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‘मेेरी कहानियां भारत-पाक के बीच की नफरत को चुनौती देती हैं’

ओरल हिस्ट्री प्रोजेक्ट के तहत आपकी किताब  ‘द फुटप्रिंट्स ऑफ पार्टीशन’  आई है. इस प्रोजेक्ट के तहत आपने 600 लोगों के साक्षात्कार लिए. इतने सारे लोगों से मिलकर बातचीत करने का अनुभव कैसा रहा? अद्भुत! जिस किसी से भी मैंने बात की, उस ही के पास बहुत सशक्त कहानियां थीं.  

जनता टॉकीज

मनोरंजन हर तबके के लोगों के जीवन का एक खास हिस्सा होता है और हिंदुस्तान में फिल्में मनोरंजन का पसंदीदा साधन हैं. सिनेमा का हिंदुस्तान में वही महत्व है जो यूरोपीय देशों में किताबों का, हर वर्ग का व्यक्ति कमोबेश फिल्मों का शौकीन है. फिल्में आम आदमी की जिंदगी का  

समाज के तानों के खिलाफ महादलित महिलाओं की तान

सोना देवी आज भी याद करके सिहर जाती हैं कि कैसे उनके पति ने दाहिने गाल पर बेरहमी से थप्पड़ मारा था, जब उनको पता चला कि उनकी बीवी महादलित बैंड पार्टी में शामिल होकर बाजा बजा रही है. उस थप्पड़ की गूंज आज भी सोना देवी के कानों में  

‘मैं खुद को किसी खांचे में नहीं बांधना चाहता’

आपकी फिल्म  ‘कोर्ट’  के दोनों मुख्य किरदारों में एक सफाई कर्मचारी (जमादार) और दूसरा दलित लोक गायक है. क्या आपको उम्मीद थी कि ये दोनों किरदार उच्च मध्य वर्ग खासकर पश्चिमी दर्शकों को समझ में आएगी? जब मैंने इस फिल्म का कथानक (स्क्रिप्ट) लिखा, तब मेरे सामने भी ये सवाल  

हिंदी साहित्य में स्वेतलाना एलेक्सीविच की जरूरत

इस साल साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित बेलारूस की खोजी पत्रकार और नॉन फिक्शन (गैर काल्पनिक) लेखिका स्वेतलाना एलेक्सीविच की सबसे चर्चित किताब ‘वॉयसेज फ्रॉम चर्नोबिल’ के बारे में पढ़ते हुए मेरा ध्यान सबसे पहले भोपाल गैस त्रासदी के साहित्यिक दस्तावेजीकरण की तरफ गया. यह किताब वर्ष 1986 में  

झलक सरहद पार की

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में सिविल लाइंस की एक दुकान के बाहर मशहूर पाकिस्तानी अदाकारा सनम सईद का एक आदमकद पोस्टर लगा है. सड़क पर रिक्शों में जातीं स्कूल-कॉलेज की लड़कियां उन्हें पहचानती हैं और अगली बार उस दुकान पर आने की बात भी कहती हैं. अमूमन बॉलीवुडिया  

संगीत के साथ जैसे उन्हें जीवन वापस मिल गया था. गाना दोबारा शुरू करते हुए उन्हें यह डर था कि पता नहीं इतने समय बाद वो गा भी पाएंगी या नहीं और लोगों पर उनका जादू वैसे ही चलेगा या नहीं. लेकिन जब उन्होंने गाया तो दोबारा उसी तरह की  

चला गया समाजवादी आंदोलन का सिपाही

छह सितंबर की बात है. बंगलुरु के पास स्थित हरिदवनम से एक खबर चली कि समाजवादी चिंतक, विचारक, लेखक प्रो. कृष्णनाथ शर्मा नहीं रहे. उन्हें जानने वाले बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक एक-दूसरे को फोन करते रहे. कुछ ने इलेक्ट्रॉनिक चैनलों पर भी टकटकी लगा ली कि  

‘आदिवासी समाज से कोई आगे आएगा तो हिंदी लेखकों की चिंता बढ़ जाएगी’

आपने गांव के स्कूल में पढ़ाई पूरी की. आप कॉलेज नहीं गए. क्या कविता लेखन में रुचि स्कूली जीवन से ही थी? नहीं, स्कूली जीवन में क्या लिखने की रुचि रही होगी. बस किसी तरह पढ़ाई कर लिया करते थे. छठी क्लास में पहुंचने के बाद लगा कि कोई कक्षा  

‘मैं खुद को क्रिएटिव बनाए रखने के लिए काम करता हूं, मुंबई के लिए नहीं’

 आप विज्ञान के विद्यार्थी रहे हैं, ऐसे में लेखन की प्रेरणा कहां से मिली? हम लोग मूल रूप से बिहार के ‘बाढ़’ कस्बे के रहने वाले हैं. वहीं पढ़ाई-लिखाई हुई. मेरे पिताजी राजकमल चौधरी (प्रसिद्ध मैथिल और हिंदी लेखक) के पिता के साथ शिक्षक थे. बिहार के एक उपन्यासकार अनूप