‘जुड़ते यूरोप के टूटते देश’

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न तो बर्लिन की दीवार गिरती, न विभाजित जर्मनी का पुन: एकीकरण हो पाता, ढाई दशक पूर्व, तत्कालीन सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचोव ने यदि इसे रोकना चाहा होता. इससे भी बड़ी विडंबना यह रही कि जर्मनी का एकीकरण होते ही सोवियत संघ स्वयं ताश के पत्तों की तरह बिखर गया. आज उसकी जगह 15 नए देश बन गए हैं. जर्मनी का एकीकरण पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों के लिए ऐसा अपशगुन साबित हुआ कि उस समय के चेकोस्लोवाकिया और युगोस्लाविया का भी अस्तित्व नहीं रहा. चेक गणराज्य और स्लोवाकिया भूतपूर्व चेकोस्लोवाकिया के नए उत्तराधिकारी हैं, जबकि युगोस्लाविया को जर्मनी की अगुआई में ‘नाटो’ देशों ने मिलकर ऐसा तोड़ा कि उस की जगह पर अब तक सात नए देश बन चुके हैं.

कह सकते हैं कि समाजवादी देशों की दिखावटी एकता वहां की कम्युनिस्ट तानाशाहियों की बनावटी सफलता थी. कभी न कभी इस आडंबर का बेड़ा गर्क होना ही था. लेकिन, विडंबना यह भी है कि अब बारी पश्चिमी यूरोप के उन देशों के टूटने की है, जो अपने आप को लोकतंत्र का सिरमौर समझते हैं. वे ‘नाटो’ और यूरोपीय संघ दोनों के सदस्य हैं. अन्य देशों में पृथकतावाद को पोषित करते रहे हैं. अपनी सभ्यता-संस्कृति पर इतराने और भारत जैसे बहुजातीय देशों को राष्ट्र-राज्य (एक देश में एक जैसी सभ्यता, संस्कृति, भाषा, इतिहास एवं उद्भव वाली जनता की राज्यसत्ता) का उपदेश देते रहे हैं. इसी सिद्धांत के चलते अब अपने ही टूटने की नौबत आती देखकर वे सन्नाटे में आ गए हैं. सबसे बड़ा विरोधाभास तो यह है कि उनके जो प्रदेश उद्भव, बोल-भाषा या रहन-सहन वाली परिभाषा की आड़ लेकर अलग होना चाहते हैं, वे किसी गरीबी या पिछड़ेपन के कारण नहीं, अपनी अमीरी और सफलता का सुखभोग अन्य प्रांतों के साथ बांटने से बचने के लिए ऐसा कर रहे हैं. बाद में, यूरोपीय संघ की छत्रछाया में वे उन्हीं की बगल में बैठना भी चाहते हैं जिनसे अलग होने के लिए वे आज मचल रहे हैं.

इस समय 28 देशों का यूरोपीय संघ यूरोप महाद्वीप के लगभग 45 सार्वभौम देशों को मिला कर उन्हें एक ही माला में पिरोने का प्रयास कर रहा है. कुछ जानकारों का कहना है कि इससे इन देशों के कुछ प्रदेशों को स्वतंत्र देश बन कर स्वयं ही इस माला के मनके बनने की प्रेरणा मिल रही है. अगले कुछ वर्षों में यूरोप में 10 नए स्वतंत्र देश जन्म ले सकते हैं. शुरुआत हो चुकी है. सितंबर और अक्टूबर 2012 में सिर्फ तीन हफ्ते के भीतर पश्चिमी यूरोप के तीन प्रमुख देशों- ब्रिटेन, स्पेन और बेल्जियम के चार प्रदेशों ने स्पष्ट कर दिया कि वे अलग देश बनने के लिए दृढ़ संकल्प हैं. इटली और फ्रांस के पृथकतावादी भी फिर से अंगड़ाई लेने लगे हैं.

अलगाववादी आंदोलनों की ताकत जिस तरह से बढ़ रही है उससे लगता है कि 45 देशों वाले यूरोप में कुछ साल के भीतर ही 10 नए देश जन्म ले सकते हैं

यूरोप के ये प्रमुख देश भारत के उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, या महाराष्ट्र से भी छोटे हैं. कुछ दूसरे देश तो भारत के सबसे छोटे राज्यों से भी बौने हैं. ऐसे में, यूरोप में पृथकतावाद के पुनरुत्थान को समझ पाना और भी दुरूह हो जाता है.

स्कॉटलैंड में जनमत संग्रह
अलग होने की इस आतुरता में सबसे आगे है ब्रिटेन का स्कॉटलैंड प्रदेश.यानी भारत को दो टुकड़ों में बांट कर स्वतंत्रता देने वाले जिस ब्रिटेन के साम्राज्य में सूर्य कभी डूबता ही नहीं था, उसके अब अपने ही टुकड़े होने की नौबत आ गई है. दो साल से भी कम समय में हो सकता है कि ब्रिटेन का विधिवत बंटवारा हो जाए. उसका उत्तरी प्रदेश ‘स्कॉटलैंड’  एक नया देश बनने के लिए मचल रहा है. 18 सितंबर के दिन वहां जनमत संग्रह है. बहुमत यदि स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता के पक्ष में गया तो 24 मार्च 2016 के दिन स्कॉटलैंड यूरोप के नक्शे पर एक नया देश बन कर उभरेगा. यह वह दिन है, जब ‘राजशाही स्कॉटलैंड’ और ‘राजशाही इंगलैंड’ के मेल (यूनियन ऑफ क्राउन्स)  को 413 साल हो जाएंगे. दोनों राजशाहियों को मिला कर एक मई 1707 को बर्तानिया महान (ग्रेट ब्रिटेन) की स्थापना हुई थी, हालांकि स्कॉटलैंड के विभिन्न शहरों में इसके खिलाफ भीषण दंगे भी हुए थे. ब्रिटेन का हिस्सा हो जाने पर भी स्कॉटलैंड की न्याय प्रणाली शेष ब्रिटेन से अलग ही रही.

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स्कॉटलैंड में स्वतंत्रता समर्थक एक रैली.

