गूगल: सबका मालिक एक

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app_sphere_financeदिल्ली के मयूर विहार में रहने वाले राजेश कुमार के दिन की शुरुआत अपने स्मार्टफोन पर ताजा खबरें और ईमेल चेक करने के साथ होती है. करीब आधा घंटे यह काम करने और फिर सुबह की दूसरी कवायदों से फारिग होने के बाद वे दफ्तर रवाना होते हैं. इसके बाद सर्च इंजन, सोशल मीडिया, चैट या मेल जैसी सेवाओं के साथ पेशे से केबल ऑपरेटर कुमार के दिन का एक बड़ा हिस्सा लैपटॉप और स्मार्टफोन पर ही गुजरता है.

कुमार जैसे दो अरब से भी ज्यादा लोग हैं जिनकी जिंदगी इंटरनेट के बिना अधूरी है. वैज्ञानिक से लेकर रेहड़ी वाले तक हर तरह के लोगों से मिलकर बना यह आंकड़ा दुनिया की कुल आबादी का करीब एक तिहाई है. यह एक नया समाज है जिसकी बसाहट सूचना-तकनीक की जमीन पर हो रही है. मानव सभ्यता का इतिहास बताता है कि अलग-अलग दौर में हर समाज ने कुछ शक्तियों को अपना आधार मानते हुए उनकी आराधना की है. दुनिया की सबसे पुरानी कही जाने वाली वैदिक सभ्यता इंद्र, सूर्य या रुद्र नाम की शक्तियों को पूजती थी. पांच हजार साल पुराना वह समाज मानता था कि बारिश, धूप और आंधी-तूफान के इन देवताओं की कृपा के बिना उसकी खेतिहर व्यवस्था की गाड़ी नहीं चल सकती. आज इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले दसियों करोड़ लोगों के समाज के लिए भी एक शक्ति कुछ ऐसा ही दर्जा रखती है. उसका नाम है गूगल.

गूगल को ईश्वर का रूप कहना कइयों को अतिश्योक्ति लग सकता है, लेकिन ईश्वर की परिभाषा पर गौर करें तो उसके और गूगल के गुणधर्म काफी कुछ मिलते दिखते हैं. दरअसल मानव समाज में समय और जरूरतों के साथ ईश्वर के स्वरूप भले ही बदलते रहे हों, लेकिन उसकी परिभाषा कमोबेश एक ही रही है. उसे सबमें रहने, सबको देखने और सबको चलाने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है. दूसरे शब्दों में कहें तो एक ऐसी शक्ति के रूप में जिससे उस समाज में रहने वाले अपना हित और अहित जोड़कर देखते हैं. अपनी लगातार बढ़ती विराटता के साथ गूगल भी दो अरब से ज्यादा लोगों के लिए सुखकर्ता, दुखहर्ता और जगपालनकर्ता हो गया है. किसी भी तरह की राह तलाशते लोगों के लिए वह ईश्वर की तरह ज्ञान का सागर है जो उनके कंप्यूटर या स्मार्टफोन रूपी गागर में भरा हुआ है. उसके भक्तों ने तो उसकी एक ऑनलाइन इबादतगाह भी बना ली है जिसका नाम है दचर्चऑफगूगलडॉटओआरजी. इन भक्तों का मानना है कि गूगल को ईश्वर का दर्जा दे दिया जाना चाहिए क्योंकि एक तो उसमें वे बहुत-सी खूबियां हैं जिन्हें परंपरागत रूप से ईश्वर के साथ जोड़कर देखा जाता रहा है और दूसरी बात यह है कि उसके वजूद को वैज्ञानिक रूप से साबित भी किया जा सकता है.

वैसे 1998 में जब गूगल ने जन्म लिया था तो शायद ही किसी ने सोचा हो कि अगले 16 साल में ही वह इस दर्जे तक पहुंच जाएगा. उन दिनों नए-नए सुर्खियों में आए इंटरनेट जगत में याहूडॉटकॉम का बोलबाला था. याहू या अमेरिका ऑनलाइन जैसी चर्चित वेबसाइटें मुख्य तौर पर कांटेंट यानी खबरों और जानकारियों पर केंद्रित थीं. गूगल ने दूसरा तरीका अपनाया. वह इन जानकारियों तक जाने का जरिया बन गया. अब इंटरनेट पर किसी व्यक्ति का पहला कदम वह था. किसी को भी ढेरों बुकमार्क जमा करने या बार-बार अलग-अलग साइटों का नाम टाइप करने की जरूरत नहीं थी. सब कुछ एक ही जगह मौजूद था जिस तक पहुंचना बस एक क्लिक का खेल था. इंटरनेट के अपार विस्तार के साथ गूगल की ताकत भी असाधारण रूप से बढ़ती चली गई.

