दिल्ली विश्वविद्यालय विवाद: उच्च शिक्षा, उच्चतर सत्यानाश

एफवाईयूपी के पक्ष में खड़े लोगों का सबसे बड़ा तर्क है कि यदि यह व्यवस्था इतनी ही बुरी थी तो इसे सभी समितियों, विभागों और मंत्रालय से हरी झंडी कैसे मिल गई? विश्वविद्यालय की अकादेमिक काउंसिल और एक्जिक्यूटिव काउंसिल ने इसे पास किया था और यूजीसी से भी इसकी अनुमति ली गई थी. एकेडेमिक काउंसिल के सदस्य प्रोफेसर संजय कुमार के अनुसार, ‘जब 2012 में एकेडेमिक काउंसिल की मीटिंग में एफवाईयूपी को पास किया गया था तो सभी डीन और वरिष्ठ सदस्य वहां मौजूद थे. भाजपा के भी चार सदस्य वहां थे जिन्होंने इसके पक्ष में वोट किया था.’ ऐसे में सवाल उठता है कि जब एफवाईयूपी को बहुमत से पास कर दिया गया था तो आज इसका लगभग हर तबके में इतना विरोध क्यों हो रहा है? इस सवाल का जवाब दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (डूटा) के उपाध्यक्ष प्रोफेसर संदीप की बातों से साफ हो जाता है. वे बताते हैं, ‘एकेडेमिक काउंसिल में सौ से ज्यादा सदस्य होते हैं. इनमें से सिर्फ 26 ही निर्वाचित सदस्य होते हैं. इनके अलावा सभी सदस्य मनोनीत होते हैं जो कुलपति की इच्छा से वहां पहुंचते हैं. एक्जिक्यूटिव काउंसिल में सिर्फ दो ही निर्वाचित सदस्य होते हैं. ऐसे में जो भी कुलपति कहता है वो फैसला इन दोनों ही कौन्सिल्स में पास हो जाता है. एफवाईयूपी को लागू करवाने के लिए तो एकेडेमिक और एक्सिक्यूटिव काउंसिल की आपात बैठक बुलाई गई थी.’

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केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी

एफवाईयूपी की इस बहस में विश्वविद्यालय की स्वायत्तता, राजनीति और नियमों की अनदेखी से इतर सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे लाखों छात्रों का भविष्य भी प्रभावित होता है. ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी है कि ‘शिक्षा में सुधारों’ के नाम पर लागू की गई यह व्यवस्था छात्रों के लिए लाभकारी है या नहीं. कुलपति दिनेश सिंह ने इस व्यवस्था को लागू करते हुए कई आंकड़े प्रस्तुत किए थे. उन्होंने बताया था कि ‘विश्वविद्यालय से हर साल लगभग 25 हजार छात्र अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर चले जाते हैं. दो साल पढ़ने के बाद भी उनके पास दिखाने को कोई प्रमाण पत्र नहीं होता. ऐसे में एफवाईयूपी के अंतर्गत दूसरे साल के बाद पढ़ाई छोड़ने वाले छात्रों को डिप्लोमा दिया जाना बहुत सार्थक होगा.’ कुलपति के इस तर्क को खारिज करते हुए प्रोफेसर राजीव कुंवर बताते हैं, ‘पढ़ाई छोड़ने वाले सबसे ज्यादा बच्चे प्रथम वर्ष के होते हैं. वे भी इसलिए छोड़कर जाते हैं क्योंकि उनका किसी प्रोफेशनल कोर्स में दाखिला हो जाता है. इन छात्रों को किसी डिप्लोमा की आवश्यकता नहीं है.’ हिंदू कॉलेज के प्रोफेसर ईश मिश्र भी कुलपति के तर्क को नकारते हुए बताते हैं, ‘अन्य संस्थानों में डिप्लोमा उन छात्रों को दिया जाता है जिन्हें किसी विधा में पारंगत किया जाए. एफवाईयूपी के अंतर्गत दो साल में कौन-सी विधा में पारंगत किया जा रहा है?’

कुलपति दिनेश सिंह ने एफवाईयूपी के लागू होने के समय एक साक्षात्कार में बताया था, ‘मैंने कुछ समय पहले देश की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों को अपने विश्वविद्यालय में बुलवाया था. उन्हें कुछ लोगों की जरूरत थी जिन्हें वे नौकरी देना चाहते थे. कुल 1100 छात्रों का इन कंपनियों में साक्षात्कार तय करवाया गया. लेकिन उन कंपनियों ने इनमें से सिर्फ तीन लोगों को चुना. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अब आगे से हम दिल्ली विश्वविद्यालय नहीं आएंगे क्योंकि इसमें सिर्फ वक्त की बर्बादी है. इसी कारण से एफवाईयूपी में ऐसे विषय शामिल किए गए हैं जिनसे छात्रों को सभी महत्वपूर्ण विषयों की मूलभूत जानकारी मिले. इससे उन्हें नौकरी हासिल करने में बहुत मदद मिलेगी.’

