गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ : सीधे-सादे और जटिल

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भोपाल के हमीदिया अस्पताल में मुक्तिबोध जब मौत से जूझ रहे थे, तब उस छटपटाहट को देखकर मोहम्मद अली ताज ने कहा था–

उम्र भर जी के भी न जीने का अन्दाज आया,
जिन्दगी छोड़ दे पीछा मेरा मैं बाज आया.

जो मुक्तिबोध को निकट से देखते रहे हैं, जानते हैं कि दुनियावी अर्थों में उन्हें जीने का अन्दाज कभी नहीं आया. वरना यहां ऐसे उनके समकालीन खड़े हैं, जो प्रगतिवादी आन्दोलन के कन्धे पर चढ़कर ‘नया पथ’ में फ्रन्ट पेजित भी होते थे, फिर पण्डित द्वारकाप्रसाद मिश्र की कृष्णयान का धूप-दीप के साथ पाठ करके फूलने लगे और अब जनसंघ की राजमाता की जय बोलकर फल रहे हैं. इसे मानना चाहिए कि पुराने प्रगतिवादी आन्दोलन ने भी मुक्तिबोध का प्राप्य नहीं दिया. बहुतों को दिया. कारण, जैसी स्थूल रचना की अपेक्षा उस समय की जाती थी, वैसी मुक्तिबोध करते नहीं थे. न उनकी रचना में कहीं सुर्ख परचम था, न प्रेमिका को प्रेमी लाल रूमाल देता था, न वे उसे लाल चूनर पहनाते थे. वे गहरे अंतर्द्वंद्व और तीव्र सामाजिक अनुभूति के कवि थे. मजे की बात है कि जो निराला की सूक्ष्मता को पकड़ लेते थे, वे भी मुक्तिबोध की सूक्ष्मता को नहीं पकड़ते थे.

दूसरी तरफ के लोग उनके पीछे विच हण्ट लगाए थे. उनके ऊबड़-खाबड़पन से अभिजात्य को मतली आती थी. वे उनके दूसरे खेमे में होने की बात को इस तरह से कहते थे, जैसे- अ गुड मैन फालेन अमंग फेबियंस.

वे गहरे अंतर्द्वंद्व और तीव्र सामाजिक अनुभूति के कवि थे. मजे की बात है कि जो निराला की सूक्ष्मता को पकड़ लेते थे, वे भी मुक्तिबोध की सूक्ष्मता को नहीं पकड़ते थे

ऐसा भी नहीं है कि मुक्तिबोध को समझने वाले लोग नहीं थे. पर निष्क्रिय ईमानदार और सक्रिय बेईमान मिलकर एक षडयंत्र-सा बना लेते हैं. मजे की बात यह है कि प्रगतिवादी सत्ता प्रतिष्ठान के नेता भी, जिन्हें प्रतिक्रियावादी कहते थे, उन्हीं की चिरौरी करके उन्हें अपने बीच सम्मान से बिठाकर रिस्पैक्टेबिलिटी प्राप्त करते थे, मगर जो अपना था उसे अवहेलित करते थे. वह तो अपना है ही, उसकी नियति तय है, वह कम्बख्त कहां जाएगा? पूर्वी यूरोप से साहित्य के आयात-निर्यात की जो फर्म है, उसके माल की लिस्ट में भी मुक्तिबोध की एक लाइन नहीं थी. हां, उन्हें बराबर भेजा जाता था, जिन्हें घर में फासिस्ट कहा जाता रहा है.

मुझे याद है, जब हम उन्हें भोपाल के अस्पताल में ले गए और मुख्यमंत्री की दिलचस्पी के कारण थोड़ा हल्ला हो गया, पत्रकार मित्रों ने प्रचार किया, तब कुछ लोग, जो साहित्य की राजधानियों के थे या वहां से बढ़कर आए थे, यह कहते थे कि हम प्रान्तीयता से ग्रस्त लोग उसे हीरो बना रहे हैं. हम लोग प्राविंशियल संस्कार के लोग कहलाते थे. प्रोफेसरान और ऊंचे लेखक उन्हें देखने शुरू-शुरू में इसलिए नहीं आते थे कि कहीं प्रयाग, दिल्ली और कलकत्ता में बदनामी न फैल जाए कि हम प्राविंशियल में दिलचस्पी ले रहे हैं. प्रयाग और दिल्लीवालों ने जब गेटपास दे दिया और अदीब ने टाइम्स ऑफ इण्डिया में अंग्रेजी में तारीफ कर दी, तब इनका दिलचस्पी लेने का साहस बढ़ा. बाद में तो लेख के शुरू में मुक्तिबोध की पंक्तियां मंगलाचरण के रूप में लिखने लगे- वन्दौ वाणी विनायकौ होने लगा. उनकी मृत्यु के बाद फूल बांटने की झपटा-झपटी में कबीर की चादर की बड़ी फजीहत हुई.

