'सत्ता हस्तांतरण संधि से पता चल पाएगी नेताजी की सच्चाई' : राम तीर्थ विकल | Tehelka Hindi

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‘सत्ता हस्तांतरण संधि से पता चल पाएगी नेताजी की सच्चाई’ : राम तीर्थ विकल

गुमनामी बाबा उर्फ भगवन जी की ‘गुमनाम’ मौत के 42 दिन बाद फैजाबाद से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘नये लोग’ के दो पत्रकार राम तीर्थ विकल और उनके सहयोगी चंद्रेश कुमार ने गुमनामी बाबा के नेताजी होने का दावा करते हुए पहली खबर लिखी. इस खबर के आने के बाद ही दूसरे अखबारों ने इस खबर को तरजीह देना शुरू किया. इस पूरे मसले पर पत्रकार राम तीर्थ विकल से बातचीत.

अमित सिंह 2016-05-15 , Issue 9 Volume 8

गुमनामी बाबा उर्फ भगवन जी की ‘गुमनाम’ मौत के 42 दिन बाद फैजाबाद से प्रकाशित होने वाले अखबार ‘नये लोग’ के दो पत्रकार राम तीर्थ विकल और उनके सहयोगी चंद्रेश कुमार ने गुमनामी बाबा के नेताजी होने का दावा करते हुए पहली खबर लिखी. इस खबर को अखबार के पहले पन्ने पर जगह दी गई. इस रिपोर्ट के आने के बाद ही दूसरे अखबारों ने इस खबर को तरजीह देना शुरू किया. रिपोर्ट में विकल और चंद्रेश ने लिखा, ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस जो पिछले 12 साल से अयोध्या-फैजाबाद में गुमनामी बाबा के नाम से रह रहे थे, उनकी मौत 16 सितंबर को रहस्यमय परिस्थितियों में हो गई है. मौत के बाद फैजाबाद के बस स्टॉप के पास स्थित राम भवन पर उनके तीन तथाकथित दावेदारों ने नेताजी की संपत्ति पर दावा किया है. तीनों ने घर पर अपने-अपने ताले भी जड़ दिए हैं. साथ ही वे सभी सबूतों को मिटाने में भी लग गए हैं.’ बाद में अखबार के संपादक अशोक टंडन ने ‘गुमनामी सुभाष’ नाम की पुस्तक भी लिखी. इसके कुछ अंश कमलेश्वर के संपादन में दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका ‘गंगा’ में धारावाहिक के रूप में छपे थे. टंडन का दावा है कि उन्होंने बाबा के पास से मिली 2,760 वस्तुओं की बारीकी से जांच की है और उनमें से अनेक नेताजी से संबंधित हैं.

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पत्रकार राम तीर्थ विकल

 गुमनामी बाबा के नेताजी होने की खबर कैसे पता चली और इसके सूत्र क्या रहे?

उन दिनों मैं अपने अखबार में संडे मैगजीन का पेज देखता था. इसके लिए मैं रामकथा पर कुछ लेख लिख रहा था. इसी सिलसिले में शायद पांच अक्टूबर के दिन यहां के राजकरन इंटर कॉलेज के शिक्षक कृष्ण गोपाल श्रीवास्तव के पास कुछ स्केच लेने गया था. स्केच लेने के दरमियान ही उन्होंने इस घटना का उल्लेख किया. उन्होंने बताया कि 14 सितंबर को राम भवन में रहने वाले गुमनामी बाबा, जो कि नेताजी थे, की मौत हो गई है. उसके तीन दिन बाद उनका अंतिम संस्कार गुफ्तार घाट पर कर दिया गया. जब हमने पूछा कि यह कैसे मान लिया जाए कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे, तब उन्होंने कहा कि हम आपकी मुलाकात उनकी सबसे खास सेविका सरस्वती देवी से करा देते हैं. गुमनामी बाबा के अंतिम दिनों में वही उनके साथ रही थीं. सरस्वती देवी बस्ती की रहने वाली हैं.

जब हमारी भेंट सरस्वती देवी से हुई तब उनसे बातचीत के दौरान हमें कई ऐसी बातों का पता चला जिससे लगा कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. हालांकि इस दौरान हमारे पास कोई ऐसे साक्ष्य नहीं थे जिनसे साबित होता कि यह बात सही है. हमने इस खबर के बारे में अपने संपादक को बताया. उन्होंने कहा कि इस घटना के बारे में और पड़ताल करो. करीब 21 दिन तक पूरी पड़ताल करने के बाद 27 अक्टूबर को हमने यह खबर लिखी और 28 अक्टूबर, 1985 के अंक में यह खबर लोगों को पढ़ने को मिली. इस दौरान हमने राम किशोर पंडा, राजकुमार शुक्ला, डॉ. पी बनर्जी समेत इस मामले से जुड़े सारे लोगों से बातचीत की. खबर पढ़ने के बाद यहां जनांदोलन शुरू हो गया. उस दौरान राम भवन के जिस कमरे में गुमनामी बाबा रहा करते थे वहां पर तीन ताले लगे हुए थे. पहला ताला डॉ. पी. बनर्जी ने लगा रखा था. दूसरा डॉ. आरपी रॉय ने लगा रखा था जबकि तीसरा सरस्वती देवी ने लगा रखा था. इस दौरान भारी जनदबाव के चलते प्रशासन ने सूची बनाकर सारी चीजों को अपनी कस्टडी में रखने का निर्णय लिया. इतना होने तक सारे देश के अखबारों का ध्यान इस तरफ गया. कई अखबार इसे फॉलो करने लगे.

पहली खबर छपने के बाद से मामले में क्या प्रगति हुई?