जिन महत्वपूर्ण विषयों का जिक्र प्रोफेसर सिंह कर रहे हैं उनके बारे में एफवाईयूपी के अंतर्गत पढ़ रहे सत्यवती कॉलेज के छात्र शरद बताते हैं, ‘फाउंडेशन के नाम पर हमें गणित पढ़ाई जाती है और उसमें सम-विषम संख्या पढ़ा रहे हैं. यह कक्षा पांच में पढ़ाई जाने वाली चीज है. ऐसे ही व्यापार के नाम पर हमसे परीक्षा में सवाल पूछा जाता है कि ‘एक आलू-टिक्की का ठेला लगाने वाले को अपना व्यापार बढ़ाने के लिए क्या करना चाहिए?’ मैं हिस्ट्री (ऑनर्स) का छात्र हूँ. मुझे मेरा विषय छोड़कर बाकी ये सब पढ़ाया जा रहा है.’ एफवाईयूपी के तहत अपना पहला साल पूरा कर चुके अधिकतर छात्रों के अनुभव शरद से मिलते-जुलते ही हैं. जाकिर हुसैन कॉलेज में इंग्लिश (ऑनर्स) की छात्रा अंशु पंडित बताती हैं, ‘फाउंडेशन कोर्स में कुछ चीजें तो ठीक हैं. जैसे मुझे आईटी से काफी सीखने को मिला. लेकिन मुझे मैथ्स भी पढ़नी पढ़ रही है और वो भी प्राइमरी स्कूल के स्तर की. इसका कोई मतलब नहीं है. फाउंडेशन कोर्स भी मुख्य विषय की कीमत पर तो बिलकुल नहीं होने चाहिए. इनके लिए कभी अलग से एक-दो क्लास हों तो भी काफी हैं.’

कई का यह भी मानना है कि एफवाईयूपी को सभी संबंधित पक्षों की सलाह से लागू किया जाता तो यह उच्च शिक्षा में सुधारों का एक बड़ा कदम हो सकता था

प्रोफेसर अपूर्वानंद के अनुसार, ‘एफवाईयूपी एक बेहद ही घटिया और अतार्किक पाठ्यक्रम है. यह एक ऐसी अकादेमिक धोखाधड़ी है जो इस देश के 60 हजार छात्रों के साथ हर साल की जाने वाली थी. ये जो एफवाईयूपी के तहत दी जाने वाली डिग्री है ये दरअसल यूरोप में स्कूलों में दी जाती है.’ प्रोफेसर अपूर्वानंद एक साक्षात्कार में बताते हैं, ‘डीयू ने जब पहली बार यूजीसी को यह पाठ्यक्रम अनुमति के लिए भेजा था तो दो साल में ‘एसोसिएट बैकालॉरिएट’, तीन साल में ‘बैकालॉरिएट’ और चार साल में ‘बैकालॉरिएट ऑनर्स’ की बात कही थी. यूजीसी के कहने पर इनके नाम बदलकर ‘डिप्लोमा’, ‘बैचलर्स’ और ‘बैचलर ऑनर्स’ कर दिये गए.’ एफवाईयूपी को पूरी तरह से नकारते हुए प्रोफेसर राजीव कुंवर कहते हैं, ‘एफवाईयूपी के तहत छात्रों को अपनी पढ़ाई छोड़ कर जाने के तीन मौके दिए जा रहे हैं. इनके जरिए तीन अलग-अलग उद्देश्यों को साधने की बात हो रही है. एक ही पाठ्यक्रम से इन तीन उद्देश्यों को पूरा करना असंभव है.’ वे आगे बताते हैं, ‘यह पाठ्यक्रम छात्रों को ग्राहक बनाने का प्रयास है. तीन साल के पाठ्यक्रम को चार साल में बदलना और विषय-वस्तु को कमजोर कर देना, यह सिर्फ शिक्षा के व्यापारीकरण के लिए किया जा रहा है.’

