दो का मेल, दो की लड़ाई और तीसरा कोण

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ऊहापोह खत्म हो चुका है. धुंध छंट चुकी है. बिहार में जो होना था, वह हो चुका है. इस हो जाने का जो परिणाम होगा, उसमें अभी थोड़ा वक्त है.

10 सीटों पर होनेवाले विधानसभा उपचुनाव के लिए सीटों पर तालमेल के साथ राजनीति के दो चर्चित दुश्मन लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दो दशक बाद एक-से हो गए हैं. एकाकार होना अभी बाकी है. यह एकता सांप्रदायिक शक्तियों से लड़ने या दूसरे शब्दों में कहें तो भाजपा को रोकने के नाम पर हुई है. लालू प्रसाद के अतीत को ही आधार बनाकर सत्ता की सियासत मजबूती से साधनेवाले नीतीश कुमार उन्हीं लालू के साथ मिलकर क्या कर पाएंगे, इस विधानसभा उपचुनाव मंे देखा जाएगा. लेकिन इस महागठबंधन की इससे भी बड़ी परीक्षा अगले साल के अंत में होनेवाली है. यानी विधानसभा चुनाव में. हालांकि रटे-रटाये मुहावरे की तरह इस बार के विधानसभा उपचुनाव को सेमीफाइनल जैसा कहा जा रहा है, लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसे सेमीफाइनलों से किसी निश्चित दिशा का निष्कर्ष निकालने वालों ने कई बार मुंह की खाई है.

2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल  धुआंधार प्रदर्शन के साथ मजबूत होकर उभरी थी. इसे 2005 के विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल मान लिया गया था. लेकिन 2005 के विधानसभा चुनाव में राजद औंधे मुंह गिरा. 2009 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू और भाजपा का प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा था, लेकिन कुछ महीने बाद ही हुए विधानसभा उपचुनावों में दोनों पार्टियां कमजोर हुईं और राजद मजबूत. इस नतीजे को भी सेमीफाइनल माना गया. कहा गया कि विधानसभा उपचुनाव में लालू प्रसाद की पार्टी का प्रदर्शन इतना लाजवाब रहा है तो 2010 में होनेवाले विधानसभा चुनाव में भी यही ट्रेंड रहेगा. लेकिन कुछ माह बाद ही ट्रेंड बदल गया और विधानसभा उपचुनाव में औंधे मुंह गिरी भाजपा और जदयू को विधानसभा के मुख्य चुनाव में ऐतिहासिक जीत मिली.

लालू-नीतीश के नये गठजोड़ का मुकाबला भाजपा से होना है. भाजपा के साथ रामविलास पासवान हैं और उपेंद्र कुशवाहा भी. इन दोनों मोर्चों के बीच लड़ाई पर ही चर्चा है. लेकिन बिहार की राजनीति में एक तीसरा कोण भी है-वर्तमान मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का.

बिहार के नये समीकरणों में मांझी को महज अस्थायी या वैकल्पिक मुख्यमंत्री के दायरे में समेटकर राजनीति की बिसातें बिछ रही हैं. मांझी महादलित समुदाय से हैं. नीतीश कुमार ने उन्हें सीएम बनाया है, लालू प्रसाद ने समर्थन दिया है जैसी बातें कही जा रही हैं. लेकिन आगे मांझी की भूमिका महज वर्तमान या वैकल्पिक मुख्यमंत्री जैसी ही रह जाए, इसके आसार कम ही दिखते हैं. मांझी भविष्य में भी मुख्यमंत्री बने रहना चाहते हैं, नीतीश कुमार की परिधि भी लांघना चाहते हैं. वे नीतीश को अपना नेता तो मानते हैं, उन्हें महान आदमी बताते हैं, लेकिन आंखें बंदकर उनके रास्ते पर चलने वाले नहीं रह गए हैं. तहलका से बातचीत में वे नीतीश के कुछ माॅडलों को तो खारिज करते ही हैं बिना किसी हिचक के कुछ मसलों पर लालू प्रसाद को भी एक सिरे से खारिज करने में संकोच नहीं करते.

मांझी के संकेत यह भ्रम तोड़ते लगते हैं कि अब उन्हें इशारे से सत्ता की सियासत में उठाया या बैठाया जा सकता है. मांझी नीतीश कुमार से कुछ मसलों पर पार्टी स्तर पर मतभिन्नता रखते हैं, इसका अहसास एक-दो मौके पर  पहले भी हो चुका है. जब जदयू के बागी विधायकों पर पार्टी कार्रवाई की तैयारी में थी तो उन्होंने साफ-साफ कह दिया था कि इसमें हड़बड़ी दिखाने की जरूरत नहीं. उसके बाद जब राजद और जदयू में तालमेल होने की बात चल रही थी और नीतीश भी इसपर सिर्फ इतना ही कह रहे थे तो मांझी ने अचानक कह दिया कि सीटों के बंटवारे पर बात चल रही है. यह समन्वय का अभाव हो सकता है, लेकिन इसका एक संदेश तो साफ है कि या तो जदयू की ओर से मांझी को अद्यतन सूचनाएं उपलब्ध नहीं करायी जातीं या मांझी एक अहम नेता के तौर पर अपनी बात भी अलग से रखना चाहते हैं.

