जम्मू-कश्मीर: बाढ़ ने बदले समीकरण

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फोटोः एएफपी
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जम्मू-कश्मीर बाढ़ से उपजी त्रासदी की गिरफ्त में है. बाढ़ के पहले प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियों की बाढ़ आई हुई थी. माना जा रहा था कि हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड के साथ ही जम्मू कश्मीर में लगभग एक साथ ही विधानसभा चुनाव होंगे. लेकिन बाढ़ के कारण जम्मू-कश्मीर का चुनाव टल गया है. कब होगा ठीक-ठीक नहीं बताया जा सकता. जब भी चुनाव होगा तो उसके परिणाम क्या होंगे, आज इस प्रश्न से ज्यादा बड़ा प्रश्न यह है कि राज्य में चुनाव कब होंगे. क्योंकि प्रदेश में विधानसभा चुनाव में क्या होगा यह काफी कुछ इस पर भी निर्भर करेगा कि चुनाव होते कब हैं. राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर में चुनाव जब भी होंगे बाढ़ से आई त्रासदी उसमें एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी. यानी जनता जब वोट देने जाएगी तब ईवीएम का बटन दबाते समय उसके दिमाग में इस समय की त्रासदी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.

ऐसे में पहले यह जानना जरूरी है कि बाढ़ के कारण राजनीतिक तौर पर प्रदेश में क्या बदला है और इसके कारण आने वाले समय में क्या-क्या और कितना बदल सकता है.

बाढ़ की त्रासदी आम जनता पर तो पहाड़ बनकर टूटी ही है, उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार के लिए भी यह सबसे बड़ी राजनीतिक त्रासदी साबित हुई है. आज उमर सरकार को जिस स्तर पर आम जनता के विरोध का सामना करना पड़ रहा है उसकी कल्पना उसने शायद ही की थी. बाढ़ प्रभावितों के बीच प्रदेश सरकार की छवि अक्षम, यहां तक कि एक ऐसी सरकार की बनी है जो हाथ पर हाथ धरे लोगों को मरते हुए देख रही है. उधर, अब्दुल्ला के पास अपने तर्क हैं. उन्होंने कहा कि उनकी सरकार बाढ़ में बह गई थी. उनके अपने आवास में बिजली नहीं है, उनके मोबाइल फोन में कनेक्टिविटी नहीं है. उनके मंत्री लापता हैं. राज्य विधानसभा भवन, उच्च न्यायालय, पुलिस मुख्यालय और अस्पताल सभी पानी में हैं.

मुख्यमंत्री अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आम जनता में सरकार को लेकर गुस्सा बहुत है. कुछ समय पहले ही एक राहत शिविर में पहुंचने पर स्थानीय जनता ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और प्रदेशाध्यक्ष सैफुद्दीन सोज को बाहर जाने पर मजबूर कर दिया.

भाजपा कितनी उत्साहित है यह इससे भी जाहिर होता है कि पार्टी जम्मू-कश्मीर में अगला मुख्यमंत्री हिंदू होने का दावा कर रही है

प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार खालिद अख्तर कहते हैं, ‘बाढ़ ने जिस पैमाने पर तबाही मचाई है. आम लोगों को जिस त्रासदी से गुजरना पड़ा है. उससे देखते हुए इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रदेश में अगले कुछ समय में जब भी विधानसभा चुनाव होंगे, यह त्रासदी उस चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बनने वाली है.’ खालिद अकेले नहीं है. जम्मू स्थित वरिष्ठ पत्रकार अश्विनी चिंग्रू कहते हैं, ‘इस बाढ़ ने बहुत सारी चीजों को एक्सपोज किया है. लोगों को बहुत सारी चीजें पहली बार करीब से जानने-समझने को मिली हैं. आज जनता बाढ़ में फंसी हुई है. चुनाव आने दीजिए नेताओं को तब पता चलेगा कि बाढ़ कितनी भयावह थी.’

