‘यह लोकतंत्र के रूप में नया राजतंत्र है’

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अब जिसने भी विरोध किया और जो भी बोला, उसे बनारस के लोगों ने गंभीरता से नहीं लिया और न ही काशी विद्वत परिषद ने उन बातों पर कुछ कहा.

गणेश चतुर्थी के बाद आपने धरना-प्रदर्शन इसलिए शुरू किया ताकि गणेश प्रतिमाओं को गंगा में विसर्जित करने दिया जाए और कोर्ट के साफ आदेश हैं कि गंगा में प्रतिमा विसर्जन नहीं होगा. तो क्या आप कोर्ट के आदेश को नहीं मानना चाहते? जब ये आदेश आया तब ही इसे चुनौती क्यों नहीं दी?

धरना-प्रदर्शन की शुरुआत हमने नहीं की थी. हमने तो दो दिनों तक देखा-सुना कि गणेशजी की प्रतिमा विसर्जित होने के लिए गई है और प्रशासन ने गोदौलिया और दशाश्वमेध घाट के बीच में उसे रोक दिया है. अधिकारी मेरी बात सुनते नहीं, जो उनसे आग्रह करता. नेता भी मेरी बात नहीं सुनते. मुझे यह ठीक नहीं लगा कि मैं अपने कमरे में सोया रहूं और गणेशजी की प्रतिमाएं सड़क पर विसर्जन का इंतजार करती रहें. तब मैं भी अपने मठ से बटुकों के साथ गया लेकिन वहां तो पुलिस ने लाठीचार्ज कर मामले को दूसरी ही दिशा में मोड़ दिया. रही बात कोर्ट के आदेश को चुनौती देने की तो इस मामले में कोर्ट के आदेश की कोई जानकारी ही नहीं थी. वह तो गणेशजी की प्रतिमा को बीच सड़क पर रोका गया, तब हम इस बारे में जान सके.

लाठीचार्ज के बाद ही आपने इस यात्रा का ऐलान कर दिया था, तब से लेकर अब तक काफी समय था. क्या इस बीच यात्रा रोकने के लिए सरकार ने आपसे बात नहीं की?

लाठीचार्ज कराना सीधे-सीधे राज्य सरकार का मामला था. हमने यही कहा भी था कि डंडा चलाने वाला दोषी नहीं बल्कि दोषी सरकार है, जिनके नियंत्रण में डंडा चलाने वाले हैं. वह इस विषय पर बात करें. हमने कभी नहीं कहा कि प्रदेश के मुखिया माफी मांगे, सिर्फ यह कहा कि संवाद स्थापित किया जाए. कम से कम उन बच्चों से, जो उस धरने में शामिल थे और जिन पर पुलिस ने बेरहमी से लाठियां चलाईं. उस लाठीचार्ज का वीडियो बना, यूट्यूब पर गया, जिसे देश ने और लाखों बच्चों ने देखा. हमारी शर्त तो सिर्फ यही थी कि सरकार उन बच्चों से बात कर ले, जिन पर लाठियां चली हैं ताकि उनके मन में पुलिस और प्रशासन के बारे में बनी धारणा तो टूटे, वरना कल को वे बच्चे नक्सली ही तो बनेंगे. लेकिन सरकार ने तो बात ही नहीं की.

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सुना तो यह गया है कि यात्रा के समय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने आपसे बात करने की कोशिश की थी पर आपने मना कर दिया.

हम जब यात्रा पर निकल चुके थे तब उनके लोगों ने बताया कि मुख्यमंत्री बात करना चाहते हैं. हमने बातचीत के लिए दिन के 12 बजे तक का ही समय निर्धारित किया था, उसके बाद बात करने के लिए न तो समय था और न ही उसका कोई अर्थ होता.

मुख्यमंत्री ने इस मसले पर कुछ नहीं कहा पर बनारस तो प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र है. प्रधानमंत्री, जो दुनियाभर के मसलों पर ट्वीट करते रहते हैं, काशी में हुए इस बवाल पर वे भी चुप हैं. इस पर आपका क्या कहना है?

प्रधानमंत्री से क्या उम्मीद करें, जबकि सब जानते हुए भी मुख्यमंत्री ही चुप्पी साधे रहे. यह दुर्भाग्यपूर्ण है. हम तो मुख्यमंत्री से ज्यादा उम्मीद लगाए हुए थे कि वे इस मामले का समाधान निकालेंगे. और फिर क्या मुख्यमंत्री, क्या प्रधानमंत्री! यह लोकतंत्र के रूप में नया राजतंत्र है, जहां लोगों को अपने लोगों से ही फुर्सत नहीं. सभी अपने परिवार में उलझे हुए हैं. राजतंत्र इसलिए खत्म हुआ कि तानाशाही खत्म होगी लेकिन ये लोकतंत्र तो और ज्यादा खतरनाक राजतंत्र बनता जा रहा है. पहले के राजा रात में वेष बदलकर प्रजा का सुख-दुख जानने भी निकलते थे, अब के राजाओं को तो प्रजा के सुख-दुख से कोई मतलब ही नहीं.

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