‘अगर लिंग परीक्षण पर सजा का प्रावधान है तो ऐसे मां-बाप को क्यों नहीं दंडित किया जाना चाहिए जो अपने किन्नर बच्चों को कहीं छोड़ आते हैं?’ | Tehelka Hindi

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‘अगर लिंग परीक्षण पर सजा का प्रावधान है तो ऐसे मां-बाप को क्यों नहीं दंडित किया जाना चाहिए जो अपने किन्नर बच्चों को कहीं छोड़ आते हैं?’

चित्रा मुद्गल हिंदी साहित्य की वरिष्ठ लेखिका हैं. हाल ही में उनका किन्नरों पर लिखा गया उपन्यास ‘नालासोपारा पो. बॉक्स नं. 203’ प्रकाशित हुआ है. लेखन के अलावा वे सामाजिक कार्यों में भी काफी सक्रिय रहती हैं. किन्नरों की स्थिति, देश के राजनीतिक हालात, साहित्य और स्त्री विमर्श समेत तमाम मुद्दों पर उनसे बातचीत.

अमित सिंह 2016-05-31 , Issue 10 Volume 8
सभी फोटो : विजय पांडेय

सभी फोटो : विजय पांडेय

आपका  ‘थर्ड जेंडर’  यानी किन्नरों की जिंदगी पर आधारित  उपन्यास  ‘नालासोपारा पो. बॉक्स नं. 203’  हाल ही में प्रकाशित हुआ है. किन्नरों की जिंदगी पर उपन्यास लिखने का विचार कहां से आया? इस उपन्यास में खास क्या है?

इस उपन्यास में मैंने आजाद भारत में किन्नरों की स्थिति पर प्रकाश डालने का प्रयास किया है. आजादी के पहले और बाद हमने अपनी तमाम रूढ़ियों जैसे सती प्रथा, बाल विवाह, दलितों और अस्पृश्यों से भेदभाव आदि को तोड़ा है लेकिन किन्नरों की जिंदगी में कोई भी परिवर्तन नहीं आया. अब हाल ही में हमारे राजनेताओं ने उन्हें अलग श्रेणी देने की कवायद शुरू की है जबकि समाज में उनकी स्थिति आज भी अछूतों से बदतर है. समाज ने उनकी पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान नहीं दिया. उन्हें किसी तीज-त्योहार में शामिल नहीं किया जाता है. इसके चलते आज भी हालत यह है कि अगर मेट्रो में एक किन्नर चढ़ जाए तो सब उसे अजीब निगाहों से देखते हैं. सड़क पर भीख मांगते हुए मिल जाए तो हिकारत की नजर से देखकर जल्दी से पैसा-वैसा देकर चलता करते हैं. जब मैं मुंबई के नालासोपारा में रहती थी तब मेरा साबका एक ऐसे युवक से हुआ जिसे किन्नर होने की वजह से जबरिया घर से निकाल दिया गया था. यह उपन्यास उसी युवक के विद्रोह की कहानी है. यह युवक अपने परिवार खासकर अपनी मां से सवाल करता है कि लंगड़ा, लूला, बहरा, मानसिक रूप से विकलांग बच्चे को तो आप घर से बाहर नहीं निकाल देतीं लेकिन अगर मैं लिंग से विकलांग पैदा हुआ, जिसमें मेरा कोई दोष भी नहीं है, तो मुझे घर से बाहर क्यों निकाल दिया गया.

किन्नरों की इस स्थिति के लिए किसे जिम्मेदार मानती हैं? इसका क्या हल हो सकता है?