स्कॉटलैंड के मुख्यमंत्री अलेक्स सालमंड का नारा है, ‘हमारी सफलता का फल हमारे हाथों में होना चाहिए.’ उनकी सरकार जनता को सब्जबाग दिखाती रही है कि जब स्थानीय संपदा और कार्यकुशलता को पूरे ब्रिटेन के साथ बंटना नहीं पड़ेगा तब जनता की खुशहाली और तेजी से बढ़ेगी. जनमत संग्रह के लिए एक ऐसा दिन चुना गया है, जो मतदाताओं को एक तरह से शपथ दिलाता है कि उन्हें अपने वोट द्वारा स्कॉटलैंड को विजयी बनाना ही है. ठीक 700 वर्ष पूर्व, 1314 के इन्हीं दिनों में, स्कॉटिश राष्ट्रवादियों ने तथाकथित ‘बनकबर्न युद्ध’ में अंग्रेजों की सेना को धूल चटाई थी. स्कॉटलैंड की सत्तारूढ़ ‘स्कॉटिश नैशनल पार्टी’  (एसएनपी) के मुख्यमंत्री अलेक्स सालमंड को पूरा विश्वास है कि मतदाता इस दिन की ऐतिहासिक महत्ता को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्वाधीनता के रथ को रुकने नहीं देंगे. वे 2010 से ही जनमत संग्रह का दिन तय करने के लिए व्याकुल थे. लेकिन, उस समय स्कॉटलैंड की विधानसभा में उनकी पार्टी का बहुमत नहीं था और दूसरी पार्टियों का समर्थन मिल नहीं रहा था. 2011 का विधानसभा चुनाव वे इसी वादे के साथ लड़े कि उनकी पार्टी को यदि पूर्ण बहुमत मिला तो स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता के प्रश्न पर जनमत संग्रह होकर रहेगा.

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imgअलगाव की आग

ब्रिटेन के स्कॉटलैंड में 18 सितंबर 2014 को होने वाला जनमत संग्रह यदि उसकी आजादी के पक्ष में गया तो 2016 में वह नया देश बन जाएगा.

स्पेन के उत्तर में स्थित उसके दो प्रदेशों बास्क और कतालोनिया में स्वाधीनता के लिए जबर्दस्त आंदोलन चल रहे हैं. पृथकतावादियों की राजनीतिक ताकत वहां काफी बढ़ गई है.

बेलजियम में उत्तर के डच भाषी फ्लांडर्स दक्षिण के फ्रेंच भाषी वालोनिया से अलग होना चाहते हैं. उनकी शिकायत है कि देश का दक्षिणी हिस्सा उनके खर्च पर पल रहा है. एनवीए नाम की उनकी नई पृथकतावादी पार्टी हाल के संसदीय चुनावों में वहां सबसे ताकतवर दल बनी है.

फ्रांस दक्षिण-पूर्वी हिस्से के बास्क और कतालान अल्पसंख्यक बास्क और कतालान के अलग देश बनने पर उनमें शामिल हो सकते हैं. भूमध्य सागर में स्थित कोर्सिका द्वीप पर भी फ्रांस से अलग होने की मांग चल रही है.

इटली के उत्तरी हिस्से में स्थित पदानिया और दक्षिणी टिरोल नाम के इलाके आजादी या ज्यादा से ज्यादा स्वायत्तता की मांग को लेकर मुखर हैं[/box]

जनमत संग्रह ब्रिटेन को स्वीकार्य
चुनाव में सालमंड की पार्टी ‘एसएनपी’ को कुल 129 में से 69 सीटें मिलीं. उनका एकछत्र राज हो गया. इस पूर्ण बहुमत का अर्थ उन्होंने यही लगाया कि जनता उनके साथ है. इससे उत्साहित होकर जनवरी 2012 में उन्होंने घोषणा की कि 2014 की गर्मियों के बाद जनमत संग्रह होगा. मार्च 2013 में तय हुआ कि जनमत संग्रह 18 सितंबर 2014 के दिन होगा. इससे पहले, 21 अक्टूबर 2012 को, स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबरा में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने एक समझौते पर हस्ताक्षर के साथ विधिवत मान लिया था कि स्कॉटलैंड यदि ब्रिटिश संयुक्त राजशाही (यूके) के भीतर रहने के लिए कतई राजी नहीं है, तो वह 2014 के अंत तक इस विषय पर जनमत संग्रह करवाने का अधिकारी है.

मतदाताओं को केवल ‘हां’ या ‘नहीं’  में इस प्रश्न का उत्तर देना है कि ‘क्या स्कॉटलैंड एक स्वतंत्र देश होना चाहिए ?’ एडिनबरा समझौते के अनुसार,16 वर्ष या उससे अधिक आयु के वे सभी ब्रिटिश नागरिक मतदान के अधिकारी हैं जो स्कॉटलैंड के निवासी हैं. यानी वे गैर-स्कॉटिश भी मतदान कर सकते हैं जो स्कॉटलैंड में रहते हैं. लेकिन, स्कॉटिश मूल के वे लोग मतदान नहीं कर सकते जो स्कॉटलैंड से बाहर ब्रिटेन के किसी दूसरे हिस्से में रहते हैं. यूरोपीय संघ वाले देशों के वे नागरिक भी मतदान के अधिकारी हैं, जो स्कॉटलैंड के स्थायी निवासी हैं.

जीडीपी पांचवें नंबर पर
स्कॉटलैंड ब्रिटेन के कुल क्षेत्रफल के एक-तिहाई (78 हजार वर्ग किलोमीटर) के बराबर है जबकि वहां ब्रिटेन की केवल साढ़े आठ प्रतिशत (53 लाख) जनता बसती है. उत्तरी सागर से होने वाली तेल की अच्छी आय के कारण इसका सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 44, 378 डॉलर प्रति व्यक्ति है जो पूरे ब्रिटेन के औसत से अधिक है. सत्तारूढ़ पार्टी ‘एसएनए’ का दावा है कि प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की दृष्टि से स्कॉटलैंड पूरे यूरोप में पांचवें नंबर पर है. 1980 के बाद से वहां संपन्नता शेष ब्रिटेन की अपेक्षा कहीं तेजी से बढ़ी है.

लंदन के बाद स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबरा में ही देश-विदेश के बैंकों का सबसे बड़ा जमघट है. प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद का नौ प्रतिशत बैंकिंग सेक्टर से आता है. सात प्रतिशत लोग इसी सेक्टर में काम करते हैं. बैंकों की तिजोरियों में जो धन जमा है, वह पूरे यूरोप में चौथा सबसे बड़ा धन-भंडार है. वित्त-विशेषज्ञ मानते हैं कि स्कॉटलैंड के बैंकों में जो धन जमा है, वह उसके सकल घरेलू उत्पाद के 12 गुने के बराबर है. उनका कहना है कि जब तक ऐसा कोई संकट नहीं आता कि बैंकों का दीवाला निकलने लगे, तब तक तो सब कुछ ठीक है. किंतु, यदि कभी बैंकों का दीवाला निकलने लगा- जैसा कि यूरोप के कई देशों में 2008 से लेकर 2011 के बीच हुआ- तब उन्हें बचाने के प्रयास में सरकार भी दीवालिया हो जाने के कगार पर पहुंच जाएगी.