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव में इस बाढ़ से सर्वाधिक नुकसान नेशनल कॉफ्रेंस (एनसी) को होने जा रहा है. खालिद कहते हैं, ‘पार्टी की स्थिति तो पहले से ही बहुत खराब है. लोकसभा के परिणाम सबके सामने हैं. बाढ़ ने तो विधानसभा चुनावों में उसकी होने वाली फजीहत पर अंतिम मोहर लगा दी है.’

पिछले लोकसभा चुनाव में नेशनल कॉफ्रेंस ने कश्मीर घाटी की तीन सीटों पर चुनाव लड़ा था और तीनों पर वह हार गई थी. उसके लिए सबसे शर्मनाक हार उसके पार्टी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के पिता फारूख अब्दुल्ला की थी. पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला को 40 साल के अपने राजनीतिक करियर में पहली बार हार का मुंह देखना पड़ा था. नेशनल कॉफ्रेंस के लिए उसकी 60 साल की राजनीति में यह पहली बार था जब जम्मू-कश्मीर में उसे एक भी सीट नहीं मिली. कांग्रेस की स्थिति भी ऐसी ही रही. कांग्रेस ने भी जिन तीन सीटों पर चुनाव लड़ा उन पर वह बुरी तरह हारी. खालिद कहते हैं, ‘जनता इन दोनों की गठबंधन वाली सरकार से त्रस्त हो चुकी है. ये दोनों जनता की नजरों में बहुत पहले ही भरोसा खो चुके थे. इनके प्रति जनता में बहुत गुस्सा है जो लोकसभा चुनावों में दिखाई दिया.’

Amitshahऐसे में कहा जा रहा है कि विधानसभा चुनाव में भी दोनों पार्टियों की स्थिति कुछ वैसी ही रहने वाली है जैसी लोकसभा में रही थी. बल्कि हो सकता है कि उनकी हालत बदतर हो. जानकार बताते हैं कि नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन सरकार के खिलाफ तो पहले ही लोगों में गुस्सा भरा था. इस बाढ़ के बाद तो वह सातवें आसमान पर पहुंच गया है. ऐसे में विधानसभा चुनावों में दोनों पार्टियों का सूपड़ा साफ होना काफी हद तक निश्चित है. उमर अब्दुल्ला सरकार की स्थिति समय के साथ और खराब होगी. जैसे-जैसे बाढ़ प्रभावितों का दर्द बढ़ेगा वैसे-वैसे सरकार के खिलाफ भी गुस्सा बढ़ता जाएगा. इसका नुकसान विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और एनसी को उठाना पडेगा.

दोनों दलों खासकर कि नेशनल कॉन्फ्रेंस के खिलाफ गुस्सा और नाराजगी ही वह संजीवनी है जिसके दम पर पीडीपी प्रदेश में एक बार फिर से सत्ता में वापसी की राह देख रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में श्रीनगर सीट पर एनसी के अध्यक्ष फारुक अब्दुल्ला को उनकी ऐतिहासिक हार का स्वाद चखाने का काम पीडीपी ने ही किया. 1999 में अपने गठन के बाद पीडीपी के लिए यह पहला मौका था जब उसने कश्मीर घाटी की तीनों सीटें जीतीं. कश्मीर क्षेत्र की तीनों सीटें तो पार्टी ने जीती हीं, जम्मू और उधमपुर की सीट पर भी उसके प्रत्याशियों को ठीक-ठाक मत मिले थे. स्थानीय पत्रकार मीर इमरान पीडीपी की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए कहते हैं, ‘अगले विधानसभा चुनावों के बाद पीडीपी नेतृत्व की सरकार बननी लगभग तय है. बस भाजपा कोई बडा उलटफेर न कर दे.

जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक रंगमंच पर कोई किरदार अगर पिछले कुछ समय में बहुत तेजी से चर्चा में आया है तो वह भाजपा है. इसके पीछे पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी की सफलता सबसे बड़ा कारण है. पार्टी पिछले चुनाव में प्रदेश की छह लोकसभा सीटों में से तीन पर भगवा फहराने में कामयाब रही. लद्दाख की लोकसभा सीट तो उसने अपने राजनीतिक इतिहास में पहली बार जीती थी. इन सीटों को जीतने से ज्यादा जिस तथ्य से उसकी आंखों में चमक आई है वह यह है कि पार्टी जम्मू इलाके के 37 विधानसभा क्षेत्रों में से 30 पर पहले नंबर पर आई. जम्मू के अलावा जिस लद्दाख सीट को उसने पहली बार जीतने में सफलता पाई है उस संसदीय सीट के अंतर्गत आने वाली चार विधानसभा क्षेत्रों में से तीन पर वह पहले नंबर पर रही. ऐसे में जिस पार्टी को पिछले विधानसभा चुनाव में 11 सीटें मिली थीं वह इस बार 33 विधानसभा क्षेत्रों में सबसे आगे रही.

भाजपा को अगले विधानसभा में कुछ कर दिखाने की प्रेरणा इन्हीं आंकड़ों से मिल रही है. यही कारण है कि पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर एक व्यापक रणनीति बनाते हुए काम कर रही है. जम्मू के भाजपा नेता दिवाकर शर्मा कहते हैं, ‘हमारी रणनीति बहुत साफ है. हमें जम्मू और लद्दाख की कुल 41 सीटों को हर हाल में जीतना है और हम जीतेंगे. इस बार चूकने का कोई चांस ही नहीं है. जनता ने लोकसभा चुनावों मे बता दिया है कि वह किससे साथ है. कश्मीर घाटी में स्थिति थोड़ी अलग है, लेकिन हम वहां भी इस बार अपना खाता जरूर खोलेंगे.’

लोकसभा चुनाव के परिणामों का पार्टी पर कितना गहरा असर पड़ा है वह इस बात से भी जाहिर होता है कि पार्टी जम्मू-कश्मीर में अगला मुख्यमंत्री हिंदू होने का दावा कर रही है. कुछ समय पहले ही जम्मू क्षेत्र में एक रैली को संबोधित करते हुए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा ‘अगली बार इस प्रदेश का मुख्यमंत्री भाजपा का होगा. आप लोग एक बार सोच कर तो देखिए. अगर हमने एक भाजपा कार्यकर्ता को यहां का मुख्यमंत्री बना दिया तो पूरी दुनिया में उसका मैसेज जाएगा. हमें इस बार यह कर दिखाना है. बाकी राज्यों की मुझे चिंता नहीं है क्योंकि वहां तो हम जीतेंगे, लेकिन यहां अगर हम जीत गए तो उसके मायने अलग होंगे.’

केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जम्मू-कश्मीर के दौरे पर तीन-चार बार जा चुके हैं. लगभग उतनी ही बार अमित शाह भी प्रदेश का दौरा कर चुके हैं. इससे वहां भाजपा का कार्यकर्ता उत्साहित हंै. दिवाकर कहते हैं, ‘पहले भी पार्टी यहां चुनाव लड़ती थी, लेकिन वह आक्रामकता नहीं थी. कोई मजाक में भी प्रदेश में अपनी पार्टी का सीएम होगा ऐसा नहीं सोचता था. लेकिन अब इसके अलावा हम कुछ और नहीं सोच रहे.’

नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन सरकार के खिलाफ तो पहले ही लोगों में गुस्सा भरा था. इस बाढ़ के बाद तो वह सातवें आसमान पर पहुंच गया है

भाजपा मिशन 44+ को लेकर कितना गंभीर है इस बात का पता उन मीडिया रिपोर्टों से भी चलता है जिसमें बताया गया है कि कैसे भाजपा जम्मू-कश्मीर के अलावा देश के अन्य हिस्सों में पलायन कर चुके कश्मीरी पंडितों की सूची तैयार कर रही है. उन्हें पार्टी से जोड़ने और अगले चुनाव में जम्मू-कश्मीर आकर भाजपा के लिए वोट करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.

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