‘कश्मीर मसले पर पाक के साथ-साथ हुर्रियत से भी बातचीत जरूरी’

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नए लोग पुराने लोगों से बिल्कुल अलग होते हैं. पुराने लोगों को ये समझने में समय लगेगा कि नए लोग आखिर हैं क्या. यही कारण है कि नए और पुराने लोगों के बीच बातचीत की कमी है. राहुल बातचीत की कमी की इस स्थिति को खत्म करने का कोशिश कर रहें हैं. उन्हें राजनीति की बारीकियों को समझना होगा. यह कोई छोटी बात नहीं. आपको आम जनता के स्तर पर आना होगा. युवा लोगों को जनता के दुख को समझकर उनसे बात करनी होगी तभी उन्हें ये महसूस होगा कि आप उनके साथ हैं. जब मैं डॉक्टर था तो मुझे सिखाया गया था कि लोगों का इलाज उन्हें मरीज समझ के मत करो. उनसे बात करो और उनका इलाज शुरू करने से पहले ही उनका भरोसा हासिल कर लो. युवा राजनीतिज्ञों को भी यही करना चाहिए. अावाम को सब्र के साथ सुनें.

क्या अब राहुल इस ओर कोशिश कर रहे हैं?

हां, वह कोशिश कर रहे हैं. आप खुद भी इसे देख रहे हो. पहले वह संसद में कभी नहीं बोलते थे, मगर अब काफी मुखर हो गए हैं.

कश्मीरी पंडितों के लिए टाउनशिप को लेकर आप क्या राय रखते हैं? नेशनल कॉन्फ्रेंस अपनी राय पर बहुत कड़ी रही है और घोषणा कर चुकी है कि समुदाय की समस्या के लिए अलग से निपटारे के वह खिलाफ है.

जब मैं जम्मू कश्मीर का मुख्यमंत्री था तब हालात बहुत आसान थे. उनके पास (कश्मीरी पंडित) के पास अपनी जमीनें थीं और उन्होंने उसे बेचा भी नहीं था. आज हालात ये हैं कि कश्मीरी पंडितों ने अपने घर और जमीनें बेच दी हैं. बहुत ही कम ऐसे हैं जो अब भी अपनी जायदाद रखे हुए हैं. मैं उनसे ये नहीं कहने जा रहा कि वे आएं और हब्बा कादल में अपनी समस्याएं सुलझा लें, जहां उन्होंने अपनी जायदाद मुस्लिमों को बेच दी हैं. आप यह नहीं चाहते हो हिंदुओ और मुस्लिमों के बीच कोई मतभेद पैदा हो और न ही आप ये हालात बनाना चाहते हो जहां मुस्लिम ये सोचने लगें कि कश्मीरी पंडित उन पर हावी हो रहे हैं या फिर कश्मीरी पंडित ये सोचने पर मजबूर हों कि मुस्लिम उन पर हावी हो रहे हैं, इसलिए मेरा मानना है कि यहां हमें मुस्लिम नेताओं, दिल्ली में कश्मीरी पंडितों और सिखों से बातचीत करनी चाहिए. फिर किसी समाधान की तलाश करें क्योंकि उन्हें ही साथ रहना है. अगर आप अलग तरीके से मामले को सुलझाना चाह रहे हो तो आपको हमेशा परेशानी में रहना होगा.  क्या आप चाहते हैं कि आप सेना के जवान के पहरे के बीच किसी  मुस्लिम इलाके से गुजरें? इसलिए आपको एक ऐसा रास्ता खोजना है, जहां आप सम्मान के साथ इस मसले को सुलझा सकें. किसी कौम विशेष के लिए टाउनशिप बसाने के बारे में सोचने से पहले आपको इन सब बातों का ध्यान रखना होगा.

क्या आपको किसी तरह का अफसोस है? क्या कुछ ऐसा है जिसके बारे में आप सोचते हैं कि आप इसे अलग तरीके से कर सकते थे?

