अभियानों के अभियान पर

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प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का पिछले पांच महीने का कार्यकाल भारतीय इतिहास के किसी भी दूसरे प्रधानमंत्री से ज्यादा सक्रिय और जीवंत रहा है. इन चंद महीनों में मोदी ने एक ऐसे व्यक्तित्व से देश का साक्षात्कार करवाया है जो अपनी से आधी उम्र के लोगों से भी ज्यादा सक्रिय रहता है, जो रोज कुछ न कुछ नया करने कि कोशिश करता है, जिसके मस्तिष्क में नई-नई योजनाओं की भरमार है, जिसके बारे में धारणा है कि वह कभी थकता नहीं है. यह प्रधानमंत्री इस बात को लेकर भी चैतन्य रहता है कि किसी नेता या शख्सियत से मुलाकात होने के बाद कौन सी फोटो मीडिया में जारी हो. जिसके लिए हर कार्यक्रम एक उत्सव है, एक आयोजन है और उसकी सफलता में कोई कमी उसे मंजूर नहीं. जिसकी हर कोशिश इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने की भावना से की गई जान पड़ती है. जिसकी मार्केटिंग रणनीति को देखकर बड़े-बड़े एमबीएधारी भी बगलें झांकने को मजबूर हो जाते हैं. मोदी खुद को देश का प्रधान सेवक बताते हैं जबकि उनके आलोचक उन्हें सबसे बड़ा सेल्समैन बताते हैं. उनके बारे में सोशल मीडिया पर एक मजाक आजकल ट्रेंड कर रहा है कि उनके पैदा होने के बाद डॉक्टर ने कहा, ‘मुबारक हो मित्रों आईडिया हुआ है.’

अपने पांच महीने के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई कारणों से सुर्खियां बटोरी. इस दौरान उन्होंने बहुत कुछ ऐसा किया जिसे नवाचार कहा जा सकता है. यानी ऐसी चीजें जो या तो पहले नहीं हुईं थीं या उस रूप में नहीं की गईं थीं जिस रूप में मोदी ने उन्हें किया है. मोदी के ऐसे नए प्रयोगों की लिस्ट बहुत लंबी है. इन योजनाओं में कितनी संभावनाएं हैं, क्या ये योजनाएं वास्तव में किसी बड़े बदलाव की नींव तैयार कर रही हैं, या फिर ये योजनाएं और अभियान भी अतीत में बनाई गई तमाम योजनाओं की भीड़ का हिस्सा भर हैं. इनकी उपयोगिता क्या है और सफलता की क्या उम्मीद है, इनमें कितनी मौलिकता और कितनी नकल है? इन तमाम सवालों की पड़ताल इस लेख में करने की कोशिश की गई है.

‘जहां बड़ों की सुनवाई नहीं है वहां प्रधानमंत्री बच्चों से कहां बात करता है. यह संवाद बहुत जरूरी था. बच्चों से संवाद का सिलसिला रुकना नहीं चाहिए’

राष्ट्रीय शिक्षक दिवस

बचपन में आप और हम जैसे देश के लगभग अधिकांश बच्चों के पास तीन चाचा हुआ करते थे. एक तो वे जो रिश्ते के चाचा थे, दूसरे चाचा चौधरी और तीसरे जवाहर लाल नेहरू. ये जो तीसरे व्यक्ति हैं उनके बारे में स्कूल में ही रटाया जाता था कि फलाना फोटो में जैकेट पहने, टोपी लगाए और शेरवानी में गुलाब खोंसे जो व्यक्ति हैं वे चाचा नेहरू हैं. बताया जाता था कि उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था. जिनका सीधे तौर पर उनसे संपर्क हुआ था वे तो उन्हें चाचा मानते ही थे ही लेकिन जिन्होंने उन्हें सिर्फ तस्वीरों में देखा था वे भी नेहरु जी को चाचा ही कहा करते थे. अब ये चाचा वाली छवि खुद ब खुद बन गई या सोच-विचार कर बनाई गई इसके बारे में तो उस दौर के लोग ही बताएंगे लेकिन नेहरू की मृत्यु के बाद देश को फिर कोई ‘पॉलिटिकल’ चाचा नहीं मिला. अलग-अलग राज्यों ने इस दौरान मुख्यमंत्री के रूप में मामा और ताऊ जरूर देखे लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में बच्चों से संवाद साधने या रिश्ता बनाने की कहानी नेहरू के बाद कभी सुनने को नहीं मिली.

