स्तंभ Archives | Page 3 of 12 | Tehelka Hindi — Tehelka Hindi
सलमान एक परपीड़क विचार है

न्यायपालिका में हमेशा से थोड़े से लाइसेंसशुदा ड्राइवर तबीयत के लोग होते आए हैं जिन्हें तगड़ा बोध होता है कि चालू व्यवस्था की स्टीयरिंग उनके हाथ में है. वे दो बातों का बहुत ख्याल रखते हैं. एक तो यह कि पब्लिक में न्यायपालिका का खौफ बना रहे, दूसरे कुछ चमकदार  

पॉजीटिव खबर चलाइए…

बरसों बाद इन दिनों एक बार फिर फील गुड का माहौल है, देश-विदेश में फिर इंडिया शाइन कर रहा है. चमकदार लिबास है, चमकदार नेता हैं और चमकदार बातें हैं. जनता ने जितना चाहा था उससे ज्यादा मिल रहा है, पॉलीटिकल लीडर के साथ मोटिवेशनल और स्प्रिचुअल लीडर भी मिल  

भाजपा रोको अभियान

राहुल के लौटने से कांग्रेसियों की उम्मीदें भी लौट आईं हैं. माकपा, येचुरी के ‘गठबधंन कौशल’ से आस लगाए है. जनता परिवार एकजुट हो गया है, ताकी भाजपा को रोका जा सके. राजनीति में दिलचस्प दिन आने वाले हैं  

नकली पेड़, असली मौत

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी आंखों के सामने एक आदमी की मौत के बाद अपना भाषण इस तरह जारी रखा जैसे उनके ग्लैमर के पेट्रोमैक्स पर मंडराता एक भुनगा जल गया हो.  

रोशनी बिखेरता सीतापुर

मिथक है कि यह ऋषियों का नगर था, यथार्थ कहता है कि यह आंखें रोशन करने वाला शहर है...  

टाइटेनिक की राह पर समाचार चैनल

देश में धड़ाधड़ समाचार चैनल बंद हो रहे हैं, हजारों की संख्या में टेलीविजन प्रोफेशनल बेरोजगार हैं. वॉयस ऑफ इंडिया नाम के टाइटेनिक के डूबने से शुरू हुआ यह सिलसिला बदस्तूर कायम है। सीएनईबी, पी 7, भास्कर न्यूज ,जिया न्यूज और फॉर रियल न्यूज जैसे न जाने कितने नाम हैं  

नया सफरः शुरू के दिन

धर्मयुग, रविवार जैसी पत्रिकाओं से जुड़े रहने के बाद लगभग ढाई दशक तक पूर्वी भारत के लोकप्रिय अखबार प्रभात खबर के प्रधान संपादक रहे चर्चित पत्रकार हरिवंश अब राज्यसभा के सदस्य भी हैं. उन्होंने राज्यसभा में जाने के बाद राजनीति और संसद को करीब से देखने के अपने आरंभिक अनुभवों को साझा किया है, जिसका संक्षिप्त व संपादित अंश यहां प्रस्तुत है.  

फेमिनिज्म का फैशन बन जाना

‘बराबरी, न्याय और आजादी’ के सार्वभौमिक सिद्धांत के बाहर जाते ही नारीवाद आत्म-केंद्रित विलास बन जाता है  

महाविलय में छुपे हैं महाबिखराव के सूत्र

अतिपिछड़ों-महादलितों के लिए सांप्रदायिकता बड़ा मसला नहीं है, उन्हें हिस्सेदारी चाहिए. सामाजिक न्याय की लड़ाई से उन्हें जोड़ने के लिए नया नारा चाहिए जो महाविलय के इस प्रस्ताव में नहीं दिख रहा  

खोखलेपन का महिमामंडन

शहर की रात, त्रिकालदर्शी औघड़ और कुछ मित्रों की श्मशान से जुड़ी जिज्ञासाएं. तीनों का मेल अलग तरह के घटनाक्रम का संकेत देता है. क्या वाकई कुछ अलग घटता है?