हैप्पी टू ब्लीड : मेरी माहवारी तेरी मानसिक बीमारी

देश के ग्रामीण इलाकों में आज भी महिला स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का समाधान तब तक नहीं होता जब तक महिला की स्थिति बिल्कुल ही खराब न हो जाए. मासिक स्राव के दिनों में महिलाओं का शरीर ज्यादा संवेदनशील हो जाता है और ऐसे में अगर उन्हें कोई समस्या हो, जिसके बारे में वे खुलकर न कह पाएं तो हालत खराब ही होती चली जाती है. इस ‘झिझक’ से जुड़ा सबसे खराब पहलू यही है. कहीं न कहीं देश में हर साल बढ़ती मातृ-शिशु मृत्यु दर का बीज रिप्रोडक्टिव हेल्थ को लेकर बरती जाने वाली इसी लापरवाही से पड़ जाता है. बात अगर ग्रामीण क्षेत्रों की करें तो पता चलता है कि पीढ़ी दर पीढ़ी सिर्फ अज्ञानता आगे बढ़ रही है. महिलाओं को अपने शरीर के बारे में ही अधकचरी जानकारी होती है जो तमाम संक्रमणों और बीमारियों को न्योता देती है. दासरा फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट ‘स्पॉट ऑन- इम्प्रूविंग मेनस्ट्रुअल हाइजीन इन इंडिया’ में बताया गया है कि कैसे गांवों में आज भी महिलाएं कपड़े या सेनेटरी नैपकिन के विकल्प के रूप में राख, बालू, अखबार या फूस का प्रयोग करती हैं. और ये सब उनके लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है, यही वो तरीका है, जो वे सालों से प्रयोग होता देखती आई हैं. इस हाल में कैसे उम्मीद की जाए कि उन्हें प्रजनन से संबंधी बीमारियां नहीं होंगी. ये रिपोर्ट ये भी बताती है कि किस तरह देश में इस मुद्दे को कोई जगह नहीं मिलती जबकि ये स्वास्थ्य, पर्यावरण और शिक्षा से सीधे जुड़ता है.

दसरा की रिपोर्ट के अनुसार:

• जो महिलाएं मासिक स्राव के समय अनहाइजिनिक तरीके अपनाती हैं, उनमें रिप्रोडक्टिव ट्रैक्ट इन्फेक्शन (प्रजनन अंग संबंधी संक्रमण) आम महिलाओं से 70 प्रतिशत ज्यादा देखे गए हैं.

• एक महिला द्वारा साल भर में लगभग 125-150 किलो नॉन-बायोडिग्रेडेबल सेनेटरी कचरा फेंका जाता है जिससे पर्यावरण को खासा नुकसान पहुंचता है.

• स्कूलों में शौचालय और पानी के उचित इंतजाम न होने के चलते 23 फीसदी बच्चियां स्कूल छोड़ देती हैं.

इसके इतर भी कुछ आंकड़ें बताते हैं कि मासिक स्राव से जुड़े मिथकों के चलते इसके शुरू हो जाने के बाद लड़कियों का स्कूल जाना बंद करवा दिया जाता है. देश में जोर-शोर से चल रहे ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के नारे उस वक्त बेमानी हो जाते हैं जब मिथकों, स्कूलों में शौचालय और पानी की कमी के चलते लड़कियां पढ़ाई छोड़ देती हैं.

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समस्या सिर्फ स्कूलों में शौचालयों की कमी से जुड़ी नहीं है. कामकाजी महिलाओं की समस्या इससे भी बड़ी है. कचरा प्रोजेक्ट द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार देश के बड़े शहरों में सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति भी खराब है. 2013-14 में किए गए इस सर्वे में दिल्ली में पुरुषों के लिए 4000 सार्वजनिक शौचालय थे जबकि महिलाओं के लिए सिर्फ 300. मुंबई के लगभग 2,849 सार्वजनिक शौचालयों में महिलाओं के लिए अलग शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है. कोलकाता में 300 सार्वजनिक शौचालय हैं, जिनका प्रयोग महिला-पुरुष दोनों ही करते हैं. सिर्फ शौचालयों की संख्या ही नहीं यहां साफ-सफाई की कोई ढंग की व्यवस्था न होने से होने वाली परेशानियों की फेहरिस्त भी लंबी है. कई कामकाजी महिलाएं बताती हैं कि काम पर जाने के दौरान वे कहीं भी बाथरूम का प्रयोग नहीं करतीं. अव्वल तो उन्हें पेशाब करने के लिए कोई उपयुक्त जगह नहीं मिलती और अगर मिल भी जाए तो वहां सफाई न होने से कई तरह के संक्रमण होने की आशंका रहती है. मासिक स्राव के दिनों में ये दिक्कत और बढ़ जाती है. आदर्श रूप से सेनेटरी नैपकिन या टैम्पून चार से छह घंटों के बाद बदलना चाहिए पर ऐसे माहौल में ये संभव नहीं हो पाता. लंबे समय तक एक ही नैपकिन या टैम्पून के उपयोग से संक्रमण होने के खतरे बढ़ जाते हैं. डॉ. रस्तोगी बताती हैं, ‘वैसे भी लंबे समय तक पेशाब रोकने से आपके ब्लैडर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और मासिक स्राव के समय तो अंग ज्यादा संवेदनशील हो जाते है. ऐसे में स्राव के समय एक ही नैपकिन का प्रयोग खुजली, जलन जैसी समस्याओं को जन्म देता है.’

