भगाणा बलात्कार मामला और जनांदोलन

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जंतर-मंतर पर भगाणा के बलात्कार पीड़ितों का कैंप. आजकर यहां सन्नाटा पसरा रहता है. फोटो: विकास कुमार

दिल्ली शहर के आंदोलनों का अड्डा सुबह के सात-साढ़े सात बजे ही गुलजार हो गया है. एक तंबू के बाहर कुछ लोग घेरा बनाकर बैठे हुए हैं. लड़ाई कैसे आगे बढ़े? अगला प्रदर्शन कब करना है? आंदोलन को और धार देने के क्या उपाय हैं? जैसे मुद्दों पर चर्चा चल रही है. बातचीत को बीच में काटते हुए एक महिला बोल पड़ती है, ‘मैंने एक लिस्ट बनाई है. आगे की लड़ाई में किस व्यक्ति की क्या जिम्मदारी होगी. इसमें लिखा है.’ सारे लोग उस लिस्ट की तरफ मुखातिब हो जाते हैं. अंत में यह लिस्ट एक व्यक्ति के हाथ में पहुंचती है. वह अचानक से हरियाणवी में फट पड़ता है, ‘यह क्या है? मीडिया को कोई और क्यों देखेगा? मीडिया से तो मैं ही बात करूंगा.’ यह कह कर वह व्यक्ति बगल में रखी कलम को उठाता है और मीडिया के सामने पुराना लिखा नाम काटकर अपना नाम दर्ज कर देता है. गोले में बैठे बाकी लोग चुप रहते हैं. थोड़ी देर की चुप्पी के बाद महिला फिर से बोल उठती है, ‘इस बात का ध्यान रखिएगा कि मीडिया से बात करते हुए उन महिलाओं का नाम जरूर लिया जाए जो इस आंदोलन से जुड़ी हैं.’ जिस व्यक्ति ने लिस्ट में पहले से लिखे नाम को काटकर अपना नाम लिखा था वे बसपा के पूर्व नेता वेदपाल तंवर थे और जिस महिला ने ऐतराज जताया था वे लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अनीता भारती थीं. यह हरियाणा के भगाणा गांव से आई चार बलात्कार पीड़िताओं का कैंप है. इनके साथ कथित तौर पर 23 मार्च को गांव के ही जाट बिरादरी के कुछ लोगों ने बलात्कार किया था. और ये न्याय की आस लिए दिल्ली के जंतर मंतर पर आज भी डेरा डाले हुए हैं.

16 अप्रैल को ये पीड़ित लड़कियां गांववालों के साथ हरियाणा के पूर्व बसपा नेता वेदपाल तंवर के कहने पर दिल्ली आईं थीं. इसके बाद भगाणा की इन पीड़िताओं के लिए जंतर-मंतर से लड़ाई लड़ी जाने लगी. भगाणा संघर्ष समिति का गठन हुआ. एक बार को उपरोक्त घटना को नजरअंदाज किया जा सकता था क्योंकि ऐसी लड़ाइयों के दौरान छोटे-मोटे मतभेद उभरते ही हैं. लेकिन तब ऐसा करना असंभव है जब इस तरह के मतभेदों के चलते पूरी लड़ाई का ही बंटाधार हो जाए.

भगाणा मामले पर शांति छा गई है. जंतर-मंतर पर पीड़िताओं का कैंप सूना रहता है. सोशल मीडिया पर लिखने-बोलने वाले अब दूसरे मुद्दों की तरफ बढ़ चुके हैं

शुरू में वेदपाल तंवर के साथ इस लड़ाई का नेतृत्व अनीता भारती, जितेंद्र यादव (जेएनयू के शोधार्थी) और प्रमोद रंजन (सलाहकार संपादक फॉरवर्ड प्रेस) कर रहे थे. इस दौरान जंतर-मतर से लेकर, सोशल मीडिया तक पर भगाणा की पीड़िताओं के बारे में बोला और लिखा जा रहा था. लेकिन आज दो महीने बाद भगाणा मामले पर चारों तरफ शांति पसरी हुई है. जंतर-मतर पर पीड़िताओं का कैंप लगभग खाली रहता है. सोशल मीडिया पर लिखने-बोलनेवाले अब दूसरे मुद्दों की तरफ बढ़ चुके हैं. लड़ाई आज भी वहीं खड़ी है और लड़ने वाले आगे बढ़ गए हैं. बिंदुवार देखने पर आपसी खींचतान, अवसरवाद, बलात्कार पीड़िताओं के दुख में अपना हित तलाशने की इतनी कहानियां इस इकलौते आंदोलन में देखने को मिलती हैं कि आधुनिक दौर के आंदोलनकारियों और आंदोलनों की असलियत का पता चल जाता है.