इस उपन्यास में यह किन्नर अपनी मां का पता लगाकर उनके साथ पत्र व्यवहार करता है. मां चुपके से इस बच्चे को खत भी लिखती है लेकिन वह चाहती है इसके बारे में किसी को पता नहीं चले क्योंकि इससे उनके परिवार की बदनामी होगी, बाकी बच्चों की शादियों में अड़चन आएगी. उपन्यास का नाम उसी पत्र व्यवहार के पते के ऊपर रखा गया है. बाद में वह राजनीति का भी शिकार होता है. हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने किन्नरों के लिए आरक्षण दिए जाने की बात कही है लेकिन उपन्यास का यह नायक कहता है कि हमें आरक्षण की जरूरत नहीं है. मुझे लगता है इसके लिए मां-बाप को ही कटघरे में लेने की जरूरत है. उन्हें समझाया जाए कि वे अपनी ऐसी औलाद को घूरे में न फेंकें. दूसरों को न सौंप दें. उनका सही तरीके से लालन-पालन करें. सरकार को चाहिए कि वह किन्नरों के लिए आरक्षण के बजाय मां-बाप को दंडित करने का प्रावधान करे. अगर भ्रूण के लिंग परीक्षण करने पर आप सजा का प्रावधान कर सकते हैं तो ऐसे मां-बाप को क्यों नहीं दंडित किया जाना चाहिए जो अपने किन्नर बच्चों को कहीं छोड़ आते हैं या फिर किन्नरों को दे देते हैं?

पिछले दिनों सिंहस्थ में किन्नर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को महामंडलेश्वर की पदवी मिली है. इसे किस तरह देखती हैं?

लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की बात अलग है. वे सभी काम चौंकाने वाले ही करती हैं. उनका सब कुछ फिल्मी होता है. सोचने वाली बात है कि जिस धर्म ने आपको कूड़े की तरह फेंक दिया आप अब उसी के जाल में फंसने चली गई हैं. आप ही सोचिए, लिंग पूजक धर्म में लिंग विहीन का क्या काम है? आज जिस तरह से ये (किन्नर) शोषित होते हैं उसके लिए धर्म ही जिम्मेदार है. धर्म ने उन्हें मंदिर जाने का अधिकार नहीं दिया, उन्हें पूजा करने का अधिकार नहीं दिया. हमारे समाज ने उनके साथ ठीक ढंग से व्यवहार नहीं किया. धर्म ने ऐसी व्यवस्था बनाई है कि किन्नर समाज से अलग होकर रहें लेकिन जब आपके यहां बच्चा हो तो वे आशीर्वाद देने आएं कि आपके यहां ऐसा न हो. अरे! जो खुद इतने बुरे हालात में जिंदा है वह दूसरों को क्या आशीर्वाद देगा.

यौनिकता का अधिकार मांगना एक तरह से पितृसत्तात्मक मानसिकता को ही बढ़ावा देने वाली बात है. समाज को यह समझना होगा कि स्त्री सिर्फ एक देह नहीं है. यौन स्वतंत्रता का विचार पश्चिम से आया है लेकिन आप देखिए क्या वहां वेश्यालय कम हैं? क्या वहां लड़कियों को सिर्फ देह समझे जाने के कारण आजादी मिल गई है? क्या उन्हें इसके चलते इज्जत मिलनी शुरू हो गई? ऐसा नहीं हुआ है

आजकल स्त्री विमर्श में यौन स्वतंत्रता की बात कही जा रही है. स्त्री की इस स्वतंत्रता से आप उसे कितना मजबूत पाती हैं?

औरत के धड़ के निचले हिस्से पर ही बात क्यों होती है? स्त्री के धड़ के ऊपर एक मस्तिष्क भी होता है. आप जब उसे बराबरी का हिस्सा देंगे, उसकी बुद्धिमत्ता को मानेंगे तब स्त्री सही रूप में स्वतंत्र होगी. यौनिकता का अधिकार मांगना एक तरह से पितृसत्तात्मक मानसिकता को ही बढ़ावा देने वाली बात है. आपको यौन स्वतंत्रता देकर पुरुष ही उसका फायदा उठा रहा है. आज अगर लड़की से कोई गलती हो जाती है तो पुरुष उसके लिए जिम्मेदार नहीं होता है. भले ही यौन स्वतंत्रता का फायदा उठाकर आप पुरुषों से बहुत सारे काम करवा लें लेकिन यह आपकी मजबूती नहीं है. समाज को यह समझना होगा कि स्त्री सिर्फ एक देह नहीं है. यौन स्वतंत्रता का विचार पश्चिम से आया है लेकिन आप देखिए क्या वहां वेश्यालय कम हैं? क्या वहां लड़कियों को सिर्फ देह समझे जाने के कारण आजादी मिल गई है? क्या उन्हें इसके चलते इज्जत मिलनी शुरू हो गई? ऐसा नहीं हुआ है.

