दिल्ली चुनाव: किरण भरोसे भाजपा

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खैर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व जिस किरण बेदी को मास्टरस्ट्रोक समझकर ले आया था उस किरण को लेकर पार्टी के भीतर ही कलह मची हुई है. किरण बेदी के मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित होने के बाद से ही ऐसी खबरें आनी शुरू हो गईं कि तमाम प्रदेश भाजपा के नेता किरण को पार्टी में शामिल करने और उन्हें तत्काल मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने से दुखी हैं. नाखुशी जाहिर करने की शुरुआत उत्तर पूर्व दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी ने की. उनका कहना था कि जो दो दिन पहले पार्टी में शामिल हुआ वो मुख्यमंत्री का उम्मीदवार कैसे हो सकता है. तिवारी ने कहा, ‘मुझे किरण बेदी के व्यवहार से आपत्ति है. हमारे दिल्ली के कई कार्यकर्ताओं ने कहा कि वो एक डिक्टेटर की तरह बात करती हैं. दिल्ली को नेता चाहिए थानेदार नहीं.’ मनोज तिवारी ने ये बयान किरण बेदी के मुख्यमंत्री घोषित होने से पहले दिया था.

केजरीवाल ने एक ऐसी राजनीति की शुरुआत हुई की दिल्ली शहर को शांघाई बनाने की नहीं बल्कि मुफ्त पानी और बिजली देने की बात कर रही थी

दिल्ली भाजपा के कई नेता किरण बेदी के मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किए जाने से इस कारण भी नाराज थे क्योंकि इस निर्णय के लिए न तो उनसे सलाह ली गई थी और न ही उन्हें सूचित किया गया था. प्रदेश भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘हम लोगों को भी टीवी से ही पता चला कि वो आ रही हैं. शीर्ष नेतृत्व ने न तो प्रदेश के नेताओं से सलाह-मश्विरा किया और न ही हमें कोई सूचना दी थी. प्रदेश नेतृत्व को इस पूरे निर्णय से बाहर रखा गया.’ मीडिया से बातचीत में पार्टी के वरिष्ट नेता जगदीश मुखी ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि किरण बेदी के बारे में प्रदेश भाजपा से कोई सलाह नहीं ली गई. मुखी के मुताबिक अब पार्टी की प्राथमिकताएं बदल गई हैं. जगदीश मुखी वही नेता हैं जिनको भाजपा का मुख्यमंत्री उम्मीदवार बताते हुए आप ने ऑटो के पीछे अरविंद से तुलना वाले विज्ञापन लगवाए थे. एक तरफ जहां किरण के मुख्यमंत्री घोषित होने के बाद नेताओं में नाराजगी है, उसी दौरान जारी हुई भाजपा के प्रत्याशियों की सूची ने कोढ़ में खाज का काम किया. सूची सामने आने के बाद प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय के समर्थकों ने उन्हें महरौली से टिकट देने व मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाने की मांग करते हुए प्रदेश कार्यालय में हंगामा किया. इसी तरह के विरोध प्रदर्शन अभय वर्मा, शिखा राय, जय भगवान अग्रवाल, नकुल भारद्वाज सहित कई नेताओं के समर्थकों ने भाजपा मुख्यालय पर किया.

टिकट न मिलने से नाराज पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘ये तो गलत बात है. एक कार्यकर्ता अपना पूरा जीवन पार्टी के लिए लगाता है. दरी बिछाने, कुर्सी लगाने और पोस्टर चिपकाने से वो शुरुआत करता है. जिस समय उसकी उम्र वाले नौकरी कर रहे होते हैं, अपने जीवन को दिशा दे रहे होते हैं, कार्यकर्ता घरवालों से गाली सुनते हुए भी पार्टी के लिए लगा रहता है. दूसरों को जिताने में ही उसके जीवन का 90 फीसदी हिस्सा खर्च हो जाता है. देश की राजनीति को देखते हुए एक आम राजनीतिक कार्यकर्ता को उसके बाल सफेद होने के बाद ही कुछ बनने का मौका मिलता है. अब आपको पता चले कि 40 साल से जो तपस्या आप कर रहे थे उस पर पार्टी ने किसी बाहरी को लाकर बिठा दिया है, तो आपके शरीर में क्या आग नहीं लगेगी. बात टिकट कि नहीं है. सीएम बनने की नहीं है. यह अनैतिक है और अमानवीय है. आप ऐसा करेंगे तो फिर कौन नया लड़का पार्टी की दरी बिछाने आएगा. पैराशुट से जब नेता आने लगते हैं तो फिर कार्यकर्ता पैदा करनेवाली भूमि बंजर हो जाती है.’ आगामी विधानसभा चुनाव में बूथ संगठन का काम देख रहे स्थानीय भाजपा नेता हरबंस डंकल कहते हैं, ‘नाराजगी तो स्वाभाविक है. हर आदमी सोचता है कि भाई इतने सालों से पार्टी में लगे हुए हैं, इसलिए मुझे मौका मिलना ही चाहिए.’