यह सब-बाई दी वे. मुझसे तो नामवरजी ने कुछ संस्मरणात्मक लिखने को कहा है. संस्मरणात्मक कुछ भी लिखने में अपने को बीच में डालना पड़ता है. संस्मरणात्मक की यह मजबूरी है. यह सावधानी बरतते हुए कि उनके बहाने अपने को प्रोजेक्ट न कर दूं, कुछ चीजें लिखता हूं… गो सफल संस्मरण का वही गुण है, जिससे मैं बचना चाहता हूं.

जबलपुर में जिस स्कूल में मुक्तिबोध ने नौकरी की थी, उसी में बाद में मैंने की. अपनी मुदर्रिसी का वह आखिरी दौर था, उनकी मास्टरी उसी अहाते में खत्म हुई थी. पुराने अध्यापक उनकी बात करते थे. साहित्य में, बल्कि पत्रकारिता में मेरा प्रवेश तब हो चुका था. सुनता था, यहां तारसप्तक वाले मुक्तिबोध रहते थे. उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की. फिर वे नागपुर प्रकाशन विभाग में चले गए. तब मुक्तिबोध की नई जवानी थी. छरहरे खूबसूरत आदमी थे. तब का उनका एक चित्र है, जो राष्ट्रवाणी के मुक्तिबोध अंक में छपा है. बड़ी-बड़ी गहरी भावुक आँखें हैं. नाक बहुत सेन्सुअस है. शरीर सूख जाने पर भी मुक्तिबोध की आंखें धुंधली नहीं हुईं, सूखा चेहरा भी खूबसूरत रहा.

मैं कुछ लिखने लगा था. वे देखते रहते थे. मित्रों ने भी बताया होगा. मैं नागपुर शिक्षक सम्मेलन के सिलसिले में गया था. एक मित्र उनसे मिलाने शुक्रवारा स्थित शायद उनके मकान पर ले गए. सच, कहूं, मुझे मुक्तिबोध से डर लगता था. मित्रों, प्रशंसकों में वे महागुरु कहलाते थे. एक आतंक मेरे ऊपर था. मैं अपने अज्ञान में सिकुड़ा-सिकुड़ा पहुंचा. वे दरी पर पालथी मारे बैठे थे. पास पानी का लोटा और उस पर प्याला. हम लोग दरी पर बैठ गए. मुझसे बोले, आइए साहब! निहायत औपचारिक दो-चार मामूली बातें हुईं. यह जानकर कि मैं शिक्षकों के श्रम-संगठन के काम से आया हूं, उन्होंने आंखें फाड़कर गौर से देखा. मुझसे न लिखने की बात की, न कोई तारीफ. चाय जरूर पिलाई. आगन्तुक के बहाने खुद चाय पीने का मौका वो चूकते नहीं थे. यह मुलाकात बहुत सुखी रही. मुक्तिबोध मुझे शंका से देख रहे थे. जांच रहे थे. वे एकदम गले किसी से नहीं मिलते थे. प्रकृति से वे शंकालु थे. किसी को जैसा-तैसा स्वीकार नहीं करते थे. बाद के अनुभव और अकेलेपन ने यह शंका की प्रवृत्ति और बढ़ा दी थी. राजनांदगांव में वे कई लोगों की कल्पना में न जाने कैसी-कैसी तस्वीरें बनकर परेशान हुआ करते थे.

