सुर्खियों के बाद | Tehelka Hindi

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सुर्खियों के बाद

निर्भया बलात्कार कांड के दोषियों को फांसी की सजा हो चुकी है. लेकिन बलात्कार के कई चर्चित मामले ऐसे भी हैं जिनके पीड़ित लगातार तरह-तरह की प्रताड़नाएं और उपेक्षा झेलने को मजबूर हैं

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दिल्ली | अप्रैल 2013

‘शीला दीक्षित बोलीं कि मेरे पास रोज 500 बलात्कार के मामले आते हैं. मैं किस-किस को देखूंगी’

गुड़िया के लिए यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी सहित तमाम नेता बड़े-बड़े वादे कर गए थे, लेकिन हुआ कुछ नहीं. पांच साल की गुड़िया अब अपने हाल पर है

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दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम में बसा इलाका द्वारका. यहां की एक बस्ती में कुछ देर के इंतजार के बाद ही हमें गुड़िया के पिता मिल जाते हैं. वे बस्ती में बने एक मंदिर के पास से हमें लेने आए हैं. बस्ती में मौजूद अनगिनत गलियों में से एक से होकर गुजरते हुए हम गुड़िया के घर पहुंचते हैं. सिर पर दो छोटी-छोटी चोटियों और हाथों में स्लेट पकड़े हुए गुड़िया अपने छोटे भाई और मां के साथ खेल रही है. लगभग चार महीने अस्पताल में रहने के दौरान उसके छह बड़े ऑपरेशन हुए. अब वह स्वस्थ है. उसके पिता गोद में खेल रहे दोनों बच्चों को संभालते हुए कहते हैं, ‘डाक्टरों ने कहा है कि अब यह स्कूल जा सकती है. बिल्कुल ठीक है. अब हमारी सबसे बड़ी चिंता अपने बच्चों को स्कूल में दाखिल करवाने की है. जब मामला मीडिया में जोर-शोर से उठा था तब सभी ने बहुत लंबे-लंबे वादे किए थे. सोनिया गांधी खुद गुड़िया से मिलने आई थीं, उन्होंने हम दोनों से कहा था कि लड़की के स्वास्थ्य, शिक्षा और देखभाल का पूरा ध्यान रखा जाएगा. फिर गांधीनगर के हमारे नेता अरविंदर सिंह ने भी कहा था कि बच्चों के रहने और पढ़ने का पूरा इंतजाम किया जाएगा. लेकिन गुड़िया के इलाज और ऑपरेशन के सिवा अभी तक हमें सरकार से कोई मदद नहीं मिली है.’

दिल्ली गैंगरेप पर देश में मचा बवाल अभी शांत भी नहीं हुआ था कि 15 अप्रैल, 2013 को दिल्ली के गांधीनगर इलाके में दो लोगों ने पांच साल की गुड़िया का सामूहिक बलात्कार किया और फिर उसे एक बंद कमरे में मरने के लिए छोड़ दिया. डॉक्टरी जांच के दौरान यह पता चला कि अपराधियों ने बच्ची के शरीर में प्लास्टिक की बोतलें और मोमबत्तियां डाल दी थीं. अपने बच्चों के चेहरे को अपने पल्लू से साफ करते हुए गुड़िया की मां कहती हैं, ‘15 तारीख को जब गुड़िया खो गई तो हम लोगों ने पुलिस में शिकायत की, लेकिन पुलिस ने हमारी एक नहीं सुनी. अगर सिर्फ हमारी बिल्डिंग में ही खोजा होता तो शायद उसकी हालत इतनी खराब नहीं होती. उल्टा हम लोगों से ही पैसे मांगने लगे.’