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समझौता पर हस्ताक्षर करते अलेक्स सालमंड व डेविड कैमरन

झगड़ा साझी मुद्रा का
इसी संभावना के डर से स्कॉटलैंड की सरकार स्वतंत्रता के बाद भी ब्रिटिश पाउंड को देश की सर्वमान्य मुद्रा बनाए रखना चाहती है क्योंकि उसकी साख बनाए रखना ब्रिटेन का काम होगा. लेकिन, ब्रिटेन की सरकार ऐसे किसी ‘मुद्रा-संघ’ के लिए कतई राजी नहीं है. स्कॉटलैंड के राष्ट्रवादी इसे स्वतंत्रता के समर्थक मतदाताओं को डराने की धौंसबाजी मानते और इसकी निंदा करते हैं. मुख्यमंत्री सालमंड ने स्वतंत्रता-प्राप्ति की अपनी कार्यसूची में पाउंड को बनाए रखने का संकल्प लिया था. उनका कहना है कि जनमत संग्रह के परिणाम के बाद वे ब्रिटेन से इस विषय पर आगे बात करेंगे. वे शायद सोच रहे हैं कि परिणाम यदि स्वतंत्रता के पक्ष में रहा, जैसा कि वे चाहते और मानते हैं, तो इसका मतलब यह होगा ब्रिटिश सरकार स्कॉटिश जनता को डराने-धमकाने में सफल नहीं रही. तब, हो सकता है कि वह अपना अड़ियल रुख छोड़ दे. शायद सोचे कि स्कॉटलैंड भी तो आखिरकार ब्रिटेन की वर्तमान महारानी या भावी राजा को अपना राष्ट्राध्यक्ष मानने जा रहा है!

ब्रिटेन यदि तब भी अड़ियल बना रहता है तो स्कॉटलैंड को या तो अपनी अलग मुद्रा चलानी होगी या फिर यूरोपीय संघ के साथ-साथ उसके यूरो मुद्रा-संघ (यूरो-जोन) की भी सदस्यता प्राप्त करनी होगी. इसकी कुछ कठोर शर्तें हैं. अपनी अलग मुद्रा चलाने का तुक तभी है जब बैंकिंग सेक्टर का आयाम इस हद तक घटे कि बैंकों का दीवाला निकलने से सरकार दीवालिया न हो जाए. यूरोपीय संघ के ‘यूरो-जोन’  की सदस्यता मिलने पर स्कॉटलैंड को अपने यहां ‘यूरो’ का प्रचलन करना और जर्मनी में फ्रैंकफर्ट स्थित यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) के नियमों से बंधना पड़ेगा. इसका मुख्य लाभ यह होगा कि बैंकिंग सेक्टर में किसी बड़े संकट की स्थिति में साझी यूरोपीय मुद्रा ‘यूरो’ के बचाव के लिए बनी कार्यप्रणाली उसके बैंकों के उद्धार की भी चिंता करेगी. नुकसान यह होगा स्कॉटलैंड के लिए तब विदेशी कालेधन का वैसा स्वर्ग बन पाना टेढ़ी खीर बन जायेगा जैसा वहां के नेता शायद सोच रहे हैं.

अलग-अलग मतसर्वेक्षणों में स्वतंत्रता के विरोधियों का ही पलड़ा भारी रहा है, हालांकि स्वतंत्रता के समर्थकों का अनुपात लगातार बढ़ता गया है

ताम-झाम आसान नहीं
विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह सारा ताम-झाम वैसे भी उतना आसान नहीं होगा जितना स्कॉटिश राष्ट्रवादी समझते हैं. इससे भी बड़ी बाधा यह है कि यूरोपीय संघ की साझी मुद्रा ‘यूरो’ स्वयं भी कुछ कम संकट में नहीं है. ‘यूरो’ स्कॉटलैंड में भी उतनी ही अलोकप्रिय है जितनी शेष ब्रिटेन में. 80 प्रतिशत लोग ‘यूरो’ नहीं चाहते. ‘यूरो’ के प्रति दुराव और पाउंड के प्रति लगाव ही ब्रिटेन के हाथ में वह तुरुप का पत्ता है, जिससे वह स्कॉटलैंड के जनमत संग्रह को विफल करने की आशा कर रहा है.

दूसरी ओर, स्कॉटलैंड उम्मीद कर रहा है कि ब्रिटेन से अलग होकर वह यूरोपीय संघ का 29वां सदस्य बन जाएगा. यूरोपीय संघ के विधि-विशेषज्ञ इसे भी इतना सरल नहीं मानते. उनके मुताबिक नियम यह है कि जो कोई क्षेत्र या प्रदेश संघ के किसी सदस्य देश से अलग होगा, वह अपने आप यूरोपीय संघ से भी बाहर हो गया माना जाएगा. यदि वह अपने नाम पर अलग से सदस्यता चाहता है तो उसे इसके लिए अलग से आवेदन करना होगा. यह आवेदन तभी स्वीकार हो सकता है, जब यूरोपीय संघ का हर सदस्य देश उसका अनुमोदन करेगा- यानी नयी सदस्यता के प्रश्न पर हर देश को वीटो का अधिकार है- ब्रिटेन को भी. ब्रिटेन चाहे तो अपने वीटो द्वारा स्कॉटलैंड की सदस्यता में टांग अड़ा सकता है. मजे की बात यह है कि ब्रिटेन स्वयं 2017 में अपने यहां जनमत संग्रह करवाना चाहता है कि वह यूरोपीय संघ का सदस्य बना रहे या नहीं. स्कॉटिश जनमत संग्रह का परिणाम यदि ब्रिटेन से स्वतंत्रता के पक्ष में, और ब्रिटिश जनमत संग्रह का परिणाम यूरोपीय संघ की वर्तमान सदस्यता के विपक्ष में निकला तब तो ब्रिटेन अपनी टांग नहीं अड़ा पाएगा.