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राज के रास्ते

सूचना

अपनी शुरुआत से ही गूगल सर्च यानी जानकारियों की खोज का बादशाह रहा है. पर्सनल कंप्यूटर से मोबाइल डिवाइसेज की तरफ झुकती दुनिया ने उसकी ताकत और भी बढ़ाई है क्योंकि एंड्रॉयड के रूप में उसके पास इस बाजार के 80 फीसदी हिस्से पर काबिज सिपहसलार है. इसका सीधा मतलब यह है कि दुनिया में जानकारियों के बहाव पर गूगल का कब्जा है. किसी जानकारी की तलाश में जब आप सर्च, मैप्स, या यू ट्यूब जैसी सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे होते हैं तो एक हद तक गूगल को अपनी जिंदगी का नियंत्रण भी सौंप रहे होते हैं

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आज करीब 400 अरब डॉलर (लगभग 24 लाख करोड़ रुपये) का महाआकार ले चुका गूगल सर्वव्यापी है. डेस्कटॉप से लेकर लैपटॉप, फोन, फ्रिज या वाशिंग मशीन तक उसकी मौजूदगी हर जगह दिखती है. आंकड़े बताते हैं कि मोबाइल ऑपरेटिंग सॉफ्टवेयर बाजार में उसका एंड्रॉयड सबसे बड़ा खिलाड़ी है. इंटरनेशनल डेटा कॉरपोरेशन (आईडीसी) की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक एंड्रॉयड का इस बाजार के लगभग 80 फीसदी हिस्से पर कब्जा हो गया है. इसी तरह गूगल मैप्स, जीमेल, क्रोम, यूट्यूब जैसी उसकी दूसरी कई सेवाओं का भी अपनी-अपनी जगह मजबूत दबदबा है. खोज यानी सर्च का तो गूगल पर्याय बन चुका है. आज गूगल पर हर दिन 3.5 अरब यानी हर सेकेंड करीब 40 हजार सर्च होती हैं. इसीलिए गूगल करना हमारी शब्दावली का हिस्सा हो गया है. कुल मिलाकर कहें तो स्मार्टफोन और कंप्यूटर की मदद से दौड़ती जिंदगी एक बड़ी हद तक गूगल भगवान के भरोसे ही चल रही है. सर्च, जीमेल, यूट्यूब, गूगल मैप्स, एंड्रॉयड, क्रोम, हैंगआउट्स और दूसरी दर्जनों सेवाओं से मिलकर बनी उसकी दुनिया से दसियों करोड़ लोगों का रोज कई घंटे वास्ता पड़ता है. वह इस दुनिया का ईश्वर है.

‘हम जानते हैं कि आप कौन हैं, क्या करते हैं, आपके शौक क्या हैं, आप इस समय कहां हैं, हम यह भी अंदाजा लगा सकते हैं कि आप इस समय क्या सोच रहे हैं. हमारे पास आपके हर सवाल का जवाब है’, कई मौकों पर गूगल के कार्यकारी चेयरमैन एरिक श्मिट जब यह कहते हैं तो उनकी बात गलत नहीं होती. दरअसल हमारा गूगल से जुड़ाव और गूगल का हमारी जिंदगी में दखल इस हद तक हो चुका है कि वह न सिर्फ हमें अच्छी तरह जानने-पहचानने लगा है बल्कि हमारी जिंदगी को निर्देशित भी करने लगा है. आप जीपीएस के सहारे कोई सफर तय कर रहे हों या सर्च पर जानकारियों का पहाड़ खंगालने के बाद कोई चीज खरीद रहे हों, आप इस देवता की उंगली पकड़कर ही चल रहे हैं. इसलिए कहने वाले यहां तक कह देते हैं कि गूगल आपके बारे में आपकी मां या पत्नी से भी ज्यादा जानता है. श्मिट के मुताबिक गूगल का लक्ष्य है कि कुछ साल बाद वह आपको यह बताने की स्थिति में हो कि आपको फलां छुट्टी के दिन क्या करना चाहिए या कौन सी नौकरी आपके लिए सबसे मुफीद रहेगी.

