गणतंत्र का गुड़गोबर

अरविंद शेष कहते हैं, ‘यह बात ध्यान रखना चाहिए कि कोई दलित मरी हुई खाल उतारेगा, उसकी यह ड्यूटी भी ब्राह्मणवाद ने ही तय की. आज वह खाल उतारते हुए पाया जाता है तो उसकी हत्या भी आप ही करते हैं. अब जब उन्होंने खाल उतारने का काम करने से इनकार कर दिया है तब आपको चाहिए कि आप अपना इंतजाम करें.’

‘बाबा साहेब ने बाकायदा लिखा है कि गाय को पवित्र बनाने और अछूत समस्या का आपस में संबंध है. पूरे वैदिक काल में ब्राह्मण मांस खाते थे. गाय और घोड़े का मांस खाया जाता था. लेकिन आगे जाकर बौद्धों और ब्राह्मणों के बीच संघर्ष हुआ तब ब्राह्मणों ने अपने को श्रेष्ठ दिखाने के लिए गोमांस खाना बंद कर दिया. तब से लेकर आज तक गाय और गोमांस को लेकर हो रही यह राजनीति चली आ रही है’

कंवल भारती भाजपा और संघ की राजनीति पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘जब जब आरएसएस-भाजपा सत्ता में आते हैं, वे यही करते हैं. वाजपेयी की सरकार थी तब ओडिशा में हिंदूवादियों ने ईसाई धर्मगुरु ग्राहम को जिंदा जला दिया था. इनका काम यही है. कभी लव जिहाद, कभी मंदिर-मस्जिद, कभी गोरक्षा के नाम पर लोगों को आपस में लड़ाते रहो. यह गोरक्षा खाए, पिए अघाए लोगों के दिमाग का फितूर है. इन्हें रोजी-रोटी की समस्या होती तो यही लोग ऐसे मुद्दे कभी उठाते ही नहीं. कोई काम नहीं है तो चलो गाय बचा लो. गरीब आदमी की हालत यह है कि वह मरी हुई गाय की खाल उतारकर अपनी जीविका चलाता है. अमीर अपनी राजनीति के लिए उसे पीटता है. यह सत्ता समर्थित अभियान है जिसके तहत कभी मुसलमान निशाना बनते हैं तो कभी दलित. इसके लिए उन्हें पैसे भी मिलते हैं और राजनीतिक समर्थन भी. चाहे ऊना की घटना हो, झज्जर की घटना हो या फिर देश के दूसरे हिस्सों में, पुलिस-प्रशासन सबको धता बताकर यह काम किया जा रहा है. क्योंकि जो राजनीति इसे समर्थन दे रही है वह यही चाहती है कि लोग आपस में लड़ते रहें तो दूसरे मसले पर बात न हो.’

अरविंद शेष कहते हैं, ‘मेरा स्पष्ट मानना है कि गाय का पूरा मसला संघ-भाजपा के लिए सिर्फ एक पर्दा है. पिछले दो सालों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार योजनाओं के स्तर पर स्थितियां खराब होती जा रही हैं. लोग अपना रोजगार कर सकें, जीवन चला सकें, इसके लिए हालात को लगातार मुश्किल बनाया जा रहा है. अंबानी-अडाणी के लिए कैसे रास्ते खोले जा रहे हैं, उस पर कहीं बहस नहीं है. वे सब बड़े मसले गाय की बहस में छिप जा रहे हैं. सारे महत्वपूर्ण मुद्दे जो नीतिगत फैसलों से जुड़े हैं, विदेशों से क्या समझौते हो रहे हैं, अमेरिका, इजराइल, ऑस्ट्रेलिया यहां लाकर क्या कचरा फेंक रहा है, जनता को इसकी कोई जानकारी नहीं है. जनता को यह जानकारी मिल रही है कि कहां गाय के लिए दंगा हुआ, किसने किसको मार दिया, गाय हमारी माता है, यही सब देश भर में चल रहा है.’