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स्वतंत्रता विरोधियों का पलड़ा भारी
इन्हीं सब अड़चनों, दुविधाओं और दांव-पेचों भरी उलझनों के कारण 18 सितंबर को हो रहे जनमत संग्रह से पहले यह स्पष्ट नहीं था कि जनता का बहुमत स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता के पक्ष में है या विपक्ष में. पिछले कुछ महीनों से मीडिया व विभिन्न संस्थाओं द्वारा कराए जा रहे मत सर्वेक्षणों (ओपिनियन पोल) में स्वतंत्रता के विरोधियों का ही पलड़ा भारी रहा है, हालांकि स्वतंत्रता के समर्थकों का अनुपात लगातार बढ़ता गया है. उदाहरण के लिए, इन पंक्तियों के लिखने तक उपलब्ध ‘येस स्कॉटलैंड’ की ओर से 12 से 15 अगस्त के बीच करवाए गए मत सर्वेक्षण में 42 प्रतिशत लोग स्वतंत्रता के पक्ष में थे. 46 प्रतिशत विरुद्ध थे. 12 प्रतिशत कुछ तय नहीं कर पाए थे. ‘स्कॉटलैंड ऑन सन्डे’ की ओर से भी ठीक उन्हीं दिनों कराए गए मत सर्वेक्षण में केवल 38 प्रतिशत ने स्वतंत्रता का समर्थन किया. 47 प्रतिशत स्वतंत्रता के विरोधी थे और नौ प्रतिशत अनिश्चित थे. उन्हीं दिनों ‘द टाइम्स’ द्वारा कराए गए मत सर्वेक्षण के परिणाम तो और भी चौंकाने वाले थेः स्वतंत्रता के पक्ष में 38 प्रतिशत, उसके विरुद्ध 51 प्रतिशत और अनिश्चित 13 प्रतिशत.

सभी मत सर्वेक्षणों में औसतन एक हजार लोगों से उनकी राय पूछी गई. केवल इतने लोगों की राय 53 लाख की जनसंख्या का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती. मतसर्वेक्षणों से यदि फिर भी कुछ संकेत मिलता है, तो यही कि स्कॉटलैंड के भाग्य का फैसला वही लोग करेगे, जो जनमतसंग्रह के तीन सप्ताह पहले तक अपना मन नहीं बना पाए थे. उन्हीं के वशीकरण के लिए 25 अगस्त को स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता के पक्षधर मुख्यमंत्री अलेक्स सालमंड और स्वतंत्रता-विरोधी आन्दोलन के नेता एलिस्टेयर डार्लिंग के बीच दूसरी बार टेलीविजन-मुठभेड़ हुई. इस बहस के तुरंत बाद 41 प्रतिशत दर्शकों का मत था कि सालमंड ने कहीं बेहतर छाप छोड़ी है, जबकि 29 प्रतिशत को डार्लिंग की बातें पसंद आयीं. बहस के बाद मीडिया द्वारा कराए गए मतर्वेंक्षणों के परिणाम इन पंक्तियों के लिखने तक प्रकाशित नहीं हुए थे इसलिए कहा नहीं जा सकता कि बहस ने ‘हां’ और ‘ना’ के बीच की दूरी घटाई है या बढ़ाई है. स्कॉटलैंड के यदि आधे से कुछ अधिक मतदाता 18 सितंबर के दिन ‘येस’ (हां) पर निशान लगा देते हैं, तो ब्रिटेन ही नहीं, पश्चिमी यूरोप के ऐसे कई देशों के विघटन का भी बिगुल बज जायेगा, जो कभी साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी हुआ करते थे और आज अपने आप को संसार में लोकतंत्र का कर्णधार बताते हैं.

3--4641533426_e90d6027a9_bअगली बारी स्पेन की
लगभग 5,05, 000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और पौने पांच करोड़ जनसंख्या वाला देश स्पेन 17 स्वायत्तशासी क्षेत्रों व प्रदेशों वाला एक संसदीय राजतंत्र है. वैसे तो उसके लगभग सभी प्रदेशों में किसी न किसी रूप में पृथकतावाद की सुगबुगाहट चल रही है, पर देश के उत्तर में स्थित उसके दो प्रदेश- बास्क देश (बास्क अपने प्रदेश को देश ही कहते हैं) और कतालोनिया- अपने स्वाधीनता आंदोलनों के लिए सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं. दोनों के साथ एक बड़ा पेंच यह है कि वे जिस भूभाग को अपना मानते हैं, उसका कुछ हिस्सा पड़ोसी देश फ्रांस में भी पड़ता है. बास्क लोगों का आंदोलन बहुत ही उग्र एवं हिंसापूर्ण रहा है, जबकि कतालोनिया का अहिंसक और शालीन.

कतालोनिया के लिए आत्मनिर्णय के अधिकार की मांग 1931 से चल रही है. यह मांग करने वाली वहां की राष्ट्रवादी पार्टियों को उस साल के नगरपालिका चुनावों में सबसे अधिक वोट मिले थे. 1932 में कतालोनिया को एक ‘संवैधानिक स्वायत्तता’ मिली भी, लेकिन 1936 में स्पेन में गृहयुद्ध छिड़ जाने और 1939 में वहां जनरल फ्रांसिस्को फ्रांको की तानाशाही आ जाने के साथ छिन भी गई. इस तानाशाही का अंत 1975 में फ्रांको की मृत्यु और स्पेन में राजशाही लोकतंत्र की स्थापना के साथ हुआ. 1977 में कतालोनिया को अपनी स्वायत्तता वापस मिल गई, लेकिन समय के साथ पू्र्ण स्वतंत्रता की मांग भी जोर पकड़ती गई. कतालान लोग अपने आप को एक अलग राष्ट्र समझते हैं और हर वर्ष 11 सितंबर के दिन अपना राष्ट्रीय दिवस मनाते हैं. 2012 और 2013 के 11 सितंबर वाले दिन प्रादेशिक राजधानी बार्सेलोना में स्वाधीनता की मांग करती लाखों लोगों की ऐसी भीड़ उमड़ी कि सभी लोग दंग रह गए. ऐसे अनुशासित और शांतिपूर्ण प्रदर्शन स्पेन ने पहले कभी नहीं देखे थे.

कतालोनिया का स्वाधीनता-संकल्प
2012 वाले प्रदर्शन का असर यह हुआ कि कतालोनिया की विधानसभा को भंग कर, 25 नवंबर 2012 को, मध्यावधि चुनाव करवाए गए. चुनाव में पूर्ण स्वाधीनता की समर्थक पार्टियों को पूर्ण बहुमत मिल गया. इस बहुमत के बल पर विधानसभा ने 41 के विरुद्ध 85 मतों से ‘स्वतंत्रता और कतालान जनता के आत्मनिर्णय के अधिकार की घोषणा’ पारित करते हुए कहा कि ‘कतालोनिया की जनता का चरित्र एक सार्वभौम राजनीतिक एवं वैधानिक सत्ता’ जैसा, अर्थात एक स्वतंत्र राष्ट्र जैसा है. लेकिन, स्पेन के संविधान व्याख्या न्यायालय ने पहले तो इस घोषणा को निलंबित कर दिया और बाद में अवैध घोषित करते हुए ठुकरा दिया. इसके विरोध में 11 सितंबर 2013 को कतालोनिया के करीब 16 लाख निवासियों ने हाथ से हाथ मिलाते हुए 480 किलोमीटर लंबी मानव-श्रृंखला बना कर दुनिया का ध्यान अपने दृढ़निश्चय की ओर आकर्षित किया.

