बिहार: दमित दलित

जानकारों की एक राय यह भी है कि एक दलित मुख्यमंत्री पद पर बैठा है जिसकी प्रतिक्रिया में निचले स्तर पर ताकतवर जातियां अराजक होकर ऐसी गतिविधियों को अंजाम दे रही हैं. हो सकता है कि जानकारों की राय सही हो, यह भी हो सकता है कि ये सारी वजहें एक साथ इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार हों, लेकिन बिहार की राजनीति में न तो अब ऐसे सवाल सत्ता के लिए महत्वपूर्ण रह गये हैं, न विपक्ष के लिए. राजनीति से जुड़े लोग इन सवालों पर कन्नी काटते हैं ज्यादा ईमानदार जवाब के लिए सियासत से इतर लोगों को ढूंढ़ना पड़ता है. लेकिन किसी के जवाब या बयान के पहले आंकड़ों के जरिये घटनाओं को समझना जरूरी है.

आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि बिहार में दलितों के खिलाफ अत्याचार की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. 2002 से 2005 के बीच दलित उत्पीड़न के 5,538 मामले दर्ज हुए थे. 2006 से 2009 के बीच यह संख्या बढ़कर 9,052 पर पहुंच गई. 2012 का आंकड़ा बताता है कि 4,950 घटनाएं इस एक साल के दौरान घटीं. इनमें 191 बलात्कार की घटनाएं थीं. यह संख्या घटती-बढ़ती रहती है. जब हम जनवरी 2013 के बाद के आंकड़ों पर नजर डालते हैं तब हमें समझ आता है कि यह अचानक से अपने चरम की ओर बढ़ने लगी हैं. जनवरी 2014 से अगस्त 2014 के बीच दलितों के खिलाफ अत्याचार के 10,681 मामले दर्ज हुए हैं. इनमें 91 हत्या के हैं. समाजशास्त्री डॉ. एस नारायण के पास इसका एक अलग तर्क है. वे कहते हैं, ‘स्वाभाविक तौर पर जीतन राम मांझी के सीएम बनने के बाद एक बड़े तबके में बेचैनी है और वह अराजक हुआ है, लेकिन बिहार की इन घटनाओं को सिर्फ मांझी फेज से जोड़कर देखने की जरूरत नहीं.’

एक मांझी को केंद्र में रखकर बिहार की राजनीति हो रही है और मीडिया भी उसी में उलझा हुआ है या यूं कहें कि मीडिया लोगों को उसी में उलझा रहा है. साल 2013 में बिहार में 580 चुने हुए जनप्रतिनिधियों की हत्या हुई, उसमें 60 प्रतिशत के करीब दलित-महादलित जातियों से थे. इस पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई. उस दौरान नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे और भाजपा उनकी सहयोगी थी. डॉ. नारायण कहते हैं, ‘ऊपरी तौर पर सियासी समीकरण बिठाने के लिए तमाम बयान दिये जा रहे हैं और उसमें ही बिहार की राजनीति उलझ गई है, जमीनी स्तर पर और लंबे समय तक महादलितों का लाभ हो, इसके लिए कुछ नहीं हो रहा है, बिहार में यह देखना महत्वपूर्ण है.’ वे आगे बताते हैं, ‘मांझी आज जो बयान दे रहे हैं, उसके आगे-पीछे भी दलितों की राजनीति और उनके विकास को समझना होगा. मांझी कोई एकबारगी से राजनीति में नहीं आये हैं. पिछले तीन दशक से राजनीति में हैं और कई महकमों के मंत्री रहे हैं. मांझी के साथ ही आठ और विधायक अभी महादलित समुदाय से आते हैं. इतने वर्षों में मांझी ने या किसी और महादलित नेता ने क्या कभी महादलितों के लिए समग्रता में विकास की कोई योजना बनायी. इससे आप समझ सकते हैं कि व्यक्तिगत सियासत को चमकाने के लिए महादलितों पर ज्यादा बात हो रही है, उनके विकास की बातें अभी भी हाशिये पर हैं.’