कांग्रेस नेता पीएल पुनिया आरोप लगाते हैं कि भाजपा और आरएसएस दलितों, पिछड़ों और आम जनता के सवालों से ध्यान हटाने के लिए यह सब दंगा-फसाद करते हैं. इसी बात को दूसरे शब्दों में अरविंद शेष बयान करते हैं, ‘गाय दरअसल एक पर्दा है जो सरकार को सवालों से बचाती है. शिक्षा बजट में कटौती, बालश्रम का नया कानून, दलित आदिवासी छात्रवृत्तियों को बंद करना, एक से डेढ़ लाख स्कूलों का बंद होना, आरक्षण खत्म करने की कोशिश करने जैसे जो बड़े सवाल हैं, वे सब गाय के नाम पर उठ ही नहीं रहे हैं. अकेले छत्तीसगढ़ में 25 हजार से ज्यादा स्कूल बंद हो गए. राजस्थान में 20 हजार स्कूल बंद हो गए. कुल मिलाकर डेढ़ लाख से ज्यादा स्कूल बंद हो गए हैं. कहीं मर्जर के नाम पर तो कहीं पीपीपी के नाम पर. सरकारी स्कूल में कौन बच्चे जाते हैं. वे गरीबों, दलितों और पिछड़े समुदाय के बच्चे हैं. वे सब के सब शिक्षा व्यवस्था से अपने आप बाहर हो जाएंगे. सरकार में बैठे लोग अलग-अलग फ्रंट पर अपने लोगों के जरिए सामाजिक मनोविज्ञान की दिशा तय करने में लगे हुए हैं.’

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पुनिया कहते हैं, ‘आरएसएस, भाजपा जानबूझ कर देश को ऐसे मसलों में फंसाए रहना चाहती हैं. फालतू के मसलों में फंसी हुई जनता उनसे सवाल नहीं पूछ सकेगी कि वे सत्ता में आने के बाद क्या कर पाए हैं. जितने वादे किए थे चुनाव में, वे सब अधूरे हैं. भाजपा जनता का विकास करने की जगह लोगों को आपस में लड़ा रही है. उन्होंने खुद गोरक्षा का मुद्दा उठाया था. ऐसे तत्वों को बढ़ावा दिया गया. अब जब जनता आपस में लड़ रही है तब वे डैमेज कंट्रोल करने के लिए ऐसा बयान दे रहे हैं. ऐसे बयान का कोई फायदा नहीं है क्योंकि हमले तो प्रधानमंत्री के बयान के बाद भी हो रहे हैं. दरअसल, भाजपा की नीति यही है कि जनता को आपस में लड़ाया जाए ताकि वह उसी में उलझी रहे. भाजपा शासित राज्यों में ही दलितों और पिछड़ों का आरक्षण खत्म किया जा रहा है. दूसरी तरफ उन पर अत्याचार किया जा रहा है.’

मंदिर में प्रवेश न देने, मरी गाय उठाने के लिए दलितों को अछूत घोषित कर देने या उसी काम के लिए उन्हें ‘सजा’ देने का क्रम अपनी ऐतिहासिकता में बेहद भयानक रहा है. प्रसिद्ध साहित्यकार और चिंतक प्रो. तुलसीराम ने अपनी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ में दलित जीवन का यथार्थ जिस तरह लिखते हैं, उसे पढ़कर समझा जा सकता है कि भारतीय समाज में दलितों की क्या हालत रही है

