‘अगर हिंसा करनी पड़ी तो वो भी करूंगा’ | Tehelka Hindi

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‘अगर हिंसा करनी पड़ी तो वो भी करूंगा’

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल होने के लिए पटेल समुदाय के लोग पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के बैनर तले गुजरात में अब तक 175 से ज्यादा रैलियां कर चुके हैं. इसकी कमान राज्य के 22 वर्षीय युवा हार्दिक पटेल ने संभाली है. पिछले दिनों ये शांतिपूर्ण आंदोलन उस वक्त हिंसक हो गया जब अहमदाबाद में एक रैली के दौरान हार्दिक को हिरासत में ले लिया गया था. उसके बाद इस आंदोलन ने राष्ट्रीय स्तर पर लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा. हार्दिक का कहना है कि यह आंदोलन 100 मीटर की रेस नहीं, मैराथन है. उनसे अर्चना मिश्रा की खास बातचीत

Iपाटीदार अनामत आंदोलन समिति (पीएएएस) की शुरुआत के बारे में बताइए?

संगठन की शुरुआत 2011 में लौहपुरुष सरदार पटेल की जयंती पर हुई थी. मैं इस संगठन को अहमदाबाद के विरामगाम और मंडल इलाके से सिर्फ पाटीदार समुदाय के लिए चला रहा था. समाज के संवेदनशील तबके, जिसमें  हिंसा की शिकार महिलाएं और किसान शामिल हैं, की रक्षा करना हमारा उद्देश्य है. इसलिए हम उनके लिए काम कर रहे हैं और पिछले दो सालों में लगभग 12 हजार लोग हमारे संगठन से जुड़ चुके हैं.

उस समय तमाम पाटीदार ये शिकायत किया करते थे कि उन्हें न तो नौकरी मिल रही है और न ही शिक्षण संस्थाओं में एडमिशन. पिछले दो सालों में ऐसे मामलों को देखते हुए मैंने जाना कि इन समस्याओं के पीछे आरक्षण सबसे बड़ा और मुख्य कारण है. कोई 80 प्रतिशत अंक पाता है, फिर भी उसे एडमिशन नहीं मिल पाता, वहीं आरक्षण की वजह से उससे कम अंक वाले का एडमिशन हो जाता है और उनकी नौकरी लग जाती है. इसलिए मेहसाणा में पहली रैली कर हमने आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया. धीरे-धीरे विसनगर, गांधीनगर और गुजरात के दूसरे हिस्सों में रैली कर आंदोलन को आगे बढ़ाया. आज जारी आंदोलन की यह शुरुआत थी.

आपकी मांगों में विरोधाभास नजर आता है. अहमदाबाद में हुई रैली में तमाम लोग इसलिए शामिल हुए क्योंकि उनका मानना था कि आप देश में आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने की मांग कर रहे हैं. एक तरफ तो आप आरक्षण की मांग कर रहे हैं और दूसरी तरफ यह भी कह रहे हैं कि पाटीदारों को अगर आरक्षण नहीं दिया जाएगा तो ये व्यवस्था खत्म होनी चाहिए. आप इन दोनों बातों को किस तरह से देखते हैं?

भारत से आरक्षण व्यवस्था को खत्म नहीं किया जा सकता क्योंकि हमारा देश इसी वजह से चल रहा है. यहां तक कि देश में राजनीति का आधार एक तरह से आरक्षण ही है. इसलिए हम आरक्षण व्यवस्था काे खत्म नहीं कर सकते. इसकी जगह हम आरक्षण का हिस्सा बनना चाहते हैं क्योंकि अगर हमें इसमें शामिल किया जाता है तो हमारे समुदाय को भी वे लाभ मिलेंगे जो दूसरों को मिलते हैं. आज अनुसूचित जाति या जनजाति के छात्र-छात्राओं को सामान्य श्रेणी के लिए आरक्षित सीटों पर भी एडमिशन लेने का मौका मिल जाता है. मगर हमें उनके लिए आरक्षित सीटों पर एडमिशन नहीं मिलता. मैं सिर्फ पाटीदार समुदाय की ही नहीं सामान्य श्रेणी में आने वाली दूसरी जातियों की भी बात कर रहा हूं. पहले तो वे अपनी सीट खाते हैं और बाद में हमारी.

गुजरात में दंगे जैसी स्थितियां पैदा होने के बाद इस आंदोलन ने बड़ा रूप ले लिया है. क्या आपने या सरकार के लोगों में से किसी ने मामले का हल निकालने के लिए बातचीत की कोई कोशिश की है?

सरकार आगे आए और हमसे बात करे. हम नहीं जाएंगे सरकार से बात करने. अगर किसी दूसरे समुदाय को हमसे कोई दिक्कत है तो उन्हें ये फैसला करने का हक नहीं कि हमें क्या करना चाहिए. सरकार को फैसला करने दीजिए कि वह क्या करना चाहती है.

क्या आप अश्विन पटेल के पाटीदार आरक्षण संघर्ष समिति से भी जुड़े थे, जिन्होंने सबसे पहले इस मुद्दे को लोगों के सामने रखा. ऐसा कहा जाता है कि आप दोनों के बीच वैचारिक मतभेद होने के बाद आपको संगठन से हटा दिया गया. आपका इस बारे में क्या कहना है?

मैं अश्विन के साथ कभी नहीं रहा. हमने अपने आंदोलन के बारे में उन्हें जानकारी दी थी, लेकिन हमें आरक्षण जैसे मुद्दे के हल को लेकर उनका दृष्टिकोण पसंद नहीं था. उनकी अपनी विचारधारा है और वे भाजपा के साथ जुड़े हुए भी थे. अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए वह हमारे आंदोलन को भुनाना चाहते थे. वह दिल्ली में अपने राजनीतिक आधार की तलाश कर रहे थे, लेकिन मैं राजनीतिज्ञ नहीं बनना चाहता. अगर रिमोट कंट्रोल हमारे हाथ में होगा तो हम सरकार को झुका भी सकते हैं और उसे बदल भी सकते हैं.

आप और अश्विन के बीच किस तरह के राजनीतिक मतभेद थे, जिसकी वजह से आपको अलग राह चुननी पड़ी?

अश्विन के पास ऐसा कोई विचार नहीं था कि एक आंदोलन कैसे चलाया जाए. आंदोलन क्रांति के जैसा होता है और वह क्रांतिकारी नहीं हैं.

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