खबर छपने के बाद प्रशासन ने गुमनामी बाबा के सारे सामान को बाहर निकालकर एक सूची बनाई और उसे बक्सों में भरकर कोषागार पहुंचा दिया गया. हालांकि ये बात आ चुकी थी तो जनता ने इस मामले काे साफ करने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. इसी का परिणाम हुआ कि केंद्र सरकार को मुखर्जी आयोग का गठन करना पड़ा. जब मुखर्जी आयोग ने मामले की जांच शुरू कर दी तो लोगों को लगा कि सच सामने आएगा लेकिन सरकार ने इस आयोग की जांच को बीच में ही रोक दिया. तब इस मामले को लेकर नेताजी के परिवार की एक महिला और राम भवन के मालिक शक्ति सिंह अदालत की शरण में चले गए.

1985 में जब आपने यह खबर छापी तो क्या प्रशासन की तरफ से इसका खंडन आया था या जिले के अधिकारियों ने इससे इनकार किया?

उस दौरान जिले में कौन-कौन-से अधिकारी थे, यह तो याद नहीं है, लेकिन एक बात साफ है कि किसी भी अधिकारी ने इस खबर का खंडन नहीं किया था. यह सिर्फ हमारे अखबार की बात नहीं थी, देश भर के अखबारों ने इस खबर को छापना शुरू किया था. इसमें लखनऊ, नई दिल्ली और कोलकाता से छपने वाले अखबार शामिल थे. इस दौरान यह आरोप भी लगा कि बहुत सारे अधिकारी गुमनामी बाबा के अंतिम संस्कार में शामिल भी रहे लेकिन न तो किसी अधिकारी ने इन खबरों की पुष्टि की और न ही खंडन किया. जबकि उस वक्त अगर हम प्रशासन के खिलाफ कोई भी खबर छापते थे तो तुरंत अगले दिन अधिकारी उसका खंडन करते थे. इस मामले में उस परंपरा का निर्वाह नहीं किया गया.

कहा जाता है कि गुमनामी बाबा के अंतिम संस्कार में शामिल होने कोलकाता से उनका कोई भी परिजन नहीं आया था. क्या यह बात सच है?

सरस्वती देवी के अनुसार गुमनामी बाबा की मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार दो दिन बाद किया गया था. उन्होंने बताया था कि इस दौरान कोलकाता से आने वाले उनके परिजनों का इंतजार किया जा रहा था. हालांकि जब वहां से कोई नहीं आया तो शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

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क्या वाकई में गुमनामी बाबा के मरने के बाद उनका चेहरा विकृत कर दिया गया था. उस समय मौजूद डॉ. आरपी मिश्रा इस बात का खंडन करते हैं?

हां, बिल्कुल उनका चेहरा खराब कर दिया गया था. सरस्वती देवी ने मुझे पहली मुलाकात में यह बात बताई थी कि डॉ. बनर्जी और डॉ. मिश्रा ने उनका चेहरा खराब कर दिया था. यही कारण भी था कि उनके भक्तों में इस बात को  लेकर लड़ाई हुई और यह बात दुनिया को पता चल गई. डॉ. मिश्रा आज भले ही इस बात से इनकार कर रहे हैं लेकिन उस दौरान जब लोग उन पर आरोप लगा रहे थे तब उन्होंने चुप्पी साध रखी थी या कहते थे कि यह गुमनामी बाबा का आदेश था.

इतने दिनों तक गुमनामी बाबा या नेताजी से जुड़ा यह रहस्य बना हुआ है, क्या लगता है कि इस मामले का कभी खुलासा होगा?

मुझे लगता है इस मामले का खुलासा ट्रांसफर ऑफ पावर पैक्ट (सत्ता हस्तांतरण संधि) के खुलासे से हो सकता है. मुझे यह भी लगता है कि सरकार को यह पता है कि गुमनामी बाबा कौन थे, पर वह किन मजबूरियों के चलते खुलासा नहीं कर रही है इस बारे में मुझे पता नहीं है. हालांकि अब आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद जनता को यह पता चलना चाहिए कि हमें अंग्रेजों ने आजादी किन शर्तों पर दी थी. बहुत सारे लोगों का मानना है कि इसमें नेताजी को सौंपे जाने की भी शर्त जुड़ी हुई थी. अगर यह बात सच है तो दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा.

इतने लंबे समय तक इस मामले पर रिपोर्टिंग करने के बाद आप किस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं?

इन 30 सालों की रिपोर्टिंग के दरमियान मेरी मुलाकात तमाम ऐसे लोगों से हुई और तमाम ऐसे साक्ष्य सामने आए जिससे मुझे लगता है कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. आज भी जब गुमनामी बाबा का सामान बाहर निकाला जाता है या इसे इधर-उधर किया जाता है तो एक बड़ा वर्ग यह दावा करता है कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे. पर अभी देखिए जो सामान रामकथा संग्रहालय भेजा जा रहा है और जिसे देखकर लोग उनके नेताजी होने का कयास लगा रहे हैं. उन्हें मैं 30 साल से देख रहा हूं. पहली बार जब वो सामान जब्त हुआ तब भी बहुत सारे लोगों की यही धारणा थी. बाद में जब मुखर्जी आयोग बना तो इस धारणा को और बल मिला. अब जब अदालत के आदेश से सामान को संग्रहालय में रखा जा रहा है तो भी कहीं न कहीं इसी बात की पुष्टि हो रही है. सरकार इस पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है तो यह बात तो साफ है कि वे जरूर ही आजादी से जुड़े नायक रहे होंगे.

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 9, Dated 15 May 2016)

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