एक ओर जहां गुड़िया के बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार हुए मनोज शाह और प्रदीप कुमार के खिलाफ अदालती कार्यवाही शुरू हो चुकी है वहीं दूसरी ओर गुड़िया के स्वस्थ होने के बाद से उसका परिवार कई मोर्चों पर एक साथ लड़ रहा है. अपनी बच्ची के बलात्कार के पांच महीने बाद मीडिया और अनगिनत सामाजिक कार्यकर्ताओं की भीड़ से दूर, अपने एक कमरे के छोटे से घर में बैठे गुड़िया के पिता कहते हैं, ‘सोनिया गांधी तो गुड़िया से मिलकर चली गईं. उन्होंने पूरा आश्वासन भी दिया, लेकिन कुछ हुआ नहीं. फिर हम लोग शीला दीक्षित से मिलने पहुंचे. उन्होंने हमें यह कहकर भगा दिया कि मेरेे पास तो रोज 500 बलात्कार के मामले आते हैं. मैं किस-किस को देखूंगी? उन्होंने कहा कि हम अपने बच्चों को और उनके साथ हुए दुष्कर्म के मामलों को खुद संभालें. इस पूरे समय में हमें सिर्फ आम आदमी पार्टी और मीडिया का ही सहारा रहा है. मीडिया भी लगा रहा. इंडिया टुडे वाले पिछले पांच महीनों से हमारे कमरे का किराया दे रहे हैं, एक पत्रकार मैडम हमारी लड़की को पढ़ाने के लिए भी तैयार हो गई हैं. लेकिन मैं हैरान हूं कि सरकार हमारी मदद क्यों नहीं कर रही. हम गांव भी नहीं जा सकते क्योंकि वहां भी लोग तरह-तरह की बातें बनाते हैं. दिल्ली में भी अभी तक हमने चार मकान बदल लिए हैं.’

थोड़ा रुककर वे आगे कहते हैं, ‘अब जो हमारी लड़की के साथ यह सब हो चुका है तो हमारे लिए उसे पढ़ाना बहुत जरूरी है. अगर नहीं पढ़ेगी तो आगे कौन उसे सहारा देगा? उसे अपने पैरों पर खड़ा होना होगा वर्ना यह समाज रेप की शिकार लड़कियों के साथ कैसा सलूक करता है, यह तो आप जानती ही हैं. इसलिए मैं अपना सबकुछ लगाकर अपने बच्चों को पढ़ाना चाहता हूं.’

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गोहाना, हरियाणा | सितंबर 2012

‘मन तो मर जाने का करता है, दीदी…’

गैंग रेप के बाद बिरादरी के दबाव में रागिनी को अदालत में अपने बयान से मुकरना पड़ा जिसके बाद उल्टे उसे ही सजा हो गई और आरोपित रिहा हो गए  

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‘दरवज्जा खुलवा दो री, जनानी आई है.’

10-12 साल का एक लड़का घर का दरवाजा खटखटाते हुए यह कहता है. हम हरियाणा के सोनीपत जिले की गोहाना तहसील के अटैल-इदाना गांव में हैं. इससे पहले हमने गांव के बीचों-बीच बने एक मैदान में क्रिकेट खेलते बच्चों से ‘धानुकों’ की गली में रहने वाले सुनील का पता पूछा था. पहले तो सब एक-दूसरे की ओर देखते हुए मुस्कराने लगे और फिर उन्होंने मैदान के सामने बने एक पक्के घर की ओर इशारा किया. हम चले ही थे कि एक लड़के ने अपना बल्ला जमीन पर फेंकते हुए कहा, ‘सुनील और उसके मां-बाप घर पर नहीं हैं. इसलिए दरवाजा तभी खुलेगा जब हममें से कोई बाहर से आवाज लगाएगा.’ सुनील की ही रिश्तेदारी में आने वाला यह लड़का अब हमारे साथ है और घर का दरवाजा खटखटा रहा है.