इस टूटे हुए तार को हाल ही में एक दूसरे प्रधानमंत्री ने फिर से जोड़ने की कोशिश की. बच्चों और देश के प्रधानमंत्री के बीच संवाद के रिश्ते को नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिर से बहाल किया है. लेकिन उनकी भूमिका बिल्कुल बदली हुई थी. नेहरू जहां बच्चों के चाचा बने थे वहीं मोदी उनके शिक्षक के रूप में उनसे मिले. पांच सितंबर यानी शिक्षक दिवस के अवसर पर देश के सभी स्कूलों को यह निर्देश दिया गया था, जिसे बाद में सलाह बताया गया, कि कक्षा एक से लेकर बारहवीं तक के सभी स्कूलों में उस दिन छात्र-छात्राओं को नरेंद्र मोदी का भाषण लाइव सुनाया जाए. स्थिति यह थी कि जिस देश के एक बड़े हिस्से में आज भी कई स्कूलों को छत नसीब नहीं है, कहीं शिक्षक नहीं हैं तो कहीं बैठने की जगह नहीं है, उस देश में एक दिन, एक ही समय पर टीवी या रेडियो के माध्यम से प्रधानमंत्री का भाषण बच्चों तक पहुंचाना था जो कि असंभव के आसपास की चीज थी. खैर दिल्ली में बैठे हाकिमों ने चाबुक फटकारा तो जो अधिकारी सालों से स्कूलों की दुर्दशा जानने समझने के बाद भी हाथ पर हाथ धरे बैठे थे वो अचानक से काम में लग गए. इस दौरान ऐसी कई तस्वीरें आईं जहां नाव पर लोग टीवी रखकर ले जाते दिखे. कई स्कूलों में जहां बिजली नहीं थी वहां जनरेटर या बैट्री की व्यवस्था की गई. आखिरकार कार्यक्रम के दिन दिल्ली से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बच्चों को संबोधित किया. जिसे तमाम स्कूलों में बच्चों ने सुना. देश के कई दूर दराज के इलाके जैसे बस्तर, लेह, मणिपुर आदि से बच्चों के प्रधानमंत्री से सीधे प्रश्न करने की व्यवस्था की गई थी. बच्चों ने प्रश्न पूछा और उन्होंने जवाब दिया.

इस पूरे कार्यक्रम से मोदी ने उस तबके तक पहुंचने में सफलता पाई जो किसी भी राजनीतिक दल की प्राथामिकता या टार्गेट में नहीं है. पिछले लंबे समय से किसी राजनीतिक दल या नेता ने बच्चों से संवाद करने की जरूरत नहीं समझी थी. बच्चे चूंकि वोट नहीं देते इसलिए वे किसी संवाद का हिस्सा नहीं रहे. ऐसे में प्रधानमंत्री की इस पहल को कई लोगों ने सराहनीय कदम बताया.

आंकड़े बताते हैं कि देवालय से पहले शौचालय का नारा देनेवाले नरेंद्र मोदी के गुजरात में 2011 की जनगणना के मुताबिक 43 फीसदी घरों में शौचालय नहीं था

हालांकि मोदी के स्कूली बच्चों से उस दिन के संवाद को अगर ध्यान से देखें तो यह भी पता चलता है कि कैसे प्रश्नों से लेकर तमाम चीजें पहले से ही तय थीं और सब कुछ एक तय स्क्रिप्ट के हिसाब से हुआ. लेकिन घंटे-भर से अधिक के संवाद में ऐसे हिस्सों की भी कमी नहीं थी जहां एक समय के बाद बच्चे मोदी से बातचीत करने में काफी सहज नजर आए वहीं नरेंद्र मोदी ने भी शुरूआती गंभीरता और हिचक के बाद बच्चों से खुलकर हंसी-ठिठोली की.

इस एक दिन के मेल-मिलाप, जिसमें काफी कुछ पूर्वनिर्धारित था, को किसी बड़े बदलाव की शुरुआत मानना जल्दबाजी होगी लेकिन कई लोग इसे एक सकारात्मक शुरुआत के तौर पर देखते हैं. इलाहाबाद के प्रयाग स्कूल के प्रिंसिपल शारदा प्रसाद कहते हैं, ‘देखिए जिस व्यवस्था में बड़ों की सुनवाई नहीं है वहां देश का प्रधानमंत्री स्कूली बच्चों से कहां बात करता है. इस कार्यक्रम ने बच्चों से संवाद के प्रश्न को बेहद मजबूती के साथ रेखांकित किया है. हां ये सिलसिला बंद नहीं होना चाहिए.’