भारत में स्त्री विमर्श पिछले कई दशकों से चल रहा है. अब 2016 में क्या ऐसे विमर्श की जरूरत है?

मुझे लगता है कि स्त्री विमर्श बहुत हो गया. खासकर, कुछ संपादकों ने  इसे जिस हाल में पहुंचा दिया वह बहुत ही बुरा है. उन्होंने इसे यौन फॉर्मूला बना दिया है जबकि जरूरत है कि समाज में स्त्री की सुरक्षा को सुनिश्चित करने की, उसे शिक्षित करने की, उसे कानूनी तौर पर अधिकार दिलाने की. पिछले कई दशकों का स्त्री विमर्श जिस मोड़ पर पहुंच चुका है वह हमें नहीं चाहिए था.

अगर हम कहें कि पुरुष नहीं चाहिए, लेस्बियन समाज चाहिए तो कहां तक जायज होगा? स्त्री के स्वावलंबन का मतलब पुरुष से लड़ाई थोड़े ही है. यह उनके लिए भी खतरनाक है. अब समाज में बदलाव आया है. अब पिता सिर्फ अपने बेटों को पढ़ाने के लिए लोन नहीं ले रहा बल्कि वह बेटियों के लिए भी यह कर रहा है. हालांकि अभी इसका प्रतिशत कम है. अगर पुरुष-महिला दोनों काम कर रहे हैं तो पुरुष किचन के कामों में स्त्री की मदद भी कर रहा है.

अब अंतरजातीय प्रेम विवाह को लेकर स्वीकृति बढ़ी है. आज अगर लड़की पढ़ी-लिखी है और किसी को पसंद करती है तो मां-बाप उसकी बात सुनते हैं. हमारे समय में अगर आपको ऐसा कुछ करना होता, तो कहा जाता कि घर के सामने कुआं है, बेहतर है आप उसमें कूद जाएं. पर अब बदलाव हो रहा है. नई पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने समाज की रूढ़ियों को तोड़ा है. यह बहुत सकारात्मक है

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आपने कई जगह जिक्र किया है कि स्त्री विमर्श को गलत दिशा देने में साहित्यिक पत्रिकाओं के कुछ संपादकों का हाथ रहा है.

मुझे आंदोलनों पर बहुत भरोसा है. मुझे लगता है कि इसके जरिए बदलाव लाया जा सकता है. स्त्री विमर्श का आंदोलन भी ऐसे आया. लेकिन जब यह कुछ खास लोगों की बपौती बन जाता है, निरंकुशता का शिकार हो जाता है तो लोग इसका इस्तेमाल अपने तरीके से करने लगते हैं. राजेंद्र यादव जैसे संपादकों ने स्त्री विमर्श के साथ यही किया. स्त्री को केवल यौन स्वतंत्रता नहीं चाहिए थी और यौन स्वातंत्र्य से ही स्त्री स्वतंत्र नहीं हो सकती. स्त्री ने आज जो भी जगह हासिल की है वह अपने ज्ञान, अपनी पढ़ाई-लिखाई और बुद्धिमत्ता से हासिल की है.

आपने लगभग 40 साल पहले काफी विरोध का सामना करते हुए अंतरजातीय प्रेम विवाह किया था, तब से अब तक ऐसे विवाहों की स्थिति में कितना बदलाव देखती हैं?