इतिहासकार रोमिला थापर कहती हैं, ‘लोगों को मारा जाना किसी भी हालत में जायज नहीं है. इसे तो स्वीकार नहीं किया जा सकता कि कोई भी विवाद ऐसा हो कि किसी इंसान की जान ले ली जाए. बाकी गोरक्षा का बहुत लंबा-चौड़ा इतिहास है. गोहत्या रोकने की बात तो इतिहास में पुरानी है, लेकिन गोरक्षा आंदोलन बाकायदा 19वीं सदी में शुरू हुआ. अब जिसकी राजनीतिक विचारधारा में यह आइडिया इस्तेमाल हो सकता है, वे इस्तेमाल करेंगे. हम लोग सिर्फ कह सकते हैं कि ऐसा मत कीजिए क्योंकि यह इंसानियत की बात है कि गोरक्षा का नाम लेकर आप किसी को जान से मार दें, यह ठीक नहीं है. लेकिन जिन्हें इस्तेमाल करना है वे करेंगे. इसका अंजाम क्या हो रहा है, यह आप देख ही रहे हैं. एक तरफ मिथ बढ़ाया जा रहा है कि गाय ये थी, गाय वो थी, दूसरी तरफ लोगों को मारने के लिए गाय का बहाना बनाया जा रहा है.’

अरविंद कहते हैं, ‘दलितों के इस आंदोलन का बहुत दूरगामी परिणाम होगा. यह बहुत अच्छा हुआ है. सामाजिक चेतना का विकास होगा. एक पूरा समुदाय जो मरे हुए जानवरों के निपटान के जरिए ही बहुत ही निम्न दर्जे की जिंदगी जीता था, अब उसी को उसने छोड़ दिया है. यह ऐसा काम है जिसे अब तक नहीं करने वाला समुदाय कभी नहीं करेगा. उस पेशे को उस समुदाय की सामाजिक हैसियत से जोड़ दिया गया था. गुजरात के दलितों द्वारा इस काम से इनकार करने का परिणाम एक सामाजिक बदलाव के रूप में सामने आएगा.’

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोधछात्र सुनील यादव कहते हैं, ‘वंदे मातरम, भारत माता की जय, गीता से होते हुए खतरनाक प्रतीकों की यह राजनीति गाय तक पहुंची है. गाय सबसे खतरनाक राजनीतिक प्रतीक थी जिससे मुस्लिम समाज के खिलाफ हिंदुओं की गोलबंदी हो सकती थी. इस दौर में दादरी का अखलाक इसी प्रतीकों की राजनीति का शिकार हुआ. ये हिंदुत्व और गाय के ठेकेदार कभी नहीं चाहते थे कि इन प्रतीकों की राजनीति में दलित शामिल हो जाएं. उन्हें तो हिंदुत्व के किसी भी प्रतीक के आधार पर मुस्लिमों का विरोध करना था जिससे नाराज और बिखरते हुए हिंदू समाज को एक साथ लाया जाए और अपना वर्चस्व कायम रहे. इसीलिए आप देखिए तत्काल रूप से हिंदुत्व के ठेकेदार ऊना के मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे और जब लगा कि पासा पलट गया है तो दलितों का हितैषी बनने की होड़-सी लग गई है. पर इस प्रसंग में मुस्लिमों को लेकर किसी का बयान नहीं आया. तो मामला साफ है इन तथाकथित हिंदुत्व के ठेकेदारों के लिए गाय एक राजनीतिक प्रतीक है न कि मां. इधर तमाम गोशालाओं में और गुजरात की सड़कों पर गायों की दुर्दशा देखकर इसे पुष्ट कर सकते हैं. सवाल सिर्फ एक है कि अपने वर्चस्व को बनाए रखने के इस खेल में उनके लिए सब हथियार हैं और सब शिकार भी.’

भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भी गोरक्षा और गाय के नाम पर सामाजिक व्यवहार और छुआछूत तय करने के रवैये से तंग आकर  बाबा साहब आंबेडकर ने अपने कई लेखों में धर्मग्रंथों के आधार पर यह साबित किया था कि प्राचीन काल में ब्राह्मण भी मांस, यहां तक कि गोमांस खाते थे. जब बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ, जिसकी सबसे बड़ी ताकत अहिंसा और जीव हत्या के निषेध में थी, तो उसके प्रतिकार में हिंदू धर्मगुरुओं और धर्मावलंबियों ने गोमांस का निषेध करके गाय को पवित्र जानवर घोषित किया.