यानी अभी तो सिर्फ झलक है. एक हालिया साक्षात्कार में गूगल के इंजीनियरिंग डायरेक्टर स्कॉट हफमैन कहते हैं कि भविष्य में तकनीक के साथ हमारा संवाद उतना ही सहज होगा जितनी हमारी आपसी बातचीत. उनके मुताबिक कुछ ही साल बाद सर्च बॉक्स में की वर्ड टाइप करना बहुत पुरानी बात हो जाएगी. यानी किसी जवाब के लिए स्क्रीन और कीबोर्ड की जरूरत खत्म हो चुकी होगी. हफमैन कहते हैं, ‘हमारे घर की छत या दीवारों में माइक्रोफोन और स्पीकर लगे होंगे. हम सवाल पूछेंगे और मशीन हमें जवाब देगी.’ हमारे और दुनिया के बारे में सारी जानकारियों से लैस मशीनों का एक नेटवर्क – जो गूगल की ही एंड्रॉयड या किसी और तकनीक की मदद से आपस में जुड़ा होगा- हमारे शरीर और दिमाग की कवायद काफी कम कर देगा.

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आंकड़े बताते हैं कि पिछले 13 साल में गूगल ने कुल मिलाकर 161 कंपनियों का अधिग्रहण किया है. इनमें ई कॉमर्स, स्वास्थ्य या रोबोटिक्स जैसे बिल्कुल अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही कंपनियां शामिल हैं. इस असाधारण आंकड़े का औसत निकालें तो पता चलता है कि गूगल हर महीने एक कंपनी खरीद रहा है. बीते दो साल के दौरान तो उसने अधिग्रहण की इस कवायद पर 17 अरब डॉलर से भी ज्यादा की रकम खर्च की. 2013 के आखिर में गूगल ने रोबोटिक्स के क्षेत्र में सक्रिय दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में से आठ खरीद लीं. इनमें बोस्टन डायनेमिक्स भी शामिल है जिसने चीता, एटलस और बिग डॉग नाम के चर्चित रोबोट बनाए हैं. यह कंपनी अमेरिकी सेना से लेकर सोनी कॉरपोरेशन तक कई बड़ी संस्थाओं के लिए काम कर रही है. इसके तुरंत बाद गूगल ने 40 करोड़ डॉलर में डीपमाइंड टेक्नॉलॉजीज नाम की एक ब्रिटिश कंपनी का अधिग्रहण किया जो कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के क्षेत्र में सक्रिय है. 2014 की ही शुरुआत में उसने 3.2 अरब डॉलर देकर होम ऑटोमेशन के क्षेत्र में सक्रिय नेस्ट लैब्स को भी खरीदा. इसी साल जुलाई तक गूगल 20 कंपनियों का अधिग्रहण कर चुका है.

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स्रोत

सर्च इंजन अगर रास्ता है तो साफ्टवेयर और हार्डवेयर गाड़ी. यानी जानकारियों तक पहुंच के लिए माध्यम भी चाहिए. एंड्रॉयड और गूगल ग्लास ने गूगल को सूचना के इन्हीं स्रोतों पर भी नियंत्रण दिया है. स्मार्टफोनों की बहुतायत के चलते किसी भी कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला ऑपरेटिंग सिस्टम अब विंडोज नहीं बल्कि एंड्रॉयड है. उधर, गूगल ग्लास का मतलब यह है कि कंप्यूटर अब आपने अपनी आंखों पर ही पहना हुआ है. जाहिर-सी बात है कि जल्द ही दुनिया गूगल की आंखों से दुनिया देखेगी.

