‘इंतजार कराते रहना’ स्वाद है या यात्रा ? | Tehelka Hindi

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‘इंतजार कराते रहना’ स्वाद है या यात्रा ?

फिल्म रिव्यु : फाइंडिंग फैनी
शुभम उपाध्याय 2014-09-30 , Issue 18 Volume 6
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िफल्म » फाइंडिंग फैनी
निर्देशक» होमी अदजानिया
लेखक » होमी अदजानिया, केरसी खंबाटा
कलाकार » नसीरुद्दीन शाह, पंकज कपूर, दीपिका पादुकोण, डिंपल कपाड़िया, अर्जुन कपूर

जो हैं नसीर हैं. पता नहीं यह समझदार विवेचना है कि नहीं लेकिन ‘फाइंडिंग फैनी’ में नसीर ऐसे लगे जैसे अपने दुख-भरे भोले किरदार में वे चार्ली चैपलिन हो गए हों. बस न छड़ी थी न हैट न काला कोट-पैंट न वो नायाब करतबी चेहरा. चैक की लाल शर्ट के ऊपर एक बो-टाई और सिर्फ नसीर.

फिर थोड़े-से पंकज कपूर हैं. वे पूरे नहीं हैं इसकी नाराजगी ज्यादा है. लेकिन एक सीक्वेंस में, जहां वे डिंपल कपाड़िया की तस्वीर बनाते हैं, अभिनय के खुदा हो जाते हैं. जैसे वे ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ के उस दृश्य में हो गए थे जब विकास और पैसे के अर्थशास्त्र को समझाते वक्त अपने सपने की क्रूर कविता कह रहे थे, ‘जब भी मैं इन बदसूरत खेतों की बदमस्त फसलों को झूमते देखता हूं, मेरा सपना मेरी पलकें नोंचने लगता है….’. उस फिल्म की सिर्फ यही यादगार याद है और फाइंडिंग फैनी की अच्छी बात यह है कि उसके पास थोड़े ज्यादा हथियार हैं. उसके पास नसीर हैं, पंकज कपूर हैं, डिंपल कपाड़िया हैं, आश्चर्यजनक रूप से दीपिका हैं, और एक यात्रा है. लेकिन कहानी नहीं है.

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 18, Dated 30 September 2014)

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