‘जुड़ते यूरोप के टूटते देश’

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न तो बर्लिन की दीवार गिरती, न विभाजित जर्मनी का पुन: एकीकरण हो पाता, ढाई दशक पूर्व, तत्कालीन सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचोव ने यदि इसे रोकना चाहा होता. इससे भी बड़ी विडंबना यह रही कि जर्मनी का एकीकरण होते ही सोवियत संघ स्वयं ताश के पत्तों की तरह बिखर गया. आज उसकी जगह 15 नए देश बन गए हैं. जर्मनी का एकीकरण पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों के लिए ऐसा अपशगुन साबित हुआ कि उस समय के चेकोस्लोवाकिया और युगोस्लाविया का भी अस्तित्व नहीं रहा. चेक गणराज्य और स्लोवाकिया भूतपूर्व चेकोस्लोवाकिया के नए उत्तराधिकारी हैं, जबकि युगोस्लाविया को जर्मनी की अगुआई में ‘नाटो’ देशों ने मिलकर ऐसा तोड़ा कि उस की जगह पर अब तक सात नए देश बन चुके हैं.

कह सकते हैं कि समाजवादी देशों की दिखावटी एकता वहां की कम्युनिस्ट तानाशाहियों की बनावटी सफलता थी. कभी न कभी इस आडंबर का बेड़ा गर्क होना ही था. लेकिन, विडंबना यह भी है कि अब बारी पश्चिमी यूरोप के उन देशों के टूटने की है, जो अपने आप को लोकतंत्र का सिरमौर समझते हैं. वे ‘नाटो’ और यूरोपीय संघ दोनों के सदस्य हैं. अन्य देशों में पृथकतावाद को पोषित करते रहे हैं. अपनी सभ्यता-संस्कृति पर इतराने और भारत जैसे बहुजातीय देशों को राष्ट्र-राज्य (एक देश में एक जैसी सभ्यता, संस्कृति, भाषा, इतिहास एवं उद्भव वाली जनता की राज्यसत्ता) का उपदेश देते रहे हैं. इसी सिद्धांत के चलते अब अपने ही टूटने की नौबत आती देखकर वे सन्नाटे में आ गए हैं. सबसे बड़ा विरोधाभास तो यह है कि उनके जो प्रदेश उद्भव, बोल-भाषा या रहन-सहन वाली परिभाषा की आड़ लेकर अलग होना चाहते हैं, वे किसी गरीबी या पिछड़ेपन के कारण नहीं, अपनी अमीरी और सफलता का सुखभोग अन्य प्रांतों के साथ बांटने से बचने के लिए ऐसा कर रहे हैं. बाद में, यूरोपीय संघ की छत्रछाया में वे उन्हीं की बगल में बैठना भी चाहते हैं जिनसे अलग होने के लिए वे आज मचल रहे हैं.

इस समय 28 देशों का यूरोपीय संघ यूरोप महाद्वीप के लगभग 45 सार्वभौम देशों को मिला कर उन्हें एक ही माला में पिरोने का प्रयास कर रहा है. कुछ जानकारों का कहना है कि इससे इन देशों के कुछ प्रदेशों को स्वतंत्र देश बन कर स्वयं ही इस माला के मनके बनने की प्रेरणा मिल रही है. अगले कुछ वर्षों में यूरोप में 10 नए स्वतंत्र देश जन्म ले सकते हैं. शुरुआत हो चुकी है. सितंबर और अक्टूबर 2012 में सिर्फ तीन हफ्ते के भीतर पश्चिमी यूरोप के तीन प्रमुख देशों- ब्रिटेन, स्पेन और बेल्जियम के चार प्रदेशों ने स्पष्ट कर दिया कि वे अलग देश बनने के लिए दृढ़ संकल्प हैं. इटली और फ्रांस के पृथकतावादी भी फिर से अंगड़ाई लेने लगे हैं.

अलगाववादी आंदोलनों की ताकत जिस तरह से बढ़ रही है उससे लगता है कि 45 देशों वाले यूरोप में कुछ साल के भीतर ही 10 नए देश जन्म ले सकते हैं

यूरोप के ये प्रमुख देश भारत के उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, या महाराष्ट्र से भी छोटे हैं. कुछ दूसरे देश तो भारत के सबसे छोटे राज्यों से भी बौने हैं. ऐसे में, यूरोप में पृथकतावाद के पुनरुत्थान को समझ पाना और भी दुरूह हो जाता है.

