हिमांशु बाजपेयी, Author at Tehelka Hindi — Tehelka Hindi
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Articles By हिमांशु बाजपेयी
लखनऊ का मतलब सिर्फ नवाब नहीं बल्कि कहार और ब्रास बैंड वाले भी हैं : नदीम हसनैन

लखनऊ पर जितनी किताबें हैं उतनी हिंदुस्तान के बहुत कम शहरों पर लिखी गई हैं. इन सबके बीच आपकी किताब किस तरह से अलग है? दिल्ली और कलकत्ता जैसे शहरों के बारे में जो लिखा गया है उन्हंे मैंने उतनी गहराई से नहीं पढ़ा है. मगर यह काम चूंकि मैं  

होली खेले आसफुद्दौला वजीर…

मिली-जुली तहजीब की शानदार मिसाल है लखनऊ की होली.  

संगीत के साथ जैसे उन्हें जीवन वापस मिल गया था. गाना दोबारा शुरू करते हुए उन्हें यह डर था कि पता नहीं इतने समय बाद वो गा भी पाएंगी या नहीं और लोगों पर उनका जादू वैसे ही चलेगा या नहीं. लेकिन जब उन्होंने गाया तो दोबारा उसी तरह की  

उपेक्षा का दर्द

आजादी के आंदोलन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा लखनऊ का रिफह-ए-आम क्लब फिलहाल अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है  

अब तो यही हैं दिल से दुआएं भूलने वाले भूल ही जाएं…

लखनऊ की दरबारी-बैठक गायिकी की अंतिम कलाकार जरीना बेगम अपने आखिरी दिनों में गंभीर बीमारी, आर्थिक तंगी और उपेक्षा से जूझ रही हैं, उन्हे मदद की सख्त जरूरत है  

10 साल की दास्तान

उर्दू में लंबी कहानियां सुनाने की कला को दास्तानगोई के नाम से जाना जाता है. यह अजीम-अो-शान कला इस साल अपने पुनरुत्थान के दस साल पूरे कर रही है. इस बिसरा दी गई विरासत को अवाम के बीच फिर से मशहूर करने के लिए कुछ युवा पुरजोर कोशिश में लगे हैं  

अइसी कविता ते कौनु लाभ!

2015  अवधी भाषा के महत्वपूर्ण कवि-नाटककार चन्द्रभूषण त्रिवेदी उर्फ रमई काका का जन्मशताब्दी वर्ष है. पढ़ीस और वंशीधर शुक्ल के साथ रमई काका अवधी की उस अमर ‘त्रयी’ का हिस्सा हैं जिसकी रचनात्मकता ने तुलसी और जायसी की अवधी को एक नई साहित्यिक समृद्धि प्रदान की. यूं अवधी की इस  

‘मेरी अच्छी किताब को साहित्य अकादमी मिला ही नहीं’

मुनव्वर राना को हाल ही में उनके कविता संग्रह ‘शहदाबा’ के लिए उर्दू के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. वाली ‘आसी’ के शागिर्द मुनव्वर राना निम्न एवं मध्यम वर्ग के जनजीवन को शेरगोई का मौज़ू बनाने के लिए, ख़ासकर मां पर शेर कहने के लिए जाने जाते  

जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे…

साल 2014 जिन शख्सियतों की जिंदगी का अहम पड़ाव है, उनमें ग़ज़ल साम्राज्ञी बेगम अख्त़र का नाम भी शामिल है. बेगम की याद में पूरे साल देशभर में जलसे और संगीत कार्यक्रम होते रहे, क्योंकि यह उनकी पैदाइश का सौंवा साल था. अगर सितारों के बीच कहीं से बेगम देख रही होंगी, तो फख्र कर रही होंगी कि जिस माटी से उन्होंने मुहब्बत की थी, उसने उन्हें भुलाया नहीं है  

हम फिदा-ए-लखनऊ

‘किसी शहर का चरित्र खोजना है तो उसके जन में बसे किस्से-कहानियों में खोजा जाए.’ लखनऊ के संदर्भ में कही गई अमृतलाल नागर की ये पंक्ति इस शहर के मूल चरित्र की पहचान करने में बेहद सहायक है. खुद नागर जी का सम्पूर्ण साहित्य लखनऊ के ऐसे ही बेशुमार किस्से-कहानियां