‘माओवादियों को हर तरह के अतिवाद से बचना होगा’

देखिए, राज्य का भी आतंक होता है. आज आप संसद या विधानसभा में प्रतिनिधियों के बारे में आंकड़ाें पर गौर करें तो पता चलेगा कि वहां करोड़पतियों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है. मेरा सीधा-सा सवाल यह है कि क्या सांसदों और विधायकों के अनुपात में ही देश के सामान्य नागरिकों (गरीब, पिछड़ा, दलित और आदिवासियों) की पूंजी में इजाफा हुआ है? मुझे लगता है कि गरीब और गरीब होते चले गए हैं. अगर इतना अन्याय है तो फिर उसके ऐसे परिणाम ही सामने आएंगे. पुलिसकर्मी भी किसी का बच्चा है और उसके मरने का दुख सभी को होना चाहिए. लेकिन सवाल यह है कि क्या उन्हें शहीद बनाने से समस्या का समाधान हो जाएगा? समस्या का समाधान तो तब होता है जब वहां से शोषण, दमन उत्पीड़न गुरबत हो. आप ऐसी समस्या ही क्यों रहने देते हैं जहां पुलिसकर्मी या माओवादी शहीद हों? मैं राज्य के समक्ष एक काल्पनिक परिस्थिति पेश करना चाहता हूं. कल को माओवादी दिल्ली तक पहुंचने में सफल हो जाएं और फिर अपने लोगों को शहीद बताना शुरू कर दें और पुलिस वाले जो आज शहीद हो रहे हैं और उन्हें गद्दार तो फिर क्या करेंगे? इसलिए सरकारों को बहुत ध्यान से इस मसले के हल की ओर बढ़ना चाहिए. माओवाद की समस्या काे हल करने के लिए सरकार को अपने अलग-अलग विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों की एक ईमानदार फौज खड़ी करने की दरकार है जो आदिवासियों के लिए समर्पित हो. आप सलवा जुडूम पैदा कर सकते हैं तो एक ईमानदार कर्मचारियों-अधिकारियों का समर्पित कैडर क्यों नहीं पैदा कर सकते हैं?

मोदी सरकार छत्तीसगढ़ में 24 हजार करोड़ रुपये की परियोजना शुरू करने जा रही है.  अतीत के मद्देनजर पुनर्वास, उचित मुआवजा आदि मामलों का निपटारा अब ढंग से होगा, इसका कैसे भरोसा किया जा सकता है?

मैंने अपनी किताब में नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन की बात उठाई है. दंतेवाड़ा में एनएमडीसी ने सबसे पहले हजारों करोड़ रुपए खर्च करके उद्योग खड़ा किया था. फिर भिलाई में. यह सब नेहरू के जमाने में हुआ था. यहां चिंता करने वाली बात यह है कि जो कंपनी 24 हजार करोड़ रुपये लगाएगी वह आदिवासी को कमोडिटी से ज्यादा कुछ नहीं समझेगी. आदिवासियों की जमीनें ली जाएंगी तो उन्हें कैसे मुआवजा दिया जाएगा? क्या वे परियोजना को इस तरह लागू करेंगे कि प्रतिरोध की कोई गुंजाइश ही न बचे. क्योंकि विस्थापन से केवल जीविकोपार्जन ही नहीं है बल्कि बोली, भाषा, संस्कृति आदि सब कुछ क्षत-विक्षत हो जाता है.

माओवाद का भविष्य क्या है?

भारत जैसे देश में अब सशस्त्र क्रांति लाना संभव नहीं. संभव हो जाए तो अच्छी बात है. लेकिन क्यों संभव नहीं है, इसका जवाब यह है कि भारत अब बहुत शक्तिशाली राज्य में तब्दील हो चुका है. दुनिया के तमाम पूंजीवादी मुल्कों में इस मसले पर बहुत घनिष्ठता है इसलिए वे कभी भी नहीं चाहेंगे कि किसी मुल्क में क्रांति संभव हो. 1936 में माओत्से तुंग विशाल रैली (लॉन्ग मार्च) निकाल सकते थे लेकिन आज आप जगदलपुर से साउथ ब्लॉक, दिल्ली तक लॉन्ग मार्च करना चाहें तो यह संभव नहीं हो पाएगा. अब क्रांति के नए माध्यम ढूंढने होंगे. माओवादियों को अति संसदवाद से और अतिसंविधानेत्तरवाद से बचना होगा. मतलब यह कि बगैर संसद में पहुंचे हुए कुछ नहीं बदलेगा और दूसरा यह कि बगैर शस्त्र उठाए कुछ भी नहीं बदल सकेगा. इन दोनों ही चरम स्थितियों से बचना होगा.

 

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