क्राउड फंडिंग : काम का नया फंडा

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‘देश में क्राउड फंडिंग को सिर्फ गरीबों की मदद करना समझा जाता है…’

क्राउड फंडिंग से बनी फिल्म ‘आई एम’ के निर्माता ओनीर ने कई ऑफबीट फिल्में बनाई हैं. ‘माई ब्रदर निखिल’, ‘बस एक पल’, ‘सॉरी भाई’ जैसी फिल्में बनाने वाले ओनीर से बातचीत

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फिल्म के लिए क्राउड फंडिंग कैसे की?

जब मैं ‘आई एम’ बना रहा था तो भारत में क्राउड फंडिंग की कोई वेबसाइट नहीं थी. मैंने सोशल मीडिया साइट्स के जरिए फिल्म के लिए पैसे जुटाए. सिर्फ फेसबुक, ट्विटर और ईमेल का इस्तेमाल किया. लगभग 400 लोगों ने इस फिल्म को बनाने में आर्थिक मदद की. जिन लोगों ने इसे बनाने में सहयोग किया है वो सभी इस फिल्म के सह मालिक हैं.

क्राउड फंडिंग की राह में किस तरह की मुश्किलें आईं?

भारत में लोग दान का मतलब सिर्फ गरीबों और लाचारों की मदद करना समझते हैं. दूसरे देशों में ऐसा नहीं है वहां लोग कला और मनोरंजन के लिए भी क्राउड फंडिंग करते हैं. जब सवाल लोगों से पैसा लेकर फिल्म बनाने का हो तो भारत में इसकी राह बहुत आसान नहीं है. ‘आई एम’ के लिए क्राउड फंडिंग जरूरत बन गई थी. फिल्म में अलग-अलग कहानियां हैं, पैसों की कमी की वजह से हमें सभी कहानियों को एक फिल्म में समेटना पड़ा. भारत में आप डॉक्युमेंट्री बनाने के लिए क्राउड फंडिंग करने की सोच भी सकते हैं. अगर फिल्म के लिए क्राउड फंडिंग करेंगे तो लोग उतनी मदद नहीं करते. भारत में लोग कला फिल्मों को उतनी तवज्जो नहीं देते हैं जितना दूसरे देशों में देते हैं.

क्या क्राउड फंडिंग स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं के लिए उपयोगी है ?

भारत में धीरे-धीरे बहुत से फिल्म निर्माता क्राउड फंडिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं. क्राउड फंडिंग का इस्तेमाल तब किया जा सकता है जब आप कोई फीचर फिल्म न बना रहे हों, किसी और काम के लिए पैसे जुटाना भारत में आसान है.

क्या आगे भी क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाएंगे ?

नहीं, मेरा मकसद सिर्फ फिल्म बनाना है इसलिए ‘आई एम’ के बाद मैंने क्राउड फंडिंग से फिल्म बनानी बंद कर दी. जैसा कि मैंने पहले भी कहा भारत में क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाना मुश्किल भरा काम है.

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‘अगर लोग मदद के लिए आगे नहीं आएंगे तो सामाजिक फिल्में बननी बंद हो जाएंगी’

पवन कुमार श्रीवास्तव ने 2012 में क्राउंड फंडिंग के जरिए ‘नया पता’ नाम की फिल्म बनाई थी. अब एक बार फिर इसी विधा के इस्तेमाल से वह ‘हाशिये के लोग’ नाम की फिल्म बना रहे हैं

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क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाने के बारे में कैसे सोचा?

जब मैंने ‘नया पता’ फिल्म बनाने की सोची तब मुझे क्राउड फंडिंग की कोई जानकारी नहीं थी. मैं फिल्म को लेकर मुंबई के निर्माताओं से मिला पर सभी ने पैसे लगाने से इनकार कर दिया. तभी मैंने क्राउड फंडिंग से बनी ओनीर की फिल्म ‘आई एम’ देखी. मैंने तब सोच लिया कि अगर ओनीर क्राउड फंडिंग से फिल्म बना सकते हैं तो मैं क्यों नहीं. मैंने भाई से 50 हजार रुपये लेकर फिल्म पर शोध करना शुरू किया. एक महीने तक क्राउड फंडिंग के बारे में जानकारी इकट्ठा की. फिर मैंने फिल्म से जुड़े कुछ फोटो और सारांश ईमेल से कुछ लोगों को भेजे. सोशल मीडिया पर भी फिल्म की जानकारी साझा की. पहले मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों ने मुझे 500 से 3000 रुपये तक चंदे के रूप में देना शुरू किया. फिर दूसरे लोगों ने मदद की.