दलितों में चेतना आई है, वे प्रतिरोध कर रहे हैं. इसके विरोध में यथास्थितिवादी शक्तियां भी सक्रिय हो गई हैं, जो दलितों के खिलाफ अपने विरोध और प्रहार को लगातार तेज कर रही हैं

डॉ. नारायण की ही बातों को बिहार के मशहूर समाजशास्त्री एमएन कर्ण भी आगे बढ़ाते हैं. वे कहते हैं, ‘बेशक जीतन राम मांझी के सीएम बनने के बाद महादलितों में चेतना पैदा हुई है और उनमें उत्साह पैदा हुआ है लेकिन जो राजनीति में हो रहा है वह सब वोटबैंक को ध्यान में रखकर हो रहा है. बिहार सरकार ही बताये कि क्या उसके पास महादलितों की सामाजिक-शैक्षणिक स्थिति के सही-सही आंकड़े हैं. जवाब मिलेगा नहीं.’ राज्य अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य बबन रावत बिहार में दलितों और महादलितों पर बढ़ रही अत्याचार की घटनाओं की विवेचना अलग तरीके से करते हैं. वे कहते हैं कि दलितों पर अगर जुल्म बढ़े हैं, तो इससे यह साफ होता है कि दलित समाज अब मरा हुआ समाज नहीं रह गया है. कोई भी हमला जिंदा समाज पर होता है. इसलिए यह दलितों के सशक्तिकरण का ही एक पैमाना है.

जितने लोगों से बात होती है उतने मत सामने आते हैं. एएन सिन्हा इंस्टीटयू्ट ऑफ सोशल साइंस के निदेशक डॉ. डीएम दिवाकर मानते हैं कि आज बिहार में एक दलित मुख्यमंत्री हैं जो लगातार दलितों को जगने का आह्वान कर रहा है और इससे दलितों के उत्साह और विश्वास की वृद्धि हुई है. प्रतिरोध स्वरूप उन पर जुल्म भी बढ़ रहे हैं क्योंकि सदियों से जो समाज उन्हें नीची निगाह से देखता आया है वह दलितों के इस सशक्तिकरण को पचा नहीं पा रहा है. राज्य अनुसूचित जाति आयोग के ही एक और सदस्य विद्यानंद विकल मानते हैं कि यह सब इसलिए हो रहा है ताकि राज्य में अराजक स्थिति बने और लोगों में यह संदेश जाए कि एक दलित मुख्यमंत्री राज्य नहीं चला सकता और फिर अगले कुछ साल तक दलितों को फिर से मुख्यमंत्री पद पर नहीं बिठाया जा सके. विकल के अपने तर्क हैं और हो सकता है इसका भी सच्चाई से कुछ वास्ता हो. लेकिन इन घटनाओं और दलितों से जुड़े असल सवालों पर फिर भी कोई बात नहीं कर रहा.

जीतन राम मांझी दलितों की अस्मिता को उभारकर अगले विधानसभा चुनाव तक मजबूत वोटबैंक खड़ा करना चाहते हैं. नीतीश कुमार इस पूरी हलचल पर चुप्पी साधकर महादलित, अतिपिछड़ा, मुसलमान, कुरमी और यादव का एक नया समीकरण पनपते देख रहे हैं जिसमें अगला चुनाव जिताने की पूरी कूवत है. भाजपा सवर्णों की पार्टी बन चुकी है और वह साथ में कुशवाहा, बनिया, पासवान आदि को मिला लेने के बाद कुछ अतिपिछड़ों को अपने पाले में कर राजनीति को आगे बढ़ा रही है. इस बीच दलितों से जुड़े, महादलितों से जुड़े हुए कई सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब मांगे जाने चाहिए. मुख्यमंत्री मांझी से भी, नीतीश कुमार से भी और भाजपा से भी. मांझी महादलितों को पांच डिसमिल जमीन देने और आवासीय विद्यालयों में दलित छात्र-छात्राओं की संख्या बढ़ाने की रचनात्मक राजनीति करना चाह रहे हैं, जबकि भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल जैसे लोग दलितों से जुड़े जमीनी सवाल उठा रहे हैं. कुणाल कहते हैं कि जब खुलकर जाति की राजनीति ही हो रही है तो क्यों नहीं मांझीजी बंदोपाध्याय कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार जमीन का बंटवारा कर रहे हैं. आखिर बंदोपाध्याय कमिटी की रिपोर्ट तो नीतीश कुमार ने ही तैयार करवाई है और स्थायी विकास या भला चाहनेवालों को इससे क्या दिक्कत हो सकती है.