बच्चों पर इस संवाद का क्या असर पड़ा है, इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है. बिहार के नवादा जिले के एक प्राइमरी स्कूल में एक छात्र ने शिक्षक के दो दिन से गैरहाजिर रहने का कारण पूछा तो शिक्षक ने उसे पीट दिया. रोता हुआ छात्र शिक्षक के सामने ये कहते हुए चिल्ला उठा, ‘मैं आपकी शिकायत नमो (नरेंद्र मोदी) से करुंगा. उनसे कहूंगा की आप स्कूल में देर से आते हैं, पढ़ाते नहीं हैं और हम लोगों को मारते हैं.’ एक बच्चे को अपनी शिकायत के लिए अपना घर, परिवार, रिश्तेदार कोई काम का नहीं नजर आया, उसे नरेंद्र मोदी की याद आई. यह घटना कई बातें खुद ब खुद बयान करती है.

चतुर चाल दिवाली के मौके पर सियाचिन में सैनिकों के साथ मुलाकात करके प्रधानमंत्री ने एक नई शुरुआत की है
चतुर चाल दिवाली के मौके पर सियाचिन में सैनिकों के साथ मुलाकात करके प्रधानमंत्री ने एक नई शुरुआत की है

स्वच्छ भारत अभियान

इसे देखने के कई तरीके हो सकते हैं.  कुछ लोगों के लिए यह बेकार की कवायद हो सकती ह,ै तो कुछ लोग यह भी मान सकते हैं कि जब जागो तभी सवेरा. कुछ दिन पहले अखबारों में एक खबर आई कि रेलवे के अधिकारियों में इन दिनों एक होड़ लगी हुई है. सेवा और साफ सफाई करने की होड़. हुआ यह कि रेलवे अधिकारियों ने प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान से प्रेरित होकर रेलवे के प्लेटफॉर्मों को गोद लेना शुरू कर दिया. मकसद यह था कि गोद लेकर प्लेटफॉर्म की साफ सफाई अच्छी तरह की जा सके. कहनेवाले कहेंगे कि सफाई प्रेमी ये अधिकारी आज तक कहां थे. क्या मोदी के कहने से पहले उन्हें नहीं पता था कि देश के रेलवे स्टेशन गंदे स्थानों में सबसे ऊपर हैं.

गांधी जयंती के अवसर पर शुरु हुए स्वच्छता अभियान के तहत कथित तौर पर प्रधानमंत्री का सपना महात्मा गांधी के स्वच्छ भारत के सपने को पूरा करना है. इस स्वच्छता अभियान में जहां पूरी सरकार और उसके अधिकारियों से लेकर विभिन्न क्षेत्रों के तमाम सितारे शामिल हुए वहीं ऐसे लोग भी इस अभियान का हिस्सा बने जिन्हें न तो सरकार की तरफ से ऐसा करने को कहा गया था और न ही वे किसी तरह से राजनीति से जुड़े हैं. आम लोगों की झाडू लगाने वाली तस्वीरों से फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया भर उठा. जगह-जगह से लोग प्रधानमंत्री के नारे पर झाड़ू लेकर घर के बाहर निकल गए.

तमाम लोग हैं जो मानते हैं कि प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान के कारण लोगों में साफ-सफाई को लेकर जागरूकता आई है. एक धारणा प्रबल हुई है कि साफ सफाई सिर्फ एक तबके की या सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है. देश का प्रधानमंत्री झाड़ू लगा रहा है तो कोई भी लगा सकता है. इस तरह मोदी ने अपने इस अभियान से साफ सफाई को एक किस्म की अभिजात्यता दे दी है. जो वर्ग झाड़ू जैसी चीजों को पकड़ने की कल्पना भी नहीं करता था उसे भी झाड़ू के साथ सेल्फी खींचने में गर्व का अनुभव होने लगा है.

हालांकि इस अभियान की गंभीरता और प्रतीकात्मकता को लेकर भी हाल में खूब बहस हुई है. हाल ही में एक ऐसी घटना भी सामने आई जहां स्वच्छता के नाम पर पहले पत्ते फैलाये गए और फिर उन्हें झाड़ू से साफ करने की रस्म निभाई गई. नेताओं द्वारा की जा रही सफाई की ऐसी हास्यास्पद तस्वीरों से सोशल मीडिया भरा पड़ा है. ऐसे और भी उदाहरण होंगे जो सामने नहीं आएं हैं.

