क्या घाटी में आईएस के झंडे लहराना आतंक की नई आहट है?

0
1657

बहरहाल, श्रीनगर के मुख्य इलाके और दक्षिणी व उत्तरी कश्मीर के गांवों के युवाओं की प्राथमिकताओं में काफी अंतर है. दक्षिणी कश्मीर के गांवों में युवाओं में आतंकवाद में शामिल होने के लिए रुझान बढ़ रहा है. पुलिस के अनुमान के अनुसार, 2015 में 100 से अधिक युवा आतंकी संगठनों में शामिल हुए. इन युवाओं में से अधिकांश दक्षिणी कश्मीर के त्राल, शोपियां और पुलवामा इलाकों से थे. इतना ही नहीं, पिछले एक दशक में पहली बार विदेशियों की तुलना में स्थानीय आतंकवादियों की संख्या बढ़ी है. पिछले साल अक्टूबर तक सक्रिय 142 सक्रिय आतंकियों में से 88 कश्मीरी थे, बाकी के आतंकी पाकिस्तान या फिर पाक अधिकृत कश्मीर से थे. 

दूसरी ओर, पिछले 25 सालों से उत्तरी कश्मीर का सोपोर इलाका हमेशा से आतंकवाद के लिहाज से संवेदनशील रहा है लेकिन पिछले साल उत्तरी कश्मीर के इलाकों में आतंकवादी अभियानाें को बड़ा झटका तब लगा जब हिजबुल मुजाहिदीन के लिए काम करने वाले आतंकी समूहों में विघटन हो गया. हिजबुल मुजाहिदीन में लंबे वक्त से कमांडर रहे अब्दुल कयूम नजर को संगठन से निकाल देना इसका बड़ा कारण रहा. दरअसल कयूम ने पाक अधिकृत कश्मीर के अपने आकाओं के आदेश की नाफरमानी करते हुए एक के बाद एक चार पूर्व आतंकियों और अलगाववादियों से हमदर्दी रखने वाले लोगों की हत्या करवा दी थी.

उधर, श्रीनगर के मुख्य इलाके में अब बंदूक के प्रति आकर्षण कम हो रहा है. इसे लेकर कुछ लोग काफी विश्वसनीय तर्क देते हैं. अगर शबीर की बात पर यकीन करें तो यह कदम काफी सोच-समझ कर उठाया जा रहा है. ‘हम लोगों ने हिंसक विरोध से शांतिपूर्ण विरोध तक की एक यात्रा पूरी की है. हम भारत के इस प्रचार को नकार देना चाहते हैं कि हम आतंकी हैं.’ हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं द्वारा बंदूक उठाने के फैसले का भी वो समर्थन भी करता है. बकौल शबीर, ‘आतंकवाद का पूरी तरह सफाया भी ठीक नहीं होगा. आजादी के आंदोलन को बनाए रखने के लिए कुछ मात्रा में आतंकवादी जरूरी है.’

बहरहाल, इन स्थितियों को लेकर सुरक्षा तंत्र का जो नजरिया है वह श्रीनगर के युवाओं से उलट है. मीडिया से बात करने के लिए अधिकृत न होने का हवाला देते हुए एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नाम जाहिर न किए जाने की शर्त पर बताते हैं, ‘इस स्थिति के दो पहलू हैं. पहला, जब से श्रीनगर में सुरक्षा बलों का दखल बढ़ा है तब से शहर में आतंकवाद का बने रहना मुश्किल हो गया है. दूसरा, बेशक युवाओं के एक वर्ग में बंदूक के प्रति आकर्षण बढ़ा है, लेकिन उनके लिए हथियार उपलब्ध ही नहीं हैं. ऐसा कुछ हद तक नियंत्रण रेखा पर बाड़बंदी और कुछ हद तक  पाकिस्तान की दिलचस्पी घटने के कारण हुआ है. इसलिए कश्मीर में अब पहले जैसे आक्रामक जेहाद की संभावना बहुत कम है.’ हालांकि इसी के साथ ये अधिकारी चेतावनी देते हुए कहते हैं, ‘ये स्थिति किसी भी वक्त बदल सकती है. जमीन तैयार है और कोई भी यहां नए सिरे से जेहादी गतिविधियों की नई  फसल तैयार कर सकता है.’

इसमें दो राय नहीं कि श्रीनगर के मुख्य या पुराने इलाके में भारत के प्रति विरक्ति का भाव बहुत गहरा है. इसका एक बड़ा कारण यह है कि शहर ने खुद को शुरू से ही मुख्यधारा की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर रखा है. क्लाशनिकोव राइफलों के साये में वर्षों बिताने के बाद यह शहर अतीत को भुलाकर आगे बढ़ने के मिजाज में नहीं है. संभवतः ऐसा इसलिए कि गांवों की अपेक्षा शहरों में लोगों की याददाश्त ज्यादा समय तक जीवित रहती है. एक ओर ग्रामीण क्षेत्रों में आजादी और लोकतांत्रिक भागीदारी साथ-साथ चलती रही हैं वहीं श्रीनगर हमेशा से अलगाववादियों के लिए चुनाव-दर-चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के बहिष्कार के लिए झंडाबरदार की भूमिका में रहा है. तमाम राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बावजूद श्रीनगर मुख्यधारा में कभी शामिल नहीं हुआ, लेकिन इसके बावजूद यहां के युवाओं ने विकल्प के तौर पर अनिवार्य  रूप से बंदूक को नहीं अपनाया. फिर भी युवा वर्ग को बंदूक के आकर्षण से मुक्त नहीं कहा जा सकता. आतंक को महिमामंडित करते तमाम फेसबुक पेजों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि बंदूक के प्रति आकर्षण किस कदर युवाओं को अपनी ओर खींच रहा है.

