बिहार: छह महीने छप्पन मुसीबतें

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बिहार की राजनीति में उभरा ज्वार अब शांत दिख रहा है. करीब दो सप्ताह तक पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की वजह से रहस्यों के आवरण में लिपटी रही बिहार की राजनीति में फिलहाल काफी कुछ साफ हो चुका है. स्थिरता का माहौल बनने लगा है, लेकिन साथ में कई खटके भी हैं. नीतीश कुमार के फिर से मुख्यमंत्री बनने से सारी चीजें पटरी पर आने की बात कही जा रही है. हालांकि एक-दूसरे को घेर लेने, पटखनी देनेवाला बयानयुद्ध अभी भी जारी हैं. नीतीश कुमार अपने मंत्रिमंडल का गठन कर कामकाज शुरू कर चुके हैं. उन्होंने सार्वजनिक रूप से राज्य की जनता से सीएम पद छोड़ने के लिए माफी भी मांग ली है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ खुले मन से काम करने की बात भी कह चुके हैं. जाहिर है नीतीश कुमार उन अटकलों को विराम देना चाहते हैं जिसमें यह कहा जाता था कि वे सीएम रहने के दौरान कभी पीएम नरेंद्र मोदी से मिलना नहीं चाहते थे. नीतीश खुद से लड़ते हुए खुद में बड़े बदलाव के संकेत दे रहे हैं.

दूसरी तरफ मांझी अब भी रार ठाने हुए हैं. वे दुविधा के दोराहे से गुजर रहे हैं. सोशल मीडिया पर सक्रिय होकर लोगों से राय मांग रहे हैं कि क्या मैं नयी पार्टी बनाऊं? कभी जगन्नाथ मिश्र के घर पहुंचकर घंटेभर राय-मशविरा भी कर रहे हैं कि आगे क्या करना चाहिए. भाजपा के साथ जाना चाहिए या अलग से पार्टी का गठन करना चाहिए. जगन्नाथ मिश्र, जो बिहार में कई दफा मुख्यमंत्री रह चुके हैं और पिछले कई सालों से खुद को राजनीतिक तौर पर जिंदा रखने की कोशिश में थे, वे भी इस उठापटक में अचानक से सक्रिय हो गये हैं. इन तमाम व्यस्तताओं के बीच लालू प्रसाद यादव अपनी बेटी की शादी की व्यस्तता का बहाना बनाकर गायब हो गए हैं. न तो वे नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में आए न ही अपनी पार्टी को सरकार में शामिल होने दिया. तमाम तरह की अटकलें हवा में तैर रही हैं. सवालों के ढेर लगने शुरू हो गये हैं.

मांझी के अनपेक्षित इस्तीफे के बाद बैकफुट पर आयी भाजपा विपक्ष धर्म का निर्वाह करने में लग गई है. रोज-ब-रोज नीतीश के ऊपर हमले का क्रम चल रहा है. मोटे तौर ऊपर से बिहार के राजनीतिक हालात यही दिख रहे हैं. लेकिन अंदरखाने में हर ओर उफान की स्थिति है. जितनी धींगा-मुश्ती मांझी प्रकरण में अब तक हुई है उससे ज्यादा उठापटक की पृष्ठभूमि आगे के लिए तैयार दिख रही है. यह सवाल ज्यादातर लोगों के मन में है कि आगे क्या होगा बिहार में? इस सवाल का जवाब इतना आसान भी नहीं लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं, उससे उत्पन्न होनेवाली घटनाओं का अंदाजा मिलता हैं. पहला मसला तो नीतीश कुमार के भविष्य को लेकर ही है क्योंकि इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा अगर किसी का कुछ दांव पर लगा था तो वे नीतीश कुमार ही थे. नीतीश कुमार फिलहाल मुख्यमंत्री बनकर उन चुनौतियों से पार पाने में ऊर्जा लगा रहे हैं. एक पखवाड़े पहले तक उनके सामने मांझी की चुनौती थी. मांझी को रहने देने में से भी उनकी पार्टी का नुकसान तय था और मांझी को हटाने के बाद जो होगा उसका परिणाम आना अभी बाकी है. अब उनके सामने छह महीने के भीतर अपने छितराए हुए कुनबे और सियासत को समेटने की चुनौती है.

इस बात पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं कि अब वे ऐसा क्या करेंगे जिससे छह माह में खुद को और अपनी पार्टी को चुनाव की चुनौती से उबार ले जाएंगे. नीतीश कुमार के पास कई विकल्प हैं. संभव है, वे सभी विकल्पों को एक-एक कर आजमाएं. किसी भी विकल्प को आजमाने से  पहले नीतीश कुमार को खुद में बदलाव लाना जरूरी था, वे ऐसा करते हुए दिख भी रहे हैं. उनके बारे में यह धारणा है कि वे स्वभाव से अहंकारी हैं और उनके अहंकार की वजह से ही मांझी को सीएम बनाया गया और यह सब संकट खड़ा हुआ. नीतीश विनम्रता के साथ अपने बारे में बनी इस धारणा को तोड़ने की कोशिश में हैं. नीतीश के पास सबसे पहला विकल्प किसी भी तरह से लालू प्रसाद की पार्टी राजद के साथ गठजोड़ करने का है. यह गठजोड़ होगा या नहीं, होगा तो इसका स्वरूप क्या होगा, फिलहाल यही सवाल बड़ा बन गया है. हालांकि यह बिल्कुल ही दूसरे किस्म का सवाल है और नीतीश के लिए बड़ी चुनौती भी. नीतीश कुमार इसी

संभावना को हकीकत में बदलने के लिए राजद को सरकार में शामिल करना चाहते थे और अब्दुल बारी सिद्दीकी को उपमुख्यमंत्री बनाना चाहते थे लेकिन ऐसा हो न सका.