क्राउड फंडिंग क्यों आैैर इससे क्या मिलेगा?

हम जहां रहते हैं वहां एक-दूसरे की मदद के बिना समाज नहीं चल सकता. अगर लोग इस तरह की मदद के लिए आगे नहीं आएंगे तो पैसों की कमी के चलते सामाजिक फिल्में बननी कम हो जाएंगी और सिर्फ बाजार आधारित फिल्में ही बना करेंगी. क्राउड फंडिंग से फिल्म बनाने पर जिम्मेदारी बढ़ जाती है. हम हर कदम उनके बारे में सोचकर उठाते हैं, जिन्होंने हमें मदद की है. वो हम पर नजर रखते हैं. अगर हम किसी निर्माता के पैसों से फिल्म बनाते हैं तो हमें लोगों की चिंता शायद ही होती.

लोगों से पैसे जुटाने में क्या मुश्किलें आईं?

भारत में क्राउड फंडिंग से कम ही लोग वाकिफ हैं. हमारे समाज में अगर फिल्म बनाने के लिए पैसे मांगो तो लोग पहले समझते है कि यह पैसा लेकर भाग जाएगा या बेवकूफ बना रहा है. वैसा ही मेरे साथ हुआ, लोगों को समझाना मुश्किल था. इसलिए मैंने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिले पैसों से फिल्म की शूटिंग शुरू की. फिल्म मैंने कई चरणों में बनाई ताकि इसका कुछ हिस्सा लोगों को दिखा कर क्राउड फंडिंग की जा सके. धीरे-धीरे लोग मदद को आगे आए और फिल्म का निर्माण पूरा हुआ.

आपने फिल्म को सिर्फ पीवीआर में रिलीज किया. ऐसे में वो तबका इससे महरूम रह गया जिसके लिए आपने यह फिल्म बनाई?

आपने मेरा इंटरव्यू क्यों लेना चाहा? इसलिए क्योंकि आपको ‘नया पता’ फिल्म की जानकारी है. अगर मेरी फिल्म रिलीज ही नहीं होती तो इसके बारे में किसी को पता भी न चलता. ऐसे तमाम स्वतंत्र फिल्म निर्माता हैं जो सरोकारी फिल्में तो बनाते हैं पर उसे रिलीज नहीं करा पाते. मेरा मानना है कि फिल्म का प्रदर्शन महत्वपूर्ण है. मेरे पास पैसे की कमी थी और ‘पीवीआर डायरेक्टर्स कट’ स्वतंत्र फिल्म निर्देशकों की फिल्म बगैर पैसे के रिलीज करता है इसलिए मैंने इसे पीवीआर में रिलीज कराया. सिंगल स्क्रीन और मल्टीप्लेक्स में फिल्म रिलीज कराने के लिए पैसों की जरूरत होती है. मैं अकेला इस फिल्म को उन लोगों तक नहीं पहुंचा सकता जिनके लिए इसे बनाया है. विदेशों में कई संस्थान हैं जो ऐसी फिल्मों को बिना पैसा लिए प्रदर्शित करते हैं. ऐसी व्यवस्था भारत में भी लागू होनी चाहिए.

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इस फिल्म को बनाने में किसी क्राउड फंडिंग वेबसाइट या संस्था का सहारा लिया?

2012 में भारत में क्राउड फंडिंग कराने वाली वेबसाइट नाममात्र की ही थी. मैंने तब ऐसा कुछ सोचा भी नहीं था. मेरी फिल्म लगभग बन चुकी थी तो ‘विशबेरी’ क्राउड फंडिंग वेबसाइट ने मदद देने की बात कही पर मैंने इनकार कर दिया. अब ‘हाशिये के लोग’ फिल्म का निर्माण क्राउड फंडिंग वेबसाइट के जरिये कर रहा हूं. लोगों ने इसके लिए क्राउड फंडिंग शुरू कर दी है. मैं किसी बड़े अभिनेता को फिल्म में नहीं रख सकता इसलिए मैं अलग-अलग शहरों में फिल्म संस्थानों की मदद से पात्रों के लिए ऑडिशन करूंगा.

भारत में क्राउड फंडिंग का भविष्य क्या है?

इन दिनों भारत में भी क्राउड फंडिंग पकड़ बना रहा है. क्राउड फंडिंग के लिए नई वेबसाइट और संस्थान खुल रहे हैं. अगले कुछ वर्षों में ऐसे फिल्म निर्देशकों को भी मौका मिलने लगेगा जिनकी सामाजिक फिल्में पैसों की कमी की वजह से खटाई में पड़ जाती है.

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