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पहली नजर में यह सोचकर हैरानी हो सकती है कि आखिर गूगल अपने परंपरागत काम यानी इंटरनेट की बजाय स्वास्थ्य विज्ञान, रोबोटिक्स या अपने आप चलने वाली कार जैसी परियोजनाओं पर क्यों दांव लगा रहा है. जानकारों के मुताबिक इसके कई कारण हैं. पहला तो यही कि वह अपनी सेवाओं को सर्च के इतर भी फैलाना चाहता है. गौरतलब है कि अभी गूगल के कारोबार (2013 में यह करीब 58 अरब डॉलर था) का 90 फीसदी से भी ज्यादा हिस्सा गूगल सर्च से आता है. कारोबार के नियम कहते हैं कि एक प्रोडक्ट पर इतनी ज्यादा निर्भरता ठीक नहीं होती. इसलिए गूगल ऑफलाइन कारोबार के जरिये कमाई के नये रास्ते निकालना चाहता है. दांव पर लगाने के लिए उसके पास अकूत रकम भी है. रिपोर्टों के मुताबिक गूगल के पास करीब 60 अरब डॉलर(तीन लाख साठ हजार करोड़ रुपये) का रिजर्व कैश है. इसलिए वह जिस कंपनी में भविष्य की संभावना देख रहा है, उसे कोई भी कीमत चुकाकर खरीद ले रहा है.

एक हालिया लेख में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया के प्रोफेसर और अधिग्रहण जैसी कारोबारी कवायदों के विशेषज्ञ जॉर्ज गाइस कहते हैं, ‘गूगल की यह दौड़ सिर्फ ब्रांडों का पोर्टफोलियो बढ़ाने के लिए नहीं है. वह चाहता है कि उसके पास डेवलपरों, डिजाइनरों, वैज्ञानिकों या ऐसी ही दूसरी प्रतिभाओं का विशाल भंडार हो.’  उदाहरण के लिए नेस्ट लैब्स स्मार्टफोन से भी चलने वाले थर्मोस्टेट और स्मोक अलार्म डिटेक्टर बनाती है. इसके अधिग्रहण के साथ गूगल की झोली में इन दोनों उत्पादों के अलावा टोनी फेडल जैसी प्रतिभा भी आई.  नेस्ट के सहसंस्थापक फेडल को एप्पल के मशहूर आइपॉड और आइफोन के पीछे का दिमाग माना जाता है. वे उस टीम के मुखिया रहे हैं जिसने आइपॉड के 18 और आइफोन के तीन संस्करण जमीन पर उतारे. अपने-अपने क्षेत्रों में फेडल जैसी ही विशेषज्ञता रखने वाली कई प्रतिभाओं को गूगल ने यह जिम्मा सौंपा है कि वे आपका शारीरिक और मानसिक बोझ कम से कम कर दें.

इस जानकारी के बाद गूगल की अटपटी अधिग्रहण कवायद का मतलब समझ में आने लगता है. होम ऑटोमेशन, रोबोटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की तीनों कड़ियां जुड़ने पर एक दिलचस्प तस्वीर उभरती है. कल्पना करें कि आप अपनी बैठक में टीवी देख रहे हैं. शाम का उजाला धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है और आपको लगता है कि बरामदे की लाइट जला लेनी चाहिए. अब न तो आपको उठ कर स्विच तक जाने की जरूरत है और न ही किसी और को हांक लगाने की. आप कहेंगे कि बरामदे की लाइट जला दो, और लाइट जल जाएगी. पंखे की रफ्तार कम करने के लिए आपको रेगुलेटर तक जाने की जरूरत नहीं है. बोलकर ही काम हो जाएगा. आप कहेंगे कि मैं कौन बनेगा करोड़पति सीजन-2 का आठवां एपीसोड देखना चाहता हूं और टीवी आपके हुक्म की तामील कर देगा. आप कहेंगे कि सबसे अच्छा डोसा कहां मिलता है, वहां चलते हैं और जब तक आप तैयार होकर गूगलकार में बैठेंगे आपका जीपीएस उस रेस्टोरेंट का रास्ता पता लगाकर कार को उस पर चलाने के लिए तैयार हो चुका होगा. आप सुबह उठेंगे और आपकी जरूरतों के लिए डिजाइन किया गया रोबोट जिसे गूगलबोट भी कहा जाएगा, आपके लिए चाय लेकर हाजिर होगा. किसी नई जगह पर आप अकेला महसूस कर रहे हैं तो गूगल ग्लास पहन लीजिए. इसमें लगी स्क्रीन एक ही नजर में सामने बैठे किसी व्यक्ति को स्कैन करके यह बता देगी कि उसका नाम क्या है और उसके शौक आपसे मिलते हैं या नहीं.