स्पेन में बास्क लोगों का आंदोलन बहुत ही उग्र एवं हिंसापूर्ण रहा है जबकि कतालोनिया का आंदोलन अपने अहिंसक और शालीन रूप के लिए जाना जाता है

ब्रिटेन के स्कॉटलैंड में नियोजित जनसंग्रह से प्रेरणा लेते हुए कतालोनिया की पृथकतावादी प्रादेशिक सरकार ने भी, नौ नवंबर 2014 को, अपने यहां जनमत संग्रह का आयोजन करने की घोषणा की है. स्पष्ट है कि यह जनमत संग्रह स्पेन के सर्वोच्च न्यायालय की संविधान-व्याख्या और केंद्रीय सरकार की इच्छा के विरुद्ध होगा. मतदाताओं के सामने दो प्रश्न रखे जाएंगेः पहला, ‘क्या आप चाहते हैं कि कतालोनिया एक राज्य (स्टेट) बन जाए?’  दूसरा प्रश्न होगा, ‘यदि आप का उत्तर सकारात्मक है, तो क्या आप चाहते हैं कि यह राज्य स्वतंत्र हो?’ स्पेनी सरकार ने कहा है कि वह इस जनमत संग्रह को नहीं होने देगी. सरकार ने यदि उसे रोकने के लिए बलप्रयोग किया तो प्रश्न यह होगा कि क्या उसके बाद भी कतालोनिया का स्वाधीनता आन्दोलन अहिंसक बना रहेगा?

कतालोनिया की अपनी अलग भाषा और संस्कृति है. उसकी गिनती स्पेन के सबसे खुशहाल प्रदेशों में होती है. वहां के 75 लाख निवासी 200 अरब यूरो के बराबर सकल घरेलू उत्पाद पैदा करते हैं, जो प्रति व्यक्ति 27,430 यूरो (लगभग 36 हजार डॉलर) बैठता है. कतालोनिया के नेताओं को शिकायत है कि स्पेन में चल रहे आर्थिक एवं वित्तीय संकट के इस दौर में उनके प्रदेश ने केंद्र सरकार द्वारा थोपी गई सारी कटौतियों को अब तक शिरोधार्य किया और अब वह स्वयं 44 अरब यूरो के ऋणभार से दब गया है. प्रदेश के सरकार प्रमुख आर्तुर मास कहते रहे हैं कि वे अपनी जनता की कमाई दूसरों के साथ बांट कर उसे हमेशा घटाते नहीं रह सकते. उनका यह भी कहना है कि स्पेन का संविधान कुछ भी कहे, वे जनमत संग्रह करा कर रहेंगे. उनकी सरकार द्वारा कराए गए एक मतसर्वेक्षण के अनुसार प्रदेश की 74 प्रतिशत जनता कतालोनिया की स्वतंत्रता के पक्ष में है.

3-Flemish-nationalist-rallyबास्क लोगों का हिंसक आंदोलन
उग्र राष्ट्रवादी बास्क संगठन ‘एता’ (ईटीए) 1959 से ही स्पेन से अलग होने के लिए सशस्त्र संघर्ष कर रहा था. 2011 में हिंसा का रास्ता छोड़ने की अपनी घोषणा तक ‘एता’ लगभग चार हजार आतंकवादी हमलों और बम धमाकों में 830 लोगों की जान ले चुका था. इस हिंसा के कारण न केवल स्पेनी जनमानस, स्वयं बास्क प्रदेश के निवासियों में भी स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति सहानुभूति घटने लगी थी. स्पेनी बास्क अपने क्षेत्र को ‘एउस्काल ऐर्रिया’ (बास्क देश) कहते हैं. वे स्पेन और फ्रांस के जिस पूरे भूभाग को अपना बताते और उसे स्वतंत्र देश बनाना चाहते हैं, वह कुल मिलाकर 31 लाख जनसंख्या वाले सात जिलों- जैसे अंचलों का केवल 21, 000 वर्ग किलोमीटर बड़ा इलाका है. उसके तीन अपेक्षाकृत छोटे अंचल फ्रांस में पड़ते हैं और चार बड़े स्पेन में. दोनों देश बास्क स्वतंत्रता की मांग को ठुकराते हैं.

बेल्जियम के 63 लाख फ्लेमिशों का आरोप है कि देश का दक्षिणी हिस्सा उनके पैसे पर पल रहा है. वे जल्दी से जल्दी बेल्जियम से पल्ला झाड़ना चाहते हैं

लगभग 22 लाख की जनसंख्या वाला स्पेनी बास्क प्रदेश स्पेन का सबसे प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र है. 66 अरब यूरो के बराबर उसका सकल घरेलू उत्पाद 31,288 यूरो (लगभग 42 हजार डॉलर) प्रति व्यक्ति बैठता है जो स्पेनी प्रदेशों के बीच सबसे अधिक है. उदाहरण के लिए, भारत में यह अनुपात डेढ़ हजार डॉलर प्रति व्यक्ति से कुछ अधिक है. अपनी भाषाई व सांस्कृतिक भिन्नताओं तथा स्पेन का सबसे संपन्न प्रदेश होने के नाते बास्क पृथकतावादियों का मानना है कि वे एक स्वतंत्र देश होने पर और अधिक प्रगति कर सकते हैं. स्पेन तो किसी हद तक उनकी भाषा और संस्कृति को स्वीकार करता है, किंतु फ्रांस उन्हें पूरी तरह पचा लेना चाहता है.

बास्क प्रदेश में 20 अक्टूबर, 2012 को हुए प्रादेशिक चुनावों से पृथकतावादियों के हाथ और भी मजबूत हुए हैं. इनमें एक नया वामपंथी गठबंधन ‘एउस्काल ऐर्रिया बिल्दू’ (एएचबी) पहली ही बार में 21 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रहा. इस गठबंधन को अतीत में उग्रवादी रहे ‘एता’ का नया राजनीतिक चेहरा माना जाता है. बास्क राष्ट्रवादी पार्टी ‘पीएनवी’ और ‘ईएचबी’ को मिलाकर बास्क प्रदेश की विधानसभा में पृथकतावादियों के पास अब दो-तिहाई सीटों का अपूर्व बहुमत हो गया है. बास्क पृथकतावादी अब पूरी तन्मयता के साथ देखेंगे कि कतालोनिया में नौ नवंबर को होने वाले जनमत संग्रह के बाद स्पेन में घटनाचक्र क्या मोड़ लेता है. देर-सवेर वे भी अपने यहां जनमत संग्रह के माध्यम से स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करने का पूरा प्रयास करेंगे.