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आरती मेहरा इसे अलग तरीके से देखती हैं. वो कहती हैं, ‘कुछ लोग नाराज हो सकते हैं. मैं भी सोच रही थी कि मालवीय नगर से लड़ूंगी लेकिन पार्टी ने टिकट नहीं दिया. कोई बात नहीं. मैंने अपने कार्यकर्ताओं को मना लिया. सभी को परिवर्तन के लिए तैयार रहना चाहिए.’ किरण बेदी को लेकर नेता-कार्यकर्ता तो नाराज हैं ही खुद किरण बेदी के लिए उनका गुजरा हुआ कल बशीर बद्र के शेर ‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिंदा न हों’ की याद दिला रहा है. बीते वर्षों में कई मौकों पर किरण ने ट्विट करते हुए भाजपा और नरेंद्र मोदी को लेकर तमाम ऐसी बातें कहीं हैं जो आज उनके लिए शर्मिंदगी का सबब बन रही हैं. जैसे- 16 अप्रैल 2013 को किरण बेदी ने ट्वीट किया था कि, ‘भले ही कोर्ट ने नमो (मोदी) को क्लीनचिट दी है पर एक दिन उन्हें दंगों को लेकर लोगों के सामने अपनी सफाई पेश करनी ही होगी.’ अन्ना आंदोलन के समय का उनका एक ट्वीट था कि ‘दोनों (कांग्रेस और बीजेपी) ही पार्टी देश को शर्मसार करनेवाली हैं, ये पार्टियां इस लायक भी नहीं की हम इन्हें वोट करें.’ आज मीडिया समेत विपक्षी दल बेदी से इस हृदय परिवर्तन का कारण पूछ रहे हैं. सबसे ज्यादा सवाल आप के लोग कर रहे हैं, क्योंकि किरण बेदी ने यही कहते हुए उनसे किनारा किया था कि वे राजनीति में कभी नहीं आएंगी और अब दो साल के भीतर ही वो सक्रिय राजनीति में पूरी तरह से घुस गई हैं. उन्हें इन सवालों का सामना करने में पसीने छूट रहे हैं.

भाजपा के तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं में किरण बेदी को कमान देने और टिकट न मिलने से निराशा और सिर फुटौव्वल जारी है. इस कठिन घड़ी में संघ ने मोर्चा संभाल लिया है. संघ के एक प्रचारक कहते हैं, ‘क्या किया जाए. अब ये सब अपने में ही मारकाट मचाए हुए हैं. केंद्रीय भाजपा की तरफ से मदद की गुहार आई है. हमें भी पता है कि इस बार आप की वजह से नहीं, बल्कि जिस तरह से आपस में ही जूतमपैजार मची हुई है, उसकी वजह से भाजपा की हालत खराब होनेवाली है. इसलिए संघ कार्यकर्ताओं ने कमान संभाली है. तमाम सीटों पर पुराने भाजपाई पार्टी प्रत्याशी के खिलाफ काम कर रहे हैं.’

संघ के साथ ही विश्व हिंदू परिषद की महिला शाखा दुर्गावाहिनी ने भी महिलाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए अभियान शुरू किया है. पार्टी के एक विधानसभा उम्मीदवार कहते हैं, ‘यह सही है कि दुर्गावाहिनी को महिलाओं को जोड़ने के लिए प्रचार में उतारा गया है. इसकी जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में ऐसा देखने में आया कि कई घरों में पुरुषों ने तो भाजपा को वोट किया था, लेकिन उसी घर कि महिलाओं और लड़कियों ने आप को अपना मत दिया था. ऐसा नहीं है कि वो सिर्फ भाजपा को वोट देने के लिए कहती हैं, बल्कि वो समाज की एक बड़ी समस्या लव जिहाद जैसे मसलों पर उनका वैचारिक जागरण भी कर रही हैं.’ हालांकि भाजपा इस बार के चुनाव में बिना किसी अड़ंगे के आसमान छूने का ख्याब देख रही थी. इसकी एक वजह यह भी थी कि दिल्ली की लोकसभा की सातों सीटें उसकी झोली में हैं. इसके साथ ही विधानसभा की कुल 70 सीटों में से 60 पर वह पहले नंबर पर थी. भाजपा किसी भी कीमत पर दिल्ली फतह करना चाहती है. जीत की इस बेचैनी के पीछे एक कारण यह है कि भाजपा ने लोकसभा चुनाव के बाद हुए सभी विधानसभा चुनाव जीते हैं, इसमें जम्मू कश्मीर भी है जहां सरकार भले ही नहीं बनी हो, लेकिन इतिहास में उसे पहली बार 25 सीटें हासिल हुईं हैं और सबसे अधिक वोट मिले हैं. तो फिर भाजपा दिल्ली को हारने का जोखिम नहीं ले सकती, वरना पूरी तरह से ध्वस्त विपक्ष के हाथ अरविंद केजरीवाल के रूप में एक बड़ा हथियार लग जाएगा.

