित आंकड़ों की कमी भी चिंता का एक विषय है. अमेरिका की ब्रांडेस यूनिवर्सिटी के डोनाल्ड शेपर्ड के अक्टूबर 2014 में जारी शोध पत्र के अनुसार, पूरे विश्व में सिर्फ भारत में ही डेंगू का प्रकोप सबसे अधिक है. यहां हर साल 55 लाख भारतीयों को डेंगू होता है, जो कि सरकारी आंकड़ों से 282 गुना ज्यादा है. डोनाल्ड ने तीन साल तमिलनाडु में डेंगू के मामलों का अध्ययन किया और 18 राज्यों से आंकड़े इकट्ठा किए हैं. आंकड़ों में आया हुआ ये फर्क डेंगू की पहचान के लिए होने वाले दो तरह के परीक्षणों के कारण है. एनएस-1 टेस्ट, जिसे डाॅक्टरों और मरीजों की ओर से बहुतायत में प्रयोग किया जाता है, को इन आंकड़ों में नहीं गिना गया है. आधिकारिक उद्देश्य से सिर्फ प्रयोगशाला में हुए परीक्षणों का ही आंकड़ा दर्ज किया जाता है. इस पर राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के निदेशक डॉ. एसी धारीवाल कहते हैं, ‘आंकड़ों में थोड़ा-बहुत फर्क हो सकता है पर ज्यादा नहीं.’ वर्तमान में डब्लूएचओ का उद्देश्य डेंगू की मृत्यु दर को 50 फीसदी और अस्वस्थता दर को 25 फीसदी तक घटाना है और कहने की जरूरत नहीं है कि इन आंकड़ों में भारत का एक महत्वपूर्ण स्थान है. 2012 में दक्षिण एशिया क्षेत्र में डेंगू के लगभग दो लाख नब्बे हजार मामले दर्ज हुए थे, जिसमें करीब 20 प्रतिशत भागीदारी भारत की थी. आज की तारीख में, जब हर साल डेंगू के मामले बढ़ रहे हों, तब ये चिंता का विषय है. 2010 में डेंगू के 20 हजार से ज्यादा मामले दर्ज हुए, जो बढ़कर 2012 में 50 हजार और 2013 में 75 हजार हो गए. राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2014 मेंे 40 हजार केस दर्ज हुए हैं. देश की खराब स्वास्थ्य सेवाओं और उस से भी खराब डॉक्टर-मरीज अनुपात को देखते हुए इस संख्या को नीचे ले आना भी एक बड़ा काम है. देश में प्रति 1800 मरीजों पर एक डॉक्टर है. भारत में डब्लूएचओ की प्रतिनिधि डॉ. नता मेनाब्दे ने ‘नेशनल गाइडलाइन्स फॉर क्लीनिकल मैनेजमेंट ऑफ डेंगू फीवर 2014’ में साफ बताया है कि कैसे हम सार्वजानिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में डेंगू से निपटने में असफल होते जा रहे हैं. वो कहती हैं, ‘1 से 10 मार्च तक नई दिल्ली में वेक्टर जनित रोगों (मलेरिया, डेंगू, लसीका फाइलेरिया, कालाजार, जापानी इंसेफलाइटिस और चिकनगुनिया) पर एक जॉइंट मॉनिटरिंग मिशन संचालित किया गया था, जिसमें रोग को पहचान पाने और प्रबंधन में डॉक्टर की अक्षमता साफ दिखाई देती है. इस गाइडलाइन में यह अनुशंसा भी की गई कि स्वास्थ्य कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जाए विशेषकर वहां जहां रोग की स्थिति घातक हो चुकी हो. इस मिशन में ये भी कहा गया कि पहले और दूसरे चरण पर प्रबंधन और गंभीर रोगियों पर वरीयता के आधार पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है. साथ ही नाजुक हालत में परामर्श की भी उचित व्यवस्था होनी चाहिए. कोई संदेह की बात नहीं है कि यहां जोर जन स्वास्थ्य सेवाओं के सुधार पर है पर स्वास्थ्य बजट के कम हो जाने के कारण ये बहुत दुष्कर हो गया है. अब तक सरकार अपने चिकित्सकीय दिशा निर्देशों पर ही काम कर रही है. डेंगू का सबसे भयंकर प्रकोप 1996 में हुआ था, सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे देश में डेंगू के 16,517 मामले दर्ज हुए थे, जिसमें दिल्ली से अधिकतम 10,252 मामले थे. मरने वालों की संख्या 545 थी. इनमें से 423 मौतें अकेले दिल्ली में हुई थीं. ऐसी स्थिति 2006 में भी आई थी, जहां 12 हजार रोगी थे और 184 लोगों की मृत्यु हुई. उस समय जो बात सरकार के लिए मददगार साबित हुई, वो थी रोग का चिकित्सकीय प्रबंधन. डेंगू पहले बुखार, फिर हैमरेज और आघात के रूप में शुरू होता है और इनकी तीव्रता के हिसाब से ही स्थिति विशेष में चिकित्सकीय मदद दी जाती है.

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फोटो : एएफपी

विडंबना यह है कि 2008 तक देश में इस बीमारी के प्रबंधन की राह इतनी आसान नहीं थी. भारत में उस समय डेंगू बुखार और डेंगू हैमरेज बुखार के लिए डब्लूएचओ के दक्षिण एशियाई क्षेत्र के निर्धारित दिशा निर्देशों का अनुपालन हो रहा था, जिसमें 2011 में संशोधन किए गए. इसी तरह 2009 में डब्लूएचओ ने रोगों के अनुसंधान और प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए जारी किए गए दिशानिर्देशों के साथ डेंगू और घातक डेंगू की पहचान, प्रकार और प्रबंधन के लिए भी नए निर्देश जारी किए थे. हालांकि इन दोनों दिशा निर्देशों में साम्य न होने के कारण इनका कोई फायदा नहीं हुआ. किसी भी रोग का सही वर्गीकरण (प्रकार) मालूम करना बहुत ही जरूरी है क्योंकि किसी भी रोग से से होने वाली मृत्यु का कारण उसकी विकट अवस्था की पहचान न हो पाना है. अगर एक बार डेंगू की तीव्रता का पता चल जाता है तो सरकारी और निजी अस्पताल दोनों द्वारा दी गई स्वास्थ्य सेवाएं लाभदायक साबित होती हैं. हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों की एक टीम ने डब्लूएचओ की 2011 और 2009 के दिशा निर्देशों को जोड़ते हुए डेंगू बुखार के चिकित्सकीय प्रबंधन के लिए नए राष्ट्रीय दिशा निर्देश बनाए हैं. पर ऐसा लगता है कि रोकथाम के तरीके और डॉक्टरी मदद सिर्फ कागजों तक ही सीमित है.

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