1. जुलाई आते-आते वे सभी चेहरे इस आंदोलन से दूरी बनाने लगे थे जो इसका नेतृत्व कर रहे थे. अनीता भारती ने इसी समय एक फेसबुक स्टेटस लिखा कि इस आंदोलन का इस्तेमाल एनजीओ से जुड़े लोग अपने हितों के लिए कर रहे हैं. वे लिखती हैं, ‘भगाणा की बेटियों को अभी न्याय मिला भी नहीं है और इन एनजीओबाजो ने बड़े-बड़े विदेशी फंडेड प्रोजेक्ट लेकर यात्राएं, रैलियां आदि निकालनी शुरू कर दी हैं ताकि ये लोग नई बनी सरकार के सामने अपने को दलितों का सबसे बड़ा हितैषी दिखा पाएं. जिस भी पार्टी की सरकार हो ऐसे एनजीओबाजों की हमेशा चांदी होती है.’ दिलचस्प बात यह है कि अनीता भारती जिस एनजीओ की तरफ इशारा कर रही हैं वह खुद उनके भाई अशोक भारती का है जिसका नाम नेशनल कन्फेडरेशन ऑफ दलित ऑर्गनाइजेशन्स (नेक्डोर) है.

अशोक भारती के बारे में भगाणा के ग्रामीणों का आरोप है कि एक दिन वे सुबह-सुबह आए और कहने लगे कि हम आपकी लड़ाई को लड़ रहे हैं. आगे भी लड़ेंगे. आप हमें एक ऐफिडेविट बनवाकर दे दीजिए कि इस लड़ाई को नेक्डोर लड़ रहा है. इस बारे में भगाणा के सतीश काजला कहते हैं, ‘हम तो गांव से इस उम्मीद पर आए थे कि दिल्ली जाएंगे तो न्याय जल्दी मिल जाएगा. लड़ाई सरकार के करीब रहकर लड़ेंगे तो सरकार जल्दी सुन लेगी. लेकिन जब अशोक भारती ने ऐफिडेफिट बनवाने वाली बात कही तब तो मेरे नीचे से जमीन ही सरक गई. हमने उन्हें साफ-साफ मना कर दिया.’ अनीता भारती के मुताबिक वे आज भी भगाणा की पीड़िताओं के साथ हैं.

2.  इस मामले में दूसरे मुख्य चेहरे जीतेंद्र यादव खुद के अलग होने की वजह आंदोलन में मजदूर बिगुल दस्ते के शामिल होने को बताते हैं. उनके मुताबिक ये लोग बहुत आक्रामक तरीके से आंदोलन को आगे बढ़ाना चाहते थे. हालांकि जब इस बारे में मजदूर बिगुल दस्ता की सदस्य शिवानी से बात हुई तो यही बात सामने आई कि जीतेंद्र भी मूलत: आंदोलन के ऊपर अपने वर्चस्व को लेकर ही अलग हुए थे. शिवानी कहती हैं, ‘प्रमोद रंजन और जितेंद्र यादव जैसे लोगों की वजह से ही भगाणा की यह लड़ाई ठप पड़ गई. ये लोग इस आंदोलन को जातिगत रूप देना चाहते थे. जिसका हमने विरोध किया था.’

3. मजदूर बिगुल दस्ते और शुरुआती नेतृत्वकर्ताओं के बीच पिस रही भगाणा की पीड़िताओं की त्रासदी यहीं नहीं रुकी. आंदोलन के दौरान ही ‘नौजवान भारत सभा’ नामक संगठन को, जोकि मजदूर बिगुल दस्ता से ही जुड़ा है, इसमें हिस्सा लेने के बदले ढाई हजार रुपया दे दिए गए. तहलका द्वारा इस बारे में पूछने पर प्रमोद रंजन बताते हैं कि उन्होंने (नौजवान भारत सभा ने) हमसे आने-जाने के लिए गाड़ी के इंतजाम की बात कही थी सो हमने उन्हें पैसे दे दिए. इस पर बिगुल दस्ता की शिवानी का कहना था ‘यह प्रस्ताव हमारा नहीं था. यह उनका प्रस्ताव था. वे प्रदर्शन में ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने चाहते थे.’ अजीब सी बात है. एक जनांदोलन से जुड़े लोग पीड़ितों के लिए मिले पैसे को राजनीतिक पार्टियों की तरह भीड़ जुटाने के लिए खर्च कर रहे थे.

4. अप्रैल के आखिरी हफ्ते में अतुल तिवारी नामक एक पत्रकार को प्रेस रिलीज बनाने और मीडिया को जंतर-मंतर तक बुलाने के लिए रखा गया. इस पत्रकार को चंदे के पैसे में से प्रतिदिन एक हजार रुपये दिए गए. अतुल का काम था हर शाम को प्रेस रिलीज बनाना और उसे मीडिया संस्थानों को मेल करना. अतुल ने यहां सात दिनों तक काम किया. इस खर्चे पर भगाणा के ग्रामीणों ने आपत्ति उठाई. उनका कहना था कि चंदा मांग कर जो लड़ाई लड़ी जा रही है उसमें किसी को केवल प्रेस रिलीज बनाने के लिए एक दिन का एक हजार रुपया दिया जाना ठीक नहीं. बाद में पता चला कि मीडिया में अपनी छवि चमकाने के लिए यह नियुक्ति वेदपाल तंवर, प्रमोद रंजन, अनीता और जितेंद्र ने करवाई थी.