4-south-tyrol-is-not-italiaदो पाटों के बीच बेल्जियम
क्षेत्रफल में राजस्थान के 10वें हिस्से के बराबर और केवल एक करोड़ 10 लाख की जनसंख्या वाला बेल्जियम शुरू से ही एक ऐसा अजूबा रहा है, जिसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि वह दशकों पहले ही टूट नहीं गया. अतीत में फ्रांस और हॉलैंड शासित दो इलाकों को जोड़कर 1830 में बने इस बनावटी देश के दोनों हिस्से कभी पूरी तरह जुड़ नहीं पाए. उत्तर के डच भाषी फ्लांडर्स और दक्षिण के फ्रेंच भाषी वालोनिया के बीच हमेशा खटपट बनी रही. डचभाषियों की जनसंख्या फ्रेंच भाषियों की दोगुनी है. दोनों के बीच विद्वेष ने देश को कई बार टूटने के कगार तक पहुंचाया, पर वह अब तक हर बार बाल-बाल बचता गया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले तक औद्योगिक दृष्टि से कहीं विकसित फ्रेंच भाषी वालोनिया-वासी, खेती-किसानी की प्रधानता वाले डच भाषी फ्लेमिशों की खिल्ली उड़ाया करते थे. विश्वयुद्ध के बाद संपन्नता और विकास का पलड़ा फ्लेमिशों के पक्ष में पलट गया. अब वे फ्रेंच भाषियों की खिल्ली उड़ाते हैं और नहीं चाहते कि उन्हें अपनी खुशहाली उनके साथ बांटनी पड़े. 63 लाख फ्लेमिश, जो बेल्जियम के सकल घरेलू उत्पाद में करीब 28 हजार यूरो (लगभग 37,500 डॉलर) प्रति व्यक्ति के हिस्सेदार हैं, यथासंभव बेल्जियम से पल्ला झाड़ लेना चाहते हैं.

बेल्जियम का ‘चेक-बुक संघवाद’
बंदरगाह नगर एन्टवर्प बेल्जियम के फ्लांडर्स हिस्से का सबसे बड़ा और राजधानी ब्रसेल्स के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा नगर है. 15 अक्टूबर 2012 को एन्टवर्प में स्थानीय चुनाव हुए थे. चुनाव परिणामों में 36 प्रतिशत मतों के साथ ‘नियू-फ्लाम्से अलियांसी’ (नव फ्लेमिश गठबंधन- एन-वीए) नाम की एक नई पृथकतावादी पार्टी सबसे आगे रही. उसके नेता और एन्टवर्प के नए मेयर बार्त दे वेवर ने चुनाव से पहले कहा था कि फ्लेमिश लोग ‘ऐसी गायों की तरह हमेशा दुहे जाने से थक गए हैं जिनका काम बस खूब मलाईदार दूध देना है.’  उनका यह भी कहना था कि बेल्जियम मात्र एक ‘ट्रांसफर यूनियन’ बन कर रह गया है जिसका एक हिस्सा दूसरे के धन पर पल रहा है और जो पूरी तरह ‘चेक-बुक संघवाद’ पर आश्रित है. चुनाव के बाद प्रधानमंत्री को ललकारते हुए उन्होंने कहा कि वे ‘देशव्यापी परिवर्तनों’ की तैयारी शुरू कर दें.

बार्त दे वेवर की पार्टी 2010 में बेल्जियम में हुए उन संसदीय चुनावों में भी पूरे देश में सबसे आगे रही थी जिनके बाद डेढ़ साल तक वहां कोई नई सरकार ही नहीं बन पाई. वर्तमान प्रधानमंत्री एलियो दी रूपो फ्रेंच भाषी हैं. वे अब भी प्रधानमंत्री हैं, क्योंकि जुलाई 2014 में हुए संसदीय चुनावों के बाद इस बार भी किसी नई सरकार का गठन नहीं हो पाया है. इन चुनावों से फ्लेमिश पार्टी ‘एन-वीए’ की शक्ति और बढ़ी है. आशंका है कि 2010 की तरह इस बार भी महीनों तक कोई नई सरकार नहीं बन पाएगी. राजनीतिक अस्थिरता भी किसी देश की एकता के लिए घातक होती है. अब तो फ्लांडर्स क्षेत्र के उद्योगपति और कारोबारी भी देश के विभाजन का समर्थन करने लगे हैं.

इन देशों में पृथकतावाद की आग को गरीबी, बेरोजगारी या किसी भेदभाव से ज्यादा अपने ही धनवान अंचलों की स्वार्थपरता से हवा मिल रही है

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स ही यूरोपीय संघ की राजधानी और उत्तर अटलांटिक संधि संगठन ‘नाटो’ का मुख्यालय भी है. ब्रसेल्स फ्लांडर्स में पड़ता है, पर वहां फ्रेंच भाषा का बोलबाला है. देश यदि टूटता है, तो उस के दो नहीं तीन टुकड़े बन सकते हैं. तीसरा टुकड़ा उन 76 हजार जर्मन भाषियों का होगा जो देश के पूर्व में जर्मनी की सीमा के पास बसे हुए हैं और संभवतः जर्मनी के साथ विलय की मांग कर सकते हैं.

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कोर्सिया में दिशासूचकों पर लिखे गए शब्द मिटा दिए गए हैं.

फ्रांस भी आक्रांत 
पश्चिमी यूरोप के प्रमुख देशों में फ्रांस सबसे अधिक केंद्रवादी देश है. वहां उस तरह के प्रांत या प्रदेश नहीं हैं जिस तरह के ब्रिटेन, स्पेन या बेल्जियम में हैं. दूर से देखने पर फ्रांस बहुत ठोस, समरूपी और शक्तिशाली लगता है, लेकिन पृथकतावाद से वह भी अछूता नहीं है. स्पेन की सीमा से लगे फ्रांस के दक्षिण-पूर्वी भाग में जो बास्क और कतालान अल्पसंख्यक रहते हैं, वे भी जब-तब याद दिलाया करते हैं कि वे अपनी भाषा और संस्कृति के दमन से व्यथित हैं. बास्क और कतालोनिया यदि स्पेन से अलग होकर स्वतंत्र देश बनने में सफल हो गए, तो फ्रांस का सिरदर्द और बढ़ जाएगा. तब वे या फ्रांस के बास्क और कतालान सीमा के दोनों ओर के भूभागों के विलय की मांग कर सकते हैं.