और यह सब किसी सुदूर भविष्य की बात नहीं है. हफमैन कहते हैं कि तकनीक की लगातार घटती लागत के चलते जल्द ही माइक्रोचिप और सेंसर सर्वसुलभ और सर्वव्यापी होंगे. इसके बाद आपकी आवाज को पहचानने वाली मशीनों का एक पूरा नेटवर्क आपके पर्सनल असिस्टेंट की तरह काम करेगा. कल अगर आपकी कोई फ्लाइट है और आपको उसके समय को लेकर दुविधा हो रही है तो जेब से फोन निकालने की भी जरूरत नहीं. आपको बस इतना कहना है कि मेरी फ्लाइट कब है और आपको जवाब मिल जाएगा. एक साक्षात्कार में हफमैन कहते हैं, ‘फ्लाइट आज ही हो और आप किसी काम में तल्लीन हों तो किसी निजी सहायक की तरह हमारा सिस्टम आपको बार-बार याद दिलाएगा कि आपको अब बगैर देर किए एयरपोर्ट के लिए निकल लेना चाहिए.’  हफमैन की ही अगुवाई में गूगल पूरे जोर-शोर से इस पेचीदा काम में लगा है कि ये मशीनें हमारी रोजमर्रा की भाषा को समझने के काबिल हो जाएं.

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आवागमन

सिर्फ अमेरिका में ही सालाना करीब 5.5 अरब घंटे अलग-अलग वजहों से पैदा होने वाले ट्रैफिक जाम की भेंट चढ़ जाते हैं. प्रति व्यक्ति के हिसाब से यह बर्बादी हर साल 18 घंटे की होती है. इसके अलावा अमेरिका में हर व्यक्ति सालाना 100 से भी ज्यादा घंटे कार से इधर-उधर जाने में खर्च करता है. गूगल चाहता है कि लोग इस समय को उसकी सेवाओं पर खर्च करें. इसके अलावा अपने आप चलने वाली गूगल की कारें समय और ईंधन तो बचाएंगी ही, उनके चलते दुर्घटनाएं घटने से जान-माल के नुकसान में भी कमी आएगी.

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इसका मतलब यह है कि अभी हमारी दुनिया पर गूगल का जो असर है वह सिर्फ एक झलक है. आज इंटरनेट कंप्यूटरों का नेटवर्क है, लेकिन भविष्य में यह टीवी, फ्रिज, कार, रोबोट और ऐसी तमाम दूसरी मशीनों से मिलकर बना नेटवर्क होगा जिसकी विराटता और ताकत आज से कहीं ज्यादा होगी. एंड्रॉयड टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन या वैक्यूम क्लीनर अभी आम भले ही न हों, लेकिन आ चुके हैं. आप कहीं भी हों, इन्हें अपनी मर्जी से नियंत्रित कर सकते हैं.

जानकार मानते हैं कि इस सुविधा का फायदा हमसे कहीं ज्यादा गूगल को होगा और यह दोहरा होगा. एक तरफ उसके पास कंप्यूटर या फोन से इतर दूसरे स्रोतों से भी सूचनाएं आएंगी. दूसरी तरफ इन सूचनाओं से कमाई करने के लिए उसके पास मोबाइल और लैपटॉप के अलावा आपके टीवी, फ्रिज और दूसरे कई ऐसे ही माध्यम और होंगे. आज गूगल के कारोबार का ज्यादातर हिस्सा इंटरनेट पर सर्च के बूते आता है. लेकिन भविष्य में आपका एंड्रॉयड फ्रिज उसे यह बताएगा कि आप किस ब्रांड का जूस पसंद करते हैं. एंड्रॉयड टीवी के जरिये उसे यह पता लग जाएगा कि आप किस समय अपने टीवी पर क्या देखते हैं. इसके बाद वह अलग-अलग कारोबारियों को आपके खाने-पीने और मनोरंजन की आदतों के बारे में बताएगा. वह यह भी बताएगा कि आपको किस वक्त किस चीज की जरूरत है और आप तक किस चैनल के माध्यम से कब और कौन से विज्ञापन पहुंचाए जाने चाहिए. इसी तरह ड्राइवर विहीन कार बनाने में उसकी दिलचस्पी इसलिए भी है कि कार अपने आप चलती रहे, आप गूगल की सर्च या किसी और सेवा के साथ व्यस्त रहें और गूगल को आपकी पल-पल की खबर मिलती रहे.