स्वच्छता अपने निर्वाचन क्षेत्र बनारस के दौर पर पहुंचे प्रधानमंत्री वहां लोगों को अपनी प्रिय योजना का संदेश देना नहीं भूले
स्वच्छता अपने निर्वाचन क्षेत्र बनारस के दौर पर पहुंचे प्रधानमंत्री वहां लोगों को अपनी प्रिय योजना का संदेश देना नहीं भूले

प्रधानमंत्री का देश को स्वच्छ बनाने का जो दावा है उस पर कुछ लोग उनके अतीत के प्रदर्शन को देखते हुए प्रश्नचिन्ह लगाते हैं. आंकड़े बताते हैं कि देवालय से पहले शौचालय का नारा देनेवाले नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात में 2011 की जनगणना के मुताबिक 43 फीसदी घरों में शौचालय नहीं है. ग्रामीण क्षेत्रों में तो हालत और भी बदतर है. वहां 67 फीसदी घर शौचालय की सुविधा से वंचित हैं. गुजरात में आज भी 2,500 से अधिक परिवार सिर पर मैला ढोने के लिए अभिशप्त हैं.

कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर मोदी सरकार के इस अभियान की आलोचना करते हुए लिखते हैं, ‘ हमारे पास पहले से ही निर्मल भारत अभियान है, जिसे मोदी ने पूरी तरह से हड़प लिया है. इस तरह कांग्रेस की ही पुरानी बोतल पर बस भगवा लेबल चस्पां कर स्वच्छता अभियान का नाम दे दिया गया है. निर्मल भारत अभियान से पहले वर्ष 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली एनडीए सरकार ने संपूर्ण सफाई अभियान चलाया था ,लेकिन हमारे मोदी जी अपनी ही पार्टी के पूर्ववर्ती कार्यक्रमों को हड़पने में भी संकोच नहीं करते. कार्यक्रमों का इस तरह हड़पा जाना भी बर्दाश्त किया जा सकता है बशर्ते मोदी कम से कम निर्मल भारत अभियान तथा संपूर्ण सफाई अभियान के बारे में सोचने तथा उन्हें लागू करने के पीछे लगी अथक मेहनत तथा अतीत में उनमें रह गई खामियों का अध्ययन कर लें कि इस अभियान के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए कौन से नए उपाय किए जाने चाहिए. उनके पास इनके विस्तार में जाने का समय ही नहीं है. वह जिस बात पर ध्यान देते हैं, वह है उनकी जैकेट का रंग, जो किसी फैशन मॉडल के लिए तारीफ की बात हो सकती है लेकिन किसी प्रधानमंत्री के लिए यह निंदनीय है’.

अय्यर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘अगर मोदी संकीर्ण सोच से इतर कहीं भी आगे बढ़ रहे होते तो वह ‘ब्रांड एम्बैसेडर’ के रूप में फिल्म अभिनेताओं और एजेंटों के रूप में काम कर रहे कांग्रेसियों को नहीं तलाश करते, बल्कि स्वच्छता के क्षेत्र में काम करनेवाले लोगों से बात करते. उनकी राय जानते. ताकि यह समझा जा सके कि हमारे पास पहले से मौजूद सफाई कार्यक्रमों में अब तक क्या-क्या सही हुआ है, क्या-क्या गलत हुआ है और अपनी रणनीति को सही दिशा में लाने के लिए क्या-क्या करने की ज़रूरत है.’

बहुत से लोगों का मानना है कि जहां देश में सफाई कर्मचारियों की जिंदगी खुद बहुत बुरी स्थिति में है, उनकी स्थिति सुधारने के लिए सरकार के पास कोई योजना भी नहीं दिखती है. ऐसे में ये अभियान फोटो खिंचवाने से आगे कहां तक जा सकते हैं?