कंवल भारती भी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘प्राचीन काल में गाय का मांस खाना आम बात थी. तमाम ग्रंथों में गाय का मांस खाने की बात लिखी है. जब महात्मा बुद्ध ने यज्ञों और पशु बलियों का विरोध शुरू किया तो ब्राह्मणों ने पलटी मारी और खुद को अहिंसक बना लिया. यह बाबा साहेब ने बाकायदा अपनी किताब में लिखा है.’

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फोटो : विजय पांडेय

‘राजनीति की बिसात पर गोमांस’ शीर्षक से अपने लेख में प्रो. राम पुनियानी लिखते हैं, ‘भाजपा और उसके संगी-साथियों के दावों के विपरीत स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में एक बड़ी सभा में भाषण देते हुए कहा था, ‘आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्राचीनकाल में विशेष समारोहों में जो गोमांस नहीं खाता था उसे अच्छा हिंदू नहीं माना जाता था. कई मौकों पर उसके लिए यह आवश्यक था कि वह बैल की बलि चढ़ाए और उसे खाए’(शेक्सपियर क्लब, पेसेडीना, कैलीर्फोनिया में 2 फरवरी, 1900 को ‘बौद्ध भारत’ विषय पर बोलते हुए) ‘ब्राह्मणों सहित सभी वैदिक आर्य, मछली, मांस और यहां तक कि गोमांस भी खाते थे. विशिष्ट अतिथियों को सम्मान देने के लिए भोजन में गोमांस परोसा जाता था. यद्यपि वैदिक आर्य गोमांस खाते थे तथापि दूध देने वाली गायों का वध नहीं किया जाता था. गाय को ‘अघन्य’ (जिसे मारा नहीं जाएगा) कहा जाता था परंतु अतिथि के लिए जो शब्द प्रयुक्त होता था वह था ‘गोघ्न’ (जिसके लिए गाय को मारा जाता है). केवल बैलों, दूध न देने वाली गायों और बछड़ों को मारा जाता था. (द कल्चरल हेरिटेज ऑफ इंडिया खंड-1, प्रकाशक रामकृष्ण मिशन, कलकत्ता, कुन्हन राजा का आलेख वैदिक कल्चर, पृष्ठ 217)

 जिग्नेश मेवाणी कहते हैं, ‘बाबा साहेब ने बाकायदा लिखा है कि गाय को पवित्र बनाने और अछूत समस्या का आपस में संबंध है. पूरे वैदिक काल में ब्राह्मण मांस खाते थे. गाय और घोड़े का मांस खाया जाता था. लेकिन आगे जाकर बौद्धों और ब्राह्मणों के बीच संघर्ष हुआ तो ब्राह्मणों ने अपने को श्रेष्ठ दिखाने के लिए गोमांस खाना बंद कर दिया. तब से लेकर यह गाय की राजनीति चली आ रही है.’

शोधछात्र सुनील कहते हैं, ‘हिंदू धर्म का मूल चरित्र ही दलित विरोधी है जैसा कि धर्मशास्त्र का इतिहास लिखते हुए तोकारेव ने कहा था कि ऊपर के तीन ही वर्णों के देवता थे और पूजा करने का अधिकार सिर्फ ऊपर के तीन वर्णों को ही था. शूद्रों को इससे बाहर रखा जाता था. हिंदू धर्म का पहला मुकाबला बौद्ध धर्म से हुआ. दमित और प्रताड़ित शूद्र बहुत तेजी से बुद्ध के पीछे होने लगे, तब ब्राह्मण धर्म अर्थात हिंदू धर्म ने अवतारों की कल्पना करते हुए धर्मशास्त्र के नियमों में ढील देते हुए अछूत जातियों को कुछ धार्मिक अधिकार दिए. लेकिन आज तक मंदिर प्रवेश या सामाजिक भेदभाव के तमाम मामलों में दलितों का भयानक अत्याचार जारी है. दलित का जीवन पशुओं से बदतर तब भी था और आज भी है.’