भूमध्य सागर में स्थित फ्रांस के कोर्सिका द्वीप पर भी फ्रांस से अलग होने की मांग होती ही रहती है. वहां राष्ट्रवादियों के विद्रोह का दमन करने के लिए, 1970 के दशक के मध्य में, फ्रांस को सैनिक बलप्रयोग का सहारा लेना पड़ा था. वहां फ्रांस के प्रति असंतोष की शुरुआत तब हुई जब पिछली सदी में फ्रांस की मुख्य भूमि से आए या उसके अफ्रीकी उपनिवेश अल्जीरिया की स्वतंत्रता के बाद अल्जीरिया से भागे फ्रांसीसी भारी संख्या में वहां आकर बसने लगे. उनके बसने या बसाए जाने से मूल कोर्सिकन अपने ही घर में अल्पसंख्यक बन गए. साथ ही कोर्सिका की स्थानीय भाषा को स्कूलों और सार्वजनिक स्थानों पर वर्जित किया जाने लगा.

वहां का पृथकतावादी ‘एफएलएनसी’ आंदोलन 1976 से हत्याओं और बम धमाकों द्वारा बाहर से आए फ्रांसीसियों को भगाने और कोर्सिका को आजाद कराने का प्रयास करता रहा है. केवल तीन लाख जनसंख्या वाले कोर्सिका द्वीप की आजादी तो अभी भी दूर है, लेकिन 1980 और 1990 में आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक,  कृषि, ऊर्जा, परिवहन जैसे कई मामलों में वहां के स्थानीय प्रशासन के अधिकार बढ़ा दिए गए. एक समय ऐसा भी आया जब फ्रांस की संसद ने मान लिया कि कोर्सिका की जनता एक अलग राष्ट्र है. लेकिन, इस मान्यता को बाद में यह कहते हुए वापस भी ले लिया गया कि यह संविधान के विरुद्ध जाती है. जून 2014 में ‘एफएलएनसी’ ने सशस्त्र संघर्ष छोड़ शांतिपूर्ण संघर्ष जारी रखने की घोषणा की है. जनमत संग्रह के बल पर ब्रिटेन का स्कॉटलैंड स्वतंत्र हो जाता है, तो इससे कोर्सिका के पृथकतावादियों को ही नहीं, फ्रांस की मुख्य भूमि पर ‘ब्रेतान’, ‘प्रोवैंस’ और ‘अल्जास’ जैसे क्षेत्रों के निवासियों को भी एक नई स्फूर्ति और फ्रांसीसी सरकार को नया सिरदर्द मिलेगा.

इटली में दक्षिणपंथ की धूम
उत्तरी इटली की कई पार्टियों का एक गठबंधन है, जिसे संक्षेप में ‘लेगा नोर्द’ (नॉर्दर्न लीग) कहा जाता है. उसके पूरे नाम का हिंदी में अर्थ होगा ‘पदानिया की स्वतंत्रता के लिए उत्तरी लीग.’ 1991 में बने इस दक्षिणपंथी गठबंधन का उस समय उद्देश्य था ‘पदानिया’ को एक स्वतंत्र देश बनाना, या कम से कम उसे व्यापक स्वायत्तता दिलवाना. ‘पदानिया’ उसकी शब्दावली में उत्तरी इटली का वह भाग है, जिसे ‘पदानियाई-वेनेतो मैदान’ भी कहा जाता है और जो देश के दक्षिणवर्ती हिस्सों की अपेक्षा अधिक विकसित है. ‘लेगा नोर्द’ के संस्थापक और मुख्य नेता उम्बेर्तो बोस्सी इटली के पू्र्व प्रधनमंत्री सिल्वियो बेर्लुर्स्कोनी की सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं.

2010 के क्षेत्रीय चुनावों में यह गठबंधन अपने क्षेत्र में सबसे बड़ा राजनीतिक घटक बन कर उभरा. वह चाहता है कि या तो इटली को एक ऐसी संघात्मक शासन प्रणाली में बदल दिया जाए जिसमें उसकी संघटक इकाइयों के पास व्यापक अधिकार हों- विशेषकर व्यापक आर्थिक अधिकार- या फिर उत्तर के ‘पदानिया’ को शेष इटली से छुटकारा मिले. उत्तरी इटली काफी औद्योगीकृत और संपन्न है, जबकि देश के कृषिप्रधान दक्षिणी भागों में बेरोजगारी और ग़रीबी का अनुपात कहीं अधिक है. ‘लेगा नोर्द’  के नेता कर-राजस्व का अधिकतर हिस्सा अपने ही पास रखना चाहते हैं. वे बहुत खुल कर तो नहीं कहते कि ऐसा नहीं होने पर वे इटली से अलग हो जाएंगे पर उनके आलोचकों का मानना है कि वे इटली के बंटवारे की भूमिका तैयार कर रहे हैं. इस बीच उत्तरी इटली के एक नामी उद्योगपति ने स्वतंत्रता की मांग करने वाली एक अलग संस्था बनाई है जिसमें ‘लेगा नोर्द’ के भी कुछ लोग शामिल हैं. इस संस्था ने बीती फरवरी में एक जनमतसंग्रह करवाया. इसमें, उसके कहने के अनुसार, 47 प्रतिशत लोगों ने इटली से अलग हो जाने का समर्थन किया. इटली में व्यापक भ्रष्टाचार और वर्षों से अपनी उपेक्षा के कारण उसके सिसली और सार्डीनिया द्वीपों से भी पृथकतावादी प्रवृत्तियों के समाचार मिला करते हैं.

खुशहाल अंचलों के निवासी अपनी मलाईदार खीर पिछड़े अंचलों के साथ बांटना नहीं चाहते. वे अलग देश बनाकर उसे अकेले ही डकार जाना चाहते हैं

4-padaniaभाग्य को कोसता दक्षिणी टिरोल
उत्तरी इटली का जर्मन भाषी दक्षिणी टिरोल धन-धान्य से संपन्न तो है ही, ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड की तरह ही स्वर्ग-समान सौंदर्य से भी भरपूर है. पहले वह ऑस्ट्रिया का ही एक हिस्सा हुआ करता था और टिरोल कहलाता था. पहले विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 1919 में बने यूरोप के नए नक्शे में टिरोल को दो भागों में बांट दिया गया. उत्तर-पूर्वी भाग जर्मन भाषी ऑस्ट्रिया के पास रहने दिया गया. दक्षिणी भाग इटली को दे दिया गया.