इस तरह से देखें तो आखिर में गूगल की हर नई कवायद का मकसद वही है जो उसका पिछले 16 साल के दौरान रहा है–हमारे बारे में ज्यादा से ज्यादा सूचनाएं जुटाना और उनके बल पर अपना बल बढ़ाना.

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Chick to Lagra

जिस रफ्तार से गूगल बढ़ा है उसे कायम रखने के लिए यह भी जरूरी है कि वह दुनिया की बाकी दो तिहाई आबादी तक भी तेजी से पहुंचे. इसके लिए सबसे पहले तो उसे उस आबादी तक इंटरनेट पहुंचाने की जरूरत होगी. इसका इंतजाम भी वह कर रहा है. गूगल लून प्रोजेक्ट के तहत उसकी ऐसे गुब्बारे छोड़ने की योजना है जो दुर्गम से दुर्गम इलाकों में भी इंटरनेट उपलब्ध कराएंगे. धरती से 20 किलोमीटर ऊपर रहने वाले इन गुब्बारों में लगे उपकरण करीब 1250 वर्ग किलोमीटर इलाके में इंटरनेट की सुविधा पहुंचाएंगे. इसके सफल प्रयोग के तौर पर बीते साल न्यूजीलैंड में हीलियम भरे गुब्बारों की मदद से 50 घरों को इंटरनेट से जोड़ा भी जा चुका है. करीब 50 मीटर व्यास के इन गुब्बारों में सोलर पैनल लगा होता है जिससे मिलने वाली ऊर्जा से इनके उपकरण चलते हैं. यानी आज भले ही इंटरनेट विशेषाधिकार लगता हो, लेकिन भविष्य में यह बुनियादी सुविधा हो जाएगी. दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी जिंदगी आज की तुलना में कहीं ज्यादा गूगल पर निर्भर हो जाएगी.

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सेवा

अब गूगल की हो चुकी बोस्टन डायनेमिक्स को रोबोटिक्स के क्षेत्र में अपने असाधारण काम के लिए जाना जाता है. इस कंपनी ने अमेरिकी सेना के लिए बिग डॉग जैसा रोबोट बनाया है जो 150 किलो तक वजन लादकर किसी खच्चर की तरह उन रास्तों पर भी चल सकता है जिन पर पहियों वाला कोई वाहन नहीं चल सकता. इसी तरह एटलस जैसे उसके रोबोटों के बारे में माना जा रहा है कि भविष्य में वे खाना बनाने या घर की सफाई करने जैसे तमाम काम करेंगे. यानी ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों ठिकानों पर गूगल का पूरा राज होगा.

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लेकिन हर देवता की तरह गूगल की कहानी में भी एक तरफ स्तुतियां हैं तो दूसरी तरफ आलोचनाएं भी हैं. एक बड़े वर्ग की शिकायत है कि गूगल हमारी याद्दाश्त खा रहा है. कई अध्ययन भी बता रहे हैं कि लोग गूगल को अपने मेमोरी बैंक की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. उनके लिए पहले से कुछ जानना जरूरी नहीं है. उन्हें पता है कि की बोर्ड पर टाइप करना है और सारी जानकारी हाजिर हो जाएगी. और यह सिर्फ स्मृति की बात नहीं है. ज्ञान की यह सर्वसुलभता एक सीमा के बाद ज्ञान के लिए ही घातक हुई जा रही है. जैसा कि अपने एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन कहते हैं, ‘चूंकि पहले से कुछ भी जानना जरूरी नहीं रह गया है, इसलिए सोचना और विचार करना, उद्वेलित होना और प्रश्न खड़े करना भी छूट गया है. अब बने-बनाए प्रश्न हैं जिनके बने-बनाए उत्तर हैं.’