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‘यह सवर्ण बनाम दलित नहीं, पिछड़ा बनाम दलित की लड़ाई है’

प्रेम कुमार मणि

यूं तो बिहार में पहचान की राजनीति का दौर कई वर्षों से चल रहा है, लेकिन इन दिनों यह द्वंद्व-दुविधा से गुजरते हुए टकराव के मुहाने पर पहुंच गई है. कई वर्षों से पिछड़े नेता पहचान की राजनीति को चमका रहे थे, स्वाभाविक तौर पर अब उनके बाद उनके नीचेवालों की ही बारी थी.

इसी कड़ी में इन दिनों बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी जो बोल रहे हैं, उस पर बवाल मचाया जा रहा है. उनकी बातों पर बहस की जरूरत है, लेकिन कोई बहस के लिए तैयार नहीं है. मांझी जो बोल रहे हैं या जो कर रहे हैं, उससे यह साफ झलक रहा है कि वह नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की तुलना में ज्यादा सचेत नेता हैं. वह बार-बार दलित, महादलित, कुछ अतिपिछड़ों और आदिवासियों पर ही जोर दे रहे हैं. कभी उन्होंने समग्रता में पिछड़ी जातियों को एक समूह के तौर पर रखकर बात नहीं की. उन्होंने पिछले दिनों जब सवर्णों और अन्य को बाहरी कहा, तो यह भी कहा कि आदिवासी, दलित और कुछ पिछड़ी जातियां ही मूलवासी हैं.

मांझी इतिहास के छात्र रहे हैं, वह इंजीनियरिंग के छात्र नहीं हैं. उन्हें अतीत की समझ है, इसीलिए वह भविष्य की राजनीति का संकेत दे रहे हैं. बिहार में मांझी के पहले भी दो दलित मुख्यमंत्री बने थे. भोला पासवान शास्त्री और रामसुंदर दास. दोनों ही मजबूरी में बनाए गए थे, कठपुतली की तरह. दोनों ने कमोबेश कठपुतली की ही तरह काम भी किया. नीतीश कुमार की मंशा भी मांझी को कठपुतली की ही तरह चलाने की थी, लेकिन मांझी वैसे नहीं रह सके.

मांझी ने राजनीति का एक नया अध्याय शुरू कर दिया है और खुद ही एक बड़ी परिघटना बन गए हैं. उत्तर प्रदेश में जिस तरह से कांशीराम ने बैकवर्ड और दलित राजनीति को दो अलग छोरों पर ला खड़ा किया था, बिहार में मांझी भी वही काम कर रहे हैं.

भले ही आज इसे सतही तौर पर सवर्ण बनाम दलित राजनीति के घेरे में रखकर देखने की कोशिश हो रही है, लेकिन यह उचित नहीं है. मांझी का विरोध करनेवाले सिर्फ सवर्ण नहीं हैं और मांझी भी इस बात को समझ रहे हैं. इसीलिए वे बार-बार कह भी रहे हैं कि वह जिसे समझाना चाहते हैं, वह वर्ग उनकी बातों को अच्छी तरह से समझ रहा है. केसी त्यागी, शरद यादव, अनंत सिंह जैसे नेता लगातार मांझी का विरोध कर रहे हैं, लेकिन मांझी अपनी लय में हैं.

