स्वर्ग का बेड़ा गर्क

पिछले 25 साल के अलगाववाद ने इस समस्या को और विकराल किया. 90 के दशक में जब सरकारी तंत्र ढह गया था तो उसी दौरान राज्य के ग्रामीण इलाकों से से लोग बड़ी संख्या में श्रीनगर की तरफ पलायन कर रहे थे. इन लोगों में एक बड़ी संख्या उनकी थी जो पैसे वाले थे और आतंकवाद और इसके चलते हो रही परेशानियों के चलते गांव छोड़ना चाहते थे.  इस पलायन के चलते मकानों की जरूरत काफी बढ़ गई. इस जरूरत को भूमाफियाओं ने पूरा किया. जल्द ही बिल्डरों और प्रॉप्रटी डीलरों के एक नेटवर्क ने खाली जमीनों को कंक्रीट के जंगल में तब्दील करना शुरू कर दिया. इनमें से ज्यादातर जमीनें उन इलाकों में पड़ती थीं जो कभी झेलम का विस्तार संभालते थे. लेकिन ये महंगे दामों पर बिकने लगीं और कइयों के दाम तो साल भर में दोगुने हो गए. बाद में सरकारी तंत्र में थोड़ी जान लौटी भी तो अधिकारी और नेता इस नेटवर्क के साथ मिल गए. इसके एवज में उन्हें अकूत मुनाफा जो मिलने वाला था. रियल एस्टेट पिछले एक दशक के दौरान घाटी में सबसे प्रमुख कारोबार बन गया और इसने श्रीनगर के हर खाली हिस्से को पाटकर आपदा को न्यौतने जैसा काम कर दिया.

पीडीपी नेता नईम अख्तर कहते हैं, ‘देखा जाए तो नया श्रीनगर की प्लानिंग सरकार ने नहीं बल्कि भूमाफिया ने की है. पिछले 20 साल के दौरान जो भी कॉलोनियां बनीं उन्होंने श्रीनगर का गला घोंटने का काम किया और इस बाढ़ से हुए विनाश की भूमिका लिखी.’ अख्तर बताते हैं कि 1975 से पहले राज्य सरकार ने श्रीनगर में दो आवासीय कॉलोनियां बसाई थीं और दोनों इस बाढ़ से अछूती रहीं. इनमें पहली शहर के उत्तर में स्थित सौरा इलाके में है और दूसरी दक्षिणी हिस्से में स्थित संतनगर और रावलपुरा में. 1947 से पहले महाराजा हरि सिंह ने कर्णनगर बसाया था. आज यह एक भव्य बाजार है. यह इलाका भी बाढ़ से अछूता रहा.

लेकिन बाढ़ से अपना भविष्य सुरक्षित करने के ऐसे प्रयासों में क्या यह भी शामिल होगा कि पिछले 25 साल की गलतियों को सुधारा जाए?

1903 की भयानक बाढ़ के समय हरि सिंह के चाचा महाराजा प्रताप सिंह का शासन था. इस बाढ़ के बाद उन्होंने आगे इससे बचने के रास्ते सुझाने के लिए अंग्रेज इंजीनियरों को श्रीनगर बुलाया था. 1902 में भी श्रीनगर में भारी बाढ़ आई थी. तब भी वह श्रीनगर के एक बड़े हिस्से को निगल गई थी और हर तरफ तबाही का मंजर हो गया था. इन इंजीनियरों ने शहर में छोटी और बड़ी नहरों का एक नेटवर्क बनाया जो बाढ़ की स्थिति में अतिरिक्त पानी को शहर से बाहर ले जाता था. प्रताप सिंह ने कई जगहों पर झेलम के तल की खुदाई भी करवाई थी. इससे नदी की गहराई और नतीजतन ज्यादा पानी आने की सूरत में भी खतरा न होने की संभावना बढ़ गई थी. श्रीनगर में कोई निर्माण करवाते हुए भी काफी ध्यान रखा जाता था कि वह पानी के स्वाभाविक रास्ते में न हो. नहरों के नेटवर्क और दूरदर्शिता से बना यह एक तंत्र था जो श्रीनगर शहर को बाढ़ से बचाए रखता था.

