दो का मेल, दो की लड़ाई और तीसरा कोण | Tehelka Hindi

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दो का मेल, दो की लड़ाई और तीसरा कोण

बिहार में जो नए राजनीतिक हालात बने हैं उनमें आगे के सारे समीकरण नीतीश कुमार-लालू प्रसाद यादव के मेल और उनके सामने खड़ी भाजपा के संदर्भ में ही देखे जा रहे हैं. लेकिन भविष्य के इन राजनीतिक समीकरणों में एक तीसरा कोण भी है-वर्तमान मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का
निराला 2014-08-15 , Issue 15 Volume 6

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ऊहापोह खत्म हो चुका है. धुंध छंट चुकी है. बिहार में जो होना था, वह हो चुका है. इस हो जाने का जो परिणाम होगा, उसमें अभी थोड़ा वक्त है.

10 सीटों पर होनेवाले विधानसभा उपचुनाव के लिए सीटों पर तालमेल के साथ राजनीति के दो चर्चित दुश्मन लालू प्रसाद और नीतीश कुमार दो दशक बाद एक-से हो गए हैं. एकाकार होना अभी बाकी है. यह एकता सांप्रदायिक शक्तियों से लड़ने या दूसरे शब्दों में कहें तो भाजपा को रोकने के नाम पर हुई है. लालू प्रसाद के अतीत को ही आधार बनाकर सत्ता की सियासत मजबूती से साधनेवाले नीतीश कुमार उन्हीं लालू के साथ मिलकर क्या कर पाएंगे, इस विधानसभा उपचुनाव मंे देखा जाएगा. लेकिन इस महागठबंधन की इससे भी बड़ी परीक्षा अगले साल के अंत में होनेवाली है. यानी विधानसभा चुनाव में. हालांकि रटे-रटाये मुहावरे की तरह इस बार के विधानसभा उपचुनाव को सेमीफाइनल जैसा कहा जा रहा है, लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसे सेमीफाइनलों से किसी निश्चित दिशा का निष्कर्ष निकालने वालों ने कई बार मुंह की खाई है.

2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल  धुआंधार प्रदर्शन के साथ मजबूत होकर उभरी थी. इसे 2005 के विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल मान लिया गया था. लेकिन 2005 के विधानसभा चुनाव में राजद औंधे मुंह गिरा. 2009 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू और भाजपा का प्रदर्शन ऐतिहासिक रहा था, लेकिन कुछ महीने बाद ही हुए विधानसभा उपचुनावों में दोनों पार्टियां कमजोर हुईं और राजद मजबूत. इस नतीजे को भी सेमीफाइनल माना गया. कहा गया कि विधानसभा उपचुनाव में लालू प्रसाद की पार्टी का प्रदर्शन इतना लाजवाब रहा है तो 2010 में होनेवाले विधानसभा चुनाव में भी यही ट्रेंड रहेगा. लेकिन कुछ माह बाद ही ट्रेंड बदल गया और विधानसभा उपचुनाव में औंधे मुंह गिरी भाजपा और जदयू को विधानसभा के मुख्य चुनाव में ऐतिहासिक जीत मिली.

लालू-नीतीश के नये गठजोड़ का मुकाबला भाजपा से होना है. भाजपा के साथ रामविलास पासवान हैं और उपेंद्र कुशवाहा भी. इन दोनों मोर्चों के बीच लड़ाई पर ही चर्चा है. लेकिन बिहार की राजनीति में एक तीसरा कोण भी है-वर्तमान मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का.

बिहार के नये समीकरणों में मांझी को महज अस्थायी या वैकल्पिक मुख्यमंत्री के दायरे में समेटकर राजनीति की बिसातें बिछ रही हैं. मांझी महादलित समुदाय से हैं. नीतीश कुमार ने उन्हें सीएम बनाया है, लालू प्रसाद ने समर्थन दिया है जैसी बातें कही जा रही हैं. लेकिन आगे मांझी की भूमिका महज वर्तमान या वैकल्पिक मुख्यमंत्री जैसी ही रह जाए, इसके आसार कम ही दिखते हैं. मांझी भविष्य में भी मुख्यमंत्री बने रहना चाहते हैं, नीतीश कुमार की परिधि भी लांघना चाहते हैं. वे नीतीश को अपना नेता तो मानते हैं, उन्हें महान आदमी बताते हैं, लेकिन आंखें बंदकर उनके रास्ते पर चलने वाले नहीं रह गए हैं. तहलका से बातचीत में वे नीतीश के कुछ माॅडलों को तो खारिज करते ही हैं बिना किसी हिचक के कुछ मसलों पर लालू प्रसाद को भी एक सिरे से खारिज करने में संकोच नहीं करते.

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 6 Issue 15, Dated 15 August 2014)

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