देश में कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत बढ़ रहा है पर काम करने के माहौल को उनके अनुकूल बनाने की ओर किसी का ध्यान नहीं है. आज भी कई ऑफिस ऐसे हैं जहां महिलाओं के लिए बाथरूम की व्यवस्था नहीं है या महिला-पुरुष के लिए कॉमन बाथरूम है. जयपुर में कार्यरत एक मीडियाकर्मी बताती हैं, ‘हमारे स्टाफ में दो-तीन महिलाएं ही थीं तो अलग बाथरूम की जरूरत नहीं समझी गई. आम दिनों में तो चल जाता था पर मासिक स्राव के समय नैपकिन को फेंकने की कोई व्यवस्था न होने से अजीब स्थिति हो जाती थी, जिसका हल सिर्फ उन दिनों में छुट्टी लेना ही लगता था. क्योंकि ये औरतों से जुड़ा मसला है तो आप इस पर दफ्तर में खुलकर बात ही नहीं कर सकते.’

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ये स्थिति कहीं न कहीं उस चुप्पी की वजह से आती है जो मासिक स्राव जैसी सहज प्रक्रिया के बारे में बात करते हुए ओढ़ ली जाती है. गांवों में साक्षरता का स्तर शहरों की अपेक्षा कम होता है, पर हिचकिचाहट वहां भी है. जेएनयू की एक शोधार्थी शिवानी इससे जुड़ा अपना अनुभव बताती हैं. ‘मुझे पिछले कुछ सालों से पीसीओएस (पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम) है. शुरू में जब मैंने खुद में आ रहे बदलाव देखे तब मैं कुछ समझ नहीं पाई. कुछ महीनों तक मैं ये बात किसी से भी नहीं कह पाई कि मुझे पीरियड्स से संबंधी कोई परेशानी हो रही है. मुझे लगता था कि पता नहीं कोई इस पर क्या कहेगा! पर फिर उस झिझक को तोड़ते हुए मैं डॉक्टर के पास गई और इलाज शुरू किया. आज मैं इस बारे में आसानी से बात कर सकती हूं. आपके पीरियड्स से जुड़ी समस्याएं उतनी ही सामान्य हैं, जितनी शरीर की कोई और तकलीफ.’ इस मामले में डॉ. निम्मी का भी यही कहना है, ‘पीसीओएस दो तरह के होते हैं, जिनमें एक ज्यादा खतरनाक होता है. पर फिर भी बीमारी कितनी भी छोटी क्यों न हो, उसका समाधान करना जरूरी है. यही पीसीओएस लंबे समय तक नजरअंदाज किए जाने पर किसी यूटराइन (गर्भाशय संबंधी) संक्रमण या किसी भी प्रकार के कैंसर का रूप ले सकता है.’

‘मेरे स्कूल के शौचालय में न पानी था न कूड़ेदान. अगर मैं नैपकिन बाहर फेंकती तो लड़के जान जाते कि मुझे स्राव हो रहा है और चिढ़ाते’

अगर सोचें कि हिचक सिर्फ मासिक स्राव से जुड़ी हुई है तो ऐसा नहीं है. शिवानी बताती हैं, ‘बहुत सी लड़कियां आज पीसीओएस से जूझ रही हैं, पर फिर भी वे इस बारे में बात नहीं करतीं. बहुतों को इस बारे में कुछ मालूम ही नहीं है वहीं कुछ इस ‘प्राइवेट’ मामले पर बात करना नहीं चाहतीं. यहां समाज में बांझपन से जुड़ा लांछन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. अधूरी जानकारी के चलते ऐसा समझ लिया जाता है कि अगर महिला को पीरियड्स से संबंधी कोई परेशानी है तो वो मां नहीं बन पाएंगी. यहां शर्म छोड़कर अपने शरीर के प्रति अन्याय न करते हुए आगे आने की जरूरत है.’

उचित जानकारी का अभाव भ्रांतियों को जन्म देता है और ऐसा समाज जहां पहले से ही मिथकों की कोई कमी न हो वहां भ्रांतियों की फसल खड़ी हो जाती है. इस मुद्दे पर महिलाओं से बात करने पर ये भी सामने आया कि कई जगहों पर टैम्पून या मेनस्ट्रुअल कप के उपयोग को कौमार्य से जोड़ कर देखा जाता है. ऐसा समझा जाता है कि टैम्पून का प्रयोग कौमार्य भंग कर देता है.

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घूम-फिरकर बात एक ही जगह आती है कि यदि स्त्री सशक्तिकरण पर इतनी बात हो रही है, महिला आरक्षण का मुद्दा हर बार सुर्खियां बन रहा है तो इतनी आधारभूत बात को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है? कैसे उन्हें किसी समय विशेष पर ‘अपवित्र’ माना जा सकता है? देश के कुछ हिस्सों में स्त्री को धरती के समान सृजन का पर्याय मानकर उसके पहले मासिक स्राव को उत्सव की तरह मनाया जाता है. जरूरत जागरूकता की है. इसे सिर्फ महिलाओं का मुद्दा मानना गलत है. बंगलुरु की सोशल एक्टिविस्ट सोनम का कहना है, ‘इस तरह के मिथक समाज से निकलने चाहिए. ये 16वीं सदी नहीं है. महिलाओं के शरीर से जुड़ी बातों को धर्म-समुदाय-राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. मुझे खुशी है कि ‘हैप्पी टू ब्लीड’ जैसी मुहिम इन मुद्दों को मुख्यधारा में ला रही है, इससे इन मुद्दों से जुड़ी शर्म और झिझक कम होगी.’

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