‘हम आईएस के झंडे समर्थन में नहीं लहराते बल्कि भारत को परेशान करने के लिए लहराते हैं. वो सब कुछ हमें पसंद है जिससे भारत नफरत करता है’

दक्षिणी कश्मीर के त्राल से हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर 22 वर्षीय बुरहान मुजफ्फर वानी के नाम पर दर्जन भर फेसबुक पेज हैं. वी लव बुरहान, बुरहान काॅलेज, त्रालः द लैंड आॅफ मार्टियर्स जैसे नामों से खुले इन पेजों पर जंगल में बुरहान केे गुप्त ठिकानों की तस्वीरें और वीडियो अपलोड किए जाते हैं. विभिन्न तस्वीरों में बुरहान को क्लाशनिकोव राइफल टांगे दिखाया गया है. तमाम वीडियो में भी उसे हथियारों से लैस अपने साथियों के साथ दिखाया गया है. अपलोड होने के साथ ही ऐसी तस्वीरों पर सैकड़ों लाइक्स और इन युवाओं के साहस की तारीफ करती टिप्पणियों की झड़ी लग जाती है. 2010 में सड़क के किनारे बने एक सुरक्षा कैंप में कथित रूप से सुरक्षा बलों द्वारा बुरहान को पीटने के बाद से उसके द्वारा बंदूक उठाने और कश्मीर में आतंकवाद को फिर से जीवित करने के लिए लोग उसकी तारीफ करते हैं.

बुरहान के प्रति युवा वर्ग की यह दीवानगी बढ़ती दिखाई दे रही है. ‘बुरहान काॅलेज’ पेज पर एक टिप्पणी के अनुसार, ‘मैं तुम से प्यार करता हूं बुरहान. मैं तुम्हारा काॅलेज जॉइन करना चाहता हूं और मैं तुम जैसा बनना चाहता हूं’. सबसे ताजा पोस्ट ‘जिहाद के बारे में हमेशा सकारात्मक सोच रखो’ है. इसे अपलोड किए जाने के एक घंटे के भीतर इसे 300 लाइक और 62 टिप्पणियां मिल जाती हैं. इसी तरह बुरहान के नाम से चलाए जा रहे एक अन्य अकाउंट पर बुरहान की ओर से अपने पिता के लिए संदेश लिखा गया है, ‘चिंता मत कीजिए पापा आपका बेटा सही राह पर है. मैं इस्लाम के लिए लड़ रहा हूं. मैं खिलाफत के लिए लड़ रहा हूं. हम सारी दुनिया पर राज करेंगे. हम खिलाफत लाएंगे.’ इस पोस्ट में एक ओर बुरहान के पिता की तस्वीर लगी है जिसके नीचे लिखा है, ‘मैं आपसे प्यार करता हूं पापा. मैं एक मुजाहिद हूं जो इस्लाम के लिए मरने के लिए पैदा हुआ है.’

फेसबुक के साथ-साथ बुरहान के आक्रामक सार्वजनिक संवाद का दायरा वाॅट्स एेप और शहर की गलियों की दीवारों पर चित्रों के माध्यम से देखा जा सकता है. त्राल में एक दुकान की शटर पर लिखा है, ‘बुरहान वापस आ रहा है.’ इसी तरह श्रीनगर के बाहरी इलाके पम्पोर में विभिन्न गलियों की दीवारों पर ‘त्राल, बुरहान जिंदाबाद’ लिखा हुआ मिल जाता है. बहरहाल, यह अति सक्रिय आॅनलाइन जेहादी आंदोलन अब तक श्रीनगर के युवाओं को ललचा नहीं सका है.

90 के दशक में आतंकवाद श्रीनगर के बाहर भी फैल गया था. अब श्रीनगर के सीमांत इलाकों में आतंकवाद फिर से अपना फन फैला रहा है. हालांकि अब तक यह श्रीनगर के भीतर प्रवेश नहीं पा सका है. लेकिन उत्तरी और दक्षिणी कश्मीर में उन हजारों लोगों को लंबे वक्त तक अनदेखा करना मुश्किल होगा जो आतंकवादियों के जनाजे में शामिल होते हैं और मातम मनाते हैं. यह स्थिति लोगों में नए सिरे से आतंकवाद के प्रति लगाव की ओर इशारा करती है. अपने आॅनलाइन अभियानों से आतंकवादी इस तरह की भावनाओं को बल देते हैं.

कुछ समय पहले पुलवामा के बाटापोरा में शकीर अहमद नाम के एक आतंकवादी के जनाजे में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए. इसमें तीन आतंकी भी थे और इस जनाजे का वीडियो वायरल हो गया था. इसके बाद जदूरा के एक कब्रिस्तान में कुछ आतंकियों ने अपने साथी मुफीद बशीर उर्फ रकीब की कब्र पर 21 बंदूकों से सलामी दी. उत्तरी कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों का हिस्सा रहे­­­ एक पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘घाटी में आईएस के झंडों के लहराने का मतलब तत्काल रूप से आतंकवाद भले ही न हो, लेकिन हम इसे पूरी तरह से नकार नहीं सकते. तालिबान और आईएस जैसे जेहादी आतंकी संगठनों की कुछ मोर्चों पर हुई जीत के कारण भू-राजनीतिक स्थितियों में आतंकवाद के अनुकूल स्थितियों में बदलाव आया है. इसलिए तस्वीर किसी भी समय बदल सकती है.’

(पहचान छिपाने के लिए सभी युवाओं के नाम बदले गए हैं)