दिल्ली, कलकत्ता, प्रयाग के बहुत-से लोगों की इतनी अतिरंजित तस्वीर वे बनाते थे कि लगता ये सब विकट शैतान हैं, जबकि वे अपने काम में लगे तटस्थ लोग थे. शंका व असुरक्षा की भावना इतनी तीव्र हो उठी थी, बाद में, कि वह भयावह कल्पना करते रहते थे कि अमुक-अमुक लोग मेरे खिलाफ षडयंत्र कर रहे हैं, जबकि उन्हें अपना भला करने से ही इतनी फुरसत नहीं मिलती थी कि उनका बुरा करें. उनके मित्रों को यह नहीं मालूम था कि मुक्तिबोध भयंकर शैतान के रूप में उनकी कल्पना कर चुके हैं. सामान्य आदमी का वे एकदम भरोसा करते थे, लेकिन राजनीति और साहित्य के क्षेत्र के आदमी के प्रति शंकालु रहते थे. कोई महज ही उनके समीप होना चाहता था या उनकी मदद करना चाहता, तो सशंकित हो जाते. कहते, ‘पार्टनर, इसका इरादा क्या है?’ ज्यों-ज्यों उनकी मुसीबतें बढ़ती गईं, ज्यादा कड़वे अनुभव होते गए, उनके कई विश्वसनीयों का चारित्रिक पतन होता गया, उनकी शंका बढ़ती गई. वे अपने को असुरक्षित अनुभव करते गए. अंत के एक-दो साल तो वे अपने चारों तरफ डर के कांटे लगाकर जीते थे. उन्हें लगता, कोई भयंकर षडयंत्र चारों तरफ से उन्हें घेर रहा है. यह स्थिति तब बहुत तीव्र हो गई, जब सरकार ने उनकी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाया. इस बात को आगे लिखूंगा.

परिवेश से कटकर आदमी रह नहीं सकता. मुक्तिबोध-जैसे पारदर्शी सच्चाई के सरल आदमी को अपने आसपास की यह अविश्वसनीयता और अकेलापन दे देती थी

नागपुर में चार-पांच दिन रहकर भी मैं उनसे दोबारा नहीं मिला. उन्होंने भी ऐसी कोई इच्छा नहीं की. यह सीधा कहलानेवाला आदमी, कुछ मामलों में बड़ा काइयां था. वह चुपचाप बैठा जांच रहा था. आगे साल-भर तक कोई संबंध नहीं रहा. एक दिन ‘नया खून’ का ताजा अंक खोला, तो तीन कालम की एक टिप्पणी का शीर्षक था ‘थाट और परसाई की स्पिरिट में अन्तर है.’ टिप्पणीकार- गजानन माधव मुक्तिबोध. मेरी एक कहानी का अनुवाद ‘थाट’ ने छापा था. मुक्तिबोध ने थाट की राजनीति बतलाई थी और मेरी कहानी को जैसे मिसफिट कहा था. चेतावनी थी कि ये पत्र प्रचार और पैसे का लोभ देकर किसी बनते लेखक को फंसाते हैं. मेरी उस कहानी का अर्थ थाट ने साम्यवादी व्यवस्था में रेजिमेण्टेशन के सन्दर्भ में लगाकर छापा था. यों मेरी एक फैण्टेसी को पांचजन्य ने पौराणिक कथा समझकर धर्मार्थ उद्धृत कर लिया था. अपनी समझ का उपयोग करने का हर एक को हक है.

मैंने उन्हें नहीं लिखा. वे भी चुप रहे. सालेक बाद जब वसुधा निकालने की योजना बनी, तो मैंने उन्हें पत्र लिखा. वे भरे बैठे थे. बड़ा लंबा पत्र आया. लिखा था कि नया खून की उस टिप्पणी के बाद यहां लोगों ने मुझसे बार-बार कहा कि आपको बहुत बुरा लगा है. मैं दूर हूं. लोगों से संपर्क होता नहीं है. सुनता रहता हूं. सोचा, सीधे आपसे बात कर लूं. मैं साफ बात करना पसंद करता हूं. आप मुझे साफ बताइए कि क्या उस टिप्पणी से आपको बुरा लगा?