इस बात पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं कि नीतीश ऐसा क्या करेंगे जिससे छह माह में खुद को और अपनी पार्टी को चुनाव की चुनौती से उबार ले जाएंगे

लालू प्रसाद, नीतीश कुमार के साथ राष्ट्रपति भवन तक परेड में शामिल रहे, लेकिन वे सरकार में शामिल होने से पीछे हट गए. साथ ही वे नीतीश के शपथ ग्रहण समारोह में भी नहीं पहुंचे. बताया गया कि बेटी की शादी की व्यस्तता के चलते ऐसा हुआ. यह तर्क बहुत वाजिब नहीं लगता. भाजपा नेता सुशील मोदी कहते हैं, ‘उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के यहां ही लालू प्रसाद की बेटी की शादी हो रही है. वे अखिलेश यादव नीतीश कुमार के शपथ ग्रहण समारोह में पहुंचे थे. जबकि लालू यादव बिहार के होकर, इस पूरे प्रकरण का हिस्सा होने के बावजूद शपथ ग्रहण से गायब रहे.’ जितनी बड़ी चुनौती नीतीश के सामने है, उतनी ही बड़ी चुनौती लालू प्रसाद के सामने भी है. यह बात जगजाहिर है कि बिहार में लालू यादव का राजनीतिक वजूद नीतीश कुमार ने ही दरकाया है. आज लालू यादव खुद सांसद या विधायक बनने के योग्य नहीं हैं लेकिन अपने बेटे-बेटियों को राजनीति में स्थापित करने की उनकी पूरी इच्छा है. ऐसे में लालू प्रसाद ऐसी कोई गलती नहीं करना चाहते, जिससे उनकी भावी पीढ़ी की राजनीतिक संभावनाओं को नुकसान हो. राजनीतिक हल्कों में माना जा रहा है कि अगर लालू यादवों के अपने घर से कोई नीतीश कुमार के साथ सरकार में अहम भूमिका में नहीं रहेगा या भविष्य में दावेदार के तौर पर पेश नहीं होगा तो उनको अपना कोर वोट बैंक (यादव-मुसलिम) ही संभालना मुश्किल हो जाएगा. इसी वोट बैंक पर लालू प्रसाद और उनकी भावी पीढ़ी के भविष्य की राजनीतिक संभावनाएं टिकी हुई हैं.

इस खतरे को भांपते हुए ही फिलहाल लालू प्रसाद ने अपने वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी को उपमुख्यमंत्री नहीं बनने दिया. लालू यादव के सामने जीतन राम मांझी का ताजा-ताजा उदाहरण भी है. जिस तरह से जीतन राम मांझी ने सत्ता पाने के बाद खुद को महादलितों का नेता बनाने में अपनी सारी ऊर्जा झोंक दी और बगावत का बिगुल फूंका, उसे देखते हुए लालू प्रसाद कोई गलती नहीं करना चाहते हैं. कल को क्या पता अब्दुल बारी भी उसी राह चले जाएं. बात इतनी ही नहीं है. नीतीश कुमार, लालू प्रसाद के साथ गठजोड़ करने के लिए जितने बेचैन हुए जा रहे हैं वैसी बेताबी लालू यादव को नहीं है. लालू प्रसाद जानते हैं कि गठजोड़ या तालमेल हो जाने के बाद भी नीतीश कुमार टिकट बंटवारे के समय इतनी आसानी से लालू प्रसाद को उतनी सीट नहीं देंगे, जितनी वे चाहते हैं. नीतीश कुमार विधानसभा में संख्याबल का हवाला देंगे. लालू प्रसाद लोकसभा चुनाव में मजबूत हुई अपनी पार्टी का वास्ता देना चाहते हैं.

यह सच भी है. 2010 के विधानसभा चुनाव में भले ही नीतीश कुमार की पार्टी को बड़ी संख्या में जीत मिली थी लेकिन 2014 में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में, भाजपा से अलगाव के बाद नीतीश कुमार की बजाय लालू प्रसाद की पार्टी ही भाजपा से लड़ने में प्रमुख रही और उसका आधार भी बढ़ा हुआ दिखा और सबसे बड़ी बात यह कि लालू प्रसाद को मालूम है कि राज्य भर के यादव मतदाताओं का जो समूह उनके साथ दो दशक से अधिक समय से चिपका हुआ है, जिसमें थोड़ी-सी दरार भाजपा ने डाली है, वह नीतीश कुमार के नेतृत्व को आगे कर देने से और भी दरक सकता है. यादव मतदाताओं के एक समूह में भाजपा लोकसभा चुनाव में सेंधमारी कर चुकी है. भाजपा ने रामकृपाल यादव को केंद्रीय मंत्री बनाकर भी बड़ा पासा फेंक दिया है. नंदकिशोर यादव जैसे नेता को भाजपा राज्य स्तर पर बड़े नेता की तरह आगे बढ़ा रही है. लालू प्रसाद की पार्टी के ही एक और धाकड़ यादव नेता पप्पू यादव विद्रोह का बिगुल बजा चुके हैं. पप्पू यादव न सिर्फ उत्तर बिहार में मजबूत पकड़ रखनेवाले नेता हैं, बल्कि हालिया दिनों में उन्होंने राज्यभर में सभाएं और यात्राएं करके अपना जनाधार बढ़ाया है.

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