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कई छात्रों और शिक्षकों ने मिलकर ’सेव दिल्ली यूनिवर्सिटी कैम्पेन’ भी शुरू किया था. फोटो: विकास कुमार

एफवाईयूपी का समर्थन कर रहे लोगों द्वारा अंबेडकर विश्वविद्यालय का जिक्र कई बार किया जाता है. वे लोग सवाल करते हैं कि दिल्ली में ही स्थित अंबेडकर विश्वविद्यालय भी चार साल में ही स्नातक की डिग्री दे रहा है तो ऐसे में सिर्फ डीयू को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा है. इसके जवाब में प्रोफेसर राजीव बताते हैं, ‘एफवाईयूपी और अंबेडकर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में जमीन-आसमान का अंतर है. वहां एफवाईयूपी की तरह कभी भी पढ़ाई छोड़ने का प्रावधान नहीं है. साथ ही अंबेडकर विश्वविद्यालय तीन साल में ही ऑनर्स की डिग्री देता है. चार साल में तो वहां छात्रों को दो विषयों में ऑनर्स की डिग्री मिल रही है. इसमें कोई दिक्कत नहीं है. लेकिन एफवाईयूपी में ऐसा कुछ भी नहीं है. उल्टा यहां सिर्फ ज्यादा नंबर बांटकर बेहतर परिणाम दर्शाने का प्रयास किया जाता है.’

एफवाईयूपी में छात्रों का मूल्यांकन भी एक समस्या बन रहा था. छात्रा अंशु पंडित बताती हैं, ‘कई लोग तो सिर्फ इस वजह से ही एफवाईयूपी से खुश थे क्योंकि उन्हें अच्छे अंक मिल जाते थे. इस व्यवस्था में छात्रों के प्रदर्शन पर नहीं बल्कि शिक्षकों से उनके ताल-मेल के अनुसार अंक मिलते थे.’ सत्यवती कॉलेज के छात्र अनिमेश के अनुभव भी कुछ ऐसे ही हैं. वे बताते हैं, ‘क्वालिटी एजूकेशन एफवाईयूपी में पूरी तरह से गायब है. यहां सिर्फ नंबरों की बंदरबांट होती है. शिक्षक भी पढ़ाने से ज्यादा फाइलें बनाने और रिकॉर्ड रखने के काम में व्यस्त रहते हैं.’

एफवाईयूपी में शिक्षकों को कई तरह के गैर-शैक्षणिक कार्य भी करने पड़ रहे हैं. ऐसे में जिन शिक्षकों को पढ़ाने से ज्यादा अन्य काम करना पसंद है वे एफवाईयूपी का समर्थन कर रहे हैं. डीयू के एक शिक्षक इस संदर्भ में बताते हैं, ‘तीन ही तरह के लोग एफवाईयूपी के पक्ष में हैं. पहले वो जो कुलपति के नजदीकी या जी-हुजूरी वाले हैं. दूसरे वो जिन्हें पढ़ाने की बजाय क्लर्क वाले काम ज्यादा भाते हैं. इस तरह के काम में दैनिक भत्ते इत्यादि से भी कुछ पैसे बन जाते हैं. तीसरे वे जिनको एफवाईयूपी के कारण ही नौकरी मिली है. बहुत से कॉलेजों में फाउंडेशन कोर्स पढ़ाने के लिए शिक्षक नियुक्त किए गए हैं. एफवाईयूपी के साथ ही इनकी नौकरी भी समाप्त होनी है इसलिए वे इसके समर्थन में हैं.’

एफवाईयूपी में प्रथम वर्ष के छात्रों को लैपटॉप देने की भी व्यवस्था की गई थी. इसी के चलते डीयू ने पिछले साल 172 करोड़ रुपये के लैपटॉप खरीदे थे. यह राशि मूलतः उस बजट का हिस्सा थी जिससे डीयू में नए भवन, हॉस्टल और लैब बनाए जाने थे. एफवाईयूपी को लागू करने के लिए हड़बड़ी में इसी बजट को लैपटॉप खरीदने के लिए इस्तेमाल कर लिया गया. इस तरह की हड़बड़ी कदम-कदम पर एफवाईयूपी के साथ देखने को मिली है. इस व्यवस्था को लागू करने के लिए भी ऐसी ही हड़बड़ी की गई थी जिसके चलते कुलपति को तुगलक की उपाधि तक मिल गई. कई लोगों का यह भी मानना है कि एफवाईयूपी को यदि ज्यादा ध्यान देकर बनाया जाता और फिर सभी संबंधित पक्षों की सलाह से लागू किया जाता तो शायद यह सच में उच्च शिक्षा में सुधारों का एक बड़ा कदम हो सकता था.

लेकिन तुगलकी तरीके से लागू किए गए एफवाईयूपी के खिलाफ जनता ने दिल्ली के तुगलक मार्ग पर ही इतने प्रदर्शन किए कि आखिरकार इसका अंत भी तुगलक के अधिकतर फैसलों की ही तरह हुआ.

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