स्कॉटलैंड में जनमत संग्रह
अलग होने की इस आतुरता में सबसे आगे है ब्रिटेन का स्कॉटलैंड प्रदेश.यानी भारत को दो टुकड़ों में बांट कर स्वतंत्रता देने वाले जिस ब्रिटेन के साम्राज्य में सूर्य कभी डूबता ही नहीं था, उसके अब अपने ही टुकड़े होने की नौबत आ गई है. दो साल से भी कम समय में हो सकता है कि ब्रिटेन का विधिवत बंटवारा हो जाए. उसका उत्तरी प्रदेश ‘स्कॉटलैंड’  एक नया देश बनने के लिए मचल रहा है. 18 सितंबर के दिन वहां जनमत संग्रह है. बहुमत यदि स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता के पक्ष में गया तो 24 मार्च 2016 के दिन स्कॉटलैंड यूरोप के नक्शे पर एक नया देश बन कर उभरेगा. यह वह दिन है, जब ‘राजशाही स्कॉटलैंड’ और ‘राजशाही इंगलैंड’ के मेल (यूनियन ऑफ क्राउन्स)  को 413 साल हो जाएंगे. दोनों राजशाहियों को मिला कर एक मई 1707 को बर्तानिया महान (ग्रेट ब्रिटेन) की स्थापना हुई थी, हालांकि स्कॉटलैंड के विभिन्न शहरों में इसके खिलाफ भीषण दंगे भी हुए थे. ब्रिटेन का हिस्सा हो जाने पर भी स्कॉटलैंड की न्याय प्रणाली शेष ब्रिटेन से अलग ही रही.

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स्कॉटलैंड में स्वतंत्रता समर्थक एक रैली.

स्कॉटलैंड के मुख्यमंत्री अलेक्स सालमंड का नारा है, ‘हमारी सफलता का फल हमारे हाथों में होना चाहिए.’ उनकी सरकार जनता को सब्जबाग दिखाती रही है कि जब स्थानीय संपदा और कार्यकुशलता को पूरे ब्रिटेन के साथ बंटना नहीं पड़ेगा तब जनता की खुशहाली और तेजी से बढ़ेगी. जनमत संग्रह के लिए एक ऐसा दिन चुना गया है, जो मतदाताओं को एक तरह से शपथ दिलाता है कि उन्हें अपने वोट द्वारा स्कॉटलैंड को विजयी बनाना ही है. ठीक 700 वर्ष पूर्व, 1314 के इन्हीं दिनों में, स्कॉटिश राष्ट्रवादियों ने तथाकथित ‘बनकबर्न युद्ध’ में अंग्रेजों की सेना को धूल चटाई थी. स्कॉटलैंड की सत्तारूढ़ ‘स्कॉटिश नैशनल पार्टी’  (एसएनपी) के मुख्यमंत्री अलेक्स सालमंड को पूरा विश्वास है कि मतदाता इस दिन की ऐतिहासिक महत्ता को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय स्वाधीनता के रथ को रुकने नहीं देंगे. वे 2010 से ही जनमत संग्रह का दिन तय करने के लिए व्याकुल थे. लेकिन, उस समय स्कॉटलैंड की विधानसभा में उनकी पार्टी का बहुमत नहीं था और दूसरी पार्टियों का समर्थन मिल नहीं रहा था. 2011 का विधानसभा चुनाव वे इसी वादे के साथ लड़े कि उनकी पार्टी को यदि पूर्ण बहुमत मिला तो स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता के प्रश्न पर जनमत संग्रह होकर रहेगा.

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imgअलगाव की आग

ब्रिटेन के स्कॉटलैंड में 18 सितंबर 2014 को होने वाला जनमत संग्रह यदि उसकी आजादी के पक्ष में गया तो 2016 में वह नया देश बन जाएगा.

स्पेन के उत्तर में स्थित उसके दो प्रदेशों बास्क और कतालोनिया में स्वाधीनता के लिए जबर्दस्त आंदोलन चल रहे हैं. पृथकतावादियों की राजनीतिक ताकत वहां काफी बढ़ गई है.