मुझे नहीं लगता कि मुझे कोई अफसोस है. मैंने वह सबकुछ किया जो मैं करना चाहता था. हालांकि कुछ मामलों में मैं नाकाम रहा तो कुछ मामलों में मुझे कामयाबी भी मिली. आखिरकार गलतियां इंसान से ही होती हैं. मुझसे भी कुछ गलतियां हुई हैं, जिसके लिए मैं अल्लाह से माफी देने के लिए दुआ करता हूं.

क्या कश्मीर को लेकर आपके पास कोई ऐसा ख्वाब है जो अधूरा रह गया? अब आप इसे लेकर क्या तब्दीली करना चाहते हो?

हां, कश्मीर को लेकर मेरा एक ख्वाब है, मगर इसे मैं आपको नहीं बताऊंगा. जब मेरी किताब आ जाए तो आप इसे पढ़ लें.

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अब्दुल्ला मानते हैं कि हुर्रियत से भी बात करनी होगी, क्योंकि वे भी कुछ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं

लगता है कश्मीर मसला पहले से कहीं ज्यादा पेचीदा हो गया है क्योंकि भारत और पाकिस्तान के बीच हो रही बातचीत का कोई नतीजा नहीं निकल रहा है. दिल्ली में भी बहस सिर्फ धारा 370 को हटाने को लेकर ही हो रही है, स्वायत्तता बहाल करने पर नहीं. सरकार भी अलगाववादियों से बात नहीं करना चाहती. इस बारे में आपकी क्या राय है?

भारत और पाकिस्तान दोनों को मिल-बैठकर इस समस्या का ऐसा समाधान निकालना चाहिए, जिसे सभी, यहां तक कि कश्मीर के लोग भी स्वीकार करें. इसके अलावा कोई भी उपाय काम नहीं कर सकता. युद्घ इसका समाधान नहीं है- वे (भारत-पाक) इस तरह से कई बार कोशिश कर चुके हैं. महज बातचीत ही रास्ता है. इसके साथ ही आपको हुर्रियत से भी बात करनी होगी क्योंकि वे भी कुछ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं. हालांकि उनके खयालात बिल्कुल अलग हो सकते हैं. आखिर में आम जनता की राय ही अहम होगी. इसलिए अपने दरवाजे खोलिए, उन्हें बंद मत रखिए. आप ये नहीं कह सकते कि आप उनसे बात नहीं करने जा रहे. मुझे गृहमंत्री का बयान पढ़कर बुरा लगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार अलगावावादियों से बात नहीं करेगी और मुफ्ती से भी वह ऐसा ही चाहती है. मुफ्ती क्या कर सकते हैं, जब फैसला दिल्ली से होना है? इसलिए बातचीत के दरवाजे खोलिए. उन्हें (अलगाववादियों) पाकिस्तान से बातचीत करने दीजिए. भाई! ‘राज्य’ कहीं नहीं जा रहा. अगर चार लोग बातचीत के लिए पाकिस्तान जाते हैं तो हमें भी जाकर बातचीत करनी होगी. इससे आसमान नहीं टूट पड़ेगा. अगर आप बातचीत नहीं करते हो तो फिर इसका हल कैसे निकालोगे? इसका हल निकालने के लिए खुदा जमीं पर नहीं आएगा. हम यह पहले भी कह चुके हैं कि बीच-बचाव के लिए हम कोई तीसरी पार्टी नहीं चाहते. इस मसले पर मिलकर बातचीत करनी होगी.

क्या आपको लगता है कि भाजपा इसे और पेचीदा बना रही है?

एक बात मैं आपसे कहूंगा. अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान गए थे. क्या वो फारूक अब्दुल्ला को अपने साथ ले गए थे? नहीं न! क्यों? क्योंकि भाजपा की सोच थी कि ‘फारूक अब्दुल्ला जाएगा, अपनी बात कहेगा तो हम फिर क्या मुंह दिखाएंगे.’ एक तरफ तो आप कहते हो कि कश्मीर भारत का हिस्सा है, वहीं दूसरी तरफ इतनी हिम्मत भी नहीं कि आप कश्मीरियों को वहां (पाकिस्तान) ले जा पाएं. तब आप ये दावा कैसे कर सकते हो कि कश्मीर आपका है? आपके दिल में चोर है. पहले इसे निकालो. जब आप ऐसा कर लोगे तब आप इसके हल तक पहुंच जाओगे. दिल साफ कर बातचीत कीजिए, हर समस्या का एक हल होता है.