दूसरी ओर नीतीश समझ चुके हैं कि साल 1966 का इतिहास फिर से दुहराया जा रहा है. 1966 में इंदिरा गांधी को गूंगी गुड़िया समझकर प्रधानमंत्री बनाया गया था, लेकिन उस गूंगी गुड़िया ने भारतीय राजनीति में सबकी जुबान बंद कर दी थी. मांझी भी उसी राह पर हैं. अब बिहार की राजनीति दो खाने में बंटकर होगी. एक ओर दलित राजनीति, दूसरी ओर अपर बैकवर्ड पॉलिटिक्स. जो सवर्ण हैं, वे भी अपना ठिकाना तलाशेंगे. उनके लिए अपर बैकवर्ड से ज्यादा आरामदेह ठिकाना मांझी वाला होगा. चुनाव के पहले बहुत सारे सवर्ण नेता भाजपा में जाने की कोशिश करेंगे. भाजपा की एक सीमा होगी, वह सबको नहीं ले पाएगी. ऐसे में जो लोग बचेंगे, वे मांझी के नेतृत्व को स्वीकार करेंगे.

पहले उत्तर प्रदेश में यह देखा जा चुका है कि मुलायम से उकताया हुआ समूह मायावती के नेतृत्व में आ गया था, विशेषकर सवर्ण समूह. बिहार में भी वैसा ही होगा. अपर बैकवर्ड क्लास का राज पिछले तीन दशक से है. उससे उकताये हुए लोग नए नेतृत्व की तलाश करेंगे. उनका प्रतिनिधित्व अब मांझी करेंगे. आइडेंटिटी पॉलिटिक्स के इस दौर में मांझी बिहार में चैंपियन नेता बन चुके हैं. इस मायने में वह लालू और नीतीश को पीछे छोड़ चुके हैं.

मांझी की समझदारी पर भी गौर करना होगा. वह कभी किसी जाति के खिलाफ नहीं बोलते. वह सिर्फ दलित, आदिवासियों व अतिपिछड़ों के कुछ खास समूहों के पक्ष में बोल रहे हैं. वह सबसे तालमेल बिठाकर चल रहे हैं. वह केंद्र की भी प्रशंसा दिल खोलकर करते हैं और नीतीश का भी गुणगान करते हैं. वह बखूबी समझते हैं कि बिहार की राजनीति में आगे क्या होनेवाला है और उसके लिए उन्हें किस राह पर चलना चाहिए.

लेखक राजनेता व राजनीतिक विश्लेषक हैं. उनके विचार निराला से बातचीत पर आधारित हैं. 

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बंदोपाध्याय कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 21 लाख एकड़ जमीन है. यहां 17 लाख लोग भूमिहीन हैं. छह लाख लोगों के पास घर बनाने के लिए भी जमीन नहीं है. घोषणा ही करनी थी या कुछ करना ही था तो वही करते कि बंदोपाध्याय के बताये रास्ते के अनुसार 21 लाख एकड़ जमीन को गरीबों, दलितों, महादलितों, भूमिहीनों, घरहीनों के बीच बांट देते. महादलितों से जुड़ा एक अहम मुद्दा मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी और खुद मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के इलाके, गया से भी है, जहां हर साल दर्जनों बच्चे सुविधा, जागरूकता के अभाव में इंसेफलाइटिस की वजह से मर जाते हैं, जो बच जाते हैं वे जीवनभर विकलांग बने रहते हैं. अब तक ना तो नीतीश कुमार-भाजपा की सरकार की ओर से इस पर कोई ठोस पहल हुई थी और न ही जीतन राम मांझी की ओर से इस पर बात हुई है.

