तहलका-फुल्का Archives | Tehelka Hindi — Tehelka Hindi
हंसी का बिजूका

‘यह मूर्ति कैसी?’ ‘ये लाफिंग बुद्धा है.’ ‘मजेदार लग रहा है.’ ‘सो तो है, इससे ‘गुडलक’ आता है’ ‘कैसे?’ ‘देख नहीं रहे, कितना खिलखिला कर हंस रहा है!’ ‘तो!’ ‘हंसने से वैसे भी मनहूसियत दूर हो जाती है.’ ‘तो आप खुद क्यों नहीं हंसते?’ मेरी इस बात पर वे मुस्कुराए.  

कभी मिले तो पूछिएगा !

अभी मैं लिखने बैठा ही था कि अचानक अंधेरा छा गया. कुछ नजर नहीं आता था. जबकि लाइट आ रही थी. आंखों को कई बार भींचा. ट्यूब लाइट की तरह लपलपाया. मगर कोई फायदा नहीं. तभी किसी ने मेरा हाथ पकड़ा. मैं कांप गया. ‘डरो नहीं! अराम से बैठो यहां!’  

इस सूरत-ए-मौसम में हमारी सूरत

भकभकाती भूमिका - आ गई! चली गई! की आवाज गली-गली में रह-रह कर सुनाई दे रही है. गोकि मां भगवती का जयकारा हो रहा हो. ‘कटौती’ सबसे ज्यादा घृणित शब्द है इन दिनों. चिलचिलाती गर्मी में हम ऐसे उबल रहे हैं कि जैसे बंदे न हो के हम अंडे हों!  

दर्शन देते देवता…

हर्षित, मुदित नाच रही है देह, थिरक, फुदक रहा मन. वाणी गई कहीं खो, नैन गए फैल, पलकें हुई निर्निमेष. कैसे… कैसे बखान करें देवता के रूप का ! कैसे बखान करें उसकी लीलाओं का! सुधबुध खो गई है हमारी. कैसे आज देवता ने ली हम जैसो की सुध! कैसे  

गर आदमी हो तो क्या आदमी हो!

‘आज केवल आदमी होने से काम नहीं चलता है.’ ‘दद्दा, मुझे लगता है आदमी होना ही बड़ी बात है.’ ‘अगर आदमी ही होना बड़ी बात होती तो, आदमी को मयस्सर नहीं है इंसा होना, गालिब ने फिर क्यों कहा!’ ‘आदमी और इंसान एक ही बात है!’ ‘तुम भ्रमित हो! फर्क  

खूंटे से बंधी जम्हूरियत

दोनों ने लंबा हाथ मारा था. मगर पहली बार सफलता पर खुश होने के बजाय वे दोनों बुरी तरह डरे हुए थे. एक-दूसरे का चेहरा देखते, जब उकता जाते तो लाए हुए माल का ख्याल आता. और जैसे ही उस पर नजर फेंकते, भीतर का डर और सघन हो जाता.  

चरखे से चर-खा तक

राजनीति में कई लोग इन्हें दिग्गज मानते हैं, मगर मेरे लिए वे मात्र गज हैं. नापने वाला नहीं चरने वाला गज. उन्हें अपनी तरफ देखते हुए मैंने एक सवाल फेंका, ‘आखिर कितना खाएंगे?’ वे मुस्कुराए. बोले, ‘यह सवाल ही अप्रासंगिक है. जिसका जो काम है, वो तो करेगा ही. यह तुम  

दुर्गति न कर दे यह ‘गति’

यह कैसी बयार बह रही है! किस दिशा से बह रही है! वह उतावली है या हम! वह उड़ा रही है हमें या हम स्वयं उड़ रहे हैं! देश का कारवां किस भरोसे बढ़ रहा है! कहां से चले थे, कहां पहुंचे ! न ठहर रहे हैं, न स्वयं को टटोल