5. एक मई की शाम को जंतर-मंतर पर एक शर्मनाक नजारा देखने को मिला. आंदोलन का नेतृत्व कौन करे, इस बहस में मामला गाली-गलौज तक पहुंच गया. ग्रामीणों का कहना था कि कमान ग्रामीणों के हाथों में रहनी चाहिए. जबकि वेदपाल तंवर जो खुद अगुवाई करना चाहते थे इस बात पर भड़ककर बैठक छोड़कर चले गए. इस घटना के करीब एक घंटे बाद नेतृत्व के मसले पर एक बार फिर से भगाणा के ग्रामीण रामफल जांगड़ा और प्रमोद रंजन के बीच हाथापाई हो गई. रामफल कहते हैं, ‘उन्होंने शराब पी रखी थी. आते ही कहने लगे कि आ मैं सिखाता हूं तुम्हें नेता कैसे बनते हैं. उसने आगे बढ़कर मेरी गर्दन पकड़ने की कोशिश की. फिर हमने भी थोड़ा कड़ाई से काम लिया.’ इन आरोपों पर प्रमोद रंजन कहते हैं कि वे कभी-कभार शराब पीते हैं. उस शाम उन्होंने नहीं पी थी. लेकिन जितेंद्र यादव स्वीकार करते हैं कि हाथापाई हुई थी और दोनों ने शराब पी रखी थी.

6. आपसी खींचतान चल रही थी, इसी बीच आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं ने पीड़िताओं पर एक किताब प्रकाशित करने का फैसला लिया. यह किताब दुसाध प्रकाशन की तरफ से ‘भगाणा की निर्भयाएं’ नाम से छपी. दुसाध प्रकाशन के सर्वेसर्वा एचएल दुसाध, प्रमोद रंजन और जितेंद्र यादव इस किताब के संपादक बने. प्रकाशक का कहना था कि किताब की बिक्री से जो पैसा आएगा वह भगाणा की पीड़ित लड़कियों को सहायता स्वरूप दिया जाएगा. 22 जून को दुसाध फेसबुक स्टेटस के जरिए किताब का मूल्य बताते हैं. वे यह भी लिखते हैं कि किताब की 200 प्रतियां पीड़ितों को दी गई हैं और किताब उनकी आय का सम्मानजनक जरिया तथा उनको न्याय दिलाने का हथियार बनेगीं. वे लोगों से अपील करते हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा संख्या में इस किताब को खरीदें.

अपनी इस किताब को बेचने का दुसाध का यह एक नायाब तरीका था. असल में उन्होंने पीड़ित लड़कियों के परिजनों से इस किताब को अपने कैंप के सामने स्टाल लगा कर बेचने के लिए कहा था. उनका कहना था कि एक किताब जितने में बिकेगी उसका आधा पैसा परिजन रखेंगे और आधा वे यानि एचएल दुसाध. मार्केटिंग का यह नया तरीका है. पहले पीड़िताओं पर किताब प्रकाशित करें और फिर उन्हीं से किताब बिकवाएं. ज्यादातर को तो पता भी नहीं है कि किताब में उनके बारे में क्या लिखा गया है. वे दिल्ली आए थे, न्याय पाने के लिए, यहां उन्हें किताब बेचने का काम थमा दिया गया. इस बारे में प्रकाशक एचएल दुसाध से बातचीत की कोशिश असफल रही.

जब हम इस बारे में जेएनयू के प्रोफेसर और दलित मामलों को लेकर सक्रिय रहनेवाले गंगा सहाय मीणा से बात कहते हैं तो कहते, ‘देखिए, आंदोलन पर किताब छापना कोई गुनाह नहीं है. यह अच्छी बात ही है. लेकिन जिस तरह से दुसाध जी ने किताब बेचने की कोशिश की है वो एकदम गलत है. ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए था.’

यह सब होता रहा और होते-होते इतना आगे बढ़ गया कि अब इस लड़ाई का पूरी तरह से सत्यानाश हो चुका है. फिलहाल जंतर-मंतर पर पीड़ितों के कुछ परिजन बैठे रहते हैं. चारों लड़कियां कुछ समय यहां रहती हैं, कुछ समय हिसार में. पीड़ित लड़कियों को हर कुछ दिन पर तारीख के लिए कोर्ट में जाना पड़ता है. उन्हें दिल्ली लाने वाले वेदपाल तंवर कुछ ही दिन पहले नई राजनीतिक पार्टी, हरियाणा जनहित कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. अनीता भारती अपनी नियमित आंदोलनों (दूसरे) और नौकरी वाली दिनचर्या में व्यस्त हैं. प्रमोद रंजन अपनी पत्रिका का संपादन कर रहे हैं और जितेंद्र यादव उसी जंतर-मंतर पर किसी दूसरे मुद्दे को लेकर सभाएं आयोजित करवा रहे हैं. यही है आज के आंदोलन और आंदोलनकारियों का सच जिसे बलात्कार पीड़िता और उनके परिजन समझने की कोशिश करते अपनी लड़ाई खुद लड़ने की तैयारी कर रहे हैं.

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