बेलजियम में उत्तर के डच भाषी फ्लांडर्स दक्षिण के फ्रेंच भाषी वालोनिया से अलग होना चाहते हैं. उनकी शिकायत है कि देश का दक्षिणी हिस्सा उनके खर्च पर पल रहा है. एनवीए नाम की उनकी नई पृथकतावादी पार्टी हाल के संसदीय चुनावों में वहां सबसे ताकतवर दल बनी है.

फ्रांस दक्षिण-पूर्वी हिस्से के बास्क और कतालान अल्पसंख्यक बास्क और कतालान के अलग देश बनने पर उनमें शामिल हो सकते हैं. भूमध्य सागर में स्थित कोर्सिका द्वीप पर भी फ्रांस से अलग होने की मांग चल रही है.

इटली के उत्तरी हिस्से में स्थित पदानिया और दक्षिणी टिरोल नाम के इलाके आजादी या ज्यादा से ज्यादा स्वायत्तता की मांग को लेकर मुखर हैं[/box]

जनमत संग्रह ब्रिटेन को स्वीकार्य
चुनाव में सालमंड की पार्टी ‘एसएनपी’ को कुल 129 में से 69 सीटें मिलीं. उनका एकछत्र राज हो गया. इस पूर्ण बहुमत का अर्थ उन्होंने यही लगाया कि जनता उनके साथ है. इससे उत्साहित होकर जनवरी 2012 में उन्होंने घोषणा की कि 2014 की गर्मियों के बाद जनमत संग्रह होगा. मार्च 2013 में तय हुआ कि जनमत संग्रह 18 सितंबर 2014 के दिन होगा. इससे पहले, 21 अक्टूबर 2012 को, स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबरा में ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने एक समझौते पर हस्ताक्षर के साथ विधिवत मान लिया था कि स्कॉटलैंड यदि ब्रिटिश संयुक्त राजशाही (यूके) के भीतर रहने के लिए कतई राजी नहीं है, तो वह 2014 के अंत तक इस विषय पर जनमत संग्रह करवाने का अधिकारी है.

मतदाताओं को केवल ‘हां’ या ‘नहीं’  में इस प्रश्न का उत्तर देना है कि ‘क्या स्कॉटलैंड एक स्वतंत्र देश होना चाहिए ?’ एडिनबरा समझौते के अनुसार,16 वर्ष या उससे अधिक आयु के वे सभी ब्रिटिश नागरिक मतदान के अधिकारी हैं जो स्कॉटलैंड के निवासी हैं. यानी वे गैर-स्कॉटिश भी मतदान कर सकते हैं जो स्कॉटलैंड में रहते हैं. लेकिन, स्कॉटिश मूल के वे लोग मतदान नहीं कर सकते जो स्कॉटलैंड से बाहर ब्रिटेन के किसी दूसरे हिस्से में रहते हैं. यूरोपीय संघ वाले देशों के वे नागरिक भी मतदान के अधिकारी हैं, जो स्कॉटलैंड के स्थायी निवासी हैं.

जीडीपी पांचवें नंबर पर
स्कॉटलैंड ब्रिटेन के कुल क्षेत्रफल के एक-तिहाई (78 हजार वर्ग किलोमीटर) के बराबर है जबकि वहां ब्रिटेन की केवल साढ़े आठ प्रतिशत (53 लाख) जनता बसती है. उत्तरी सागर से होने वाली तेल की अच्छी आय के कारण इसका सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 44, 378 डॉलर प्रति व्यक्ति है जो पूरे ब्रिटेन के औसत से अधिक है. सत्तारूढ़ पार्टी ‘एसएनए’ का दावा है कि प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद की दृष्टि से स्कॉटलैंड पूरे यूरोप में पांचवें नंबर पर है. 1980 के बाद से वहां संपन्नता शेष ब्रिटेन की अपेक्षा कहीं तेजी से बढ़ी है.