हवाई जहाज और कार जैसे आविष्कार जब हुए थे तो कहा गया था कि इनके इस्तेमाल से बचने वाला समय मनुष्य अपने आप को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करने में लगाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इन साधनों का उपयोग करने वाले वर्ग के पास समय की और भी कमी रहने लगी. ज्ञानरूपी महासागर की सर्वसुलभता को लेकर भी इस तरह की आशंका जताई जा रही है.

हालांकि दूसरा वर्ग ऐसी आशंकाओं को खारिज करता है. उसका मानना है कि तकनीक पर निर्भरता से पनप रहे इस तरह के डर निर्मूल हैं. इस वर्ग के लोग मानते हैं कि ऐसा ही डर तब भी जताया गया होगा जब भाषा लिखी जाने लगी. उससे पहले तक ज्ञान का विस्तार मौखिक रूप से ही हो रहा था तो कहा गया होगा कि लिखकर सुरक्षित कर लेने से याद रखने की जरूरत खत्म हो जाएगी और इस तरह सोचना और विचारना भी कम हो जाएगा. प्रिटिंग प्रेस के अविष्कार के बाद तो यह तर्क और भी बढ़ाचढाकर दिया गया होगा. लेकिन इसके बाद भी ज्ञान की नई-नई शाखाएं सिरजती प्रतिभाएं दुनिया का नक्शा बदलती रहीं.

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गूगल का हमारे दिमाग पर क्या असर हो रहा है, इसे लेकर कोलंबिया विश्वविद्यालय ने कुछ समय पहले एक अध्ययन किया था. यह दूसरे वर्ग की बात का समर्थन करता दिखता है. इस अध्ययन का निष्कर्ष यह निकला कि दिमाग जरूरत के हिसाब से अनुकूलन कर लेता है. यानी गूगल इस्तेमाल करने वालों का दिमाग जानकारी की बजाय यह याद रखने लगता है कि उस जानकारी तक पहुंचना कैसे है औ उसे इस्तेमाल कैसे करना है. अध्ययनकर्ताओं को यह भी पता चला कि जो जानकारी गूगल पर उपलब्ध नहीं है, दिमाग द्वारा उसे याद रखने की संभावना भी ज्यादा है.

लेकिन सूचना की इस सुलभता से पैदा होने वाले सवाल यहीं खत्म नहीं होते. कहा जा रहा है कि गूगल-इफेक्ट की जद में आए लोगों में आपसी संवाद और भरोसा कम हो रहा है. वे अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और यहां तक कि डॉक्टर से भी ज्यादा भरोसा गूगल से मिलने वाली जानकारियों पर कर रहे हैं. जैसा कि कुछ समय पहले अखबार द हिंदू में प्रकाशित अपने एक लेख में डॉ टी रामाप्रसाद बताते हैं. तमिलनाडु के इरोड जिले में प्रैक्टिस करने वाले डॉ रामाप्रसाद के पास एक मरीज आया. उसे कुछ समय से बुखार और खांसी की शिकायत थी. चेकअप और कुछ परीक्षणों के बाद डॉक्टर ने उसे बताया कि उसे फेफड़ों की टीबी है. इसके बाद उन्होंने उसे कुछ दवाइयां दे दीं. लेकिन उस मरीज ने दवाइयां नहीं लीं. एक हफ्ते बाद वह डॉक्टर के पास वापस आया. इस दौरान उसने गूगल की मदद से फेफड़ों की टीबी पर काफी रिसर्च कर ली थी. उसने डॉक्टर से कहा कि उन्हें टीबी की पुष्टि के लिए और भी टेस्ट करने चाहिए. डॉक्टर रामाप्रसाद के मुताबिक उन्होंने मरीज को काफी समझाया कि उनका अनुभव उन्हें बता रहा है कि उसे टीबी ही है और जिन परीक्षणों की वह बात कर रहा है उन्हें हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गैरजरूरी बताया है. लेकिन वह मानने को तैयार नहीं था. इस चक्कर में कई दिन और निकल गए. इस दौरान उसकी हालत बिगड़ती चली गई और आखिर में उसे आईसीयू में भर्ती होना पड़ा.