कुछ ही देर में दस-बारह साल की दो छोटी-छोटी लड़कियां आकर दरवाजा खोलती हैं. दरवाजे के ठीक सामने आंगन में भैस का तबेला है. तबेले के पीछे हैंडपंप पर घूंघट में ढकी एक लड़की कपड़े धो रही है. यह सुनील की पत्नी रागिनी है. दरवाजा जिन छोटी-छोटी लड़कियों ने खोला था वे रागिनी की ‘वर्तमान पारिवारिक पहरेदार’ हैं. 28 सितंबर, 2012 के बाद रागिनी चौबीसों घंटे अपने ही घरवालों और रिश्तेदारों की सख्त पहरेदारी में रहती है. वह अपने घर का दरवाजा खुद नहीं खोल सकती, किसी से बात नहीं कर सकती, घंटी बजने पर मोबाइल फोन नहीं उठा सकती, गर्मी से बेहाल होने पर भी अपने ही घर के आंगन तक में नहीं बैठ सकती. यहां तक कि शौचालय भी अकेले नहीं जा सकती. उसकी ससुराल में अब किसी को उस पर भरोसा नहीं है और कोई उसका चेहरा तक देखना पसंद नहीं करता.

लेकिन रागिनी की जिंदगी हमेशा से ऐसी नहीं थी. पिछले साल की गर्मियों में ही उसका ब्याह धूमधाम से पास ही के गांव में रहने वाले सुनील के साथ हुआ था. सब ठीक चल रहा था. वह अपने पति से बहुत प्यार करती थी और उसकी आंखों में वे हजारों सपने झिलमिला रहे थे जो कोई भी 19 साल की लड़की अपनी नई जिंदगी और नई-नई शादी को लेकर अपने मन में संजोती है. तभी अचानक एक अप्रत्याशित हादसे ने रागिनी की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया. अगर इस हादसे में उसके हाथ-पैर टूट जाते, उसका सामान चोरी हो जाता या कुछ बदमाश सड़क पर उसे लूटकर चाकू से जख्मी करके छोड़ देते, तब भी शायद वह इन सभी हादसों से उबर कर एक नई जिंदगी शुरू कर सकती थी. लेकिन 28 सितंबर, 2012 को रागिनी सामूहिक बलात्कार का शिकार हो गई. पांच दिन और चार रातों तक चार दरिंदों के कब्जे में रहने के बाद जब रागिनी दुर्दांत हिंसा की उस अंधेरी सुरंग से बाहर निकली तो उसकी जिंदगी भी जैसे खत्म हो चुकी थी. एक सामान्य नवविवाहिता से वह एक वेश्या, चोर और दोयम दर्जे की चरित्रहीन महिला में तब्दील हो चुकी थी. स्वयं पीड़ित होने के बावजूद लगातार पारिवारिक, और न्यायिक उपेक्षा से जूझती रागिनी की यह कहानी बलात्कार की शिकार महिलाओं के अंधेरे भविष्य की डरावनी तस्वीर हमारे सामने रखती है.

रागिनी का पति सुनील साइकिल पर बर्तन बेचने का काम करता है और उसके ससुर भी गांव में ही रेहड़ी लगाकर घरेलू सामान बेचते हैं. आज वे घर पर नहीं हैं. अपने एक कमरे के घर में हमें बिठाते हुए रागिनी घर में मौजूद ‘पहरेदार लड़कियों’ को बाहर भेजने की कोशिश करती है और धीरे से कहती है, ‘इनको कुछ लाने के बहाने से बाहर भेज दूं वर्ना मेरी सास को सब बता देंगी और फिर बहुत बुरा होगा. मेरे सासरे वाले जब भी बाहर जाते हैं, इन लड़कियों को मुझ पर नजर रखने के लिए छोड़ कर जाते हैं.’ लड़कियों को तबेले के कामों में उलझाने के बाद बात शुरू करते ही रागिनी सिसकने लगती है. मैं कहती हूं कि मन में जो भी है कह दो. वह कहती है, ‘मेरा मन? मन तो अब सिर्फ मर जाने का करता है, दीदी. कब से मरने की कोशिश कर रही हूं लेकिन ये लोग मरने के लिए भी अकेला नहीं छोड़ते वर्ना कब की मर जाती. अब मेरे बस की कुछ ना रही है’.