लंदन के बाद स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबरा में ही देश-विदेश के बैंकों का सबसे बड़ा जमघट है. प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद का नौ प्रतिशत बैंकिंग सेक्टर से आता है. सात प्रतिशत लोग इसी सेक्टर में काम करते हैं. बैंकों की तिजोरियों में जो धन जमा है, वह पूरे यूरोप में चौथा सबसे बड़ा धन-भंडार है. वित्त-विशेषज्ञ मानते हैं कि स्कॉटलैंड के बैंकों में जो धन जमा है, वह उसके सकल घरेलू उत्पाद के 12 गुने के बराबर है. उनका कहना है कि जब तक ऐसा कोई संकट नहीं आता कि बैंकों का दीवाला निकलने लगे, तब तक तो सब कुछ ठीक है. किंतु, यदि कभी बैंकों का दीवाला निकलने लगा- जैसा कि यूरोप के कई देशों में 2008 से लेकर 2011 के बीच हुआ- तब उन्हें बचाने के प्रयास में सरकार भी दीवालिया हो जाने के कगार पर पहुंच जाएगी.

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समझौता पर हस्ताक्षर करते अलेक्स सालमंड व डेविड कैमरन

झगड़ा साझी मुद्रा का
इसी संभावना के डर से स्कॉटलैंड की सरकार स्वतंत्रता के बाद भी ब्रिटिश पाउंड को देश की सर्वमान्य मुद्रा बनाए रखना चाहती है क्योंकि उसकी साख बनाए रखना ब्रिटेन का काम होगा. लेकिन, ब्रिटेन की सरकार ऐसे किसी ‘मुद्रा-संघ’ के लिए कतई राजी नहीं है. स्कॉटलैंड के राष्ट्रवादी इसे स्वतंत्रता के समर्थक मतदाताओं को डराने की धौंसबाजी मानते और इसकी निंदा करते हैं. मुख्यमंत्री सालमंड ने स्वतंत्रता-प्राप्ति की अपनी कार्यसूची में पाउंड को बनाए रखने का संकल्प लिया था. उनका कहना है कि जनमत संग्रह के परिणाम के बाद वे ब्रिटेन से इस विषय पर आगे बात करेंगे. वे शायद सोच रहे हैं कि परिणाम यदि स्वतंत्रता के पक्ष में रहा, जैसा कि वे चाहते और मानते हैं, तो इसका मतलब यह होगा ब्रिटिश सरकार स्कॉटिश जनता को डराने-धमकाने में सफल नहीं रही. तब, हो सकता है कि वह अपना अड़ियल रुख छोड़ दे. शायद सोचे कि स्कॉटलैंड भी तो आखिरकार ब्रिटेन की वर्तमान महारानी या भावी राजा को अपना राष्ट्राध्यक्ष मानने जा रहा है!

ब्रिटेन यदि तब भी अड़ियल बना रहता है तो स्कॉटलैंड को या तो अपनी अलग मुद्रा चलानी होगी या फिर यूरोपीय संघ के साथ-साथ उसके यूरो मुद्रा-संघ (यूरो-जोन) की भी सदस्यता प्राप्त करनी होगी. इसकी कुछ कठोर शर्तें हैं. अपनी अलग मुद्रा चलाने का तुक तभी है जब बैंकिंग सेक्टर का आयाम इस हद तक घटे कि बैंकों का दीवाला निकलने से सरकार दीवालिया न हो जाए. यूरोपीय संघ के ‘यूरो-जोन’  की सदस्यता मिलने पर स्कॉटलैंड को अपने यहां ‘यूरो’ का प्रचलन करना और जर्मनी में फ्रैंकफर्ट स्थित यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) के नियमों से बंधना पड़ेगा. इसका मुख्य लाभ यह होगा कि बैंकिंग सेक्टर में किसी बड़े संकट की स्थिति में साझी यूरोपीय मुद्रा ‘यूरो’ के बचाव के लिए बनी कार्यप्रणाली उसके बैंकों के उद्धार की भी चिंता करेगी. नुकसान यह होगा स्कॉटलैंड के लिए तब विदेशी कालेधन का वैसा स्वर्ग बन पाना टेढ़ी खीर बन जायेगा जैसा वहां के नेता शायद सोच रहे हैं.

