व्यंग्य-सी नुकीली कविताएं

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इन तमाम पंक्तियों को मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में परखा जा सकता है. देश में एक पूर्ववर्ती सरकार ने जनता को मजबूत प्रगति का आधार देने के बजाय खैरात बांटने की नीति पर काम किया और नई सरकार सत्ता मिलने के पश्चात जनता को उपदेश देने में जुटी है. विचार, साहित्य, बाजार और राजनीति, तमाम क्षेत्रों में  मौलिकता या खरेपन का संकट है, सब कुछ मिलावटी हो चला है. ऐसे ही हालात पर पंकज लिखते हैं, ‘संकरण का संक्रमण इस कदर फैला है/ विष को छोड़ बाकी सब विषैला है.’

वास्तविक जीवन में संपर्कों-संबंधों से कटकर सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में गुम हुई नौजवान पीढ़ी से लेकर साहित्य, समाज और मानवीय संबंधों को भी कवि ने अपनी कविता का विषय बनाया है. मंच का कवि होने के कारण अधिकांश कविताओं में राजनेताओं पर व्यंग्य के वार हुए हैं संभवतया इस कारण ज्यादातर कविताएं एक विशेष दायरे में कैद दिखाई पड़ती हैं. पुस्तक में कई स्थानों पर टाइपिंग की गलतियां संप्रेषणीयता को बाधित करती हैं जिनको अगले संस्करणों में सुधारा जा सकता है.

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