सितंबर, 2012 में रागिनी शादी के बाद पहली बार मायके वापस आई थी. बनवास गांव के अंतिम छोर पर बना एक कमरे का छोटा-सा घर रागिनी का मायका है जहां वह अपनी तीन बहनों और दो भाइयों के साथ रहती थी. रागिनी का परिवार ‘धानुक’ जाति में आता है और इसलिए उसका घर गांव के दलितों और पिछड़ी जातियों के टोले की सबसे अंतिम कतार में है. हरियाणा की पारंपरिक पिछड़ी जातियों में आने वाले ‘धानुक’ मूलतः सवर्णों के घरों की मिट्टी साफ करने और घास काटने का काम करते रहे हैं. लेकिन रागिनी के माता-पिता बंधुआ मजदूरी के साथ साथ पट्टे पर गांव के सवर्णों की भैंसें भी पालते हैं. रागिनी की मां संतोष कहती हैं, ‘हमने अपनी सालों की बचत मिलाकर लड़की का ब्याह किया था. तब वो ब्याह के बाद पहली बार घर आई थी. लेकिन यहीं गांव के सामने बने फाटक से उसे चार लड़के उठा के ले गए. फिर पांच दिन बाद वापस आई और उसकी हालत बहुत खराब थी. हम तो चाहते थे कि सभी अपराधियों को सजा हो. पुलिस में रिपोर्ट भी लिखवाई थी. लेकिन फिर धीरे-धीरे गांववालों और बिरादरी का दबाव बढ़ने लगा. हमारे सामने रिपोर्ट वापस लेने के सिवा कोई चारा नहीं बचा था.’

रागिनी के साथ यह हादसा सितंबर, 2012 के उस चर्चित समय में हुआ था जब अचानक एक महीने में हुई बलात्कार की 20 घटनाओं की वजह से हरियाणा राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया था. वह बताती है, ‘मायके में मैं अपने पड़ोस में रहने वाली माफी के घर जाया करती थी. वह गांव में ब्यूटी पार्लर चलाती थी और मुझे सिलाई भी सिखा देती थी. 28 सितंबर को उसी ने मुझसे कहा कि तेरे पति का फोन आ रहा है बार-बार. वो तुझे फाटक पर बुला रहा है. लेकिन फाटक पर मेरे पति नहीं थे.’

गोहाना फाटक नाम की उस जगह से सुनील और संजय नामक दो लोगों ने रागिनी का अपहरण कर लिया. ये दोनों पास ही के खिंदारी गांव के रहने वाले थे. वहां से एक सफेद कार में उसे गोहाना-खकरोही रोड पर मौजूद चावल के खेतों में बने एक सुनसान कमरे में ले जाया गया. वहां दो लोग और थे. अहमदपुर माजरा गांव का अनिल और हताडी गांव का श्रवण. रागिनी आगे बताती है, ‘उन्होंने मुझे कुछ सुंघाकर बेहोश कर दिया था. फिर जब होश आया तो मैं खेतों के बीच बने एक पानी के पंप वाले कमरे में थी. वो चारों मुझे नोच रहे थे. अपने मोबाइल पर गंदी फिल्में देखते, हंसते और फिर मुझे नोचते. चार दिनों तक मैं बिना कपड़ों के रही. फिर वे मुझे कुरुक्षेत्र और फिर पानीपत ले गए. मैंने अपनी शादी में मिले कुछ गहने पहने थे. एक जोड़ी बालियां, पाजेब और एक अंगूठी थी. सब बेच दिया और आखिर में मुझे एक फटा-पुराना सलवार कुर्ता पहनने के लिए दिया. में इतनी जख्मी थी कि बेहोश हो चुकी थी. मैंने उनसे मुझे छोड़ने की मिन्नतें कीं लेकिन वे हंसते और फिर मुझे नोचने लगते. तभी मुझे मौका मिला और मैंने चुपके से अपने पापा को फोन कर दिया. फिर पुलिस मुझे लेने आई. लेकिन तब तक पांच दिन गुजर चुके थे.’

‘जरा सी कंघी कर लूं या गर्मी लगे और खाट आंगन में निकाल कर लेट जाऊं तो मेरा देवर और जरा-सी ननद पूछते हैं कि अब किसको बुलाएगी, दिल नहीं भरा?’