लेकिन बीते दो दशक के दौरान इस तंत्र की धज्जियां उड़ा दी गईं. अराजक तरीके से हुए निर्माण ने आपदा का असर काफी बढ़ा दिया. बाढ़ में कई पुलों का बह जाना साफ संकेत है कि लोग भूल चुके थे कि यह पानी का रास्ता है. रामशू कहते हैं, ‘2014 की इस भयानक बाढ़ का सबसे अहम कारण यही है कि झेलम से उसकी जगह छीन ली गई. पानी के रास्तों पर हुए अतिक्रमण, नदियों में जमी गाद और नदी के किनारों पर सड़क निर्माण ने झेलम घाटी में बाढ़ का खतरा बढ़ा दिया था.’

बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी का भी मानना है कि कि आपदा की प्रमुख वजह दलदली जमीन (वेटलैंड्स) पर हुआ अतिक्रमण था. सोसायटी के निदेशक डॉ. असद रहमानी कहते हैं, ‘पिछले 30 सालों के दौरान कश्मीर घाटी में वेटलैंड्स में करीब 50 फीसदी की कमी आई है. इसका कारण है अंधाधुंध निर्माण जिसमें पर्यावरण के लिए कोई सम्मान नहीं है. यह निर्माण मुख्यत: व्यावसायिक गतिविधियों के चलते हुआ है.’ वे आगे कहते हैं, ‘अगर इन वेटलैंड्स को सुरक्षित रखा जाता तो जान-माल को हुए इस भयानक नुकसान को कम से कम किया जा सकता था.’

इस आपदा ने राज्य सरकार के लिए मुश्किल में डालने वाले कुछ सवाल पैदा कर दिए हैं. लोग पूछ रहे हैं कि आखिर क्यों प्रशासन ने उस जगह को बचाने के लिए सारे जरूरी कदम नहीं उठाए जो राज्य की राजधानी होने के साथ-साथ प्रशासन और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र भी है.

सवाल यह भी उठ रहे हैं कि इन वजहों को देखते हुए श्रीनगर को राजधानी बनाए रखना कितना व्यावहारिक है. अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण शहर हमेशा ही बाढ़ के खतरे की जद में है. ऊपर से अंधाधुध और बेतरतीब निर्माण के बाद यह खतरा और बढ़ गया है.  शहरों की योजना में विशेषज्ञता रखने वालीं अनीस द्रबू कहती हैं, ‘हकीकत यह है कि श्रीनगर और इसके आसपास का इलाका बाढ़ के लिहाज से खतरनाक है. मौसम में आ रहे बदलावों के चलते ग्लेशियरों का पिघलना इस खतरे को और बढ़ा रहे हैं. शहर के लिए पानी की निकासी का एकमात्र रास्ता झेलम है जिसमें गाद भरी होने के चलते उसका दम फूल रहा है. निकासी के लिए जब तक तत्काल गंभीर प्रयास नहीं किए जाते तब तक ऐसी बाढ़ भविष्य में आम हो सकती है.’

श्रीनगर स्थित शेरे कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नॉलॉजी का एक अध्ययन बताता है कि 2031 तक श्रीनगर में एक इंच भी जगह खाली नहीं बचेगी. राज्य के मुख्य सचिव इकबाल खांडे कह रहे हैं कि भविष्य में ऐसी किसी भी आपदा को रोकने के लिए झेलम दरिया में स्पिल चैनल निर्माण के लिए 22 हजार करोड़ की योजना का प्रस्ताव है और उन्हें उम्मीद है कि केंद्र सरकार इसे मंजूरी दे देगी. उनके मुताबिक दक्षिण कश्मीर में संगम के निकट झेलम दरिया के पास से ही एक स्पिल चैनल अथवा फ्लड चैनल बनाया जाएगा. यह नहर उत्तरी कश्मीर में वुल्लर झील तक होगी और जब भी झेलम का जलस्तर बढ़ेगा, यह नहर बढ़े हुए पानी को वुल्लर तक पहुंचाएगी.

लेकिन बाढ़ से अपना भविष्य सुरक्षित करने के ऐसे प्रयासों में क्या यह भी शामिल होगा कि पिछले 25 साल की गलतियों को सुधारा जाए? लालच, भ्रष्टाचार और हिंसा के जिस गठजोड़ ने बादशाहों, यात्रियों, कवियों और सूफियों को लुभाने वाले श्रीनगर को बदसूरत बना दिया है, वह खत्म हो.

जो हालात हैं उनमें फिलहाल तो ऐसा होना संभव नहीं लगता.

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