अलग-अलग मतसर्वेक्षणों में स्वतंत्रता के विरोधियों का ही पलड़ा भारी रहा है, हालांकि स्वतंत्रता के समर्थकों का अनुपात लगातार बढ़ता गया है

ताम-झाम आसान नहीं
विधि विशेषज्ञों का मानना है कि यह सारा ताम-झाम वैसे भी उतना आसान नहीं होगा जितना स्कॉटिश राष्ट्रवादी समझते हैं. इससे भी बड़ी बाधा यह है कि यूरोपीय संघ की साझी मुद्रा ‘यूरो’ स्वयं भी कुछ कम संकट में नहीं है. ‘यूरो’ स्कॉटलैंड में भी उतनी ही अलोकप्रिय है जितनी शेष ब्रिटेन में. 80 प्रतिशत लोग ‘यूरो’ नहीं चाहते. ‘यूरो’ के प्रति दुराव और पाउंड के प्रति लगाव ही ब्रिटेन के हाथ में वह तुरुप का पत्ता है, जिससे वह स्कॉटलैंड के जनमत संग्रह को विफल करने की आशा कर रहा है.

दूसरी ओर, स्कॉटलैंड उम्मीद कर रहा है कि ब्रिटेन से अलग होकर वह यूरोपीय संघ का 29वां सदस्य बन जाएगा. यूरोपीय संघ के विधि-विशेषज्ञ इसे भी इतना सरल नहीं मानते. उनके मुताबिक नियम यह है कि जो कोई क्षेत्र या प्रदेश संघ के किसी सदस्य देश से अलग होगा, वह अपने आप यूरोपीय संघ से भी बाहर हो गया माना जाएगा. यदि वह अपने नाम पर अलग से सदस्यता चाहता है तो उसे इसके लिए अलग से आवेदन करना होगा. यह आवेदन तभी स्वीकार हो सकता है, जब यूरोपीय संघ का हर सदस्य देश उसका अनुमोदन करेगा- यानी नयी सदस्यता के प्रश्न पर हर देश को वीटो का अधिकार है- ब्रिटेन को भी. ब्रिटेन चाहे तो अपने वीटो द्वारा स्कॉटलैंड की सदस्यता में टांग अड़ा सकता है. मजे की बात यह है कि ब्रिटेन स्वयं 2017 में अपने यहां जनमत संग्रह करवाना चाहता है कि वह यूरोपीय संघ का सदस्य बना रहे या नहीं. स्कॉटिश जनमत संग्रह का परिणाम यदि ब्रिटेन से स्वतंत्रता के पक्ष में, और ब्रिटिश जनमत संग्रह का परिणाम यूरोपीय संघ की वर्तमान सदस्यता के विपक्ष में निकला तब तो ब्रिटेन अपनी टांग नहीं अड़ा पाएगा.

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स्वतंत्रता विरोधियों का पलड़ा भारी
इन्हीं सब अड़चनों, दुविधाओं और दांव-पेचों भरी उलझनों के कारण 18 सितंबर को हो रहे जनमत संग्रह से पहले यह स्पष्ट नहीं था कि जनता का बहुमत स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता के पक्ष में है या विपक्ष में. पिछले कुछ महीनों से मीडिया व विभिन्न संस्थाओं द्वारा कराए जा रहे मत सर्वेक्षणों (ओपिनियन पोल) में स्वतंत्रता के विरोधियों का ही पलड़ा भारी रहा है, हालांकि स्वतंत्रता के समर्थकों का अनुपात लगातार बढ़ता गया है. उदाहरण के लिए, इन पंक्तियों के लिखने तक उपलब्ध ‘येस स्कॉटलैंड’ की ओर से 12 से 15 अगस्त के बीच करवाए गए मत सर्वेक्षण में 42 प्रतिशत लोग स्वतंत्रता के पक्ष में थे. 46 प्रतिशत विरुद्ध थे. 12 प्रतिशत कुछ तय नहीं कर पाए थे. ‘स्कॉटलैंड ऑन सन्डे’ की ओर से भी ठीक उन्हीं दिनों कराए गए मत सर्वेक्षण में केवल 38 प्रतिशत ने स्वतंत्रता का समर्थन किया. 47 प्रतिशत स्वतंत्रता के विरोधी थे और नौ प्रतिशत अनिश्चित थे. उन्हीं दिनों ‘द टाइम्स’ द्वारा कराए गए मत सर्वेक्षण के परिणाम तो और भी चौंकाने वाले थेः स्वतंत्रता के पक्ष में 38 प्रतिशत, उसके विरुद्ध 51 प्रतिशत और अनिश्चित 13 प्रतिशत.

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