रागिनी और उसके परिवार का कहना है कि माफी इस साजिश में शामिल थी लेकिन उन्हें उसे पुलिस हिरासत से बाहर निकलवाना पड़ा. संतोष बताती हैं, ‘मामला पुलिस में जाने के बाद हमें पता चला कि चारों लड़के हमारी ही बिरादरी के हैं. पहले तीन महीने तो गांववालों ने साथ देते हुए कहा कि माफी को बाहर निकाल लो, बाकी लड़कों को अंदर ही रहने दो. सब कह रहे थे कि अब रागिनी इदान गांव की बहू है और माफी बनवास गांव की इज्जत. बहुत दबाव की वजह से हमें माफी के खिलाफ सारे आरोप वापस लेने पड़े. फिर यही चक्कर चारों लड़कों के लिए भी शुरू हो गया. बिरादरी के लोग दस दिन तक हमारे दरवाजे पर बैठे रहे. उन लड़कों के गांवों के बड़े-बूढ़े भी आ गए. रागिनी के सासरे वालों का भी दबाव था. वे कह रहे थे कि उनके लड़के की जान को खतरा है. लड़की की दूसरी शादी तो होती नहीं और ये लोग भी उसे ससुराल नहीं ले जाते. फिर हमें बयान बदलना ही पड़ा.’

रागिनी कहती है, ‘मेरे बस में कुछ नहीं था. ससुरालवालों को लगता था कि केस चला तो उनकी बदनामी होगी. फिर इनकी जान को भी खतरा था. सबने कहा कि अगर ससुराल में रहना है तो अदालत में बयान बदल दूं. अदालत को बता दूं कि मेरे साथ कोई बलात्कार नहीं हुआ था, कि उन पांच दिनों में मैं अपने ससुराल में थी और अस्पताल की रिपोर्ट इसलिए ऐसी आई क्योंकि मैंने अपने पति के साथ संबंध बनाए थे. मैंने वही कह दिया. वहां बिरादरी के सारे लोग थे. मैं सच नहीं बोल सकती थी.’ 24 अप्रैल, 2013 को अत्तिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश मनीषा बत्रा ने झूठा बयान देने के आरोप में रागिनी को 10 दिन की कैद और 500 रु के जुर्माने की सजा सुना दी. रागिनी के मामले को बलात्कार पीड़ित महिलाओं पर पड़ने वाले सामाजिक दबाव और पुनर्वास नीतियों की नामौजूदगी का उदाहरण बताते हुए राष्ट्रीय जनवादी महिला समिति की उपाध्यक्ष जगमति सांगवान कहती हैं, ‘यह बलात्कार के सबसे वीभत्सतम मामलों में से है. न्यायपालिका भी लड़की पर पड़ रहे दबाव को महसूस नहीं कर पाई और उसी को सजा दी गई. और यह सब जस्टिस वर्मा कमेटी की सिफारिशों के लागू होने के बाद हो रहा है. साफ है कि नए कानून भी महिलाओं को न्याय दिलाने में असफल हो रहे हैं.’

इस बीच रागिनी की जिंदगी का नरक जारी है. पुलिस में शिकायत करने की बात करते ही वह कहती है, ‘सवाल ही पैदा नहीं होता. यहां सबको यही लगता है कि मैं ही दोषी हूं. सब कहते हैं कि मैं उन लड़कों को जानती थी और खुद उनके साथ मजे उड़ाने के लिए भाग गई थी. जरा सी कंघी कर लूं या गर्मी लगे और खाट आंगन में निकाल कर लेट जाऊं तो मेरा छोटा-सा देवर और जरा-सी ननद पूछते हैं कि अब किसको बुलाएगी, अभी तक दिल नहीं भरा. सब बदचलन और घटिया लड़की कहते हैं. मेरी सास कहती है कि मैं खराब हो गई हूं इसलिए मुझे अभी तक बच्चा नहीं हुआ. मेरा पति भी नहीं समझता. कहता है कि मैं अपनी मर्जी से ही भागी थी. मैं सांस नहीं ले पाती और आप पुलिस में शिकायत की बात कर रही हैं? इसमें मेरी क्या गलती थी? मेरी तो बहुत इच्छा है कि उन चारों को कड़ी से कड़ी सजा मिले. लेकिन मेरे चाहने से क्या होता है? मेरे हाथ में कुछ भी नहीं है. सिर्फ चुप रहना है. इसलिए मैं चुप रहती हूं.’ 