एक सवाल सीतामढ़ी के टेम्हुआ गांव का भी है, जहां कालाजार से 50 के करीब दलितों की मौत हुई है. सवाल तो यह भी है कि बिहार में जो अराजक स्थिति उत्पन्न हुई है, उसमें सबसे ज्यादा भूमिका हाल के वर्षों में नीतीश कुमार और भाजपा सरकार की ही देन रही है. नीतीश कुमार की सरकार ने ही अमीरदास आयोग को रिपोर्ट तैयार कर देने के बाद भंग कर दिया था, जिस अमीरदास आयोग की रिपोर्ट से इस बात का खुलासा होना था कि नब्बे के दशक में बिहार में हुए नरसंहारों में रणबीर सेना के जरिए राजनीतिक दलों के लोगों ने शामिल होकर तमाम कुकृत्य किए थे. इसका एक उदाहरण हाल के दिनों में दिखा, जब भाजपा के कोटे से केंद्र में मंत्री बने गिरिराज सिंह के बारे में (मानवाधिकार आयोग के आईजी अमिताभ दास) ने यह रिपोर्ट दी कि गिरिराज सिंह के संबंध रणबीर सेना से रहे हैं. गिरिराज सिंह मंत्री बन चुके हैं, माना जा रहा है कि अब अमिताभ दास को इसकी सजा मिलेगी.

मांझी के इर्द-गिर्द घूम रही राजनीति के चक्र में बिहार के सामयिक सवाल गायब हो चले हैं. अभी चुनाव में दस माह बाकी हैं लेकिन चुनावी जंग अभी से सिर चढ़ने लगी है. मांझी के बयान को बार-बार सवर्ण बनाम दलित नेता के रूप में दिखाने की कोशिश हो रही है. प्रेमकुमार मणि जैसे राजनीतिक विश्लेषक व नेता बार-बार बता रहे हैं कि सत्ता के शीर्ष की राजनीति से तो सवर्ण कई साल पहले ही आउट हो चुके हैं. दरअसल यह लड़ाई अब पिछड़ा बनाम दलित की लड़ाई हो चुकी है. मणि की बातें इस नए टकराव की तरफ इशारा करती हैं. मांझी अपनी बातों में कभी पिछड़ों की बात नहीं करते. वे बार-बार दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक और अतिपिछड़ा समूह की वकालत करते हैं. पिछड़े नेता ऊर्जा लगाये हुए हैं कि मांझी जिस नये राजनीतिक समूह का निर्माण कर रहे हैं, उसमें किसी तरह पिछड़ों को भी शामिल कर लें, लेकिन मांझी अपनी धुन में हैं. शायद वे जानते हैं कि पिछड़ों से दलितों को अलगकर ही वे आगे भी चैंपियन नेता बने रह सकते हैं, इसलिए वे बार-बार दुहरा रहे हैं कि दलितों की आबादी 22 प्रतिशत है. मुसलमान 16 प्रतिशत. बस यही मिल जाए तो किसी की जरूरत नहीं. मांझी खुद तहलका से बातचीत में कह चुके हैं कि वे ठेके-पट्टे में पिछड़ों को आरक्षण देने के पक्ष में नहीं हैं, वे दलितों के लिए और विशेषकर महादलितों के लिए आरक्षण चाहते हैं. मांझी तहलका से बातचीत में कह चुके हैं कि लालू यादव दलितों के हितैषी नेता नहीं हैं. मांझी तहलका से बातचीत में कह चुके हैं कि समय बतायेगा कि किसके नेतृत्व में चुनाव होगा. मांझी अपनी सारी बातें कह चुके हैं, कही हुई बातों के अनुसार ही राजनीति कर रहे हैं. वे नीतीश को भगवान भी कहते हैं, नरेंद्र मोदी को शानदार-जानदार प्रधानमंत्री भी कहते हैं. वे सत्ता की सियासत को साधने में ऊर्जा लगाये हुए हैं, दलितों की अस्मिता को उभारकर, लेकिन दलितों के मूल सवालों से मुंह चुराकर.

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