मुझे लगता है कि अब अंतरजातीय प्रेम विवाह को लेकर स्वीकृति बढ़ी है. आज अगर लड़की पढ़ी-लिखी है और किसी को पसंद करती है तो मां-बाप उसकी बात सुनते हैं. लड़का उन्हें ठीक लगता है तो उनकी शादी भी आराम से हो जाती है चाहे वह किसी भी जाति का हो. हमारे समय में अगर आपको ऐसा कुछ करना होता, तो कहा जाता कि घर के सामने कुआं है, बेहतर है आप उसमें कूद जाएं. पर अब बदलाव हो रहा है. नई पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने समाज की रूढ़ियों को तोड़ा है. यह बहुत सकारात्मक है और यह सिर्फ शहरों में नहीं हुआ है बल्कि गांवों में भी हुआ है. आप यहां कह सकते हैं कि यह सिर्फ पचास फीसदी है, लेकिन यह कहते वक्त आपको यह भी ध्यान रखना होगा कि यह सदियों पुरानी रूढ़ि है. उसको तोड़ा जा रहा है, यह जरूरी है. परिवार का स्वरूप भी बदल रहा है. अब सासें अपनी बहुओं के साथ उस तरह का व्यवहार नहीं करती हैं जैसे पिछली पीढ़ी की महिलाएं किया करती थीं.

वर्तमान सरकार आने के बाद से कहा जा रहा है कि असहिष्णुता और कट्टरता बढ़ी है. आप इस सरकार के कामकाज को कैसे देखती हैं?

आज देश में लोकतांत्रिक सरकार है. इसका मतलब यह हुआ कि हमारी चुनी हुई सरकार का शासन है. मेरा मानना है कि देश में किसी भी पार्टी की सरकार हो, अगर वह जनता के लिए काम करे तो वह बेहतर होगी. ऐसे में अगर एनडीए अपने किए हुए वादों को पूरा करती है या पूरा करने का प्रयास करती है तो ठीक है लेकिन यदि वह यह भी नहीं करती है तो वही बात हुई कि आसमान से गिरे और खजूर पर अटके. हां, वोट बैंक के लिए हिंदू-मुसलमान की जो खाई बनाई गई है वह बहुत खतरनाक है. आज हिंदू मुसलमान से डर रहा है तो मुसलमान हिंदुओं से भयभीत हैं और यह एक दिन की बात नहीं है. दरअसल पिछले कुछ समय में हमें ऐसा परिवेश दिया गया है. अब हिंदुओं और मुसलमानों को यह समझना होगा कि यह धरती किसी एक की बपौती नहीं है बल्कि दोनों को साथ रहकर मेलजोल बढ़ाना होगा. अगर भाजपा इस खाई को बढ़ा रही है तो बहुत बुरा है. जनता ने आपको देश का विकास करने के लिए चुना है. पर आप पुराने गौरव को वापस लाने की बात करते हैं. अरे! हमें हमारी बुनियादी सुविधाएं दो. हमें धर्म नहीं रोटी की जरूरत है. कोई भी मंदिर-मस्जिद हमें रोटी नहीं देगा. भगवान सिर्फ मानने वाले के लिए संबल का काम करते हैं.

पिछले साल इस सरकार के आने से बढ़ी असहिष्णुता का जिक्र करते हुए बहुत-से लेखकों ने उन्हें मिले पुरस्कार वापस किए. इस पर आपका क्या नजरिया है?

मैं अवॉर्ड वापस करने वाले लेखकों से सहमत नहीं हूं. मुझे लगता है कि उन लोगों ने कलम की ताकत को कम करके आंका है. लेखकों को सम्मान सरकार नहीं बल्कि जनता द्वारा दिया जाता है. यह सम्मान लेखकों को जनता द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे से मिलता है. यह एक गलत प्रक्रिया थी. अगर विरोध करना था तो सम्मान सरकार को वापस करने के बजाय साहित्य अकादमी के सामने खड़े होकर वापस करना था कि यह पैसा जनता का है और इसकी जरूरत हमें नहीं है, इसे गरीब इलाकों में खर्च कर दिया जाए.

अब तक देश के कई मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति नहीं थी. अब एक संगठन भूमाता ब्रिगेड के नेतृत्व में महिलाएं इन मंदिरों में प्रवेश कर रही हैं. इसे कैसे देखती हैं?

मैं इस मामले में भूमाता ब्रिगेड की तृप्ति देसाई के साथ हूं. यह कई साल पहले हो जाना चाहिए था. धर्म ने जो अफीम महिलाओं को पिलाई है उसका नशा टूटना जरूरी है. हर जगह कायम पुरुषवादी वर्चस्व का टूटना जरूरी है. अगर भगवान के नाम पर बने प्रतीक लोगों को ताकत देते हैं तो उन पर सबका बराबर अधिकार होना चाहिए.