स्मार्ट सिटी के नाम पर इंदिरा गांधी हवाई अड्डे के टीथ्री टर्मिनल और रिलायंस कंपनी द्वारा संचालित मुंबई मेट्रो की याद आती है जहां बारिश हर साल खेल दिखाती है

मेक इन इंडिया

15 अगस्त को लालकिले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए पहली बार प्रधानमंत्री ने मेक इन इंडिया का नारा दिया था. मेक इन इंडिया से मोदी का आशय तमाम छोटी-बड़ी, देशी-विदेशी कंपनियों को भारत के निर्माण उद्योग में निवेश करने के लिए प्रेरित करना है. उनकी इच्छा कुछ-कुछ उसी तर्ज पर निवेश लाने की है जैसा चीन में विश्व की नामचीन कंपनियों ने किया है. आज तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों पर ‘मेड इन चाइना’ का लेबल मिलता है. इस तरह से मोदी का मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया के सपने को सच करने के लिए उठाया गया पहला कदम कहा जा सकता है. कई मायनों में यह एक महत्वाकांक्षी और दूरदर्शी योजना भी है.

ऐसा नहीं है कि इससे पहले किसी सरकार ने निवेश के लिए प्रयास नहीं किए थे. विभिन्न सरकारों ने इस दिशा में काम किया है. लेकिन मोदी का मेक इन इंडिया इस मायने में अलग है कि इसकी मार्केंटिंग बेहद आक्रामक है. मोदी ने एक टर्म ईजाद किया मेक इन इंडिया. ये संभव है कि इस टर्म के बाद भी भारत में निवेश उतना ही हो जितना पिछली सरकारों में हुआ था लेकिन माहौल बनाने में मोदी कोई कमी नहीं रखना चाहते. भाजपा से मोहभंग की हालत में चल रहे एक नेता कहते हैं, ‘मोदी छोटा कुछ करते नहीं. काम अगर छोटा भी होता है तो वे मार्केटिंग के जरिए उसे बड़ा बना देते हैं.’

इसे आप उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में शुरू की गई योजनाओं से भी समझ सकते हैं. जैसे पूरे देश में विभिन्न राज्य सरकारों ने निवेश आकर्षित करने के लिए हर साल इनवेस्टर्स मीट आयोजित करने शुरु किए वैसे ही गुजरात ने भी एक आयोजन शुरू किया था. वहां देश-विदेश के तमाम उद्योगपति आते हैं. गुजरात में भी निवेश सम्मेलन आयोजित होता था लेकिन उसकी पैकेजिंग और तौर-तरीका अलग था. बाकी राज्य इनवेस्टर्स मीट कराते थे लेकिन मोदी ‘वाइब्रेंट गुजरात’ कराते थे. इतने बड़े पैमाने पर उसकी मार्केंटिग होती थी कि देश का प्रधानमंत्री भी ऐसे कार्यक्रमों से कतराने लगे. हालांकि इस भड़कीले कार्यक्रम की हकीकत कुछ और भी थी. पता चलता था कि वाइब्रेंट गुजरात में आए निवेशकों ने निवेश का वादा तो सागर भर का किया था लेकिन अंत में गागर भर ही निवेश हुआ. जैसे 2005 के आयोजन में यह दावा किया गया कि इसमें 1.06 लाख करोड़ रुपये के निवेश के लिए सहमति बनी है. लेकिन आरटीआई से मिली जानकारी ने बताया कि कि इसमें से सिर्फ 23.52 फीसदी यानी 24,998 करोड़ रुपये का निवेश ही हुआ. खुद गुजरात सरकार की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2003 से लेकर अब तक वाइब्रेंट गुजरात सम्मेलन में जितने निवेश की घोषणा हुई है उसका सिर्फ 6.13 फीसदी असल में निवेश हो पाया है. लेकिन फिर भी मोदी पूरे आत्मविश्वास से वाइब्रेंट गुजरात की सफलता के किस्से सुनाते रहते हैं.

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4 COMMENTS

  1. वास्तविकता है पीएम मोदी एक बहुत बड़े इवेंट मैनेजर है और उनकी योजना और प्रयासों में कितनी मजबूती है . ये तो समय ही बताएगा। आपने अच्छा लिखा है…

  2. मोदी बहुत मेहनती है। ………। पर मैं तहलका के संपादक से पूछना कि इसका प्रिंट वाराणसी में नहीं मिल रहा है। …क्यो…। बताये। …

  3. नरेंद्र मोदी ने देश को पाॅलिटिकल मार्केटिंग का फण्डा बताया है। लेकिन लोकतंत्र में यह प्रयोग हर बार सफल होगा। मुमकिन नहीं। आखिर, गुणवत्ता भी कोई शब्द है जिसे सार्थक करना सरकार का दायित्व है। मोदी सरकार इस पर कहीं खरा नहीं उतरती।

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