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बांदा, उत्तर प्रदेश | दिसंबर 2010

‘बिरादरी नाराज है क्योंकि हमने अन्याय के खिलाफ कुछ ज्यादा ही जोर से आवाज उठा दी’

पहले तो सारी दुनिया ने पूछा, लेकिन अब परिवार तक साथ नहीं. फिर भी पिछले ढाई साल से नीलू एक स्थानीय विधायक के खिलाफ अकेले लड़ रही है

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अपने काले ट्रैक सूट और बालों के कसे हुए जूड़े के साथ खेतों में घूमती नीलू निषाद के अपने व्यक्तित्व में भी उतना ही तीखा विरोधाभास है जितना खांटी बुंदेलखंडी इलाके में बनी उसकी एक कमरे की झोपड़ी और उसके पहनावे में. हम उत्तर प्रदेश में बांदा जिले के शाहबाजपुर गांव में हैं. नीलू से हमारा परिचय बुंदेलखंड के एक पिछड़े इलाके में रहने वाली निचली जाति की एक ऐसी लड़की के तौर पर होता है जो पिछले ढाई साल से राजनीतिक रूप से मजबूत, एक स्थानीय सवर्ण विधायक के खिलाफ एक खतरनाक कानूनी लड़ाई अकेले लड़ रही है. नीलू के मुताबिक बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के स्थानीय विधायक पुरुषोत्तम नरेश द्विवेदी ने उसके साथ दो बार बलात्कार किया, उसे भयानक शारीरिक प्रताड़ना दी गई और फिर द्विवेदी ने अपने गुर्गों की मदद से उसी पर चोरी का आरोप लगाकर उसे जेल भिजवा दिया. तब वह सिर्फ 17 साल की थी.

शारीरिक हिंसा के मामलों में पीड़ित की पहचान गोपनीय रखे जाने से संबंधित कई लिखित और अलिखित कानून मौजूद हैं. इसके बावजूद बांदा का नीलू कांड भारत में बलात्कार का एक ऐसा दुर्लभ मामला है जिसे पहचाना ही पीड़िता के नाम से जाता है. भारत के सबसे पिछड़े इलाकों में शुमार बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में रहकर सत्ताधारी पार्टी के स्थानीय विधायक के खिलाफ इंसाफ की लड़ाई लड़ने की पूरी प्रक्रिया ने नीलू को भावनात्मक तौर पर एक मजबूत इंसान में तब्दील किया है. लेकिन थोड़ी-सी बातचीत के बाद जब उसकी हिचक खुलती है तो पता चलता है कि वह अपना यही नाम बदल कर कहीं दूर चले जाना चाहती है. एक सामान्य जीवन जीना चाहती है. नीलू कहती है, ‘मोहे कुछ नहीं करना इन पार्टी और राजनीति से. एक बार फैसला आ जाए फिर मैं कहीं दूर चली जाऊंगी. जहां कोई मेरा नाम ‘नीलू’ नहीं जानता हो. इतने सारे लोग मिट्टी-मजूरी करके जी रहे हैं शहरन में, मैं भी गारा-मिट्टी करके दो रोटी कमा लूंगी.’

यह कहते-कहते वह खामोश हो जाती है. और यहीं साफ दिखता है कि पत्थर की सी इच्छाशक्ति रखने वाली यह लड़की भावनात्मक रूप से कितना टूट चुकी है. नीलू से आगे बात करते हुए  उसके विरोधाभासी व्यक्तित्व की परतें भी सामने आने लगती हैं जो एक लंबी सामाजिक और कानूनी लड़ाई से उपजी हैं.

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