सुनील पूरे टकराव को वर्चस्व की राजनीति का नतीजा मानते हुए कहते हैं, ‘गाय का मामला पूरी तरह राजनीतिक है. वर्ण व्यवस्था के प्रकर्म में भयानक रूप से बंटे हिंदू समाज में दलित बहुत साजिश के साथ शामिल किए गए तो भी उन्हें हाशिये पर रख दिया गया. जब बार-बार हिंदू समुदाय के शोषित जातियों को लगता है कि हिंदू समाज में हमारा कोई अस्तित्व नहीं है तो वे अन्य धर्मों की तरफ ताक-झांक करने लगते हैं. तो सभी को हिंदू समाज में बनाए रखने के लिए सवर्ण हिंदुओं ने एक साजिश रची कि किसी तरह इस्लाम के प्रभुत्व का डर पैदा कर इन असंतुष्ट शोषित जातियों को अपने साथ बनाए रखा जाए. इसके बाद शुरू हुआ मुसलमानों के खिलाफ नफरत और जहर का दौर जिसमें उन प्रतीकों को चुना गया जिसके प्रयोग को लेकर मुस्लिम समाज में कुछ नाराजगी हो, विरोध हो.’  

‘गाय को पवित्र बनाकर लंबे अरसे से एक राजनीति चल रही है जिसे संघ परिवार दशकों से भुनाता आ रहा है. दलितों का उत्पीड़न कांग्रेस के समय भी होता रहा है, लेकिन मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद संघ परिवार के लोगों को किस तरह चर्बी चढ़ी है कि वे बेखौफ महसूस कर रहे हैं. इन्हें दिनदहाड़े अपराध करते हुए कोई डर नहीं है, बल्कि वे खुद वीडियो बनाकर प्रसारित करते हैं क्योंकि यह गारंटी है कि पुलिस उन्हें बचा लेगी’

इतिहासकार प्रो. डीएन झा कहते हैं, ‘गोरक्षा अभियान 19वीं शताब्दी में शुरू हुआ. दयानंद सरस्वती ने गोरक्षा समिति की स्थापना की थी. तबसे गाय को राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. धीरे-धीरे यह बढ़ता गया है. गाय को लेकर बीच-बीच में समस्या होती रही है. 1966 में विनोबा भावे के नेतृत्व में संसद का घेराव हुआ था, जिसपर बहुत बवाल हुआ था. बाद में यह अभियान कम हो गया. इधर कुछ दिनों से इसने फिर जोर पकड़ा है. सवाल ये है कि गाय को बचाइएगा तो दूसरे मवेशियों को क्याें छोड़ दीजिएगा? दूसरे, गाय के मरने के बाद उसे उठाने का काम या उसके निपटान का काम कौन करेगा? क्या तोगड़िया जी हटाएंगे? उसके लिए अब इन्हाेंने लोगों को मारना शुरू किया है. चलिए आप गाय को बचा लीजिए. लेकिन उसके मरने के बाद उसका क्या होगा?’                           