क्या आपको लगता है कि असहमतियों के लिए भी एक आजाद लोकतांत्रिक मंच होना चाहिए, जहां अलगाववादियों तक को भी अपनी बात रखने का मौका मिले?

मुझे लगता है कि मुफ्ती सबके लिए एक मंच बनाने में कामयाब होंगे. उमर फारूक या सईद अली शाह गिलानी या किसी और को गिरफ्तार कर वह ऐसा मंच तैयार नहीं कर सकते. आजादी का माहौल होना जरूरी है.

लेकिन जब आपकी हुकूमत थी तो नेशनल कॉन्फ्रेंस भी ऐसा ही कर रही थी.

नहीं, ऐसा नहीं है. जब तक कि वो पाकिस्तान का झंडा नहीं दिखाते, मुझे उन्हें मंच देने में कोई दिक्कत नहीं है. साथ ही उनसे बात करने में कोई दिक्कत नहीं, लेकिन क्या वे मुझसे बात करेंगे? गिलानी मुझसे बात नहीं करेंगे. गिलानी का उद्देश्य क्या है? पाकिस्तान! जो कभी नहीं होने जा रहा और जब ऐसा नहीं होने जा रहा तब आप मुझे बताइए कि आप किसे बेवकूफ बना रहे हैं. आपका (गिलानी) कोई भी सगा नहीं मरा है. अगर कोई मरा है तो वह है गरीब या कोई लाचार. आप लोगों पर बंदूक उठाने के लिए दबाव बनाते हो, नतीजन हजारों लोग मारे गए. हमें क्या मिला? क्या सरहद बदल गई? अगर सरहद एक भी इंच इधर-उधर हुई है तो मैं मान जाऊंगा. कुछ नहीं बदला. तो फिर ये तमाशा क्यों? मुझे लगता है कि पाकिस्तान को जवाब देने का सिर्फ यही (बातचीत) रास्ता है.

हाल ही में घाटी में पाकिस्तान का झंडा लहराने को लेकर बड़ा विवाद खड़ा करना जायज था?

कश्मीर में हमेशा से झंडे लहराए जाते रहे हैं. अहम ये है कि क्या इससे किसी तरह की तब्दीली आई या नहीं? क्या सरहद बदल गई? नियंत्रण रेखा (एलओसी) के दोनों तरफ सेनाएं अब भी तैनात हैं. क्या बदला? आप सिर्फ एक झंडा दिखा रहे हो और उसके बाद मीडिया में खूब हो-हल्ला मच जाता है. आम भारतीय सोचते हैं कि वे (जो पाकिस्तान का झंडा लहराता है) सीमा के उस पार के लोग हैं. इसकी वजह से हमें काफी नुकसान पहुंच रहा है. आज हिमाचल प्रदेश के पास एक भी ऐसी जगह नहीं जहां पर्यटक ठहर सकें. इसके अलावा दिल्ली से श्रीनगर की हवाई यात्रा के टिकट की कीमत तो देखिए. ये बहुत महंगे हैं. अफसोस है कि भारत सरकार इसे लेकर कुछ नहीं कर पा रही है. दिल्ली में कोई भी शख्स इस पैसे को दुबई और बैंकॉक जाने में खर्च कर सकता है. अगर टिकटों के दाम इतने महंगे होंगे तो कोई भी कश्मीर क्यों आएगा. यही समय है जब कश्मीर के लोगों को मदद की दरकार है. आपको हवाई यात्रा के किराए में 4000 से 3000 रुपये की कटौती करनी चाहिए ताकि आम लोग भी कश्मीर आ सकें.

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