गूगल की इस विराटता को लेकर और भी कई विवाद हैं. गूगल ग्लास को ही लें. चश्मे की तरह पहनी जाने वाली इस डिवाइस का प्रायोगिक इस्तेमाल शुरू हो गया है. स्मार्टफोन अगर कंप्यूटर को आपकी जेब में ले आया था तो गूगल ग्लास उसे आपके चश्मे में ले आया है. इसकी स्क्रीन आपको दायीं आंख के सामने दिखती रहेगी. आपके हुक्म की तामील यह आपकी आवाज सुनकर यानी वॉयस कंट्रोल के जरिये करेगी. अब आप सर्च करें, फोटो खींचें, वीडियो बनाएं या फिर उन्हें पोस्ट करें, बस बोलने की देर है. यानी दुनिया हर दम आपकी नजर में है.

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स्वास्थ्य

2013 में गूगल ने कैलिको नाम की कंपनी खोलने की घोषणा की. गूगल के सहसंस्थापक लैरी पेज ने कहा कि इसका मकसद यह पता लगाना है कि बुढ़ापे को जितना हो सके टालकर व्यक्ति को दीर्घायु कैसे बनाया जा सकता है. गूगल के लिए यह कवायद कितनी अहमियत रखती है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कैलिको का मुखिया एप्पल के चेयरमैन ऑर्थर लेविंसन को बनाया गया. ज्ञान, आवागमन, सेवा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में गूगल की तैयारी बता देती है कि दुनिया पर उसका कब्जा लगातार बढ़ने वाला है.

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googlerobotदिक्कत यही है. जानकारों के मुताबिक हर समय इंटरनेट की सुलभता ने पहले ही अटेंशन डेफिसिट सिंड्रोम यानी एकाग्रता की कमी जैसी समस्या पैदा कर दी है. गूगल ग्लास इसमें बढ़ोतरी ही करेगा. आप गूगल ग्लास पहने किसी व्यक्ति से बात कर रहे हों तो आपके लिए अंदाजा लगाना मुश्किल होगा कि उसका ध्यान पूरी तरह से आपकी बात पर है भी या नहीं. हो सकता है कि वह आपकी बात पर सिर हिला रहा हो और ध्यान फेसबुक पर लगाए हुए हो.

मुश्किल यही नहीं है. एक वर्ग है जिसका मानना है कि गूगल ग्लास के बाद निजता यानी प्राइवेसी में दखल की समस्या कई गुना बढ़ जाएगी क्योंकि आपको पता ही नहीं चलेगा कि आपकी फोटो ली जा रही है या आपका वीडियो रिकॉर्ड हो रहा है. हालांकि कई लोगों का मानना है कि गूगल ग्लास के आम होने के बाद कई जगहों पर इसे प्रतिबंधित भी किया जा सकता है, जैसे मोबाइल और कैमरे के मामले में होता है. लेकिन तब क्या होगा जब यह नजर के चश्मे का भी काम कर रहा हो?

सवाल डेटा के इस्तेमाल का भी है. माना जाता है कि सर्च, क्रोम, जीमेल, यूट्यूब, पिकासा और ऐसी तमाम सेवाओं के चलते गूगल के पास व्यक्तिगत जानकारियों का सबसे बड़ा भंडार है जिसका इस्तेमाल वह अपने कारोबार में करता है. लेकिन ऐसा वह कैसे करता है यह साफ नहीं है. यह डेटा गलत हाथ में न जाए, इसे लेकर उसकी नीति भी ठीक से स्पष्ट नहीं है.

ऐसे लोगों को गूगल का जवाब होता है कि वह यूजर की इजाजत के बिना न तो उससे जुड़ी व्यक्तिगत जानकारी इकट्ठा करता है और न ही उसे बेचता है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि गूगल की अलग-अलग सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले लोग इस्तेमाल के वक्त नियम-कायदों के एक बड़े पहाड़ के आखिर में आने वाले ‘आई एग्री’ नाम के ऑइकन को बिना ज्यादा दिमाग लगाए क्लिक कर देते हैं. वैसे भी व्यक्तिगत जानकारी एक ऐसी चीज है जिसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा अभी तक नहीं बन पाई है.

तो ऐसे कई सवाल हैं जिनका ठीक-ठीक जवाब भविष्य ही दे सकता है. संभावित जवाब जानना चाहें तो आप बेशक गूगल सर्च कर सकते हैं.

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