मंदिर में प्रवेश न देने, मरी गाय उठाने के लिए दलितों को अछूत घोषित कर देने या उसी काम के लिए उन्हें ‘सजा’ देने का क्रम अपनी ऐतिहासिकता में बेहद भयानक रहा है. प्रसिद्ध साहित्यकार और चिंतक प्रो. तुलसीराम ने अपनी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ में दलित जीवन का यथार्थ जिस तरह लिखते हैं, उसे पढ़कर समझा जा सकता है कि भारतीय समाज में दलितों की क्या हालत रही है. वे लिखते हैं, ‘उस समय एक परंपरा के अनुसार गांव का कोई भी हरवाहा अपने मालिक जमींदार के मरे पशु की खाल निकालकर उसे बेचने से बचे धन को अपने पास रख लेता था. ऐसे चमड़ों की कीमत प्रायः बीस रुपये होती थी… जब हमारे घर की कलोरी गाय मरी तो छह आदमी काड़ी पर ढोते हुए मुर्दहिया पर ले गए थे. मुन्नर चाचा कहने लगे थे कि उस छुट्टी में मैं चमड़ा छुड़ाना धीरे-धीरे सीख जाऊं ताकि भविष्य में इस चर्मकला में पारंगत हो सकूं… मैंने वैसा ही किया. इसके बाद मैं अनेकों बार इस तरह की चामछुड़ाई के अवसाद से पीड़ित रहा…’

बिहार विधानसभा चुनावों के समय आखिरी दौर के मतदान से ठीक एक दिन पहले भाजपा द्वारा यह विज्ञापन दिया गया था.
बिहार विधानसभा चुनावों के समय आखिरी दौर के मतदान से ठीक एक दिन पहले भाजपा द्वारा यह विज्ञापन दिया गया था.

दलित बस्ती की कारुणिक कथाओं के क्रम में वे आगे लिखते हैं, ‘इन्हीं गिद्ध प्रकरणों के दौरान गांव के जोखू पांडे का एक बैल मर गया. मुर्दहिया पर सारे कर्मकांड संपन्न हुए. जोखू के हरवाहे द्वारा चमड़ा छुड़ाए जाने के बाद उसी के घर की एक रमौती नामक महिला जो मुर्दहिया पर घास छील रही थी, उससे नहीं रहा गया.

वह डांगर के लालचवश खुर्पा लेकर गिद्धों से भिड़ गई और मरे हुए बैल का कलेजा काटकर घास से भरी टोकरी में छिपाकर ले आई. मेरे साथ अनेक दलित बच्चे यह नजारा देख रहे थे. सभी चिल्लाने लगे: ‘रमौती घरे डांगर ले जाति हौ.’ यह खबर चाचा चौधरी तक पहुंच गई. दो दिन बाद पंचायत बुलाई गई. रमौती के परिवार को कुजाति घोषित कर दिया गया और उसका सामाजिक बहिष्कार हो गया. यह बड़ा प्रचंड बहिष्कार था. बिरादरी में शामिल होने के लिए उन्हें सूअर-भात की दावत देनी पड़ी जिससे रमौती का परिवार भारी कर्ज में डूब गया.’

प्राचीन भारतीय समाज में पशुधन लोगों की प्रमुख संपत्ति रहा है. भूमिहीन और मजदूर तबके के लिए यह जीविका और पोषण का एकमात्र साधन रहा है. मरे हुए जानवरों जैसे गाय, भैंसें और अन्य पालतू जानवरों से भी लोग आपना पेट पालते थे. भारतीय समाज की आर्थिकी में भी गाय और गोवंश की अहम भूमिका रही है. गाय के पवित्र घोषित हो जाने का फायदा जिसे भी हुआ हो, लेकिन इससे उन लोगों के पोषण और जीविका पर प्रहार हुआ जिनके लिए पेट भरने का एकमात्र साधन जानवर था. मरे हुए मवेशियों को उठाकर अपनी जीविका चलाने वाला दलित समाज अपने उसी पेशे के लिए अछूत घोषित हुआ और अब उसी के लिए उसे प्रताड़ित किया जाना न सिर्फ मानवाधिकार का मसला है, बल्कि एक बड़े समुदाय की पहचान और गरिमापूर्ण जीवन पर प्रहार है. अब सवाल है कि क्या दलितों का आंदोलन उनके लिए भारतीय समाज में नए कपाट खोलेगा?