24 जुलाई को मांझी से करीब घंटे भर की हुई बात-मुलाकात से कई और दूसरे संकेत और संदेश भी मिलते हैं. इनसे यह साफ होता है कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के इस तालमेल में अहम केंद्र के तौर पर मांझी ही होंगे.

तहलका से जब मांझी की बात होती है तो सबसे पहले वे राज्य में अनु.जाति के छात्रों के लिए संचालित आवासीय विद्यालयों की स्थिति पर बात करते हैं. कहते हैं कि बिहार की स्थिति इस मामले में बद से बदतर है जबकि दूसरे राज्यों ने इसपर बहुत काम किया है. ऐसा कहकर मांझी सिर्फ एक नयी कोशिश करने की बात भर नहीं कहते बल्कि संकेत साफ होता है कि वे नीतीश के दलित विकास माॅडल की बुनियाद को भी नकारते हैं. बातों ही बातों में मांझी दो-तीन बार यह भी कहते हैं कि जब अगले विधानसभा चुनाव के वक्त नेतृत्व के चयन की बात आएगी तो सबको बहुतेरी बातों का ध्यान रखना होगा. प्रतिकूल स्थिति में भी अगर महादलित जदयू के साथ रहा है तो वह सिर्फ मांझी की वजह से रहा. महादलित ही जदयू का इकलौता ठोस वोट बैंक रह गया है, जो अभी और बढ़ेगा. साफ है कि भले ही नीतीश ने मुख्यमंत्री का पद छोड़ते वक्त यह एलान किया हो कि अगले चुनाव में नेतृत्व करने के लिए वे फिर से आ जाएंगे लेकिन अब यह इतना आसान भी नहीं लगता.

बिहार की राजनीति को समझने वाले जानते हैं कि मांझी वक्त की नजाकत समझते हुए अपनी चाल चलने के महारती हैं. वे कांग्रेस के बेहतर दिनों में कांग्रेसी थे, राजद के उफानी काल में लालू के खेमे में और फिर जब लालू के ही खिलाफ खड़े नीतीश कुमार का सुशासन आया तो वे नीतीश के साथ हो गए. मांझी जानते हैं कि उन्हें अगर अपनी अलग पहचान बनानी है, नीतीश कुमार के आभामंडल से बाहर निकलना है तो कुछ अपने तरीके की बातें भी कहनी होंगी. इसलिए जब लालू प्रसाद मंडलवादी ताकतों को एक करने और मंडल की राजनीति वापस लाने में ऊर्जा लगाये हुए हैं और नीतीश कुमार इसमें उनका साथ देने के लिए उनके साथ हो चुके हैं तो मांझी ने दूसरी बातों को हवा देने की शुरुआत कर दी है. तहलका से बातचीत(नीचे दिए गए लिंक को देखें) में वे कहते हैं कि सिर्फ जाति के आधार पर नहीं बल्कि आर्थिक व शैक्षणिक स्तर पर प्राथमिकता की बात होनी चाहिए. मांझी जानते हैं कि बिहार में जो नया महागठजोड़ जैसा बना है वह नीतीश कुमार, लालू प्रसाद और कांग्रेस का है, लेकिन वे उदाहरणों व उद्धरणों के जरिये तीनों को घेरते हैं.

नीतीश कुमार भाजपा को साधने के लिए लालू के साथ जा चुके हैं. लालू प्रसाद नीतीश कुमार के साथ होकर भी मौके-बेमौके उन्हें और उनकी पार्टी को बैकफुट पर लाकर पुराना हिसाब-किताब बराबर कर रहे हैं. इन दोनों के बीच जीतन राम मांझी एक साथ सबको साधकर भविष्य में संभावनाओं की तलाश में लगे हुए हैं. संभावनाओं के वे द्वार कहां से खुलेंगे, कैसे खुलेंगे, यह मांझी जानते हैं. लालू प्रसाद और नीतीश कुमार यदि पिछले करीब ढाई दशक से बिहार की सत्ता में चंद्रगुप्त, चाणक्य, किंग, किंगमेकर आदि विशेषणों से विभूषित होते रहे हैं तो कम बोलनेवाले, हंसकर बोलनेवाले, स्वभाव से सहज और सरल मांझी भी अपनी चार दशक की राजनीति में उचित समय में संभावनाओं के द्वार तलाश लेने वाले उस्ताद नेता रहे हैं.

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