दिल्ली में भाजपा की हार के बाद ये चर्चा शुरू हो जाएगी की मोदी को इस देश में कोई आदमी चुनौती दे सकता है तो वो केजरीवाल हैं

दिल्ली की जीत से भाजपा यह भी साबित करना चाहती है कि जनता में मोदी के प्रति दीवानगी अभी बरकरार है. पार्टी की यही सोच उसके लिए चुनौती भी है. अगर कहीं वो दिल्ली विधानसभा हार गई तो विरोधी मोदी लहरवाले नारे की हवा निकालने में जुट जाएंगे. इसका बुरा असर आगामी यूपी और बिहार विधानसभा चुनाव पर भी निश्चित रूप से पड़ेगा. यानी यह मामला सिर्फ दिल्ली जीतने का नहीं उससे कहीं बड़ा है. यह मोदी की छवि से भी जुड़ा है. हालांकि भाजपा के आलोचक यह भी कहने लगे हैं कि किरण बेदी को भाजपा ने बली का बकरा बनाया है. आलोचकों के मुताबिक अगर भाजपा जीतती है जीत का श्रेय मोदी के खाते में जाएगा और हार मिलती है तो ठीकरा किरण बेदी के सिर फोड़ दिया जाएगा. यानी भाजपा में भी कांग्रेसी संस्कृति पनपने लगी है.

एक महत्वपूर्ण कारण और भी है जिसकी वजह से भाजपा किसी भी कीमत पर दिल्ली को हासिल करना चाहती है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘देखिए पार्टी एक-एक कर सभी राज्यों में जीतती जा रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में यूपी में दलित राजनीति से लेकर समाजवादियों की राजनीति को हमने पटखनी दे दी है. बाकी राज्यों में भी कमोबेश वैसा ही हाल था. लालू-नीतीश सभी की राजनीति को हमने पंक्चर कर दिया. दिल्ली की गद्दी छोड़कर पिछले लोकसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल, मोदी को हराने बनारस पहुंच गए थे. ये आदमी हार तो गया लेकिन जिस शहर में पहली बार गया था वहां दो लाख से अधिक वोट पा गया था. बात यह है कि जहां मोदी लगभग सभी पार्टियों और नेताओं को चित करते जा रहे हैं वहां अगर दिल्ली के चुनाव में केजरीवाल जीतने में सफल रहा तो फिर से वही लड़ाई शुरू हो जाएगी जो बनारस में अरविंद की हार के साथ खत्म हो गई थी. दिल्ली में भाजपा की हार को हर हाल में मोदी विरोधी केजरीवाल के हाथों मोदी की हार के रूप में प्रचारित करेंगे. इससे एक और चर्चा शुरू होने की पूरी उम्मीद है कि इस देश में अगर कोई मोदी को चुनौती दे सकता है तो वह केजरीवाल ही हैं. मोदी किसी भी हाल में यह तो नहीं चाहेंगे. पार्टी की कोशिश केजरीवाल को सिर्फ हराना नहीं, बल्कि पूरी तरह से समाप्त कर देना है ताकि वो दोबारा से चुनौती देने के लिए खड़ा ही न हो सकें.’ जो डर मोदी-शाह के मन में बैठा है उसकी ताकीद मीडिया में आ रहे सर्वेक्षण भी कर रहे हैं. यानी पनघट की डगर कठिन है. बेदी कितना पानी भर पाती हैं, इस पर भाजपा और मोदी दोनों की निगाहें टिकी हुई हैं.

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  1. पुरानी पीढ़ी के भरोसे अमित शाह ५ -१० पार्टी चला लेंगे , उसके बाद पार्टी की वही हालत होगी जैसे आज कांग्रेस की है . लेकिन तब तक तो दोनों विदा हो जायेंगे . और बी जे पी बंजर हो चुकी होगी .

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