गीताप्रेस में महाभारत

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इस विवाद के बाद से गीताप्रेस के सभी कर्मचारियों ने काम ठप कर दिया है, जिसकी वजह से धार्मिक पुस्तकों के प्रकाशन का काम पूरी तरह से रुक गया है. कर्मचारियों का कहना है कि जब तक निलंबन वापस नहीं लिया जाता कर्मचारी काम पर नहीं लौटेंगे.  उधर, गीताप्रेस के बंद होने की अफवाहों के बीच प्रबंधन ने एक विज्ञप्ति जारी कर इसका खंडन किया है. विज्ञप्ति में प्रबंधन ने कहा है, ‘कुछ मीडिया संस्थान गीताप्रेस के खिलाफ भ्रामक प्रचार कर रहे हैं. गीताप्रेस बंद नहीं हुआ है, केवल कर्मचारियों की हड़ताल की वजह से काम बंद हुआ है. संस्थान न तो बंद होने की स्थिति में है और न ही इसे बंद होने दिया जाएगा. किसी तरह की कोई आर्थिक समस्या भी नहीं है. कर्मचारियों की अनुशासनहीनता के कारण प्रबंध तंत्र पिछले एक साल से परेशान है. पिछले दिनों हद पार करते हुए कर्मचारियों ने सहायक प्रबंधक से मारपीट की, जिसके बाद कुछ कर्मचारियों को निलंबित किया गया है.’ विज्ञप्ति में यह भी स्पष्ट किया गया है कि गीताप्रेस किसी तरह का कोई चंदा नहीं लेता है. साथ ही लोगों से अपील की है कि वे गीताप्रेस के नाम पर किसी को चंदा न दें.

सन 1923 में अपनी स्थापना के बाद से गीताप्रेस में 55 करोड़ से ज्यादा पुस्तकों का प्रकाशन हो चुका है. यहां से 11 भाषाओं में श्रीमद्भगवतगीता का प्रकाशन होता है. गीताप्रेस के 92 साल के इतिहास में कर्मचारी आंदोलन की यह पहली घटना है. बहरहाल ये मामला एक बार फिर उपश्रमायुक्त के दरबार में है. यहां कर्मचारियों और प्रबंध तंत्र के बीच जल्द ही बातचीत होने वाली है. इसका क्या नतीजा होगा यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इस विवाद ने उन पाठकों को सबसे ज्यादा मायूस किया है जो यहां की धार्मिक पुस्तकों के मुरीद हैं.

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