साहित्य का अर्थ व्यापक है, सा+हित यानी जिससे सभी का हित हो. मुझे नहीं लगता कि इंटरनेट पर रचा हुआ कुछ इस पैमाने पर खरा उतरता हो. लिखने का अधिकार सबको है. जो कहानियां-कविताएं लिखते हैं, तुकबंदी करते हैं, सब साहित्यकार हैं. पर मेरे अनुसार गंभीर साहित्य इससे थोड़ा अलग है पर सभी तरह का साहित्य रचा जाना चाहिए. आसान साहित्य एक बेस तैयार करता है

इधर साहित्य में एक नए तरह का प्रयोग हुआ है. लघु प्रेम कथाएं आई हैं, जिन्हें लप्रेक कहा जा रहा है.

मैंने अब तक लप्रेक तो नहीं पढ़ा है पर साहित्यिक पत्रिकाओं में उसकी समीक्षा पढ़ी है. मुझे लगता है कि जो बातें मेरे दिल को छू नहीं पातीं, दिमाग उसे लंबे समय तक याद नहीं रखता. साहित्य का अर्थ व्यापक है. सा+हित यानी जिससे सभी का हित हो. मुझे नहीं लगता कि इंटरनेट पर रचा हुआ कुछ इस पैमाने पर खरा उतरता हो. इंटरनेट पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है पर मेरे ख्याल से वह बेहतर साहित्य नहीं हो सकता. मुझे लगता है साहित्य शाश्वत है. लिखने का अधिकार सबको है. जो कहानियां लिखते हैं, तुकबंदी करते हैं, कविताएं लिखते हैं, सब साहित्यकार हैं. पर मेरे अनुसार गंभीर साहित्य इससे थोड़ा अलग है. यह एक प्रक्रिया है. सभी तरह का साहित्य रचा जाना चाहिए.

सबको पढ़ने का अधिकार है. जरूरी नहीं कि सभी को ‘शेखर- एक जीवनी’ या ‘नदी के द्वीप’ समझ में आए, तो ऐसे में वह आसान साहित्य पढ़कर अपनी समझ बढ़ाकर फिर उसे पढ़े. ऐसा साहित्य एक बेस तैयार करता है.

नई पीढ़ी के लेखकों में आपको कौन-कौन पसंद है. साहित्य की इस पीढ़ी से आपको कितनी उम्मीदें हैं?

अखिलेश, अल्पना मिश्र, मनीषा कुलश्रेष्ठ, राकेश कुमार सिंह, संजय कुंदन, चंदन पांडेय, मनोज पांडेय आदि बेहतर लिख रहे हैं. खासकर आजकल  लड़कियां बहुत अच्छा लिख रही हैं. उनके द्वारा किया जा रहा विमर्श भी बेहतर है. नए लेखक ऐसे-ऐसे पक्षों को लेकर सामने आ रहे हैं जो अकल्पनीय हैं. नए लोगों की चीजों को देखने की दृष्टि अलग है.

आप उन्नाव को केंद्र में रखकर एक उपन्यास पर भी काम कर रही हैं. क्या होगा इस उपन्यास में?

हां, अब मैं अपने अगले उपन्यास की तैयारी कर रही हूं. यह शायद मेरा आखिरी उपन्यास होगा. इसमें मैं अपनी जन्मभूमि उन्नाव को केंद्र में रख रही हूं. यह वैश्य ठाकुरों के इतिहास पर केंद्रित होगा. ये कहां से आए,  स्वतंत्रता संग्राम में इनकी क्या भूमिका रही, इनकी स्त्रियों की हालत कैसी रही. अभी हालांकि इसमें काफी वक्त लगेगा.

आपके प्रिय लेखक?

प्रेमचंद, गोर्की, हेमिंग्वे, अमृतलाल नागर, कृष्णा सोबती, कुंवर नारायण, निर्मल वर्मा…(हंसते हुए), यह सूची बहुत लंबी है.

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 10, Dated 31 May 2016)

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