दक्षिणी टिरोल वाले तभी से अपनी किस्मत को कोस रहे हैं. इटली में 1922 में सत्ता में आई फासिस्ट सरकार ने जर्मन भाषा और संस्कृति पर रोक लगा दी. वह गांवों, शहरों, सड़कों, झीलों और पहाड़ों को मनमाने इतालवी नाम देने लगी. स्थिति तब बदली जब द्वितीय विश्वयुद्ध में तानाशाह मुसोलिनी की पराजय और उसकी हत्या के बाद इटली में एक जनतांत्रिक सरकार बनी. उसने 1946 में दक्षिणी टिरोल को स्वायत्तशासी दर्जा दिया, लेकिन साथ ही उसे इतालवी भाषी त्रेन्तीनो प्रदेश का हिस्सा बनाकर भाषायिक अल्पमत में डाल दिया. दक्षिणी टिरोल वासियों ने इसके विरोध में हिंसा और आतंकवाद को अपनाना शुरू कर दिया. हार मानकर इटली ने उन्हें 1992 में व्यापक स्वायत्तशासी अधिकार दिए.

इस बीच इटली भी यूरो मुद्रा वाले कई अन्य देशों की तरह दीवालिया होने से बचने की जी-जान से कोशिश कर रहा है. सरकार अपने बचत और कटौती अभियान में दक्षिणी टिरोल को भी शामिल करने लगी है. इससे वहां पुराने घाव फिर से हरे होने लगे हैं. भारत में गोआ से कुछ बड़े दक्षिणी टिरोल की जनसंख्या केवल पांच लाख 10 हजार है, लेकिन प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद लगभग 35 हजार यूरो है.

इटली की सरकार अपने ऋणभार को घटाने के लिए दक्षिणी टिरोल से भी अतिरिक्त योगदान की मांग कर रही है. नतीजा यह हो रहा है कि बहुत से टिरोल वासी एक बार फिर पूछने लगे हैं कि इटली में बने रहने का आखिर फायदा क्या है. वहां के पृथकतावादी कह रहे हैं कि उनके प्रदेश का 90 प्रतिशत राजस्व उन्हीं के पास रहना चाहिए, वर्ना वे इटली से अलग हो जाने के लिए फिर से उठ खड़े होंगे.

अमीरों का पृथकतावाद
अलगाववादी प्रवृत्तियों की व्याख्या करते समय अब तक मुख्य तर्क यही दिया जाता रहा है कि उनकी जड़ में आंचलिक गरीबी, बेरोजगारी, अत्याचार, भेदभाव या आर्थिक पिछड़ापन होता है. लेकिन, यूरोप के प्रसंग में हम पाते हैं कि दो दशक पहले (तत्कालीन सोवियत संघ के एशियाई हिस्सों के इतर) पू्र्वी यूरोप में लगभग एक दर्जन नए देशों का उभरना स्थानीय राष्ट्रवाद की आग का ही नहीं, उस आग में नाटो के यूरोपीय सदस्य देशों द्वारा डाले गए घी का भी परिणाम था. जर्मनी को छोड़कर, उस समय की आग में घी डालने वाले कई पश्चिमी यूरोपीय देशों का अपना हाथ इस समय जल रहा है. 1990 वाले दशक में तत्कालीन युगोस्लाविया में प्रत्यक्ष सैनिक हस्तक्षेप कर जब ये देश उसे छिन्न-भिन्न कर रहे थे, तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि अलगाव के इस अलाव की आंच से कभी वे भी झुलस सकते हैं.

इन देशों में पृथकतावाद की आग को गरीबी, बेरोजगारी या किसी भेदभाव से अधिक उनके अपने ही धनवान, खुशहाल अंचलों की अवसरवादिता और स्वार्थपरता से या फिर ऐतिहासिक यादों से हवा मिल रही है. खुशहाल अंचलों के निवासी अपनी मलाईदार खीर पिछड़े अंचलों के साथ बांटने के बदले अलग देश बनाकर अकेले ही डकार जाना चाहते हैं. उनके नेताओं को यूरोपीय संघ में व्याप्त आर्थिक और वित्तीय संकट से अलग होने का एक सुनहरा मौका नजर आ रहा है, हालांकि यूरोपीय संघ में वे भी बने रहना चाहते हैं. वे यह भी जानते हैं कि आज का यूरोपीय संघ ही एक दिन अमेरिका जैसा ‘संयुक्त राज्य यूरोप’ बनने वाला है. उसके झंडे तले तब वे एक ही मेज पर उन्हीं लोगों की बगल में फिर बैठेंगे जिन्हें आज बुरा-भला कह रहे हैं.

एक नया धर्मसंकट
इस बीच पश्चिमी यूरोप के देशों में राजनीतिज्ञों और समाजशास्त्रियों की कई ऐसी पुस्तकें या लेख आदि भी प्रकाशित हुए हैं, जिनमें अगले कुछ दशकों में जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस और स्वीडन जैसे देशों में इस्लामी पृथकतावाद के उभरने के प्रति आगाह किया गया है. उनका कहना है कि 40-50 वर्ष पूर्व इन देशों में मुसलमानों की संख्या नगण्य हुआ करती थी. इस बीच एशिया और अफ्रीका से आकर इन देशों में बस गए मुस्लिम शरणार्थियों तथा वैध-अवैध अप्रवासियों की कुल संख्या इन देशों की अपनी जनसंख्या के चार से 10 प्रतिशत के बराबर हो गई है. वे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान खोने के डर से स्थानीय समाज के साथ घुलना-मिलना पसंद नहीं करते. स्थानीय समाज में भी उनके प्रति नस्लीय या अन्य प्रकार के पूर्वाग्रह हैं. ऐसे ही तनावों के कारण ब्रिटेन, फ्रांस और स्वीडन में भारी दंगे भी हो चुके हैं. इन लेखकों का मत है कि कुछ इस्लामी देश स्वयं जिस तरह टूट रहे हैं और पश्चिमी यूरोप के देश अपने यहां इस्लामी कट्टरपंथ या आतंकवाद से जिस तरह जूझ रहे हैं, वह सब मिल कर पश्चिमी यूरोप को इस्लामी पृथकतावाद के लिए उर्वर भूमि बना रहा है. पश्चिमी यूरोप के देश इस नई चुनौती को लेकर बड़े धर्मसंकट में हैं. एक तरफ तो उदार मानवीय मूल्यों पर आधारित उनके लोकतांत्रिक संविधान जातीय या धार्मिक भेदभाव की अनुमति नहीं देते, दूसरी तरफ नेताओं को वोट के लिए उसी जनता के सामने जाना पड़ता है, जो अपने ही देश में विदेशी बन जाने की शिकायत करती है.

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