मैं समझ गया कि मेरी-उनकी निकटता को घटित न होने देने में किन्हीं लोगों ने अपना फायदा देखा होगा. अपना फायदा देखने का भी हर एक को हक है. बाद में पता चला कि इन लोगों ने अपने समकालीनों के लिए खुफिया विभाग भी खोल रखा था और जगह-जगह एलची नियुक्त कर रखे थे. हमारे मित्र प्रमोद वर्मा जब तबादले पर जबलपुर आए, तब उन्हें हेड ऑफिस से चिट्ठी मिली थी कि यहां किससे संबंध रखना और किससे नहीं, इस बारे में अमुक से हिदायत ले लो. प्रमोद ने लिख दिया था कि शत्रु और मित्र मैं खुद बनाता हूं. उस चिट्ठी को मुक्तिबोध के सामने हम लोगों ने पढ़ा और खूब हंसते रहे. खैर, ये स्थानीय मधुर पालिटिक्स की बातें हैं. मगर परिवेश से कटकर आदमी रह नहीं सकता. मुक्तिबोध-जैसे पारदर्शी, सच्चाई के सरल आदमी को अपने आसपास की यह अविश्वसनीयता और अकेलापन दे देती थी.

‘कामायनी ः एक पुनर्विचार’ को छापने के लिए एक पुस्तक विक्रेता मित्र शेषनारायण राय राजी हो गए थे. वे पेशे से प्रकाशक नहीं हैं. पैसा लगा देने को तैयार थे. मुक्तिबोध जी पर उनकी श्रद्धा थी. तब मुक्तिबोध को कोई प्रकाशक नहीं मिलता था. पुस्तक की कम्पोजिंग चल रही थी, तब वे जबलपुर आए. तीन दिन हो गए, पर उन्होंने न किताब की बात की, न राय से मिलने की इच्छा. पहले तो रात-दिन पुस्तक छापने की लौ लगी रहती थी और अब यह विराग. मैंने कहा- आप प्रकाशक से तो मिल लीजिए. वे यहीं पास में रहते हैं. मुक्तिबोध खिन्न भाव से बोले- मिल लेंगे, पार्टनर. कोई उससे मिलने थोड़े ही आए हैं. मैंने कहा- सच बताइए मामला क्या है? वे बोले- अब पाण्डुलिपि तो दे ही चुके हैं. अमुक साहब कह रहे थे कि आप बुरे फंस गए. वह राय तो बहुत खराब आदमी है. खैर! मैंने राय से कहा, राय हंसा. कहने लगा- वही साहब मुझसे कह गए थे कि तुम पैसा पानी में डाल रहे हो. उस किताब को कौन खरीदेगा. मुक्तिबोध उनका विश्वास करते थे. वे बड़े हैरान हुए. कहने लगे- आखिर उसने ऐसा किया क्यों? बाद में राय ने उन्हें रुपये पेशगी दिए. दुकान से वो कुछ किताबें भी ले गए. बहु गदगद थे. ऐसे मौकों पर वे बच्चे की तरह हो जाते थे- वाह पार्टनर, आपका यह राय भी मजे का आदमी है. उसने इतने रुपये दे दिए. अगर उन्हें किसी से मुश्किल से सौ रुपये मिलने की उम्मीद है और वह दो सौ रुपये दे दे, तो वह चकित हो जाते. कहते- पार्टनर, यह भी बड़ी मजे की बात है. उसने तो दो सौ रुपये दे दिए. इतने रुपये कोई कैसे दे देता है. इस पुस्तक का प्रकाशन वो अपने ऊपर अहसान मानते थे. राजनांदगांव से उन्होंने राय को अंग्रेजी में एक चिट्ठी लिखी, जो कोई लेखक प्रकाशक को नहीं लिखेगा. लिखा था- पुस्तक अच्छी छपनी चाहिए. मैं आपको लिखकर देता हूं कि मुझे आपसे एक भी पैसा नहीं चाहिए, बल्कि आपका कुछ ज्यादा खर्च हो जाए तो मैं हरजाना देने को तैयार हूं.

राजनांदगांव में वे अपेक्षाकृत आराम से रहे. शरद कोठारी तथा अन्य मित्रों ने उनके लिए सब कुछ किया. पर वे बाहर निकलने को छटपटाते थे. वे साल में एक-दो बार किसी सिलसिले में जबलपुर आते और खूब खुश रहते, रंगीन सपने में डूबते हुए कहते- पार्टनर, ऐसा हो कि एक बड़ा-सा मकान हो. सब सुभीते हों. कोई चिंता न हो. वहां हम कुछ मित्र रहें. खूब बातें करें, खूब लिखे-पढ़ें और जंगल में घूमें. फिर कहते- आप राजनांदगांव आइए. वहीं कुछ दिन रहिए. बहुत बड़ा मकान है. कोई तकलीफ नहीं होगी. नो, नो, आई इनवाइट यू.

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